संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
११—प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन, ग्रन्थकी प्रशंसा, शान्ति, ब्रह्म, द्रष्टा और दृश्यका विवेचन, परस्पर सहायक प्रज्ञा और सदाचारका वर्णन
८८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भी देख लेता है। यह विचार-चमत्कृति परमात्ममयी, आदरणीया और परमानन्दकी एकमात्र साधिका है; अतः एक क्षणके लिये भी इसका परित्याग नहीं करना चाहिये। जैसे पक जानेके कारण मधुर रससे परिपूर्ण आमका फल सबके लिये रुचिकर होता है, उसी तरह उत्तम विचारसे युक्त पुरुष, सामान्य जनोंकी तो बात ही क्या, महापुरुषोंके लिये भी आदरणीय हो जाता है। विचारद्वारा जिनकी बुद्धि विशुद्ध हो गयी है और विचारसे ही जिन्हें ज्ञानमार्गमें जानेकी युक्ति ज्ञात है, वे मनुष्य नाना प्रकारके दुःखरूप गड्ढोंमें बार-बार नहीं गिरते अर्थात् आवागमनसे मुक्त हो जाते हैं। सैकड़ों अनर्थोंके संयोगसे जिसका शरीर जर्जर हो गया है तथा जो रोगग्रस्त है, वह वैसा रुदन नहीं करता, जैसा वह मूर्ख विलाप करता है, जिसने विचारहीनतासे अपने आत्माका हनन कर दिया है। विचारहीनता सारे अनर्थोंका निजी निवासस्थान है। सभी सत्पुरुष उसका तिरस्कार करते हैं और वह सारी दुर्गतियोंकी चरम सीमा है, अतः उसका परित्याग कर देना चाहिये। विचारपूर्वक स्वयं ही अपनी बुद्धिद्वारा अपने मनको वशमें करके मोहमय संसारसागरसे अपने मनरूपी मृगका उद्धार करना चाहिये। मैं कौन हूँ और यह संसारनामक दोष मेरे निकट कैसे आ गया—इस विषयमें न्यायपूर्वक किया गया अनुसंधान 'विचार' कहलाता है। रघुनन्दन ! इस जगत्में सत्यके ग्रहण और असत्यके त्यागकी बुद्धिसे सम्पन्न पुरुषोंको विचारके बिना उत्तम तत्त्वका कुछ भी ज्ञान नहीं होता। विचारसे ही तत्त्वका ज्ञान होता है, तत्त्वज्ञानसे मनकी निश्चलता प्राप्त होती है और मनके शान्त हो जानेसे सम्पूर्ण दुःखोंका सर्वथा विनाश हो जाता है। भूतलपर सभी लोग स्पष्ट विचारदृष्टिसे ही समस्त कर्मोंकी सफलता लाभ करते हैं तथा उत्तम परमात्मसाक्षात्कारतां भी विचारसे ही उपलब्ध होती है, इसलिये श्रीराम ! शमादि साधनसम्पन्न तुम्हें उपर्युक्त विचारशीलता रुचिकर होनी चाहिये।
परंतप राम ! संतोष ही परम श्रेय है और संतोष परम सुख भी कहा जाता है। संतोषयुक्त पुरुष परम विश्रामको प्राप्त होता है। जो संतोषरूपी ऐश्वर्यके सुखसे सम्पन्न हैं तथा जिनका चित्त निरन्तर विश्रामपूर्ण रहता है, ऐसे शान्त पुरुषोंको विशाल साम्राज्य भी पुराने घासके टुकड़ेके समान प्रतीत होता है। श्रीराम ! संतोषयुक्त बुद्धि संसारकी विषम परिस्थितियोंमें भी न तो उद्विग्न होती है और न कभी उसका विनाश ही होता है। जो शान्त पुरुष संतोषामृतके पानसे पूर्णतः तृप्त हो चुके हैं, उनके लिये यह अपरिमित भोगसम्पत्ति विष-सी जान पड़ती है। रागादि दोषोंका विनाशक तथा अत्यन्त मधुर आस्वादसे युक्त संतोष जैसा सुखद होता है, वैसा सुख ये अमृतरसकी लहरियाँ नहीं दे सकतीं। जो अप्राप्त वस्तुकी आकाङ्क्षाका परित्याग करके प्राप्त हुई वस्तुमें समभाव रखनेवाला है तथा जिसमें हर्ष-शोकके विकार परिलक्षित नहीं होते, वह मनुष्य इस लोकमें संतुष्ट कहा जाता है। जबतक मन आत्माके द्वारा आत्मामें संतुष्ट नहीं हो जाता, तबतक उस मनरूपी गड्ढेसे उसी प्रकार आपत्तियाँ उद्भूत होती रहती हैं, जैसे गड्ढेसे लताएँ। संतोषसे शीतल हुआ मन विशुद्ध विज्ञानकी दृष्टियोंसे अत्यन्त विकासको प्राप्त होता है—ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यकी किरणोंके सम्पर्कसे कमल विकसित हो जाता है। जैसे मलिन दर्पणमें मुखकी छाया नहीं दीखती, उसी प्रकार आशाकी परवशतासे व्याकुल एवं संतोषरहित चित्तमें ज्ञानका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता। जिसका मन शारीरिक तथा मानसिक क्लेशोंसे मुक्त एवं संतुष्ट है, वह प्राणी दरिद्र होते हुए भी सच्चे साम्राज्यसुखका उपभोग करता है। अपने आत्मामें आत्मासे ही स्वयं सम्यक् प्रकारसे निरतिशय पूर्णानन्दका आश्रय लेकर पुरुषार्थद्वारा प्रयत्नपूर्वक सभी विषयोंमें तृष्णा-
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विचार, संतोष और सत्समागमका विशेषरूपसे वर्णन * ८९
का परित्याग कर देना चाहिये। चन्द्रमाकी भाँति संतोषामृतसे परिपूर्ण मनुष्यका मन शान्त एवं शीतल बुद्धिद्वारा स्वयं ही शाश्वती स्थिरताको प्राप्त हो जाता है। जब संतोषसे सम्पन्न पुरुष अपने आत्मामें आत्माद्वारा स्वस्वरूपसे स्थित हो जाता है, उस समय उसकी सारी मानसिक व्यथाएँ उसी प्रकार अपने-आप शीघ्र ही समूल विनष्ट हो जाती हैं, जैसे वर्षा-ऋतुमें धूल शान्त हो जाती है। श्रीराम ! जिसकी वृत्ति सदा शीतल और कलङ्कसे सर्वथा रहित है, वह पुरुष अपनी उस शुद्ध वृत्तिद्वारा चन्द्रमाकी भाँति पूर्णतया शोभित होता है। रघुनन्दन ! इस जगत्में जो पुरुषश्रेष्ठ गुणी पुरुषोंद्वारा अभिमत समतासे सुशोभित है, उस विशुद्ध पुरुषको आकाशचारी देवता और महामुनि भी प्रणाम करते हैं।
महाबुद्धिमान् राम ! इस संसारमें श्रेष्ठ संत-समागम मनुष्योंका संसार-सागरसे उबारनेमें सर्वत्र विशेषरूपसे उपकार करता है। जो महात्मा पुरुष सत्संगतिरूपी वृक्षसे उत्पन्न हुए विवेक नामक निर्मल पुष्पकी रक्षा करते हैं, वे मोक्ष-फलरूपी सम्पत्तिके अधिकारी होते हैं। जो आपत्तीरूपी कमलिनीके लिये हिम और मोहरूपी कुहरेके लिये वायुके समान है, वह उत्तम संत-समागम ही इस जगत्में सर्वोत्कृष्ट है। श्रीराम ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि संत-समागम विशेषरूपसे बुद्धिपूर्वक, अज्ञानरूपी वृक्षका उच्छेदक और मानसिक व्यथाओंको दूर भगानेवाला है। सत्सङ्गसे प्राप्त हुई दिव्य विभूतियाँ ऐसा परम उत्तम निर्वाण-सुख प्रदान करती हैं, जो सतत वर्धनशील, अविनाशी और बाधारहित होता है। अतएव अत्यन्त कष्टदायिनी दशामें पड़कर विवशताको प्राप्त हुए मनुष्योंको भी थोड़े समयके लिये भी सत्संगतिका परित्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि लोकमें सत्संगति सन्मार्गको प्रकाशित करनेवाली और हृदयान्धकारको दूर करनेके लिये ज्ञानरूपी सूर्यकी प्रभा है। जिसने सत्संगतिरूपी गङ्गामें, जो शीतल एवं निर्मल है, स्नान कर लिया, उसे दान, तीर्थ, तप और यज्ञोंसे क्या लेना है अर्थात् सत्संगति इन सबसे बढ़कर है। जो रागशून्य और संशयरहित हैं तथा जिनकी चिज्जड-ग्रन्थियाँ विनष्ट हो चुकी हैं, ऐसे सत पुरुष यदि लोकमें विद्यमान हैं तो तप एवं तीर्थोंके संग्रहसे क्या लाभ ! अर्थात् वह फल तो उन संतोंकी संगतिसे ही प्राप्त हो सकता है। इसलिये जिनकी चिज्जडग्रन्थियोंका विनाश हो गया है एवं जो ब्रह्मज्ञानी हैं, उन सर्वसम्मत संतोंकी सभी उपायोंद्वारा भलीभाँति सेवा करनी चाहिये, क्योंकि वे भवसागरसे पार होनेके लिये साधन हैं। किंतु जो लोग नरकाग्निको बुझानेके लिये मेघस्वरूप संतोंको अवहेलनाकी दृष्टिसे देखते हैं, वे स्वयं उस नरकाग्निकी सूखी लकड़ी बन जाते हैं।
संतोष, सत्संगति, विचार और शम—ये ही चारों मनुष्योंके लिये भवसागरसे तरनेके साधन हैं। इनमें संतोष परम लाभ है। सत्संगति परम गति है। विचार उत्तम ज्ञान है और शम परमोत्कृष्ट सुख है। ये चारों संसारका समूल विनाश करनेके लिये विशुद्ध उपाय हैं। जिन्होंने इनका भलीभाँति सेवन किया, वे मोहजलसे परिपूर्ण भवसागरसे पार हो गये। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राम ! इन चारों साधनोंमेंसे विशुद्ध प्रकाशवाले एक ही साधनका अभ्यास हो जानेपर शेष तीनों भी अवश्य अभ्यस्त हो जाते हैं; क्योंकि इनमेंसे एक-एक भी क्रमशः इन चारोंकी जन्मभूमि है। अतः सबकी सिद्धिके लिये यत्नपूर्वक एकका तो पूर्णरूपसे आश्रय लेना ही चाहिये। जैसे प्रशान्त सागरमें जलयान स्वच्छन्द गतिसे चलते हैं, उसी प्रकार शमद्वारा निर्मल हुए हृदयमें सत्समागम, संतोष और विचार उत्तम धारणापूर्वक प्रवृत्त होते हैं। जो प्राणी विचार, संतोष, शम और सत्समागमसे सम्पन्न है, उसे दिव्य ज्ञान-सम्पत्तियाँ उपलब्ध हो जाती हैं—ठीक उसी तरह, जैसे कल्पवृक्षका आश्रय लेनेवाले पुरुषको लौकिक
९० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
सम्पत्तियाँ सुलभ होती हैं। पूर्ण चन्द्रमामें परिलक्षित हुए सौन्दर्य आदि गुणोंकी तरह विचार, शम, सत्समागम और संतोषयुक्त मानवमें प्रसाद आदि गुण प्रादुर्भूत हो जाते हैं। जैसे श्रेष्ठ मन्त्रिगणोंसे युक्त राजाके पास विजयलक्ष्मी उपस्थित होती है, उसी तरह जिस पुरुषकी बुद्धि सत्सङ्ग, संतोष, शम और विचारसे युक्त होनेके कारण उत्तम हो गयी है, उसे दिव्य ज्ञान-सम्पत्ति सुलभ हो जाती है। इसलिये रघुनन्दन ! मनुष्यको चाहिये कि वह पुरुषार्थसे मनको वशमें करके इनमेंसे एक गुणका नित्य यत्नपूर्वक उपार्जन करे; क्योंकि जबतक मनुष्य परम पुरुषार्थके आश्रयसे अपने चित्तरूपी गजराजको जीतकर हृदयमें एक गुण भी धारण नहीं कर लेता, तबतक उत्तम गतिकी प्राप्ति नहीं हो सकती। जिसके चित्तमें उत्तम फलदायक एक ही गुण सुदृढ हो गया है, उसके सारे दोष शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं; क्योंकि एक ही गुणकी विशेष वृद्धि होनेपर दोषोंपर विजय प्रदान करनेवाले अनेक गुणोंकी वृद्धि होती है और एक दोषके अधिक बढ़ जानेपर बहुत-से गुण-विनाशक दोष बढ़ जाते हैं। (सर्ग १४—१६)
प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन, ग्रन्थकी प्रशंसा, शान्ति, ब्रह्म, द्रष्टा और दृश्यका विवेचन, परस्पर सहायक प्रज्ञा और सदाचारका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिसका हृदय पूर्वोक्त प्रकारके विवेकसे युक्त है, वही इस जगत्में महान् है और वही ज्ञानोपदेश सुननेका योग्य अधिकारी है—ठीक उसी तरह, जैसे राजा नीति-शास्त्रके श्रवणका उत्तम पात्र होता है। जैसे मेघजालसे रहित शरत्काल-का आकाश चन्द्रमाके लिये योग्य होता है, उसी तरह जो मूर्खोंके सङ्गसे रहित एवं महान् आशयवाला है, वह निर्मल पुरुष विशुद्ध विचारका योग्य भाजन है। श्रीराम ! तुम इस समग्र गुणलक्ष्मीसे सम्पन्न हो; अतः मैं आगे जिसका वर्णन करूँगा, उस मनके मोहको हरनेवाले वाक्यको सुनो। जिसका पुण्यरूपी कल्पवृक्ष फलोंके भारसे अत्यन्त झुका हुआ खड़ा है, वही पुरुष मुक्ति-प्राप्तिके निमित्त इसे श्रवण करनेके लिये उद्योग करता है। अतः उपर्युक्त गुणसम्पन्न पुरुष ही कल्याण-प्राप्तिके लिये पवित्र, उदार तथा परायेको ज्ञान प्रदान करनेवाले वचनोंके सुननेका अधिकारी होता है।
यह संहिता मोक्ष-साधनकी प्रतिपादिका, सारभूत अर्थोंसे परिपूर्ण और मोक्षदायिनी है। इसमें बत्तीस हजार* श्लोक बतलाये जाते हैं। जैसे गाढ निद्राके वशीभूत हुए पुरुषके सामने दीपक जला दिये जानेपर यद्यपि उसे प्रकाशकी कामना नहीं रहती तो भी प्रकाश होता है, उसी प्रकार इस संहिताके परिशीलनसे इच्छा न रहने-पर भी निर्वाणकी प्राप्ति हो जाती है। यह संहिता स्वयं सम्यक् प्रकारसे परिशीलन करके जानी गयी हो अथवा अन्यद्वारा वर्णन किये जाते समय सुनी गयी हो, तो भी पाप-तापकी शान्तिद्वारा सुखकी हेतुभूता
* इस ग्रन्थके छहों प्रकरणोंमें क्रमशः वैराग्यप्रकरणमें ११४५, मुमुक्षुव्यवहारप्रकरणमें ८०७, उत्पत्तिप्रकरणमें ५४०४, स्थितिप्रकरणमें २४०४, उपशमप्रकरणमें ४२७७ और निर्वाणप्रकरणमें १४२७५ श्लोक-संख्या है—इस प्रकार सम्पूर्ण ग्रन्थमें श्लोकोंकी संख्या २८३१२ मिलती है। किंतु यहाँ इस सर्गमें, वैराग्यप्रकरणमें १५००, मुमुक्षुव्यवहारप्रकरणमें १०००, उत्पत्तिप्रकरणमें ७०००, स्थितिप्रकरणमें ३०००, उपशमप्रकरणमें ५००० और निर्वाणप्रकरणमें १४५००—इस प्रकार कुल ३२००० श्लोक बताये गये हैं। ग्रन्थमें आये हुए बड़े श्लोकोंके और गद्यभागके अक्षरोंकी सख्याको ३२ अक्षरके एक अनुष्टुप् श्लोकके हिसाबसे गिननेपर यह संख्या प्रायः ठीक हो सकती है।
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन एवं ग्रन्थकी प्रशंसा * ९१
देवनदी गङ्गाके समान यह अज्ञानके उपशमद्वारा तुरंत
सुख प्रदान करती है । जैसे रस्सीका पूर्ण ज्ञान हो
जानेसे उसमें उत्पन्न हुई सर्पभ्रान्ति विनष्ट हो जाती
है, उसी तरह इस संहिताके सम्यक् परिशीलनसे संसार-
दुःख शान्त हो जाता है । इस संहितामें पृथक्-पृथक्
रचे गये छ प्रकरण हैं, जो युक्तियुक्त अर्थवाले वाक्यों-
से युक्त और सार-सार दृष्टान्तोंसे भरी हुई सूक्तियोंसे
समन्वित हैं । उनमें पहला प्रकरण 'वैराग्य' नामसे कहा
गया है, जिसके अध्ययनसे उसी प्रकार विरागकी वृद्धि
होती है, जैसे मरुस्थलमें भी जलके सिंचनसे वृक्ष बढ़ता
है । जैसे मणिके भलीभाँति मार्जित किये जानेके कारण
उत्पन्न हुए प्रकाशसे उसमें निर्मलता प्रकट हो जाती
है, उसी तरह डेढ़ हजार श्लोकोंसे युक्त इस वैराग्य-
प्रकरणका विचार करनेसे विषयोंके दोषोंका परिज्ञान
होनेके कारण उत्पन्न हुए विवेकके प्रकाशसे हृदयमें
शुद्धताका उदय हो जाता है । तदनन्तर 'मुमुक्षुव्यवहार'
नामक प्रकरणकी रचना की गयी है । इस प्रकरणमें
केवल एक हजार श्लोक हैं । युक्तियोंसे भरा होनेके
कारण यह अत्यन्त सुन्दर है और इसमें मुमुक्षु पुरुषोंके
स्वभावका वर्णन किया गया है । इसके बाद तीसरा
'उत्पत्तिप्रकरण' आता है, जो दृष्टान्त और आख्यायिकाओं-
से परिपूर्ण तथा विज्ञानका प्रतिपादक है । उसमें सात
हजार श्लोक हैं । इस प्रकरणमें 'अहं' और 'त्वं' जिसका
स्वरूप है एवं जो वास्तवमें उत्पन्न न होकर भी प्रकट
हुई-सी प्रतीत होती है, द्रष्टा और दृश्यके भेदसे
समन्वित उस सांसारिक सम्पत्तिका वर्णन किया गया
है । इस प्रकरणके सुननेपर श्रोता इस सम्पूर्ण जगत्को
अपने हृदयमें ऐसा समझता है कि यह 'त्वं' और
'अहं'के विस्तारसे युक्त, लोक, पर्वत और आकाशसे
समन्वित, संकल्परूपमय नगरके तुल्य क्षणध्वंसी, स्वप्नमें
प्राप्त हुए पदार्थोंके समान सत्तारहित, मनोराज्यकी तरह
विस्तारवाला, अर्थशून्य होनेके कारण गन्धर्वनगरके
सदृश, दो चन्द्रमाओंकी भ्रान्तिके समान मृगतृष्णामें
जलभ्रान्तिकी तरह, नौकाके चलनेसे पर्वतादिके संचलन
भ्रमकी भाँति चञ्चल और यथार्थ लाभसे रहित है तथा
जैसे सुवर्णमें कङ्कण, जलमें तरङ्ग और आकाशमें नीलिमा
असत् है, वस्तुतः ये क्रमशः अपने-अपने अधिष्ठानके
ही अङ्ग हैं, उसी तरह यह जगत् असत् होकर भी
सत्-रूपसे उत्पन्न हुआ है । परमार्थ दृष्टिसे तो यह
उस विज्ञानरूपी शरत्कालके आकाशके समान है,
जिसका अज्ञानरूपी कुहरा पूर्णरूपसे शान्त हो गया है ।
तत्पश्चात् चौथे 'स्थितिप्रकरण'की अवतारणा की
गयी है । इस प्रकरणमें तीन हजार श्लोक हैं और यह
व्याख्यान और आख्यायिकाओंसे भरा हुआ है । ब्रह्म ही
द्रष्टा और दृश्य भावको स्वीकार करके इस प्रकार
जगत्-रूप एवं अहंरूपसे स्थितिको प्राप्त हुआ है—
ऐसा इस प्रकरणमें कहा गया है । इसी तरह यह
जगद्धम जो दसों दिशाओंके मण्डलकी विशालतासे
देदीप्यमान है और चिरकालसे वृद्धिको प्राप्त होता आया
है, यह विषय भी उस प्रकरणमें समझाया गया है ।
तदुपरान्त पाँचवाँ 'उपशान्ति' प्रकरण कहा गया है ।
इसमें पाँच हजार श्लोक हैं । यह परम पावन तथा
विविध युक्तियोंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर है ।
इस प्रकरणमें 'यह जगत् है, यह मैं हूँ, यह तुम हो
और यह वह है—यों उत्पन्न हुई भ्रान्ति किस प्रकार
पूर्णरूपसे शान्त होती है' यह विषय बहुत-से श्लोकों-
द्वारा बतलाया गया है । उपशमप्रकरणका श्रवण
करनेसे यह संसार प्रायः शान्त हो जाता है; क्योंकि
जिसका भ्रान्त स्वरूप सम्यक् प्रकारसे शान्त हो गया
है—ऐसी संसृतिका शतांशमात्र अवशिष्ट रह जाता है ।
तदनन्तर 'निर्वाण' नामक छठे प्रकरणका वर्णन
किया गया है । उसमें शेष साढ़े चौदह हजार श्लोक
हैं । यह प्रकरण ज्ञानरूपी महान् पुरुषार्थका देनेवाला
है । उसे जान लेनेपर सारी कल्पनाएँ शान्त हो जाती
९२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
हैं और परमात्माकी प्रतिरूप परम कल्याण हस्तगत हो जाता है। अधिक क्या, उक्त प्रकरणके ज्ञाता पुरुषके सम्पूर्ण सांसारिक भ्रम मिट जाते हैं। वह निर्विषय चैतन्य प्रकाशरूप, विज्ञानस्वरूप, आधि-व्याधियोंसे रहित और आकाशमण्डलके समान निर्विकार हो जाता है। उसकी सभी जगद्-यात्राएँ शान्त हो जाती हैं और वह कृतकृत्य होनेके कारण स्वस्थ हो जाता है। वह प्रकृति एवं प्रकृतिके कार्यभूत सम्पूर्ण विषयोंमें कर्ताके अभिमान और ग्रहण-त्यागकी दृष्टिसे रहित हो जाता है, इसलिये वह देहधारी होते हुए विदेह-सा एव संसारी होनेपर भी असंसारी-सा प्रतीत होता है। उसका अहङ्काररूप पिशाच नष्ट हो जाता है और वह देहयुक्त होते हुए भी शरीर-रहित-सा रहता है। चैतन्यघन परमात्मा अपने अंदर कल्पित आकाशमें प्रत्येक परमाणुमें सहस्रों लोकोंकी रचना करके उन्हें धारण करता है और स्वयं उन्हें देखता है।
श्रीराम ! जैसे उपजाऊ खेतमें उचित समयपर बोये गये उत्तम बीजसे अवश्य ही श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है, उसी तरह इस संहिताको हृदयगम कर लेनेसे परमार्थ-विषयक ज्ञान सुलभ हो जाता है। जैसे प्रातःकाल होनेपर प्रकाशका होना अवश्यम्भावी है, वैसे ही इस संहिताको चित्तमें धारण कर लेने मात्रसे निश्चय ही उत्तम विवेककी उपलब्धि होगी। विद्वानोंके मुखसे इसका श्रवण करके अथवा स्वयं ही इसे समझकर धीरे-धीरे विचार करनेसे जब बुद्धि सुदृढ़रूपसे संस्कृत हो जाती है, तब पहले हृदयमें सभास्थानको विभूषित करनेवाली ऊँची लताके समान संस्कारयुक्त विशुद्ध वाणीका उदय होता है। फिर महान् गुणोंसे सुशोभित वह श्रेष्ठ चतुरता प्रकट होती है, जिससे राजा तथा देवगण भी प्रसन्न होते हैं। जैसे सुन्दर नेत्रोंसे युक्त पुरुष रात्रिके समय दीपक हाथमें लेकर सभी पदार्थोंको देख लेता है, उसी तरह बुद्धिमान् मनुष्य सर्वत्र पूर्वा-परका ज्ञाता हो जाता है। इस ग्रन्थके अभ्याससे जिसका अज्ञानान्धकाररूप आवरण फट गया है अतएव जो पदार्थोंके प्रविभाजनमें समर्थ हो गयी है; ऐसी प्रज्ञा कालिमारहित रत्नदीपककी लौके समान उत्कृष्ट प्रकाशवाली हो जाती है। प्रस्तुत ग्रन्थका ज्ञाता पुरुष चाहे भयहेतुओंके सम्मुख ही क्यों न खड़ा हो, फिर भी जैसे बाण बड़ी-बड़ी चट्टानोंको विदीर्ण नहीं कर सकते, उसी तरह भयंकर सांसारिक भय उसके हृदयको पीड़ा नहीं पहुँचा सकते। इस ग्रन्थके अध्ययनसे जन्ममें प्रारब्धकी और कर्ममें पुरुषार्थकी कारणता कैसे होगी !—इस प्रकारके संशय-समुदाय दिनमें अन्धकार-की भाँति विलीन हो जाते हैं। इस ग्रन्थका विचार करनेवाले पुरुषके हृदयमें समुद्रकी-सी गम्भीरताका, सुमेरुगिरिकी-सी धीरताका और चन्द्रमाकी-सी शीतलता-का उदय हो जाता है। जब हृदयाकाशमें शमके आलोकसे विभूषित विवेकरूपी निर्मल सूर्यका उदय हो जाता है, तब निश्चय ही अनर्थसूचक कामादि धूमकेतु अपना उदय नहीं ले पाते। धैर्यकी पराकाष्ठाको प्राप्त हुई जो बुद्धि धर्मरूपी दीवालमें गाढ़रूपसे संलग्न हो गयी है, उसे मानसिक चिन्ताएँ विचलित नहीं कर सकतीं, जैसे वायु चित्रलिखित लताको नहीं कँपा सकती। तत्त्वज्ञ पुरुष विषयासक्तिरूप गड्ढेमें नहीं गिरता; क्योंकि जिसे उत्तम मार्गका ज्ञान है, वह भला गड्ढेकी ओर क्यों दौड़ेगा। सत्-शास्त्रोंके परिशीलनसे जिनका चरित्र उत्तम हो गया है, उनकी बुद्धि यथायोग्य प्राप्त शास्त्रानुकूल कर्ममें ही रमण करती है—ठीक उसी तरह, जैसे पतिव्रता स्त्री अपने अन्त:पुरके आँगनमें ही प्रसन्न रहती है। जिस पुरुषका अन्तःकरण मोक्ष-साधनके अनुभवसे शुद्ध हो गया है, उसे भोगसमुदाय न तो कभी पीडित ही करते हैं और न आनन्द ही देते हैं। वह अनिष्ट कार्योंके प्राप्त होनेपर न तो द्वेष करता है और न इष्ट कार्योंके नष्ट हो जानेपर उनकी आकाङ्क्षा
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन एवं ग्रन्थकी प्रशंसा * ९३
ही करता है; बल्कि यह कार्य-फलादिके स्वरूपका ज्ञाता होकर भी जड वृक्षकी भाँति अनभिज्ञका-सा आचरण करता है। वह साधारण जनकी तरह समयानुकूल प्राप्त हुए पदार्थोंसे ही निर्वाह करता हुआ देखा जाता है—यहाँतक कि अथवा अनिष्ट फलके प्राप्त होनेपर भी उसके हृदयमें स्वल्पमात्र भी विकार नहीं होता। राघव ! इस सम्पूर्ण शास्त्रको बँचवाकर और समझकर फिर इसपर विचार करो। यह कथनमात्र नहीं है, बल्कि देवोंके वरदान और शापकी भाँति इसका फल अवश्य प्राप्त होता है। यह सुन्दर शास्त्र उत्तम ज्ञानसे युक्त अलंकारोंसे विभूषित, काव्यस्वरूप और सरस है। इसमें दृष्टान्तोंद्वारा विषयका प्रतिपादन किया गया है। जिसे थोड़ा भी पद पदार्थका ज्ञान है, वह स्वयं ही उसे समझ लेता है; किंतु जो स्वयं इसे जाननेमें असमर्थ है, उसे पण्डितके मुखसे सुनना चाहिये। जैसे संकल्पद्वारा निर्मित नगरमें पुरुषको हर्ष-विषाद बाधा नहीं पहुँचाते उसी तरह संसार-भ्रमका परिज्ञान हो जानेपर यह भी कष्टदायक नहीं होता। जैसे यह चित्रलिखित सर्प है, वास्तविक सर्प नहीं है—ऐसा जान लेनेपर वह सर्प-जनित भयका दाता नहीं होता, उसी तरह इस दृश्य संसाररूपी सर्पका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर यह भी सुख अथवा दुःख नहीं देता। जैसे चित्रलिखित सर्पका पूर्ण ज्ञान हो जानेपर उसका सर्पत्व ही नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार संसारका वास्तविक स्वरूप ज्ञात हो जानेपर यह स्थित रहते हुए भी शान्त हो जाता है अर्थात् इसका प्रभाव नहीं पड़ता।
रघुनन्दन ! यह शास्त्र ज्ञानका विस्तार करनेवाला और बुद्धिद्वारा ग्रहण किये जानेवाले सारभूत पदार्थोंकी परमावधि है। अब मैं इसका वर्णन करता हूँ, सुनो। पहले जिस विधिसे यह शास्त्र श्रवण किया जाता है तथा जिस परिभाषासे इसका यथार्थरूपसे विचार करनेका विधान है, वह अवतरणिका श्रवण करो। जिस देखे हुए पदार्थके सादृश्यसे अनुभवमें न आये हुए पदार्थका ज्ञान कराया जाता है, बोधोपकाररूप फल प्रदान करनेवाले उस सादृश्यको विद्वान् लोग दृष्टान्त कहते हैं। श्रीराम ! जैसे रात्रिमें दीपकके बिना घरमें रखे हुए बर्तन आदि सामग्रियोंका ज्ञान नहीं हो सकता, उसी तरह दृष्टान्तके बिना अपूर्व अर्थका बोध होना असम्भव है। उपमान और उपमेयके जिस कार्य-कारणभावका प्रतिपादन किया गया है, वह परब्रह्मको छोड़कर शेष सभी पदार्थोंके साथ लागू होता है। मैं यहाँ ब्रह्मोपदेशके प्रसङ्गमें तुमसे जो दृष्टान्त कह रहा हूँ, उसमें एकदेशके साधर्म्यसे प्रकृतार्थका परिग्रहण किया जाता है। यहाँ ब्रह्मतत्त्वका बोध करानेके लिये जो-जो दृष्टान्त दिया जाता है, वह स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले पदार्थोंकी तरह मिथ्याभूत जगत्के अन्तर्गत ही है—ऐसा समझना चाहिये। उत्पत्तिके पूर्व और विनाशके उत्तरकालमें जैसे यह जगत् अभावग्रस्त था, उसी तरह वर्तमान कालमें भी विचार करनेपर अवस्तुभूत ही है; अतः मिथ्यात्वके कारण जाग्रत् और स्वप्न—इन दोनोंकी समानता है। यह प्रसिद्ध बात बालकोंतककी समझमें आ सकती है। मोक्षसाधनोंके निर्माता ग्रन्थकर्ता महर्षि वाल्मीकिने दूसरे भी जिन ग्रन्थोंकी रचना की है, उनमें भी ज्ञातव्य वस्तुका ज्ञान करानेके लिये केवल यही व्यवस्था रक्खी है कि दृष्टान्तोंके जिस अंशमें समता सम्भव हो, उसी अंशके साथ समता रक्खी जाय। चूँकि यह जगत् स्वप्न, संकल्प और ध्यानसे कल्पित नगरके समान मिथ्या है, इसी कारण यहाँ वे ही दृष्टान्त दिये गये हैं, दूसरे नहीं। ज्ञानप्राप्तिके लिये कारणरहित ब्रह्ममें जो कारणताकी उपमा दी जाती है, वहाँ उपमाप्रयुक्त पदार्थोंके साथ सर्वांशमें साधर्म्य सम्भव नहीं हो सकता। अतः विवादरहित बुद्धिमान् पुरुषको ज्ञानप्राप्तिके लिये उपमानसे उपमेयका एक अंशमें ही साधर्म्य स्वीकार करना चाहिये। पदार्थोंके