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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

५५- शिव और शक्तिके यथार्थ स्वरूपका विवेचन

५८६* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

उत्पन्न हुए दो फूलोंको विकसित कर दिया हो। उनके वे विभिन्न अङ्ग धीरे-धीरे अपनी-अपनी सजगता (ज्ञानयुक्त चेष्टा) प्रकट करने लगे, मानो वसन्त ऋतुके नूतन पल्लव नूतन रसकी अभिव्यक्ति कर रहे हों। तदनन्तर देवताओ, सिद्धो और अप्सराओके समुदाय चारो ओरसे वहाँ उसी तरह आ पहुँचे, जैसे प्रातःकाल विकसित कमलोंसे सुशोभित सरोवरमें झुंड-के-झुंड हंस आ गये हों। ब्रह्माजीने सामने खड़े हुए मुझको और उस विलासशालिनी विद्याधरीको देखा। देखकर वे प्रणवपूर्वक स्वरसहित उच्चरित होनेवाली सुन्दर वेदवाणीके समान मधुर वचन बोले—

उस दूसरे संसारके ब्रह्माजीने कहा—मुने ! आपने हाथपर रखे हुए आँवलेके समान इस असार संसारके सारतत्त्वको देख और जान लिया है। आप ज्ञानरूपी अमृतकी वर्षा करनेवाले महामेघ हैं। आपका स्वागत है। महर्षे ! इस समय आप इस अत्यन्त दूरवर्ती मार्गपर आ पहुँचे हैं। बहुत दूरका रास्ता तै करनेके कारण आप बहुत थक गये होगे। यह आसन है, इसपर बैठिये।

उनके ऐसा कहनेपर मैं बोला—'भगवन् ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ।' ऐसा कहता हुआ मैं उनकी दृष्टिके संकेतसे दिखाये गये एक 'मणिमय पीठपर बैठ गया। फिर तो देवता, ऋषि, गन्धर्व, मुनि और विद्याधरोंद्वारा मेरी स्तुति की जाने लगी। इसके बाद पूजा, नमस्कार तथा अन्य समुचित नीतियुक्त व्यवहार सम्पादित हुए। दो घड़ीमें जब सम्पूर्ण भूतगणोंद्वारा किया गया प्रणाम-समारोह शान्त हुआ, तब उन ब्रह्माजीसे मैने कहा—'भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी ब्रह्मदेव ! यह क्या बात है कि यह नारी मेरे पास गयी और कहने लगी कि 'आप अपने ज्ञानोपदेशसे प्रयत्नपूर्वक हमें बोधकी प्राप्ति कराइये' देव ! आप तो सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी तथा समस्त ज्ञानोंमें पारंगत हैं। जगत्पते ! बताइये, यह काममूढा स्त्री आपके विषयमें क्या कहती है । देव ! जब आपने इसे अपनी पत्नी बनानेके लिये ही उत्पन्न किया था तब फिर इसे उस पदपर क्यों नहीं प्रतिष्ठित किया, इसको वैराग्यकी ओर आप क्यों ले गये ?'

दूसरे जगत्के ब्रह्माजी बोले—मुने ! सुनिये, जैसी बात है, उसे आपके सामने ठीक-ठीक बता रहा हूँ; क्योंकि सत्पुरुषोंके सामने सब बातें यथार्थ और पूर्णरूपसे कहनी चाहिये। मुने ! वह जो शान्त, अजन्मा, अजर एवं अनिर्वचनीय परमार्थ सद्रूप ब्रह्म है, उसीको चेतन अथवा चित्त्तत्त्व कहते हैं। चैतन्य ही उसका एकमात्र स्वरूप है। उसी परमात्माने अपने स्वरूपभूत चैतन्यसे मुझे प्रकट किया है। मैं चिदाकाशरूप ही हूँ और सदा अपने स्वरूपमें ही स्थित रहता हूँ, जब सृष्टि उत्पन्न होकर यथावत् रूपसे स्थित हो जाती है, तब मेरा व्यावहारिक नाम स्वयम्भू होता है। वास्तवमें न तो मैं उत्पन्न होता हूँ और न कुछ देखता ही हूँ। मैं समस्त आवरणोंसे मुक्त रहकर चेतनाकाशरूप हो चेतनाकाशमें ही स्थित हूँ। यह जो आप मेरे सामने हैं और मैं आपके सामने हूँ तथा हमलोगोंमें जो यह परस्पर सम्भाषण हो रहा है, यह वैसा ही है, जैसे समुद्रमें एक तरङ्गके आगे दूसरी तरङ्ग हो और स्वयं समुद्र ही उन तरङ्गोके घात-प्रतिघातके रूपमें शब्द कर रहा हो। इस विषयमें मेरी ऐसी ही मान्यता है। इस प्रकार समुद्रसे तरङ्गोंकी कल्पनाके समान जिसने अपनी और दूसरेकी दृष्टिसे देखे जानेवाले भेदकी किंचित् कल्पना कर ली है तथा कालवशात् अपने स्वरूपको भी किंचित् भुला देनेके कारण जिसकी आकृति कुछ मलिन-सी हो गयी है, वह मैं चिदाभासमात्र ही हूँ। ऐसे रूपवाले मुझ ब्रह्माके अन्तःकरणमें जो ममता और अहंताकी वासना

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखताका वर्णन * ५८७

उदित हुई है, वह उस कुमारी स्त्रीसे भिन्न जो आप
हैं, आपको अन्य-सी प्रतीत होती है और मुझे अनन्य-सी
जान पड़ती है। वह वासना हम दोनोंकी दृष्टिसे उदित
(प्रकट) भी है और अनुदित (अप्रकट) भी। वस्तुतः
मैं अविनाशिनी सत्तावाला हूँ; क्योंकि कभी मेरी उत्पत्ति
नहीं हुई है। मैं आत्मरूपसे अपने आपमें ही स्थित हूँ।
स्वभावसे ही मैं अच्युत, अपने आत्मामें रमण करनेवाला
तथा स्वयं ही सब कुछ करनेमें समर्थ हूँ। यह कुमारी
स्त्रीके रूपमें जो सामने खड़ी है, वासनाकी अधिष्ठात्री
देवी ही है। यह न तो मेरी गृहिणी हैं और न गृहिणी
बनानेके निमित्त मैंने इसका सङ्कल्प ही किया है।
अपनी वासनाके आवेशवश इसके मनमें यह भाव
उत्पन्न हो गया कि 'मैं ब्रह्माजीकी पत्नी हूँ।' इस
भावनाको लेकर यह स्वयं ही अत्यन्त दुःख उठा
रही है और वह भी व्यर्थ। यही सारे जगत्‌के भीतर
वासना बनकर बैठी हुई हैं। (सर्ग ६९)


पाषाण-जगत्‌के ब्रह्माद्वारा वासनाकी क्षयोन्मुखता एवं आत्मदर्शनकी इच्छा बताकर शिलाकी चितिरूपता तथा जगत्‌की परमात्मसत्तासे अभिन्नताका प्रतिपादन करके वसिष्ठजीको अपने जगत्‌में जानेके लिये प्रेरित करना

अन्य जगत्‌के ब्रह्माजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ ! (मैने
अपने संकल्पसे कल्पित दो परार्ध वर्षोंकी आयु बिता
दी) अब चिदाकाशरूप मैं निरतिशयानन्दरूप,
ब्रह्माकाशमयी परम कैवल्यरूपा स्थितिको प्राप्त करना
चाहता हूँ, इसीसे यहाँ मेरी वासनाद्वारा रचे गये इस
संसारमें नित्य, नैमित्तिक, दैनन्दिन और आत्यन्तिक ये
चारो प्रकारके प्रलय उपस्थित हो गये हैं। मुनीश्वर ! इस
महाप्रलयकालमें अब मैने इसे त्याग देने—इस वासनाका
मूलोच्छेद करके इसे अपनी सत्तासे गिरा देनेके उद्योग-
का निश्चित रूपसे आरम्भ कर दिया है, इसीसे यह
विरसताको प्राप्त अर्थात् विनाशोन्मुख हो गयी है। जब
मैं चित्ताकाशरूपताको त्यागकर आदि चेतनाकाशरूप
महाकाश होने जा रहा हूँ, तब यहाँ महाप्रलयका आना
और वासनाका विनाश होना अवश्यम्भावी है। यही
कारण है कि यह विरस होकर मेरे मार्गकी ओर दौड
रही है। भद्र, ऐसा कौन उदारबुद्धि प्राणी है, जो अपने
जन्मदाताका अनुसरण न करता हो ? आज यहाँ चारो
युगोंका विनाश उपस्थित है, अन्तिम कल्प, अन्तिम मन्वन्तर
तथा अन्तिम कलियुगकी समाप्तिका समय आ गया है,
इसलिये आज ही प्रजा, मनु, इन्द्र तथा देवताओंका यह
अन्तकाल आ पहुँचा है। आज ही यह कल्पका अन्त,
महाकल्पका अन्त, मेरी वासनाका अन्त और मेरे देहाकाश-
का भी अन्त होनेवाला है। ब्रह्मन् ! इसीलिये यह
वासना अब क्षीण होनेको उद्यत है, जब कमलोंसे भरा
हुआ सरोवर ही सूख रहा हो, तब गन्धलेश कहाँ ठहर
सकती है ? केवल अभिमान ही जिसका शरीर है, ऐसी
इस वासनाको स्वभावतः स्वयं ही आत्मदर्शनकी इच्छा
होती है। आत्मसाक्षात्कारके लिये किये गये धारणाभ्यास-
रूप योगसे इसने अन्य ब्रह्माण्डमें जाकर वहाँ आपके
जगत्‌का दर्शन किया, जहाँ धर्म आदि चारो वर्गोंके
अनुष्ठानमें लगी हुई स्वतन्त्र प्रजा निवास करती है।
आकाशमें विचरती हुई इस विद्याधरीने उसी सिद्धिकी
सामर्थ्यसे लोकालोक पर्वतके शिखरकी शिला देखी, जो
इसके अपने जगत्‌की आधारभूत है तथा हमारी दृष्टिमें
केवल आकाशरूप ही है। जिस जगत्रूपी पर्वतपर यह
जगत् है और जिसमे उसकी शिलारूपता है, उस तथा
हमारे जगद्रूप पदार्थोंमें ऐसे-ऐसे अनेक दूसरे
जगत् भी हैं। यह जगत्रूपी भ्रान्ति जिनकी समझमें
आ गयी अर्थात् जिनकी दृष्टिमें यह चेतनाकाशके साथ
एकरूपताको प्राप्त हो गयी, वे कभी मोहमें नहीं पड़ते