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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

२०—श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना

वैराग्य-प्रकरण ] * सांसारिक वस्तुओंकी निःसारता * ५७


पाती, यह कितने आश्चर्यकी बात है । समुद्रकी क्षणभङ्गुर लहरोंके समान यह चपल जनता इस भूतलपर निरन्तर कहींसे वेगपूर्वक आती और फिर सदा वेगसे ही चली जाती है । जैसे चञ्चल भ्रमररूपी नेत्रों और लाल पल्लवरूपी अधरोंवाली तथा विष-वृक्षपर चढ़कर फैली हुई चञ्चल विष-लताएँ देखनेमें अति सुन्दर होनेके कारण पहले मनको हर लेती हैं, पीछे सेवन करनेपर प्राणोंका नाश कर देती हैं, उसी प्रकार लाल अधरों और भ्रमरतुल्य चञ्चल नेत्रोंसे सुशोभित होनेवाली सुन्दरी स्त्रियाँ मनोहारिणी होनेके कारण पहले तो मनुष्योंके चित्तको चुराती हैं, फिर सर्वथा उनके प्राणोंका अपहरण करनेवाली बन जाती हैं । जैसे तीर्थयात्रा अथवा देवोत्सवमें बहुत-से मनुष्योंका मेला जुट जाता है, उसी प्रकार इस लोक और परलोकसे व्यर्थ ही आये हुए और अमुक स्थानपर हमलोगोंकी भेंट होगी, इस तरह आपसके संकेतयुक्त अभिप्रायसे एकत्र हुए लोगोंका जो स्त्री, पुत्र और मित्र आदिके रूपमें यहाँ मिलन होता है, यह व्यवहार मायामय ही है। यह संसार वेगपूर्वक घूमनेवाले कुलालचक्रके समान है। यद्यपि यह वर्षा ऋतुके पानीके बुलबुलोंके समान क्षणभङ्गुर है, तथापि असावधान मनुष्योंकी बुद्धिमें अपनी चिरस्थायिताकी ही प्रतीति कराता है ।

जहाँ दैववश बारंबार जन्म लेकर अपने शरीरको धारण करके छाया, पत्र और पुष्प आदिके द्वारा निरन्तर प्राणियोंका उपकार करनेवाला वृक्ष भी कुल्हाड़ीसे काट दिया जाता है, उस संसारमें मनुष्य-जैसा अपराधी और उपकारशून्य प्राणी सदा जीवित ही रहेगा, ऐसा विश्वास करनेके लिये कौन-सा कारण है ? विषका वृक्ष और विषयासक्त मनुष्य दोनों ऊपरसे बड़े मनोहर लगते हैं, किंतु उनके भीतर बड़ा भारी दोष भरा रहता है । एक (विषवृक्ष) हृदयस्थित प्राणोंके विनाशके लिये खड़ा है तो दूसरा (विषयासक्त मनुष्य) आन्तरिक शान्तिके विघातके लिये तैयार रहता है। इनके सङ्गसे तत्काल मूर्छा या मूढ़ता ही प्राप्त होती है । संसारमें ऐसी कौन-सी दृष्टियाँ हैं, जिनमें दोष नहीं है ? वे कौन-सी दिशाएँ हैं, जहाँ दुःख और दाह नहीं है ? वे कौन-से जीव-शरीर हैं, जो क्षणभङ्गुर नहीं हैं ! और कौन-सी लौकिक क्रियाएँ हैं, जिनमें छल-कपट नहीं है ? बीते हुए और आनेवाले अनन्त कल्पोंकी संख्याका परिज्ञान नहीं होता । इसलिये जैसे क्षण अनन्त हैं, उसी प्रकार कल्प भी अनन्त हैं। भगवान् विष्णु और रुद्र आदिकी दृष्टिमें कल्प भी क्षण ही हैं। अतः ब्रह्मलोकके निवासी भी कल्प नामधारी एक क्षणतक ही जीनेवाले हैं । इसलिये कलाओं (विभिन्न अंशो) से सुशोभित होनेवाले कालसमूहमें लघुत्व और दीर्घत्व—चिरजीवन और क्षणजीवनकी बुद्धि भी द्रष्टाकी कल्पनाके अधीन होनेके कारण असत्य ही है । सर्वत्र पत्थरके ही पहाड़ हैं—उनमें पत्थरके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं है। इसी तरह सब जगह मिट्टीकी ही पृथ्वी हैं, काष्ठके ही वृक्ष हैं और हाड़-मांसके ही मनुष्य हैं। लोगोंके बनाये हुए संकेतके अनुसार ही उनके विशेष नाम आदि भाव नियत हो गये हैं। इस भोग्यवर्गमें कोई भी वस्तु विकारसे हीन अथवा अपूर्व नहीं है। सब कुछ विकाररूप होनेके कारण ही असत्य है । जल, अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वी—ये पाँच महाभूत ही परस्पर मिलकर घट-पट आदि नाना पदार्थोंके रूपमें अविवेकी पुरुषोंको प्रतीत होते हैं । चेतनके सान्निध्यसे ही उन्हें पदार्थोंकी प्रतीति होती है । विवेक-दृष्टिसे पृथक्-पृथक् विभागपूर्वक आलोचना करनेपर यह जगत् पाँच भूतोंसे अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु नहीं सिद्ध होता ।

महात्मन् ! मिथ्या होनेपर भी इस पदार्थ-समूहके विषयमें व्यवहार-कुशलताके कारण विद्वान् पुरुषोंके भी मनमें भोगसम्बन्धी चमत्कार (चेष्टा) को उत्पन्न करनेवाली जो व्यवहार-चमत्कृति या प्रवृत्ति देखी जाती है,


१. कुम्हारका चाक ।

५८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

वह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि कभी-कभी स्वप्नमें मिथ्याभूत विषयको लक्ष्य करके भी किन्हीं लोगोंकी उस प्रकार चमत्कारपूर्ण प्रवृत्ति होती देखी जाती है।

जैसे पशु किसी हरी-हरी लताके फलको पानेकी इच्छासे ही आगे बढ़नेपर निस्संदेह पर्वतशिखरसे गिर जाता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ पुरुषोंके पद (स्थान या धन-वैभव आदि) को हठात् लेनेकी इच्छा रखनेवाला पुरुष राग-लोभ आदि दोषोंसे दूषित हुए अपने चित्तके द्वारा ही मारा जाकर अवश्य पतनके गर्तमें गिर जाता है।

(सर्ग २७)


जागतिक पदार्थोंकी परिवर्तनशीलता एवं अस्थिरताका वर्णन

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—ब्रह्मन् ! यह जो कुछ भी स्थावर-जङ्गम रूप दृश्य जगत् दिखायी देता है, वह सब सपनेमें लगे हुए मेलेके समान अस्थिर है—चिरकालतक टिकनेवाला नहीं। आज जिस शरीरको रेशमी वस्त्र, फूलोंके हार तथा भाँति-भाँतिके अनुलेपनोंसे सजाया गया है, वही कल नंगा होकर ग्राम या नगरसे बहुत दूर किसी गड्ढेमें पड़ा-पड़ा सड़ जायगा। जिस स्थानमें आज विचित्र आहार-व्यवहार और चहल-पहलसे भरा हुआ चञ्चल-सा नगर देखा गया है, वहीं कुछ ही दिनोंमें सूने वनके धर्मका उदय हो जायगा—वह भूमि गहन वनके समान निर्जन एवं अगम्य हो जायगी। जो पुरुष आज तेजस्वी है और अनेक मण्डलोंपर शासन करता है, वही कुछ दिनोंके अनन्तर राखका ढेर बन जाता है। आज जो आकाशमण्डलके समान नीला और महाभयंकर वन है, वही कुछ कालके पश्चात् ध्वजा-पताकाओंसे आकाशको ढक देनेवाला विशाल नगर बन जाता है। आज जो लता-वल्लरियोंसे आवेष्टित भयंकर वनश्रेणी दृष्टिगोचर होती है, वही कतिपय दिनोंमें ही मरुभूमि (रेगिस्तान) का स्थान ग्रहण कर लेती है। जल स्थल हो जाता है और स्थल जल। काठ, जल और तिनकोंसहित सारा जगत् ही विपरीत अवस्थाको प्राप्त होता रहता है। जवानी, बचपन, शरीर और द्रव्यसंग्रह—ये सब-के-सब अनित्य हैं और तरङ्गकी भाँति निरन्तर एक भावसे दूसरे भावको प्राप्त होते रहते हैं। इस संसारमें प्राणियोंका जीवन हवासे भरे स्थानमें रक्खे हुए दीपककी लौके समान चञ्चल (शीघ्र ही बुझ जानेवाला) है और तीनों लोकोंके सम्पूर्ण पदार्थोंकी शोभा (चमक-दमक) बिजलीकी चमकके समान क्षणिक है।

महर्षे ! वे उत्सव और वैभवसे सुशोभित होनेवाले दिन, वे महाप्रतापी पुरुष, वे प्रचुर सम्पत्तियाँ तथा वे बड़े-बड़े कर्म—सब-के-सब दृष्टिपथसे दूर हो केवल स्मरणके विषय रह गये हैं। इसी तरह हम भी क्षणभरमें अज्ञात स्थानको चले जायँगे और लोगोंके लिये केवल स्मरणीय बनकर रह जायँगे। यह संसार प्रतिदिन नष्ट होता है और प्रतिदिन पुनः उत्पन्न हो जाता है। अतः आजतक इस नष्टप्राय जले हुए संसारका अन्त नहीं हुआ। प्रभो ! मनुष्य पशु-पक्षियोंकी योनिको प्राप्त होते हैं। पशु-पक्षी मानवजन्म धारण करते हैं तथा देवता भी देवेतर योनियोंमें जन्म लेते हैं। फिर इस संसारमें कौन-सी वस्तु स्थिर है ? स्वर्ग, पृथ्वी, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ और दिशाएँ—ये सब-के-सब विनाशरूपी बड़वानलके लिये सूखे ईंधनके समान हैं। धन, भाई-बन्धु, भृत्यवर्ग, मित्र तथा वैभव—ये सब-के-सब विनाशके भयसे डरे हुए पुरुषके लिये नीरस ही हैं। मुनीश्वर ! जगत्‌में मनुष्य क्षणभरमें ऐश्वर्य (धन-वैभव) प्राप्त कर लेता है और क्षणभरमें दरिद्र हो जाता है। वह क्षणभरमें ही रोगी और क्षणभरमें नीरोग हो जाता है। इस प्रकार प्रतिक्षण विपरीत अवस्था प्रदान करनेवाले इस नश्वर जगत्रूपी भ्रमसे कौन


१. यहाँ बड़वानलका अर्थ अग्निमात्र समझना चाहिये।

वैराग्य-प्रकरण ] * श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना * ५९


बुद्धिमान् मनुष्य मोहित नहीं हुए हैं ? ( इस भ्रमने सभी लोगोंको मोहमें डाल रक्खा है । )

आकाशमण्डल क्षणभरमें ही अन्धकाररूपी कीचड़से ढक जाता है, फिर क्षणभरमें ही सुवर्णद्रवके समान शीतल मृदुल चाँदनी आदिके उज्ज्वल प्रकाशसे उद्भासित हो परम सुन्दर दिखायी देने लगता है । दूसरे ही क्षण मेघरूपी नील कमलोंकी मालासे उसका अन्तःप्रदेश ( वक्ष एवं उदर ) ढक जाता है । क्षणभरमें ही वहाँ उच्चस्वरसे मेघोंकी गम्भीर गर्जना होने लगती है और क्षणमें ही वह मूककी भाँति नीरव हो जाता है । क्षणमें ही ताराओंकी हारावलीसे अलंकृत और क्षणमें ही सूर्यरूपी मणिसे विभूषित हो जाता है । क्षणमें ही वहाँ चन्द्रमाकी चटकीली चाँदनीसे आह्लाद छा जाता है और क्षणभरमें ही वह सबसे सूना हो जाता है । इस तरह जैसे आकाशकी स्थिति क्षण-क्षणमें बदलती रहती है, उसी प्रकार संसारके सभी पदार्थ प्रतिक्षण परिवर्तनशील हैं । महर्षे ! संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जो धीर होता हुआ भी क्षणभरमें स्थित और क्षणभरमें नष्ट होनेवाली, आवागमनकी परम्परासे युक्त इस सांसारिक स्थितिसे भयभीत नहीं होता ? मुने ! यहाँ क्षणभरमें आपत्तियाँ आती हैं और क्षणभरमें सम्पत्तियाँ । क्षणमें ही जन्म होता है और क्षणमें ही मृत्यु । इस जगत्में कौन-सी ऐसी वस्तु है, जो क्षणिक न हो ? भगवन् ! यहाँ उत्पन्न हुआ मनुष्य पहले कुछ और ही था और थोड़े दिनों बाद अन्य प्रकारका हो जाता है । यहाँ सदा एकरूप रहनेवाली सुस्थिर वस्तु कोई नहीं है । यहाँ कायरके द्वारा शूरवीर मारा जाता है । एक ही व्यक्तिके हाथसे सैकड़ों मनुष्य मारे जाते हैं और साधारण लोग भी राजा बन बैठते हैं । इस प्रकार यह सारा जगत् विपरीत अवस्थामें परिवर्तित होता रहता है । बाल्यावस्था थोड़े ही दिनोंमें चली जाती है, फिर यौवनकी शोभा छा जाती है और कुछ ही दिनोंमें वह भी समाप्त हो जाती है । तत्पश्चात् वृद्धावस्थाका पदार्पण होता है । जब हमारे शरीरमें भी एकरूपता ( स्थिरता ) नहीं है, तब बाह्य वस्तुओंमें एकरूपताका विश्वास क्या हो सकता है ! उत्पन्न और विनष्ट होनेवाले संसारी पुरुषोंकी न तो आपत्तियाँ स्थिर रहती हैं और न सम्पत्तियाँ ही । यह काल चतुर मनुष्योंको भी अवहेलनापूर्वक विपरीत स्थितियोंमें परिवर्तित करनेके कार्यमें अत्यन्त कुशल है । प्रायः सब लोगोंको आपत्तिमें ढकेलकर यह क्रीड़ा करता है ।

( सर्ग २८ )


श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! विषयभोग दुःख-रूप और अनित्य हैं, इस प्रकार विषयोंमें दोष-दर्शनरूपी दावानलके द्वारा मेरा चित्त दग्ध हो निर्मल एवं महान् हो गया है । अतः जैसे जलाशयोंमें मृगतृष्णाका उदय नहीं होता, उसी तरह मेरे उस चित्तमें भोगोंकी आशा अङ्कुरित नहीं होती । जैसे नीमके वृक्षपर फैली हुई रसहीन गिलोय काल पाकर उत्तरोत्तर कड़वी होती जाती है, उसी प्रकार यह सांसारिक स्थिति भी दिन-प्रति-दिन तीव्र वैराग्यके कारण मेरे लिये अधिकाधिक कटुताको प्राप्त हो रही है । मुनीश्वर ! विविध चिन्ताओंसे परिपूर्ण भोग-समूहों एवं राज्योंकी अपेक्षा चिन्तारहित महात्मा पुरुषोंद्वारा स्वीकृत एकान्त-सेवन ही मुझे अच्छा लगता है। सुन्दर उद्यान मुझे आनन्द नहीं देता, स्त्रियोंसे मुझे सुख नहीं मिलता और धनकी आशापूर्तिसे मुझे हर्ष नहीं होता । मनके साथ-साथ शान्ति मैं पाना चाहता हूँ । मैं न तो मृत्युका अभिनन्दन और न जीवनका ही स्वागत करता हूँ। जिस तरह संतापरहित होकर स्थित हूँ, उसी तरह रह रहा हूँ; मुझे राज्यसे, भोगोंसे, धनसे और नाना प्रकारकी