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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

१—विश्वामित्रजीका श्रीरामको तत्त्वज्ञानसम्पन्न बताते हुए उनके सामने शुकदेवजीका दृष्टान्त उपस्थित करना, शुकदेवजीका तत्त्वज्ञान प्राप्त करके परमात्मामें लीन होना

वैराग्य-प्रकरण ] * श्रीरामचन्द्रजीका भाषण सुनकर सबका आश्चर्यचकित होना, आकाशसे पुष्पवर्षा * ६३


परम आह्लाद प्रदान करनेवाला है। इन रघुनन्दनने इस समय आदरपूर्वक जो उचित भाषण किया है, वह शान्तिरूपी अमृतसे भरा होनेके कारण परम मनोहर है। इस भाषणने श्रेष्ठताका पद प्राप्त कर लिया है—यह प्रवचन सर्वोत्तम सिद्ध हुआ है। इसके द्वारा हमें भी तत्काल यह ज्ञान हो गया कि स्वर्ग आदिके सुख भी निस्सार हैं।

'रघुकुलतिलक श्रीरामके द्वारा उठाये गये इन पावन प्रश्नवाक्योंका महर्षिलोग जो निर्णय करेंगे, उसे भी सुनना उचित होगा। नारद, व्यास और पुलह आदि मुनीश्वरो ! आप सभी महर्षि उस निर्णयको निर्विघ्नरूपसे सुननेके लिये शीघ्र यहाँ पधारें। जैसे केसरकी शोभासे परिपूर्ण हो सुवर्णकी भाँति उद्दीप्त होनेवाली कमलिनीपर भ्रमर चारों ओरसे टूट पड़ते हैं, उसी प्रकार हम भी धन-वैभवसे पूर्ण तथा सुवर्णमयी सामग्रियोंसे प्रकाशित होनेवाली राजा दशरथकी इस पुण्यमयी सभामें सब ओरसे प्रवेश करें।'

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! सिद्धोंके ऐसा कहनेपर विमानोंमें निवास करनेवाले दिव्य महर्षियोंकी वह सारी मण्डली उस राजसभामें उतरी। उस मण्डलीमें सबसे आगे मुनीश्वर नारद थे, जो अपनी बजती हुई वीणाको उस समय भी छोड़ न सके थे और सबसे पीछे सजल जलधरके समान श्याम कान्तिवाले महर्षि व्यास थे। इन दोनोंके बीचमें शेष ऋषियोंकी मण्डली थी। भृगु, अङ्गिरा और पुलस्त्य आदि मुनीश्वर उस मण्डलीकी शोभा बढ़ाते थे। च्यवन, उद्दालक, उशीर तथा शरलोम आदि महर्षियोंने उसे सब ओरसे घेर रखा था।

एक दूसरेके शरीरकी रगड़से उन सबके मृगचर्म अपने स्थानसे खिसककर अस्त-व्यस्त हो गये थे। उन महर्षियोंके हाथोंमें बल पाकर रुद्राक्षमाला हिल रही थी तथा उन सबने सुन्दर कमण्डलु धारण कर रखे थे। आकाशमें अपने तेजःपुञ्जके प्रसारसे श्वेत एवं रक्त प्रभा धारण करनेवाली वह मुनिमण्डली तारोंकी पङ्क्तिके समान प्रकाशित हो रही थी। परस्परके तेजसे उन सबके मुखमण्डल ऐसे उद्भासित हो रहे थे, मानो अनेक सूर्योंकी पङ्क्तियाँ प्रकट हो गयी हों। उस मण्डलीमें व्यासजी ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो तारोंके समुदायमें श्याम मेघ घिर आया हो और देवर्षि नारद तारिकाओंके समूहमें शीतरश्मि चन्द्रमाकी-सी शोभा धारण करते थे। महर्षि पुलस्त्य देवमण्डलीके बीच देवराज इन्द्रके समान विराज रहे थे। महर्षि अङ्गिरा ऐसे प्रकाशित होते थे, मानो देवताओंके समूहमें साक्षात् सूर्य उपस्थित हों। आकाशमण्डलसे वह सिद्ध-सेना ज्यों ही भूतलपर उतरी त्यों ही मुनियोंसे भरी हुई दशरथ-सभाके सभी लोग उठकर खड़े हो गये। वसिष्ठ और विश्वामित्रने अर्घ्य-पाद्य तथा मधुर वचनोंद्वारा क्रमशः उन सभी आकाशचारी सिद्धों तथा महर्षियोंकी पूजा की। आकाशचारी सिद्ध आदिके उस महान् समुदायने भी अर्घ्य-पाद्य एवं मधुर वचनोंद्वारा वसिष्ठ और विश्वामित्रका आदरपूर्वक पूजन किया। तत्पश्चात् भूपाल दशरथने सम्पूर्ण आदरभावके साथ उस सिद्ध-समुदायका पूजन किया। फिर उस सिद्ध-समुदायने भी कुशल-प्रश्न-सम्बन्धी वार्तालापद्वारा महाराज दशरथका सत्कार किया। उस समय प्रेमोचित दान, मान आदि क्रियाओंद्वारा एक दूसरेसे सत्कार पाकर सभी आकाशचारी तथा भूमण्डलमें विचरनेवाले महर्षि यथायोग्य आसनोंपर बैठे। उन लोगोंने सामने नत-मस्तक होकर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीका चारों ओरसे मधुर भाषण, फूलोंकी वर्षा और साधुवादके द्वारा पूर्ण सत्कार किया।

श्रीरामचन्द्रजी राज्यलक्ष्मीसे सुशोभित होते हुए वहीं बैठे तथा विश्वामित्र, वसिष्ठ, वामदेव, राजमन्त्रीगण, ब्रह्माके पुत्र नारदजी, मुनिवर व्यास, मरीचि, दुर्वासा, अङ्गिरा और उनके पुत्र आङ्गिरस मुनि, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, मुनीश्वर शरलोमा, वात्स्यायन, भरद्वाज, मुनिवर वाल्मीकि, उद्दालक, ऋचीक, शर्याति और च्यवन—ये तथा और भी बहुत-से वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान्

६४ * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

तत्त्वज्ञानी महात्मा, जो उन सबमें प्रधान थे, वहाँ विराजमान हुए। तत्पश्चात् वसिष्ठ और विश्वामित्रजीके साथ नारद आदि, जो साङ्गवेदोंका अध्ययन कर चुके थे, मस्तक झुकाये हुए श्रीरामचन्द्रजीको लक्ष्य करके इस प्रकार बोले—'अहो ! बड़े आश्चर्यकी बात है कि राजकुमार श्रीरामने इस प्रकार अनेक कल्याणमय गुणोंसे सुशोभित वैराग्यरससे पूर्ण तथा परम उदारतासे युक्त बातें कही हैं। श्रीरामके भाषणमें वक्तव्य अर्थ 'इदमित्थम्' रूपसे व्यवस्थापूर्वक निहित है। उसे ऐसी सुबोध भाषामें कहा गया है, जिसे सुनते ही श्रोता वास्तविक अभिप्रायको समझ ले। जो बात कही गयी है, वह सर्वथा उचित और स्पष्ट शब्दोंमें प्रतिपादित है। श्रीरामकी यह वाणी उदार है—इसके भीतर बहुत-से उत्कृष्ट अभिप्राय छिपे हुए हैं। यह सुननेमें प्रिय और श्रेष्ठ पुरुषोंके योग्य है। इसमें जो कुछ कहा गया है, वह चञ्चल चित्तसे नहीं, स्थिरबुद्धिसे विचारकर व्यक्त किया गया है। इसका भाव स्पष्टरूपसे समझमें आ जाता है। इस भाषणका प्रत्येक पद अभिव्यक्त (व्याकरण-विशुद्ध) तथा सुस्पष्ट—ग्रस्त आदि दोषोंसे रहित है। यह वाणी इष्ट (प्रिय एवं हितकर) तथा आन्तरिक सन्तोष-की सूचक है। श्रीरघुनाथजीके मुखसे निकला हुआ यह वचन किसको आश्चर्यमें नहीं डाल देता ? सैकड़ोंमें किसी एक पुरुषकी ही वाणी सम्पूर्णतः उत्कृष्ट, चमत्कारपूर्ण और अभीष्ट अर्थको प्रकट करनेमें समर्थ होती है।

'राजकुमार ! आपके सिवा दूसरा कौन है, जिसकी बाणके समान सूक्ष्म अर्थका भेदन करनेवाली कुशाग्र बुद्धिरूपिणी लता विवेकरूपी फलसे सुशोभित हो विचार-वैराग्यरूपी उत्तम विकासको प्राप्त हो रही हो। श्रीरामकी भाँति जिसके हृदयमें अनुपम प्रकाश फैलानेवाली प्रज्ञा-रूपिणी दीप-शिखा प्रज्वलित हो रही हो, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा जाता है। जिनमें ऐसी प्रज्ञा नहीं है, वे मनुष्य रक्त, मांस और हड्डियोंके यन्त्ररूपी देहमें आत्मबुद्धि रखनेके कारण रक्त-मांसादिरूप ही बहुत-से शब्द-स्पर्शादि पदार्थोंका उपभोग करते रहते हैं। ऐसा लगता है, उनके भीतर कोई चेतन पदार्थ है ही नहीं—वे जड़के तुल्य हो गये हैं। जो लोग सर्वथा मोहाच्छन्न होनेके कारण संसारका विचार नहीं करते, वे निरे पशु हैं। वे ही बारंबार जन्म, मृत्यु और जरा आदि रूपोंको प्राप्त होते हैं। जैसे लोकमें सर्वोत्तम मधुर फल और सुन्दर आकृतिवाले आमके वृक्ष विरले ही होते हैं, उसी प्रकार उत्कृष्ट चमत्कारसे पूर्ण तत्त्व-साक्षात्काररूप फलसे सम्पन्न एवं सुन्दर शरीरवाले भव्य पुरुष इने-गिने ही होते हैं। इन आदरणीय बुद्धिवाले श्रीराममें अभी इसी अवस्थामें अपने ही विवेकके कारण उस तत्त्वदर्शनरूप चमत्कारका उदय देखा जाता है, जिसके द्वारा जगत्‌के व्यवहारका सम्यक्‌रूपसे समीक्षण हुआ है। जो देखनेमें सुन्दर हों, जिनपर सरलतासे चढ़ा जा सके तथा जो उत्तम फलों और पल्लवोंसे सुशोभित हों, ऐसे वृक्ष प्रायः सभी देशोंमें उत्पन्न होते हैं; परंतु चन्दनके वृक्ष सर्वत्र नहीं होते (इसी तरह श्रीराम-जैसे पुरुष सर्वत्र दुर्लभ हैं)। फल और पल्लवोंसे भरे-पूरे वृक्ष प्रत्येक वनमें सदा सुलभ होते हैं। परंतु अपूर्व चमत्कारसे युक्त लौंगका वृक्ष सदा और सर्वत्र सुलभ नहीं है (इसी तरह श्रीराम-जैसे पुरुष सर्वत्र दुर्लभ हैं)। जैसे चन्द्रमासे शीतल चाँदनी उत्पन्न होती है, सुन्दर वृक्षसे मञ्जरी प्रकट होती है और फूलसे सुगन्धका प्रवाह प्रादुर्भूत होता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजीसे यह तत्त्वदर्शनरूपी चमत्कारका आविर्भाव देखा गया है। जो लोग सदा तत्त्वचिन्तनमें तत्पर हो विवेकके द्वारा आत्मज्ञान या परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप सार पदार्थके लिये प्रयत्नशील रहते हैं, वे ही सुयशके भंडार, सत्पुरुषोंमें अग्रगण्य, धन्य एवं समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। तीनों लोकोंमें श्रीरामचन्द्रजीके समान विवेकशील और उदारचित्त पुरुष न तो अबतक कोई देखा गया है और न भविष्यमें ही कोई होगा, ऐसी हमारी मान्यता है।' (सर्ग ३२-३३)

वैराग्य-प्रकरण सम्पूर्ण


१. अर्द्धोच्चारित शब्द या वाक्य, जिससे पूरी बात समझमें नहीं आती, ग्रस्तदोषसे युक्त माना गया है।

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मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण

विश्वामित्रजीका श्रीरामको तत्त्वज्ञानसम्पन्न बताते हुए उनके सामने शुकदेवजीका दृष्टान्त उपस्थित करना, शुकदेवजीका तत्त्वज्ञान प्राप्त करके परमात्मामें लीन होना

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज ! इस प्रकार सभामें आये हुए सिद्ध पुरुषोंने जब उच्चस्वरसे श्रीरामके भाषणकी भूरि-भूरि प्रशंसा की, तब विश्वामित्रजीने अपने सामने बैठे हुए श्रीरामसे प्रेमपूर्वक कहा—'ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन ! तुम्हारे लिये और कुछ जानना शेष नहीं है। तुम अपनी ही सूक्ष्मबुद्धिसे सब कुछ जान चुके हो—सर्वरूप सच्चिदानन्दघन परमात्माको तत्त्वसे जानते हो। तुम्हारी बुद्धि भगवान् व्यासके पुत्र शुकदेवजीकी-

सी है। उसे जाननेयोग्य वस्तुका ज्ञान प्राप्त हो चुका है। श्रीराम ! मैं तुमसे व्यासपुत्र शुकदेवजीका यह वृत्तान्त कह रहा हूँ, जो तुम्हारे अपने ही वृत्तान्तके समान है, इसे सुनो। यह सुननेवाले मनुष्योंके जन्म-

मरणरूप संसारके अन्त ( मोक्ष ) का कारण है। वे जो तुम्हारे पिताके बगलमें अञ्जनगिरिके समान श्याम तथा सूर्यतुल्य तेजस्वी भगवान् व्यास बैठे हैं, इनके शुकदेव नामसे प्रसिद्ध एक महाज्ञानी पुत्र हुआ, जिसका मुख चन्द्रमाके समान सुन्दर था। शुकदेवजी सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता थे। वे एक दिन मन-ही-मन इस लोकयात्रा ( जागतिक व्यवहार ) पर विचार कर रहे थे। उस समय उनके हृदयमें भी तुम्हारी ही तरह विवेकका उदय हुआ। उन महामना शुकदेवने अपने विवेकसे स्वयं ही चिरकालतक विचार करके जो परम मनोहर परमार्थ सत्य वस्तु ( या परमार्थ—साधनकी उच्च स्थिति ) है, उसे प्राप्त कर लिया। उसे प्राप्त करके भी उनके हृदयमें 'यही परमार्थ वस्तु ( सच्चिदानन्दघन परमात्मा ) है' ऐसा पूर्ण विश्वास नहीं हुआ; इसलिये उस परम वस्तुके स्वतः प्राप्त हो जानेपर भी उनके मनको शान्ति नहीं मिली। इतना अवश्य हुआ कि उनके चित्तकी चञ्चलता दूर हो गयी और जैसे चातक वर्षाकी जलधाराके अतिरिक्त अन्य जलधाराओंसे मुँह मोड़ लेता है, उसी प्रकार उनका मन अत्यन्त क्षणभङ्गुर भोगोंसे विरत हो गया।

एक दिन निर्मल बुद्धिवाले शुकदेवजीने मेरुगिरि-पर एकान्त स्थानमें बैठे हुए अपने पिता मुनिवर श्रीकृष्णद्वैपायन व्याससे भक्तिभावके साथ पूछा—'मुने ! यह संसाररूपी आडम्बर कैसे उत्पन्न हुआ है ? कैसे इसकी शान्ति या नाश होता है ? यह कितना बड़ा है ? किसका है ? और कबतक रहेगा ?' पुत्रके इस प्रकार प्रश्न करने-पर आत्मज्ञानी मुनिवर व्यासने उन्हें जो कुछ बताने योग्य