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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

३७—मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार

उत्पत्ति-प्रकरण ] * यह दृश्य-प्रपञ्च मनका विलासमात्र है, इसका ब्रह्माजीके द्वारा प्रतिपादन * १८७

ये सृष्टिके समुदाय ( ब्रह्माण्ड ) कैसे प्रकट होते हैं !' मेरे इस प्रश्नको सुनकर लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने मुझसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही ।

ब्रह्माजी बोले—वत्स ! यह मन जगत्-भावको धारण करनेकी शक्तिसे सम्पन्न है, अतः यही इस तरह सब पदार्थोंके रूपमें स्फुरित होता है, जैसे जल ही जलाशयमें फैले हुए विचित्र आवर्तोंके रूपमें स्फुरित ( भासित ) होता है । पहलेके किसी कल्पकी बात है । मैं अपने दिनके आरम्भमें जब सोकर उठा और संसारकी सृष्टिकी इच्छा करने लगा, उस समय कैसी घटना घटित हुई, यह बताता हूँ; सुनो । एक दिन संध्याके समय ( कल्पके अन्तमें ) सारी सृष्टिका संहार करके मैंने एकाग्र एवं स्वस्थचित्त हो अकेले ही वह रात बितायी। रात्रिके अन्तमें मैं जाग उठा और विधिपूर्वक संध्या करके प्रजाकी सृष्टि करनेके लिये मैंने अपनी फैली हुई आँखें आकाशमें लगायीं—मैं एकटक दृष्टिसे आकाशकी ओर देखने लगा। ज्यों ही दृष्टि डाली, त्यों ही मुझे आकाश अत्यन्त विस्तृत, अन्तरहित और शून्य दिखायी दिया । वह न तो अन्धकारसे व्याप्त था और न तेजसे ही ।

'अब मैं सृष्टिके लिये संकल्प करूँ' ऐसा निश्चय करके मैंने सूक्ष्म चित्तसे विशुद्ध भावके साथ उस स्रष्टव्य ( सृष्टिके योग्य ) वस्तुकी समीक्षा—पर्यालोचना आरम्भ की । इतनेमें ही उस विशाल आकाशके भीतर मैंने मनसे अनेक बड़े-बड़े ब्रह्माण्ड देखे, जो पृथक्-पृथक् विद्यमान थे । उन सबकी स्थिति व्यवस्थित थी । कहीं कोई प्रतिबन्ध नहीं था । उन ब्रह्माण्डोंमें दस पद्मयोनि ब्रह्मा विराजमान थे, जो मेरे ही प्रतिबिम्ब-से प्रतीत होते थे । वे सभी कमलकोशके निवासी थे और राजहंसोंपर चढ़े हुए थे । पृथक्-पृथक् स्थित हुए उन ब्रह्माण्डोंमें जरायुज आदि चार प्रकारके प्राणी उत्पन्न हो रहे थे । उन सभी ब्रह्माण्डोंमें जल देनेवाले, विशुद्ध ( अनग्रह आदि दोषोंसे रहित ) मेघ-समुदाय छा रहे थे । बड़ी-बड़ी नदियाँ बहती थीं और समुद्रोंके समान गर्जना करती थीं। आकाशमें अनेक सूर्य तपते थे तथा मरुद्गण इधर-उधर संचरण करते थे। स्वर्गमें देवता, भूतलपर मनुष्य तथा पातालोंमें रहकर दानव एवं नाग यथेष्ट क्रीडाएँ करते थे। कालचक्रमें गुँथी हुई तथा सर्दी, गरमी और वर्षाके स्वभाववाली सब ऋतुएँ यथासमय प्रकट हो फल-फूलोंसे सम्पन्न होकर भूमण्डलकी सब ओरसे शोभा बढ़ाती थीं। प्रत्येक दिशामें स्वर्ग और नरकरूपी फल देनेवाले शुभाशुभ आचारका प्रतिपादन करनेवाली स्मृतियाँ सर्वत्र प्रौढ़ताको प्राप्त थीं—उनका सब ओर प्रचार और प्रसार था। भोग और मोक्षरूपी फल चाहनेवाले विभिन्न जातिके समस्त प्राणी क्रमशः अपनी अभीष्ट वस्तु पानेके लिये यथासमय प्रयत्न करते थे । सात लोक, सात द्वीप, सातों समुद्र और सातों पर्वत, जो कालद्वारा नष्ट होनेवाले हैं, बड़े कोलाहलसे युक्त प्रतीत होते थे। उन ब्रह्माण्डोंमें अन्धकार कहीं ( खुले स्थानोंमें ) क्षीण हो गया था, कहीं ( पर्वतकी गुफा आदिमें ) अधिक स्थिर होकर छा रहा था और कहीं सब झाड़ियों एवं कुञ्जोंमें लेशमात्र तेजसे मिश्रित होकर विद्यमान था। नभरूपी नील कमलके भीतर मेघरूपी भ्रमर मँडरा रहे थे तथा तारक-समूहरूपी केसरोंसे वह परिपूर्ण था । मेरु पर्वतके कुक्षोंमें कल्पान्तकालके मेघोंकी भाँति घनीभूत कुहासा छा रहा था, जो सेमलके फलके भीतर रहनेवाली सफेद रूईके समान दिखायी देता था । लोकालोक पर्वत ही जिसकी करधनी है, गर्जते हुए समुद्र ही जिसके आभूषणोंकी झनकार हैं तथा जो अपने ही रत्नोंसे विभूषित है, वह पृथ्वी उन ब्रह्माण्डोंमें उसी प्रकार विराजमान थी जैसे कोई कुलाङ्गना अपने अन्तःपुरमें निवास करती हो ।

भुवनरूपी गड्ढोंमें रहनेवाले बहुत-से प्राणी जिनमें बीजके समान जान पड़ते थे, वे पृथक्-पृथक् ब्रह्माण्ड-गोलक अरुण तेजसे प्रकाशित हो अनारके फलोंके समान दिखायी देते थे । चन्द्रमाकी कलाके समान निर्मल

१८८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
कान्तिवाली, तीन प्रवाहवाली तथा ऊपर-नीचे एवं मध्य
—तीन मार्गोंपर विचरनेवाली गङ्गा जगद्रूपी पुरुषके यज्ञो-
पवीतकी भाँति सुशोभित हो रही थीं। दिशारूपी लताओंमें
विद्युद्रूपी फूलोंसे युक्त मेघरूपी पल्लव वायुसे टकराकर
इधर-उधर झोंके खाते, बिखर जाते और फिर नये पैदा
हो जाते थे। विभिन्न भुवनोंके भीतर समूह-के-समूह बसे
हुए देवता, असुर, मनुष्य और नाग गूलरके फलोंमें
रहनेवाले मच्छरोंके समान जान पड़ते थे। उन लोकोंमें
युग, कल्प, क्षण, लव, कला और काष्ठा आदिसे युक्त
एवं सबके अतर्कित विनाशकी प्रतीक्षा करनेवाला काल
प्रवाहरूपसे स्थित था। अपने शुद्ध एवं उत्तम चित्तके
द्वारा ऐसा दृश्य देखकर मैं बड़े विस्मयमें पड़ गया कि
यह क्या है और कैसे प्रकट हुआ है। इस स्थूल नेत्रसे
जो मुझे कुछ भी नहीं दिखायी देता, उसी अनुपम
मायाजालको मैं मनसे आकाशमें स्पष्ट देख रहा हूँ-यह कैसे
सम्भव हुआ है ? उसके बाद देरतक उस मायाजालको
देखनेके पश्चात् मैंने मनसे ही उस ब्रह्माण्डके आकाशसे
एक सूर्यको अपने समीप बुलाकर पूछा-
'देवदेवेश्वर ! महातेजस्वी सूर्य ! आओ, तुम्हारा
स्वागत है' यों कहकर मैंने पहले तो उनका स्वागत
किया। फिर उनके सामने अपना प्रश्न इस प्रकार रखा-
'भगवन् ! तुम कौन हो ? तुम्हारा यह जगत् कैसे
उत्पन्न हुआ ? इसके अतिरिक्त जो और जगत् दिखायी
देते हैं, इनकी उत्पत्ति भी किस प्रकार हुई है ? निष्पाप
देव ! यदि जानते हो तो यह सब बताओ।' मेरे इस
प्रकार पूछनेपर उन्होंने मेरी ओर देखा और पहचान
लिया। फिर मुझे नमस्कार करके उत्तम पदोंसे युक्त
वाणीद्वारा इस प्रकार कहा ।
सूर्य बोले-जगदीश्वर ! आप इस दृश्य-प्रपञ्चके नित्य
कारण हैं, फिर भी इसे जानते कैसे नहीं ? और यदि
जानते हैं तो मुझसे पूछते क्यों हैं ? सर्वव्यापी देव ! यदि
मेरी बातें सुननेके लिये आपके मनमें कौतूहल हो तो
सुनिये। महात्मन् ! आप परम महान् परमात्मा हैं (आपसे
कुछ भी अज्ञात नहीं है)। 'सत्-असत्' का बोध न होनेसे
जो मोहमें डालनेवाली हैं तथा जिनसे अनवरत नाना
प्रकारकी सृष्टियाँ होती रहती हैं, उन सदसत् कलाओं
(संकल्पों) से जो विस्तारको प्राप्त हुआ है, वह मन ही
यहाँ विविध पदार्थोंके रूपमें विलसित हो रहा है। तात्पर्य
यह कि यह सारा दृश्य-प्रपञ्च मनका ही विलास या
संकल्प है। (सर्ग ८५-९१)
स्थूल-शरीरकी निन्दा, मनोमय शरीरकी विशेषता, उसे सत्कर्ममें लगानेकी प्रेरणा, ब्रह्मा और उनके
द्वारा निर्मित जगत्की मनोमयता, जीवका स्वरूप और उसकी विविध सांसारिक गति तथा
सृष्टिके दोष एवं मिथ्यात्वका उपदेश
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं- रघुनन्दन ! इस संसारमें
ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त सभी जातिके प्राणियोंके सदा
दो-दो शरीर होते हैं। एक तो मनोमय शरीर होता है,
जो शीघ्रतापूर्वक सब कार्य करनेवाला और सदा चञ्चल
है। दूसरा मांसका बना हुआ स्थूलशरीर है, जो मनके
बिना कुछ नहीं कर सकता। उक्त दोनों शरीरोंमेंसे जो
मांसमय स्थूलशरीर है, वह सभी लोगोंको प्रत्यक्ष दिखायी
देता है। उसीपर सब प्रकारके शापों, विद्याओं (आभि-
चारिक कृत्यों) तथा विष, शस्त्र आदि विनाशके साधन-
समूहोंका आक्रमण होता है। यह मांसमय शरीर असमर्थ,
दीन, क्षणभङ्गुर, कमलके पत्तेपर पड़े हुए जलके समान
चञ्चल तथा प्रारब्ध आदिके अधीन है। देहधारियोंका
जो यह मन नामक दूसरा शरीर है, वह तीनों लोकोंमें
प्राणियोंके अधीन होकर भी प्रायः अधीन नहीं रहता