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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

**१७—कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता**

वैराग्य प्रकरण ] * कालके स्वरूपका विवेचन * ५१


शक्ति होनेपर खानेकी ही शक्ति नहीं रहती। इस प्रकार शक्तिह्रासके कारण भोगकी इच्छा तो बड़ी प्रबल हो उठती है, परंतु उपभोग किया नहीं जा सकता। उस दशामें निश्चय ही हृदय जलता रहता है। मुने ! शरीररूपी वृक्षके सिरेपर बैठी हुई जरावस्थारूपिणी वृद्धा बगुली, जो नाना प्रकारके क्लेशोंसे शरीरका अपकार करनेवाली है, रोगरूपी सर्पोंसे आक्रान्त होकर ज्यों ही चें-वें करने लगती है, त्यों ही मूर्च्छारूपी गहरे अन्धकारकी इच्छा रखनेवाला मृत्युरूपी उल्लू कहींसे झटपट आया हुआ ही दिखायी देता है।

जैसे सायंकालकी संध्याके प्रकट होते ही अन्धकार दौड़ पड़ता है, उसी प्रकार शरीरमें जरावस्थाको देखते ही मृत्यु दौड़ी चली आती है। सूना नगर, जिसकी लताएँ कट गयी हों वह वृक्ष तथा जहाँ वर्षा न हुई हो, वह देश भी कुछ-कुछ शोभित होता है, किंतु जरासे जर्जर हुए शरीरकी तनिक भी शोभा नहीं होती। वृद्धावस्थाकी मार खाकर जर्जर हुआ शरीर हिमसमूहसे आक्रान्त हो मुरझाये हुए कमलकी-सी शोभाको धारण करता है।

मस्तकरूपी पर्वतके शिखरपर उगी हुई यह वृद्धावस्था-रूपिणी चाँदनी वातरोग और खाँसीरूपिणी कुमुदिनी-को यत्नपूर्वक विकसित कर देती है। यह बुढ़ापारूपिणी वेगवती गङ्गा आयुके समाप्त होनेपर शरीररूपी तटवर्ती वृक्षकी जड़ोंको तुरंत ही काट गिराती है। तात ! जैसे श्वेत पत्रवाली और फूलोंसे लदी हुई पतली लता कुछ टेढ़ी हो जाती है, उसी प्रकार जिसके सारे अवयव सफेद हो गये हैं, मनुष्योंका वह दुबला-पतला शरीर वृद्धावस्थासे टेढ़ा हो जाता है—कमानकी तरह झुक जाता है। मुने ! जैसे कपूरसे सफेद हुए केलेके पेड़को हाथी क्षणभरमें उखाड़ फेंकता है, उसी प्रकार मृत्युरूपी गजराज वृद्धावस्थासे कपूरकी भाँति सफेद हुई देहको निश्चय ही क्षणभरमें उखाड़ फेंकता है। तात ! जो वृद्धावस्थाको प्राप्त होकर भी जीता है, उस दुष्ट जीवनके लिये दुराग्रह रखनेसे क्या लाभ ? भूतलपर किसीसे पराजित न होनेवाली यह जरावस्था मनुष्योंकी समस्त एषणाओंका तिरस्कार कर देती है—उनकी किसी भी इच्छाको सफल नहीं होने देती। (सर्ग २२)


कालके स्वरूपका विवेचन

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! 'यह मेरी भोग्य वस्तु है। मैं इसका भोक्ता हूँ। ये भोगके साधन हैं। इस साधनसे इस तरह भोग्य वस्तुको प्राप्त करके मैं चिरकालतक इसका उपभोग करूँगा। आज यह वस्तु मैंने प्राप्त कर ली और अब इस मनोरथको प्राप्त करूँगा' इत्यादि असंख्य मानसिक संकल्प-विकल्पोंद्वारा जो अनन्त व्यावहारिक वचनोंका प्रयोग करते हैं तथा अन्र ( तुच्छ ) शरीरमें महत्त्व-बुद्धि ( आत्मभाव ) रखते हैं, उन मूढ़ जनोंने हेयोपादेय, शत्रु-मित्र तथा राग-द्वेषादि भेदोंद्वारा इस संसाररूपी गुफामें भ्रमको अत्यन्त गौरवपूर्ण ( दुश्छेद्य ) बना दिया है। जैसे बड़वाग्नि उमड़े हुए समुद्रको सोखती है, उसी प्रकार यह सर्वभक्षी काल भी उत्पन्न हुए जगत्को अपना ग्रास बना लेता है। भयंकर कालरूपी महेश्वर इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चको निगल जानेके लिये सदा उद्यत रहते हैं; क्योंकि सारी वस्तुएँ उनके लिये सामान्यरूपसे ग्रास बना लेनेके योग्य हैं। युग, वर्ष और कल्पके रूपमें काल ही प्रकट है। इसका वास्तविक रूप कोई देख नहीं सकता। वह सब संसारको अपने वशमें करके बैठा है। संसारमें जो रमणीय, शुभ कर्म करनेवाले तथा उच्चता या गौरवमें सुमेरु पर्वतके भी गुरु थे, उन सबको कालने उसी तरह

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* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *
[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

निगल लिया है, जैसे गरुड़ सर्पोंको निगल जाते हैं। यह काल बड़ा निर्दय, कठोर, क्रूर, कर्कश, कृपण और अधम है। संसारमें अबतक ऐसी कोई वस्तु नहीं हुई, जिसे यह काल उदरस्थ न कर ले। इस कालका विचार सदा सबको निगल जानेका ही रहता है। यह एकको निगलता हुआ भी दूसरेको चबा जाता है। अबतक असंख्य लोग इसकी उदर-दरीमें प्रवेश कर चुके हैं, तो भी यह महाखाऊ काल तृप्त नहीं होता। यह रात्रिरूपी भौरोंसे भरी हुई और दिनरूपी मञ्जरियोंमें सुशोभित वर्ष, कल्प और कलारूपिणी लताओंको निरन्तर सृष्टि करता रहता है, किंतु कभी थकता नहीं।

मुने ! यह काल धूर्तोका शिरोमणि है। इसे कितना ही तोड़ा जाय, टूटता नहीं। जलानेपर भी जलता नहीं और दृश्य होनेपर भी दीखता नहीं। यह मनोराज्यकी भाँति फैला हुआ है। एक ही निमेषमें किसी वस्तुको उत्पन्न कर देता है और पलभरमें किसी भी वस्तुका पूर्णतः विनाश कर डालता है। काल केवल अपना ही पेट भरनेमें संलग्न रहनेके कारण तिनका, धूल, इन्द्र, सुमेरु, पत्ता और समुद्र—सबको अपने अधीन करने—निगल जानेके लिये उद्यत रहता है। केवल इस कालमें ही पर्याप्त क्रूरता भरी है, लोभ भी इसीके भीतर डेरा डाले हुए है। सारा-का-सारा दुर्भाग्य भी इसीमें निवास करता है तथा दुःसह चपलता भी इसीमें उपलब्ध होती है। यह काल महाकल्प नामक वृक्षोंसे देवता, मनुष्य और असुर आदि प्राणिसमूहरूपी फलोंके भारोंको गिराता हुआ-सा खड़ा है। सैकड़ों महाकल्प बीत जानेपर भी यह काल न तो खिन्न होता है, न किसीके द्वारा समादृत होता है, न कहीं आता है न जाता है, न अस्त होता है और न इसका उदय ही होता है। यौवनरूपी कमलिनीको संकुचित करनेके लिये यह चन्द्रमाके समान है, आयुरूपी गजराजका मस्तक विदीर्ण करनेके लिये सिंहके सदृश है। इस संसारमें तुच्छ या महान् कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे यह कालरूपी चोर चुरा न ले जाता हो; यह काल ही व्यावहारिक अवस्था में संसारका कर्ता, भोक्ता, संहार करनेवाला और स्मरणकर्ता आदि सभी पदोंपर प्रतिष्ठित होता है। किसीने भी बुद्धिकौशलद्वारा इस कालके रहस्यका निश्चय नहीं किया है। पुण्य और पापके फलभोगके अनुसार सुन्दर और कुरूप रूप धारण करनेवाले समस्त शरीरोंको काल ही उत्पन्न करता, काल ही उनकी रक्षा करता और काल ही सहसा उनका संहार कर देता है।

इस प्रकार इस जगत्में सर्वत्र कालका विलास देखा जाता है। मनुष्योंमें तो कालका बल प्रसिद्ध ही है।

इस कालकी पत्नी है—चण्डी (अत्यन्त कोपवती कालरात्रि), जो बड़ी चतुराईसे चलती है। इसे कालने संसाररूपी वनमें विहार करनेके लिये नियुक्त किया है, इसके साथ सारी मात्रिकाएँ (डाकिनी, शाकिनी आदि) रहती हैं। यह कालरात्रि बाघिनके समान प्राणिसमूहका विनाश करनेवाली है। कालके धनुषका नाम है—अभाव या संहार। वह निरन्तर टंकार करता रहता है, उससे दुःखरूपी बाणोंकी झड़ी लगी ही रहती है। वह धनुष सब ओर स्फुरित होता रहता है। ब्रह्मन्! यह कालरूपी राजकुमार संसारमें दौड़ते हुए प्राणियोंके पीछे दौड़ता है और उनको बाणोंसे विदीर्ण करता रहता है। इस कालसे बढ़कर शक्तिशाली दूसरा कोई नहीं है। यही सबसे अधिक विलास करनेमें प्रवीण है और समस्त लक्ष्यभेदियोंसे ऊपर उठकर अनुपम शोभा पाता है।

यह जो कुछ भी विस्तृत जगन्मण्डल दिखायी देता है, वह उस कालकी नाट्यशाला है। इसमें वह खुद