राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
प्रस्तावना एवं काश्मीर राज्य विवरण
The provided image is completely blank and does not contain any text to transcribe.
कल्हणकृत
राजतरंगिणी
भाष्यकार
रघुनाथ सिंह
एम० ए०, एल० एल० बी०, पी-एच० डी०
हिन्दी प्रचारक संस्थान
( व्यवस्था : कृष्णचन्द्र बेरी एण्ड सन्स )
पो० बॉक्स नं० १०६, सी० २१/३० पिशाचमोचन, वाराणसी-१
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की पी-एच० डी० उपाधि हेतु
स्वीकृत शोध-प्रबन्ध
प्रथम आवृत्ति | प्रकाशक
१९७० | विजयप्रकाश बेरी
मूल्य ७५.०० | हिन्दी प्रचारक संस्थान
| पो० बॉक्स नं० १०६,
| सी० २१/३० पिशाचमोचन वाराणसी-१
मुद्रक : विक्रम पंचाङ्ग प्रेस, भदैनी, वाराणसी-१
काश्मीराभिजननिरतिशयानुरागरञ्जितान्तःकरणानां, सार्वभौमप्रभुता-
सम्पन्नगणतन्त्रभारतप्रथमप्रधानमन्त्रिणां, सम्प्रतिशतऋतुपुरप्रसाधनपराणां,
पण्डितश्रीजवाहरलालनेहरुमहानुभावानां;
अङ्गरसपरिपाकमुत्पन्नायाः, भारतप्रधानमन्त्रिपदस्य तृतीयालङ्कारस्व-
रूपायाः, श्रीमत्या इन्दिरागान्धीमहा गायाः,
करकिसलयोः
हार्दः स्नेहोपहारः
उद्गम
मैं शिशु था। शिशुओं के साथ सड़कों पर दौड़ता था। खेलता था। सफेद घोड़ों की
जोड़ी आती। 'राजा राजा' कोलाहल होता। हम रुक जाते। देखते—राजा। लोग कह उठते—
जम्बू के राजा, काश्मीर के राजा।
श्वेत पगड़ी। नाटा कद। कुछ कम गोरा रंग। किन्तु मर्यादा की झलक। स्वाभिमान
की कान्ति। स्थिर चित्तवृत्ति। वे अनायास आकर्षित करते—लोगों को। काशी निवासियों के
कर बद्ध होते। मस्तक नत होते। गाड़ी को मार्ग देते। पीछे हट जाते। राजा हाथ उठाकर,
मुस्कराकर, अभिवादन का उत्तर देते। लोग होते सन्तुष्ट। हमें लगता आश्चर्य।
उनके सामने बैठते—सुन्दर-गौरवर्ण, श्वेत पगड़ी धारी, दो सज्जन। उनमें एक के
कानों में होती, स्वर्ण तरकी। दोनों के भ्रू मध्य लगा रहता केसर चन्दन का तिलक। काशी में
जहाँ लोगों का रंग गेहुआ और साँवला होता है उनके सर्वाङ्ग गौरवर्ण को देखकर आश्चर्य
होता। प्रायः यह घटना प्रति वर्ष होती। यह बात लगभग ५८ वर्ष पुरानी होगी।
हम बढ़ते गये। राजा की उमर ढलती गयी। बिलासपुर के राजा भी उन दिनो काशी
आते थे। उनका विलास भवन मामूरगंज वाराणसी में अब भी है। यह बाग नेपाली कोठी के
पूरब-उत्तर ओर है। नेपाल के राजा लोग, राणाओं द्वारा नेपाल से निर्वासित होने पर, यही
जीवन व्यतीत किये थे। नेपाली कोठी के पश्चिम ओर सड़क के पार नेपाल की रानी लक्ष्मी
देवी का बगीचा है। वहीं वे जीवन व्यतीत की थी। नेपाल की राज्य क्रान्ति के पूर्व, नेपाल के
राजा, राणाओं के एक प्रकार से बन्दी थे। काशी नेपाल के राजा तथा राणाओं दोनो को
प्रिय थी।
बिलासपुर राजा के पास गाड़ी और घोड़ा जोड़ी थी। उनके बगीचा से सटा पूर्व ओर
अस्तबल था। उन दिनों मोटरों का दर्शन दुर्लभ था।
बिलासपुर के राजा का भी नाटा कद था। ये प्रतिदिन गङ्गा स्नान करते थे। वे मेरे
बैठका के सम्मुख दशाश्वमेघ घाट पर आते थे। उनकी वेश-भूषा काशिराज से भिन्न थी। जिनको
राजसी ठाट में देखने के हम आदी थे।
महाराज काश्मीर का स्वर्गीय आनरेबुल सर राजा मोतीचन्द्र से बहुत स्नेह था। मेरे
पिता के मामा स्वर्गीय ठाकुर विश्वनाथ सिंह उनके यहाँ कार्य करते थे। उनका परिचय राजा
साहब के माध्यम से स्वर्गीय काश्मीरराज प्रताप सिंह से हो गया था। श्री प्रताप सिंह को एक
पुत्र हुआ था। वह असमय में ही काल कवलित हो गया। वे पुत्र के इच्छुक थे। काशी के
पण्डितों ने उनकी इस स्थिति से लाभ उठाया। उन्हें विश्वास दिलाया—पूजापाठ, दान पुण्य से
सब कुछ हो सकता है। महाराज उनकी बातो में आ गये। यह काम गुप्त ढंग से करना था।
राज्य में यह समाचार न फैले। इसकी विशेष सतर्कता रखी गयी। हमारे मामा के द्वारा पूजा
पाठ आदि का प्रबन्ध हो जाता था।
( ५ )
दशाश्वमेध घाट, मेरे मकान और जम्मू हाउस के बीच एक फर्लाङ्ग का फासला था ।
अपने खानदानी मकान ओरङ्गावाद से दशाश्वमेध रोज जाया करता था । जम्मू हाउस की
भवन रचना हमें आकर्षित करती थी । जम्मू हाउस के दक्षिण तरफ दशाश्वमेध की सड़क और
उत्तर टेढ़ी नीम की गली थी । मैं बाल्यावस्था में अपनी मामी के साथ गंगा स्नान करने जाता
था । जिस दिन गली में भिखमंगों का विशाल जन समूह एकत्रित रहता, हम समझ जाते थे ।
महाराज काश्मीर आ गये थे ।
मेरा कुटुम्ब प्रारम्भ से ही अंग्रेजों का द्रोही रहा है । मेरे पिता के दूसरे मामा स्वर्गीय
श्री बैजनाथ सिंह काग्रेस स्थापना के दो वर्ष पश्चात् काग्रेस में सम्मिलित हुए । वे भंग भंग
तथा स्वदेशी आन्दोलन में जेल यात्रा कर चुके थे । हमारे जन्म के पूर्व दो बार आन्दोलन में
कारागार की सजा भुगत चुके थे । कलकत्ता उनका कार्य क्षेत्र था । यही कार्य करते थे । कवि
थे । कविता करते थे । पुरानी शैली के थे । कविता लिखकर फाड़ देते थे । कभी कविता उन्होंने
प्रकाशित करने का प्रयास नहीं किया ।
काश्मीर के राजा थे । उनकी सेना थी । उनका राज्य था । उस समय यह बातें स्वा-
धीनता आन्दोलन काल में बहुत भली लगती थीं । भारत के मानचित्र पर काश्मीर, राजस्थान
तथा अन्य भारतीय रियासतों का पीला रंग देखता तो मन में उत्साह उत्पन्न होता ।
काशी एवं काश्मीर का नाम समध्वनि होने के कारण रुचता था । दोनों राजाओ को
देखकर मन प्रसन्न होता था । भारत की पुरानी स्मृति स्मरण हो आती थी । काशिराज
प्रभुनारायण सिंह जी संस्कृत के उद्भट विद्वानो में थे । काशी के विद्वानों में उनकी गणना की
जाती थी । संस्कृत के उच्च कोटि के लेखक थे । एक समय काशी विश्वविद्यालय के स्व० उप-
कुलपति एवं गुजराती के प्रसिद्ध लेखक श्री आनन्द शंकर बापूभाई ध्रुव उनके यहाँ गये । ध्रुव
जी संस्कृत के विद्वान् थे । उन्होने अकस्मात् कुछ पृष्ठ लिखित देखे । उठाकर पढ़ा । उन्हे
आश्चर्य हुआ । ये नाटक के कुछ पृष्ठ थे । पद, अलंकार, उपमा आदि समन्वित थे । काव्य
रचना कालिदास से कम नहीं थी । पद सरस थे, मधुर थे । ओजपूर्ण शैली थी । पुरानी शैली
में मौलिक नूतनता थी । ध्रुव जी ने कहा—'महाराज आप इसे छपाते क्यों नहीं ?' उन्होंने
हँस कर कहा—'यह मेरा काम नहीं है । ब्राह्मणों का काम है ।' और सब पृष्ठ फाड़ दिया ।
राजागण उस समय परम्परा का पालन करने में गौरव का अनुभव करते थे । महाराज
काश्मीर गंगा स्नान करते थे । हमारे बैठका के ठीक सामने । दशाश्वमेध घाट पर । वे कभी-
कभी दशाश्वमेध घाट से पंचगंगा घाट नाव से जाते थे । उनके सरल स्वभाव की सब प्रशंसा
करते थे । साधारण जनता के साथ घाटो पर स्नान करते थे । जबकि छोटे-छोटे राजा आते थे
तो अपने मिथ्या अभिमान के कारण अलग प्रबन्ध कराते थे । काश्मीरराज अपनी सरलता एवं
नम्रता के कारण काशी में लोकप्रिय थे ।
मैं हिन्दू स्कूल का विद्यार्थी था । हिन्दू स्कूल में काशीनरेश हाल है । भव्य भवन रचना
है । उसके ऊपर काश्मीर नरेश श्री रणबीर सिंह के नाम पर संस्कृत पाठशाला थी । संस्कृत
पाठशाला के अध्यापक खूब बड़ी पगड़ी बाँधते थे । उस समय उधर आबादी नही थी । पंडित
लोग शहर से तर्क वितर्क करते चलते थे । हम लोग यहाँ के विद्यार्थियों की फहराती लम्बी
शिखा और पीली धोती देख कर कभी-कभी उनका मजाक उड़ाते थे—'काश्मीर से केसर
आई है । उसी से रंग कर धोती पहने हैं ।'
सन् १९२१ में असहयोग आन्दोलन आरम्भ हो गया। मैने स्कूलत्याग दिया । आन्दोलन
में भाग लिया । उस समय मेरी ११ वर्ष की अवस्था थी । मेरी सजा और फैसला तत्कालीन
सिटी मजिस्ट्रेट श्री खरे घाट आई. सी. एस. ने किया था । वे कालान्तर में काश्मीर में किसी
उच्च पद पर चले गये थे ।
सन् १९२१ में ही श्री विश्वनाथ सिंह को दो गोलियाँ लगी । उन्होंने मारने वालों से
बन्दूक छीन ली । राजा विलासपुर की कोठी समीप ही थी । वे फाटक कूद कर डाक गये । उन्हें
खून से लथपथ देखकर विलासपुर राजा के स्थानीय दीवान तत्काल मर गये ।
मेरे कुटुम्ब में सभी लोग राजनीतिक आन्दोलन में जेलयात्रा कर चुके थे । श्री बैजनाथ
सिंह छः बार और श्री विश्वनाथ सिंह तीन बार । श्री मूडी आइ. सी. एस. जो कालान्तर
में भारत के होम मेम्बर और पंजाब के गवर्नर थे उन दिनों काशी में ज्वाइन्ट मजिस्ट्रेट थे ।
उन्होंने फैसला सुनाया । विश्वनाथ सिंह तिलक स्वराज्य फंड का रुपया एकत्रित कर रहे थे,
डाकुओं ने उन पर हमला किया और उल्टे उन्हीं के ऊपर दूसरा मुकदमा चला दिया । यह
मुकदमा श्री दयाल, जो कालान्तर में इलाहाबाद के जज तथा काश्मीर के चीफ जस्टिस हो गये
थे, इजलास में चला । श्री विश्वनाथ सिंह छूट गये । सन् १९३० में उन्हें नमक सत्याग्रह में
अढ़ाई वर्ष का जेल हुआ । उनका स्वास्थ्य ढलता गया और सन् १९४४ में उनकी मृत्यु हो
गई । इस प्रकार काश्मीर किसी न किसी प्रकार अपनी स्मृति मुझमें हरी रखता था । मैं
आन्दोलन में पड़ गया । फिर भी जब कभी काश्मीर के राजा आते तो मैं उन्हें अवश्य देखता ।
बहुत सी बातें याद आती है । अखबारों में काश्मीर का समाचार रुचि से पढ़ता ।
मेरे घर में काश्मीरराज ने जो पत्र श्री विश्वनाथ सिंह को लिखे थे उनकी एक पूरी फाइल
थी । सैकड़ों पत्र थे । हिन्दी नागरी में लिखे थे, मैं कभी-कभी उनको पढ़ता था। मैं उस ओर से
उदासीन था । मेरे निवास स्थान की तलाशी राजनैतिक कार्यकर्त्ता होने के कारण वर्ष में दो
तीन बार होती थी । उन पत्रों में राजा सर मोतीचन्द के नाम लिखे पत्र थे । उन्हें बाँधकर रख
दिया था । एक बार तलाशी आई । मैं घर पर नही था । अचानक तलाशी हुई । गंगा जी खूब
बढ़ी थी। मेरे बैठके की पहली मंजिल तक पानी आ गया था। हल्ला हुआ—पुलिस आई। नौकर
ने कागजों का बंडल तीसरी मंजिल से धारा में फेंक दिया । उनमें वे पत्र भी समाप्त हो गये ।
उस समय तक श्री प्रताप सिंह तथा राजा सर मोतीचन्द का देहान्त हो चुका था ।
मैने वकालत शुरू की। मेरे साथ श्री राजेशदत्त पाण्डेय तथा चतुर्भुज दास पारिख,
जज हाईकोर्ट इलाहाबाद, कार्य करते थे। हम लोग फौजदारी के वकील थे। एक साथ सभी
मुकदमे में काम करते थे। राजेशदत्त पाण्डेय के पिता रमेशदत्त पाण्डेय महाराजा काश्मीर के
यहाँ तीस वर्षों तक उच्च पदों पर कार्य किये थे। स्वर्गीय डॉ० श्रीमती एनिवेसन्ट ने रमेशदत्त
जी को राजा के आग्रह पर भेजा था। उनकी श्रीनगर में पाण्डेय बिल्डिंग थी। राजेशदत्त जी
का काश्मीर में ही अध्ययन हुआ था।
( ७ )
सन् १९४० से मुस्लिम लीग का आन्दोलन प्रबल होता गया। स्व० जिन्ना साहब काश्मीर
पहुँचने लगे । भविष्य ठीक न देखकर उन्होंने अपनी श्रीनगर की इमारत बेच दी। श्री राजेश
दत्त जी के साथ प्रायः काश्मीर सम्बन्धी बातें हुआ करती थीं ।
मैं सन् १९५२ में संसद् में आया । श्री पंडित जवाहर लाल से पूर्व परिचय था । सन्
१९२१ में आनन्द भवन से साइक्लोस्टाइल से इनडिपेन्डेन्ट अखबार निकलता था । वह पहले
छप कर निकलता था। अंग्रेजी सरकार ने उसे सन् १९२२ में बन्द करा दिया था। मैं उसकी
एक प्रति इलाहाबाद से काशी लाता था। उसी के आधार पर पुनः साइक्लोस्टाइल करके बेचा
जाता था। किसी भी काश्मीरी कुटुम्ब में प्रवेश का यह मेरा पहला अवसर था। संसद् में
काश्मीर स्टेट्स ग्रुप संसद् सदस्यों का बना। मैं उसका संयोजक सन् १९५४ से १९६३ तक
था। इस समय के नेताओं तथा काश्मीर के लोगों से निकट सम्बन्ध हो गया। मैं चार बार
संसद् सदस्यों का स्टडी ग्रुप लेकर काश्मीर गया। काश्मीर भ्रमण किया। बाल्यावस्था में
स्वर्गीय विश्वनाथ सिंह कहा करते थे जाना हो तो काश्मीर जाओ। मैं अध्ययन काल में
गर्मियों की छुट्टी में दार्जिलिंग, नैनीताल, मंसूरी और शिमला जाया करता था। किन्तु काश्मीर
का अपना ही स्थान है। वह सचमुच नन्दन कानन है।
सन् १९६० में प्रथम बार विचार उठा कि काश्मीर की राजतरंगिणियों के मूल संस्कृत
का हिन्दी में अनुवाद करूँ। श्री स्टीन के राजतरंगिणियों से मुझे विशेष प्रेरणा मिली। सन्
१९६७ का संसद् चुनाव हार जाने के कारण खाली था। अतएव इस कार्य में हाथ लगाया ।
इस समय मेरे एक मात्र सहायक एवं मित्र श्री पशुपतिप्रसाद द्विवेदी ही थे ।
सर्व श्री लल्लनजी गोपाल काशी हिन्दूविश्वविद्यालय, उपेन्द्र ठाकुर मगध विश्वविद्यालय
तथा कृष्णदत्त वाजपेयी सागर विश्वविद्यालय ने राजतरङ्गिणी सम्बन्धी अनेक सुझाव दिये हैं,
उसके लिये मैं उनका आभारी हूँ ।
यह पुस्तक मैंने स्व० श्री जवाहरलाल नेहरू तथा उनकी पुत्री श्रीमती इन्दिरागांधी को
भेंट की है। उनका सम्पर्क मेरे परिवार से रहा है। काश्मीर को इस बात का गर्व होना
चाहिए कि यदि उसने मेघवाहन, ललितादित्य, प्रवरसेन, जयापीड़, अवन्तिवर्मा जैसे महान्
व्यक्तियों को उत्पन्न कर काश्मीर का मुख उज्ज्वल किया है तो उसी प्रकार स्व० पंडित मोती-
लाल एवं श्री जवाहरलाल ने भारत का जीवन स्तर उठाने का कम प्रयास नहीं किया ।
काश्मीर की महिलाएँ यशोवती, सुगन्धा, दिद्दा केवल काश्मीर की शासिका थीं। किन्तु
श्रीमती इन्दिरा गांधी को समस्त भारतवर्ष का शासन करने का गौरव प्राप्त हुआ है।
निःसन्देह मेघवाहन ललितादित्य ने दिग्विजय किया था। परन्तु मोतीलाल ने सर्व-
त्याग किया। पंडित जवाहरलाल ने महात्मा गांधी के आशीर्वाद के साथ भारतीय आजादी प्राप्त
कर एक पराधीन देश को स्वाधीन बनाया है। पंडित मोतीलाल जी सेन्ट्रल एसेम्बली
( वर्तमान लोकसभा ) के नेता थे। पंडित जवाहरलाल भी उसके नेता थे । श्रीमती इन्दिरा
गांधी भी उसकी नेता हैं। विश्व के किसी भी संसद् को यह गौरव नहीं प्राप्त है कि तीन
पीढ़ियों तक एक ही कुटुम्ब के लोग एक के बाद दूसरे नेता होते गये हों। काश्मीर के दिग्-
विजय कर्ताओ का कार्य क्षेत्र काश्मीर तक सीमित था। किन्तु पंडित मोतीलाल, उनके पुत्र
पंडित जवाहरलाल और जवाहरलाल की पुत्री इन्दिरा गांधी का कार्य क्षेत्र समस्त भारतवर्ष
था। वे भारत के भाग्य विधाता बने हैं। नि.सन्देह काश्मीर भूमि उनके जैसी दूसरी सन्तान
उत्पन्न नही कर सकी है। भारतवर्ष का तिलक काश्मीर है। उस काश्मीर को शत-शत प्रणाम।
कल्हण ने किसी राजाश्रय में किसी संरक्षण में किसी प्रश्रय में किया अर्थलाभ की दृष्टि
से राजतरंगिणी की रचना नही की थी। मैने भी किसी राजाश्रय, किसी-संरक्षण तथा किसी
प्रश्रय, अर्थ लोभ किंवा किसी भी स्वार्थ लोभ से यह पुस्तक नही लिखी है। अपनी अभिलाषा
केवल इतनी ही है कि मेरा प्रयास कुङ्कुम-केसर की उत्पत्ति भूमि काश्मीर की मञ्जुल
यशः सुगन्धि का अनुभव सहृदयजन को कराने में सफल हो। अपने परिश्रम, अपने अर्जित
धन से पुस्तक संग्रह कर लिखा है। कल्हण की वाणी को प्रकाश में लाने का प्रयास किया
है। यदि मै अर्थ लोभ किंवा किसी भी प्रकार की मुरापेक्षी भावना से लिखता तो मेरी
लेखनी कुण्ठित हो जाती। मैं शब्दजाल का व्यापारी हो जाता। मेरा पुरस्कार अथवा सन्तोष
इसी में है कि मैं यह कार्य कर सका। मै केवल इतने का ही आकाङ्क्षी हूँ कि सहृदयजन इसे
समझने की कृपा करें। यह कार्य ज्ञात अज्ञात काश्मीर की उन महाविभूतियों के बिना आशीर्वाद
के सफल नही होता जिनकी सुरभि से काश्मीर एवं जगत् आज भी सुरभित हैं। काश्मीर के
उन महात्माओं तथा जनता को अंजली बद्ध नमस्कार करता हूँ। धर्म के प्रति आस्था होने के
कारण कहना चाहता हूँ—ॐ नमः शिवाय—नमो बुद्धाय !!
काश्मीरमयान्तः करण
—रघुनाथ सिंह
प्राक्कथन
भारत विभाजन के पश्चात् भारत एवं पाकिस्तान के बीच काश्मीर विवाद का विषय बन गया ।
काश्मीर का प्रश्न अन्तर्राष्ट्रीय जगत तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में चर्चा का विषय हो गया । काश्मीर विधान-
सभा तथा भारतीय संसद में भी विभिन्न दलों द्वारा यह प्रश्न उठाया जाता रहा है। अतएव उसका व्यापक
अध्ययन अनिवार्य हो गया था। मुसलमानों के कादयान सम्प्रदाय ने कश्मीर का सम्बन्ध हजरत मूसा,
सुलेमान, ईशा आदि बाइबिल एवं कुरान वर्णित धार्मिक महात्माओं से जोड़ कर काश्मीर को भारतीय
संस्कृति, सभ्यता, धर्म एवं इतिहास से अलग करने का प्रयास आरम्भ किया। काश्मीर का नाम बदल कर
'बाग़-ए-सुलेमान' रख दिया गया। पाकिस्तानी लेखकों ने यह प्रतिपादित करने के लिए पुस्तक ही लिख
डाली कि वास्तव में नाम 'कशीर' है न कि 'काश्मीर' । काश्मीर शब्द का पुराण, महाभारत तथा अन्य
प्राचीन प्रामाणिक इतिहास ग्रन्थों में उल्लेख है, अतएव पुरातन परम्परा से काश्मीर को अलग करने का
अथक परिश्रम किया जाने लगा । इस विषय पर पुस्तकें तथा पैम्फलेट लिखे गये । शंकराचार्य पर्वत का
नाम 'तख्ते-सुलेमान' तथा अनन्त नाग का नाम 'इस्लामाबाद' रख दिया गया । इसी प्रकार पुराने स्थानों
के नाम बदल कर उनके स्थान पर जियारत शरीफ, मजार पीर आदि रख दिये गये ।
काश्मीर के काँग्रेस संसदीय दल ने काश्मीर प्रश्न का अध्ययन करने के लिये दल के संसद
सदस्यों का एक स्टडी ग्रुप बनाया। मैं इस स्टडी ग्रुप का दस वर्षों तक संयोजक रहा। इस काल में काश्मीर
में अनेक बार जाने का अवसर मिला । सुरक्षा विभाग के क्षेत्रों में जो स्थान पड़ गये थे वहाँ सुरक्षा विभाग
की सहायता से पहुँच कर उनका अध्ययन किया । संसद में भाषणों, चर्चाओं तथा बाहर काश्मीर इतिहास
सम्बन्धी विवादों का उत्तर-प्रत्युत्तर तथा वास्तविकता पर प्रकाश डालने के लिए हमें वक्तव्य देना पड़ा है।
संसद तथा बाहर आक्षेपों एवं विवादो का उत्तर देने के लिये काश्मीर के प्राचीन इतिहास एवं भू-
परिचय का ज्ञान आवश्यक हो गया । काश्मीर की यात्रा प्रतिवर्ष अध्ययन तथा जानकारी प्राप्त करने के लिये
आवश्यक हो गयी थी। इस काल में पाँच बार संसदीय सदस्यों के शिष्टमण्डल के नेता के रूप में काश्मीर जाना
पड़ा । किन्तु काश्मीर का बड़ा भूभाग अनधिकृत रूप से पाकिस्तान के पास है। काश्मीर की उत्तरीय एवं
पश्चिमीय सीमा पर भारतीय सेनाएँ पड़ी है। उन स्थानों का हमने प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया है। सैनिक छावनी
तथा सैनिक प्रभाव क्षेत्र में जाने की सुविधा हमें मिल गयी थी । अतएव हमने उस क्षेत्र के स्थानों तथा
जातियों का वर्णन किया है। तरंगिणी काश्मीर का भूगोल उपस्थित करती है। उसमें वर्णित स्थानों तथा
जातियों के क्षेत्र में गया हूँ। उनमें जिनका वर्णन नही है उन्हें भी देखा है। काश्मीर के पुराने लोगो तथा
विद्वानों से सम्पर्क स्थापित कर सन्देहास्पद प्रश्नों के हल करने का प्रयास किया है ।
श्री स्टीन के समय और आज के समय में बहुत अन्तर पड़ गया है। स्थानों का रूप बदल गया
है। उन्हें पहचानना भी कठिन है। पुराने स्थानों पर नवीन निर्माण हो गये हैं। मैं प्रत्येक वर्णित स्थानों
पर गया हूँ। उनमें श्री स्टीन काल से अब तक जो परिवर्तन हो गया है उनका उल्लेख किया है ताकि
उनके पहचानने में कठिनता उत्पन्न न हो सके ।
ध्वंशावशेषो के शिला एवं प्रस्तर खण्ड उठाकर नवीन निर्माणों में लगा दिये गये हैं। कितने ही
तोड़कर गिट्टी बनाने के काम में लाये गये हैं। परिहासपुर, कल्हण की जन्मभूमि का ध्वंसावशेष इसका
- ख -
ज्वलन्त उदाहरण है। साम्प्रदायिक उत्तेजना मे कितनी ही मूर्तियां हटा दी गयी है। कितने ही स्थानों पर
कब्ज़ा कर उनके अस्तित्व का लोप कर दिया गया है। डोगरा राज्य काल में पुराने स्थानो के संरक्षण में
जो प्रगति हुई थी उसका आजादी के पश्चात् लोप हो गया। कुछ स्थानों को पुरातत्व विभाग के आधीन
कर उनकी रक्षा का प्रबन्ध निस्सन्देह किया गया है। अनेक स्थानो से शिला खण्ड तथा प्राचीन ईंटें निकाल
ली गयी हैं। श्री स्टीन वर्णित परिचय में और वस्तुस्थिति में अन्तर मिलने का यही कारण है। तथापि
हमने स्थानो पर जाकर अध्ययन कर वास्तविक स्थिति पर प्रकाश डाला है। स्थानों के निवासी वृद्धों के
द्वारा कुछ बातें मालूम हो सकी हैं। उन्हें यथास्थान लिख दिया है।
दशवर्ष के संयोजकत्व काल तथा लम्बे काल तक कांग्रेस संसदीय दल के मन्त्री होने के कारण
काश्मीर की दैनिक घटनाओं तथा अनुसन्धानों से सम्पर्क रखना पड़ा है। पाश्चात्य लेखकों ने काश्मीर के
भूरिचय तथा स्थानों के विषय मे बहुत कुछ लिखा है। जिस समय उन्होंने लिखा था उस समय साधन
कम थे। उनमे तथा प्रस्तुत वर्णन में क्या अन्तर है, तथा वास्तविक स्थिति क्या है, उस पर प्रत्यक्ष ज्ञान
प्राप्त कर हमने प्रकाश डाला है। कई स्थलों पर हमने नवीन स्थानो की खोज एवं निष्कर्षो का प्रमाण भो
उपस्थित किया है।
पाद-टिप्पणियों में स्थानों का परिचय उनका मूल तथा विकृत दोनो रूप दिया है। यह कार्य बिना
स्थानों का प्रत्यक्ष दर्शन किये सम्भव नही था। जिस समय का इतिहास है उस समय काश्मीर की सम्पूर्ण
जनता हिन्दू थी। उनके धार्मिक एवं दैनिक जीवन से स्थानों का सम्बन्ध था। स्थानों का इतिहास वहाँ के
निवासियों के वंशीय इतिहास से मिल गया था। आज काश्मीर की ९० प्रतिशत जनता मुस्लिम है। जो
हिन्दू हैं वे प्रायः नगरों के निवासी है। वे स्वयं काश्मीर के अनेक स्थानो का इतिहास एवं नाम भूल गये
हैं। गुफायें, मन्दिर, मठ, शाला, जनाथय, विहार आदि जियारत, मस्जिद, मज़ार तथा अन्य स्थानो में
प्रायः परिणत कर लिये गये हैं। वे कभी हिन्दू स्थान थे, यह विचार वहाँ के लोगों को पसन्द नहीं आते।
इसका मैने पद-पद पर अनुभव किया है। वहाँ की मुस्लिम जनता की प्रतिक्रिया अच्छी नहीं होती।
प्राचीन गाथाओं के स्थान पर नवीन गाथायें उनके साथ जोडकर, उनके पुराने रूप को बदलकर, उन्हें
नवीन जामा पहना दिया गया है। उनके मूल रूप का पता संस्कृत-साहित्य से ही मिलता है। इस समय
रहन-सहन, समाज एवं रुचि इतनी शीघ्रता से बदलती जा रही है कि लोग कुछ दिनों में बहुत कुछ भूल
जायेंगें; अतएव उन्हें लिपिबद्ध कर देना ऐतिहासिक शोध की दृष्टि से परम आवश्यक है।
काश्मीर की सीमा पर, रामायण, महाभारत, पुराण, नीलमत तथा राजतरंगिणी में वर्णित अनेक
जातियां रहती थी। उन्हें कालान्तर में लोकोत्तर जातियां किंवा व्यक्ति मान लिया गया। यहाँ हमने प्राचीन
ग्रन्थों के आधार पर उनका स्थान निर्णय तथा परिचय दिया है। उनका उल्लेख परिशिष्ट में किया गया
है। ये जिन क्षेत्रों में रहते थे वहाँ मै गया हूँ। उनमें समय व्यतीत किया है। परन्तु धर्म परिवर्तन के
साथ अपना इतिहास भूल गया है। अभी तक प्रचलित कुछ रीति-रिवाजों के आधार पर हमने उनकी
जानकारी प्राप्त की है। पाकिस्तान अधिकृत भू-भाग का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं हो सका है। उसका वर्णन ग्रन्थों
के आधार पर किया गया है। यह ज्ञान अप्रत्यक्ष है।
मुझे प्रस्तुत शोध ग्रन्थ के औचित्य के विषय में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। स्टीन ने
भौगोलिक नामों एवं ऐतिहासिक उल्लेखों को स्पष्ट करने का प्रयास किया था किन्तु सांस्कृतिक सामग्री के
तुलनात्मक अध्ययन को भी समुचित महत्त्व तथा अवसर न दे सके। आश्चर्य है कि स्टीन के बाद भी किसी ने
- ग -
राजतरंगिणी की सांस्कृतिक सामग्री के भंडार का समुचित शोधपूर्वक अध्ययन नहीं किया। इस प्रकार
सभी दृष्टिकोणों को लेकर एक समग्र अध्ययन की आवश्यकता थी। इसीलिये मैने यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक
एवं तुलनात्मक अध्ययन किया है।
कल्हण को पूर्ण जीवनी नहीं मिलती। 'कल्हण' शीर्षक विवरण में हमने कल्हण की जीवनी उप-
स्थित करने का प्रयास किया है। इसी सन्दर्भ में हमने कल्हण के कवि और इतिहासकार दोनों रूपों का
विवेचन भी किया है। इन दोनों रूपों में ही किन पुराकालीन प्रभावों की छाप उन पर पडी, कल्हण का
आदर्श एवं लक्ष्य क्या था और उन्हें इन क्षेत्रों में कितनी सफलता मिली आदि प्रश्नों का भी विचार हुआ
है। प्राचीन भारत में ऐतिहासिक साहित्य की परम्परा में राजतरंगिणी का स्थान और महत्त्व निर्धारित
करने का भी प्रयास हुआ है। राजतरंगिणी के तरंग प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय जिसे गाथा कालीन काल
कहते हैं उनका यहाँ समावेश किया गया है। रामायण, महाभारत, पुराण, तथा तत्कालीन ग्रन्थों के आधार
पर राजतरंगिणी के वर्णित इतिहास को क्रमबद्ध करने का प्रयास किया है। कल्हण का प्राचीन कालीन
वर्णन रामायण, महाभारत, पुराण एवं अन्य प्राप्य ग्रन्थों से कहाँ तक मेल खाता है और कहाँ तक प्रामाणिक
है इसका विवेचन पाद-टिप्पणी में किया गया है। सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित सामग्री और
ऐतिहासिक एवं भौगोलिक सूचनाओं की अद्भुत रत्नराशि राजतरंगिणी में मिलती है। पाद-टिप्पणी में
इनका यथास्थान विशद विवेचन किया गया है। भूमिका रूप वाले इस अंश में हमने इस अमूल्य सामग्री को
विषय-क्रम से एकत्रित किया है जिससे कि इस अमूल्य ज्ञान-भण्डार का कुछ आभास हो सके और राज-
तरंगिणी के ऐतिहासिक महत्त्व को प्रस्तुत किया जा सके।
रत्नाकर पुराण की कपोल-कल्पना जो हसन की तारीख तथा लुप्त राजाओं की तालिका का आधार
है, उसे तर्क की तुला पर तौल कर उसकी अप्रामाणिकता सिद्ध की है। काश्मीर के इतिहास के सम्बन्ध
में हिन्दू राज्य की समाप्ति से अब तक जो भ्रान्तियाँ उत्पन्न की गयी हैं, और इतिहास को एक नया रंग
क्यों दिया गया है, इसका स्पष्टीकरण करते हुए वास्तविकता को प्रकट किया है।
कल्हण द्वारा वर्णित घटनाओं के साथ धार्मिक विकास, ह्रास, क्रान्ति, विप्लवों आदि का संक्षिप्त
वर्णन कर, यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि घटनायें तत्कालीन जनता की मानसिक स्थिति को
प्रकट करती हैं तथा जनता की मनःस्थिति के कारण किस प्रकार घटनायें घटती है।
भावानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद, शब्दानुवाद, अर्थानुवाद, भाषान्तर, रूपान्तर, अनुकरण,
पुनर्सर्जन आदि अनेक अनुवाद की शैलियाँ प्रचलित हैं। हिन्दी में प्रथम अनुवाद 'प्रबोध चन्द्रोदय'
(सन् १५४४) मल्हू कवि का मिलता है। यह सारकथन एवं आख्यान शैली का अनुवाद है। मध्ययुग के
परवर्ती अनुवाद भाषान्तर है। आधुनिक काल में कतिपय अनुवादों में मूल रचना का रूपान्तर किया गया
है। स्व० श्री भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'कर्पूर मंजरी' (सन् १८७६ ई०) का साधारण रूपान्तर किया है।
पराश्रयी रचनायें भी हिन्दी में की गयी हैं। यथा हृदयराम कृत 'हनुमन्नाटक' (सन् १६२३ ई०) तथा
बद्रीनाथ भट्ट का 'कुरुवन दहन' (सन् १९१२ ई०) है।
यूरोप में मध्ययुग में शब्दानुवाद शैली प्रचलित थी। बाइबिल का अनुवाद इसका एक उदाहरण है।
अंग्रेजी के कवि श्री जान ड्राइडन ने शब्दानुवाद, भावानुवाद तथा अनुकरण (इमिटेशन) अनुवादो का वर्गी-
करण किया है। महा कवि गेटे ने अनुवादों को परिचयात्मक (लूथर कृत बाइबिल) रूपान्तर (एडाप्टेशन)
तथा पुनः सर्जन तीन वर्गों में विभाजित किया है। समीक्षक बेनेडेट्टे क्रोचे का कहना है कि कामिनी के
- घ -
समान यदि अनुवाद सुन्दर है तो सच्चा नहीं हो सकता और सच्चा है तो सुन्दर नहीं हो सकता । उसने
उत्तम अनुवाद को मौलिक रचना के समान माना है। यह मौलिकता फिट्जेराल्ड के रुबाइयात उमर
खय्याम में परिलक्षित होती है। इसी प्रकार स्वर्गीय रामचन्द्र शुक्ल द्वारा अनूदित राखाल दास वन्द्यो-
पाध्याय के 'कंकणा' में मौलिकता का दर्शन होता है। श्री रामचन्द्र वर्मा का अनुवाद हिन्दू राजतन्त्र'
श्री जायसवाल की प्रसिद्ध पुस्तक 'हिन्दू पोलिटी' का अनुवाद है । श्री जायसवाल ने स्वयं स्वीकार किया
था कि अनुवाद उनकी मूल पुस्तक से भी उत्तम है। क्रोचे कहता है कि अनुवाद मूल का पुनः सर्जन नहीं
है; किन्तु मूल की अभिव्यक्ति के सदृश अभिव्यक्ति का सृजन हो सकता है। विश्व में सबसे अधिक अनूदित
पुस्तक बाइबिल है। उसका अनुवाद दूसरी शताब्दी ईसवी से अब तक विश्व की अनेक भाषाओं में होता
चला जा रहा है। बाइबिल की शैली धार्मिक ग्रन्थों में अपनायी जा सकती है। परन्तु राजतरंगिणी महा-
काव्य है, ऐतिहासिक ग्रन्थ है। इसके अनुवाद की शैली काव्यमय एवं ऐतिहासिक होनी चाहिये ।
स्वर्गीय सर्वश्री योगेशचन्द्र दत्त, स्तीन तथा रणजीत सीताराम पण्डित का अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध
है । श्री योगेश दत्त का अनुवाद सारानुवाद है। सर्वश्री स्तीन तथा पण्डित ने प्रत्येक श्लोक का अलग-
अलग अनुवाद किया है। कहीं-कहीं अनुवाद को स्पष्ट करने के लिये तीन-चार श्लोकों का अनुवाद एक
साथ कर दिया है। श्री स्तीन का अनुवाद शब्दानुवाद तथा अर्थानुवाद के साथ बोधगम्य है। श्री पण्डित
का अनुवाद साहित्यिक है। उसमें भाषा का प्रवाह है। कल्हण के अलंकारों, उपमा एवं रसों को अंग्रेजी
भाषा में व्यक्त करने का प्रयास किया गया है ।
प्रस्तुत अनुवाद शैली में प्रत्येक पद जिसमें क्रिया मिल गयी है उसका अनुवाद एक ही पद में किया
गया है। यदि क्रिया दूसरे पद में मिली है तो पद तोड़कर अनुवाद किया गया है। जहाँ कल्हण ने युग्मम्,
तिलकम् एवं कुलकम् लिखा है वहाँ दो, तीन तथा चार श्लोकों का भाव, अर्थ एवं अनुवाद एक साथ
रखने का प्रयास किया गया है। उसमें भी प्रायः प्रत्येक श्लोक का अनुवाद अलग ही रखने का प्रयास किया
गया है। श्लोक संख्या ६३ तक भावानुवाद, शब्दानुवाद तथा अर्थानुवाद का मिश्रण मिलेगा। उसके पश्चात्
अनुवाद की शैली बदल दी गयी है। शब्दों के क्रिया, वचन एवं लिंग का मूल रूप ही अनुवाद में रखा
गया है। प्रत्येक शब्द का अर्थ भाव के साथ किया गया है। अनेक संस्कृत शब्द जिनका हिन्दी में अनुवाद
सम्भव नहीं था उन्हें यथावत रखकर उसका अर्थ पाद-टिप्पणी में स्पष्ट किया गया है ।
भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत है। कितने ही संस्कृत शब्द अप्रचलित हो गये हैं। कितनों
का अर्थ आज वह नहीं है जो पूर्व काल में था। कितने ही अप्रचलित शब्दों का प्रयोग कल्हण ने किया है।
शब्दों का अर्थ जो कल्हण के रचना काल में था उन्हें रखने का प्रयास किया है। किसी भी मौलिक ग्रन्थ
के अनुवाद के लिये लेखक के वातावरण, निवास स्थान, समाज, तत्कालीन भूपरिचय, इतिहास, कुल, विचार
तथा कथा-प्रसंग का ज्ञान होना आवश्यक है। इनका अध्ययन करने पर ही लेखक के मूल भाव की झलक
मिल सकती है, उसकी आत्मा का दर्शन हो सकता है। कल्हण के निवास स्थान एवं जिन स्थानों का उसने
वर्णन किया है उन्हें हमने स्वयं देखा है। वहाँ का अध्ययन किया है। अतएव अनुवाद करते समय सरलता
का बोध हुआ है ।
जिन स्थलों पर सर्वश्री स्तीन तथा पण्डित के अनुवादों से अनुवाद भिन्न किया है अथवा शब्दों का
अर्थ भिन्न किया है, उसका उल्लेख पाद टिप्पणी में कर दिया है। इस प्रकार यह अनुवाद अर्थानुवाद, भावा-
नुवाद तथा शब्दानुवाद के साथ वाक्यार्थ प्रधान हो गया है। अनुवाद की रोचकता बढ़ाने के लिये अपनी
- ङ -
ओर से कुछ जोड़ने का प्रयास नहीं किया है। अर्थ खोलने के लिये जहाँ शब्दों की आवश्यकता पड़ी है वहाँ
उन्हें कोष्ठ में दे दिया है। रचनासौष्ठव अक्षुण्ण रखने के लिये कल्हण की रचना-शैली का अनुकरण किया
है। प्रसाद गुण को यथावत रखने का प्रयास किया है। प्रसाद गुण का अनुवाद में महत्वपूर्ण स्थान है।
दुरूह स्थल तथा जहाँ भाव एवं अर्थ समझने में कठिनाई हुई है अथवा जिस पद के दो अनुवाद हो सकते
थे, उन्हें भी पाद टिप्पणी में दिया है। मै स्वयं संस्कृत का अधिकारी विद्वान नहीं हूँ। कठिनता का बोध
होने पर संस्कृत के विद्वानों से सहायता ली है। अनुवाद तथा मूल संस्कृत श्री विश्वबन्धु के सम्पादकत्व में
हुये राजतरंगिणी के होशियारपुर संस्करण (सं० १९६० ई०) पर आधारित है। पाठभेद भी उसी संस्करण
से लिये गये हैं।
संक्षेप में, पाद टिप्पणी में हमने पाठ भेद देने के बाद ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व की सभी
सामग्रियों का विवेचन किया है। प्रयुक्त शब्द का अर्थ, उसकी उत्पत्ति एवं अन्य ग्रन्थों में उसके उपयोग के
विवरण देने के बाद हमने उनके वर्तमान रूप तक का इतिहास प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। इस संबंध
में हमने पुरातत्व की सामग्री, स्थानीय परंपराओं एवं अन्य प्रामाणिक ग्रन्थों का विधिवत उपयोग किया है।
इन विवरणों में हमने सदैव ही ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक दृष्टिकोण को अपनाने का प्रयत्न किया है। जिन
विषयों के विवेचन में विस्तार की अपेक्षा थी उन्हें सुविधा की दृष्टि से हमने परिशिष्ट में रख दिया है।
आभार प्रकाश
इस शोध प्रबन्ध के लिये अनेक महानुभावों और पुस्तकालयों की सहायता प्राप्त हुई है। उनके प्रति
कृतज्ञता प्रकाश आवश्यक है। संसदीय पुस्तकालय, नयी दिल्ली ने काश्मीर सम्बन्धी पुस्तकों का संग्रह किया
है। कितनी ही अप्राप्य पुस्तकें हमारे सुझाव पर विदेशों से मँगायी गयी हैं। कांग्रेस संसदीय दल के पुस्तका-
लय में प्रायः सभी आधुनिक पुस्तकें खरीदी गयी हैं। उनसे विशेष सहायता मिली है। काशी हिन्दू विश्व-
विद्यालय पुस्तकालय तथा संस्कृत विश्व विद्यालय, काशी में पुरानी तथा हस्तलिखित पुस्तको को देखने तथा
अध्ययन करने का अवसर मिला है। मै सप्ताह में दो दिन कलकत्ता रहता था। उस समय वंग परिषद् पुस्त-
कालय में राजतरंगिणी के बंगला मूल तथा अनुवादों के साथ ही पुराणों के भी मूल तथा अनुवाद देखने
तथा अध्ययन करने का अवसर मिला है। 'बम्बई सेन्ट्रल लाइब्रेरी' में राजतरंगिणी की मराठी अनुवाद के
साथ काश्मीर सम्बन्धी कुछ पुस्तकें मिली। वहाँ मास में एक बार नेशनल शिपिंग बोर्ड तथा मझगांव डाक
के सम्बन्ध में जाने का अवसर मिलता था। इस अवसर को मैने उक्त पुस्तकालय में लगाया है।
नेशनल लाइब्रेरी कलकत्ता, एशियाटिक सोसाइटी लाइब्रेरी में बंगला, अंग्रेजी तथा हिन्दी में
काश्मीर सम्बन्धी पुस्तकों का अध्ययन किया है। उक्त स्थानों के अतिरिक्त श्री काशी विद्यापीठ पुस्तकालय
में कुछ दुर्लभ पुस्तकें प्राप्त हुई । अडयार लाइब्रेरी अडयार, मद्रास में भी कुछ पुस्तकें देखने को मिली
हैं। उदयपुर विश्वविद्यालय पुस्तकालय में भी, जहाँ हिन्दुस्तान जिंक का चेयरमैन होने के कारण जाना
पड़ता था, पुस्तकों का अध्ययन किया है। रघुनाथ मन्दिर पुस्तकालय में काश्मीर सम्बन्धी हस्तलिखित
ग्रन्थों का उत्तम संग्रह है। वहाँ से तथा श्रीनगर राजकीय रिसर्च विभाग के संग्रह से भी सहायता ली
है। काश्मीर सम्बन्धी ग्रन्थों का वहाँ उत्तम संग्रह है। प्रताप सिंह संग्रहालय, श्रीनगर में काश्मीर में
उत्खनन कार्य में प्राप्त मूर्तियों का अच्छा संग्रह है। वहाँ की मूर्तियों के अध्ययन से काश्मीर की मूर्तिकला
पर प्रकाश पड़ता है। श्री टी. एन. खजांची, पुरातत्व विभाग श्रीनगर का सहयोग प्राप्त होता रहा है।
इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) उपलब्ध नहीं है, यह पृष्ठ पूर्णतः रिक्त (blank) है।
संकेत-सूची
अ० = अध्याय नागरी अंक = जादू संस्करण
अ० = वेद; अथ० = अथर्ववेद रोमन अंक = ग्रोज संस्करण
अनु० = अनुशासन पर्व ( महाभारत ) पद्म० = पद्म पुराण
अग्नि = अग्निपुराण पंच विंश = पंच विंश ब्राह्मण
अर० = अरण्य काण्ड ( रामायण ) पण्डित० = रणजीत सीताराम पण्डित कृत रा० अ०
अलवेरुनी = अलवेरुनीज इण्डिया, पाणिनी = अष्टाध्यायी
आ० = आदि पर्व ( महाभारत ) वन० = वनपर्व ( महाभारत )
आश्व० = आश्वमेधिक पर्व ( महाभारत ) बर्नियर = बर्नियर कृत ट्रेवेल्स इन मोगल इम्पायर
उ० = उद्योग पर्व ( महाभारत ) वा० रा० = वाल्मीकीय रामायण
ऋ० = ऋग्वेद अ० = अरण्यकाण्ड
क० = कर्ण पर्व ( महाभारत ) उ० = उत्तरकाण्ड
कनिंघम = कनिंघमकृत एन्शेन्ट ज्योग्राफी कि० = किष्किन्धा काण्ड
कि० = किष्किन्ध्या काण्ड ( रामायण ) यु० = युद्ध काण्ड
कोल्स० = कोलकृत इलस्ट्रेशन आफ एन्शेन्ट बिल्डिंग वाइन० = वाइन कृत ट्रेवेल इन कश्मीर लद्दाख इस्काई
ऑफ काश्मीर बेट्स० = वेट्स कृत ए गजेटियर आफ काश्मीर
कोवो० = नोट्स ऑन– टेम्पूल्स ऑफ काश्मीर ब्रह्म० = ब्रह्म पुराण
गणेश० = गणेश पुराण ब्रह्म० वै० = ब्रह्म वैवर्त पुराण
गो० गृ० = गोभिल गृह्य सूत्र, बृ० उ० = बृहदारण्यकोपनिषद्
जादू० = नीलमत पुराण जादू, संस्करण, लाहौर भ० = भविष्य पुराण
जोन० = जोन राजतरंगिणी भा० = भागवत पुराण
जैन = जैन राजतरंगिणी ( श्रीवर कृत ) भी० = भीष्म पर्व ( महाभारत )
जै० ब्रा० = जैमिनीय ब्राह्मण म०; महा० = महाभारत
ट्रोयर = ट्रोयरकृत राजतरंगिणी अनुवाद मनु० = मनुस्मृति
ड्रयू = ड्रयूकृत दी जम्मू एण्ड काश्मीर माहा० = माहात्म्य
तीर्थ० = तीर्थ संग्रह ( साहिबरामकृत ) मार्क० = मार्कण्डेय पुराण
तै० आ० = तैत्तिरीय आरण्यक मूर क्राफ्ट० = मूर क्राफ्ट कृत ट्रेवेल इन हिमालयन
तै० सं० = तैत्तिरीय संहिता प्रोविन्सेज ऑफ हिन्दुस्तान
दत्त० = जोगेशचन्द्र दत्त कृत किंग्स ऑफ काश्मीर मौ० = मौसल पर्व ( महाभारत )
दे० भा० = देवी भागवत् याज्ञ० = याज्ञवल्क्य स्मृति
द्रो० = द्रोण पर्व ( महाभारत ) योग० = योग वाशिष्ठ रामायण
नन्दि० = नन्दि पुराण रा० त० = राजतरंगिणी ( कल्हण कृत )
नील० = नीलमत पुराण लारेंस० = लारेन्सकृत दी वैली आफ काश्मीर
- ज -
[बायाँ स्तम्भ]
लिं० = लिंग पुराण
वराह = वराह पुराण
वा० सं० = वाजसनेयिसंहिता
वायु० = वायु पुराण
विलसन० = विलसनकृत हिन्दू हिस्ट्री आव काश्मीर
ब्रीज० = नीलमत पुराण रोमन, ब्रीज संस्करण
विष्णु० = विष्णु पुराण
विष्णु० ध० = विष्णु धर्मोत्तर पुराण
ब्यूलर० = रिपोर्ट जर्नल आफ दि रायल एशियाटिक
सोसाइटी आफ बाम्बे सं० १४:१८७७
श० = शल्यपर्व ( महाभारत )
श० ब्रा० = शतपथ ब्राह्मण
शा० = शान्तिपर्व ( महाभारत )
शि० = शिवपुराण
[दायाँ स्तम्भ]
शि० सं० = शिव शत रुद्र संहिता
शु० = शुक्रनीति
शु० =
स० = सभापर्व ( महाभारत )
सं० गृ० = सांख्य गृहोक्त नाटक
संहिता० = बृहत् संहिता
स्कन्द० = स्कन्द पुराण
स्टीन० = स्टीन एम० ए० द्वारा अनूदित कल्हण की
राजतरंगिणी
हरिवंश० = हरिवंश पुराण
हि० = हिस्ट्री
ह्यूगेल० = ह्यूगेल कृत काश्मीर एण्ड दण शेष दर ग्रीक
हुयेनसांग० = दी लाइफ आफ हुयेनसांग
कल्हण
रचना : कल्हण के सम्बन्ध में जो कुछ सामग्री बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक तक प्राप्त हुई है,
उससे अधिक इस दिशा में प्रगति नहीं हो सकी है। राजतरंगिणी, अर्धनारीश्वर स्तोत्र तथा जय-
सिंहम्युदय काव्य कल्हण से सम्बन्धित किये जाते हैं। राजतरंगिणी निस्सन्देह कल्हण की रचना है। अर्ध-
नारीश्वर स्तोत्र के १८ श्लोकों में सात श्लोक राजतरंगिणी के सात तरंगों के मंगलाचरणों से लिये गये
हैं। जयसिंहम्युदय काव्य अभी तक प्रकाश में नहीं आया है।
राजतरंगिणी के इतिपाठ तथा स्तोत्र के इतिपाठ में मौलिक अन्तर है। राजतरंगिणी के इतिपाठ
में कल्हण ने अपने को महाकवि नहीं लिखा है। केवल अष्टम तरंग के इतिपाठ में महाकवि शब्द आता है।
परन्तु इसका पाठभेद अनेक प्राचीन प्रतियों में मिलता है। जिनमें महाकवि शब्द नहीं दिया गया है। प्रतीत
होता है किसी श्रद्धालु लिपिक ने महाकवि शब्द उसके काव्य के विशाल रूप को देखकर अन्त में दे दिया
है। सुयोग्य, विनयी एवं प्रतिभाशाली कवि चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह अपनी लेखनी से अपने
लिए महाकवि पद का प्रयोग नहीं करेगा। यह आत्मश्लाघा हो जाती है। अर्धनारीश्वर स्तोत्र उसकी
स्वतन्त्र रचना है अथवा उसके श्लोकों का संग्रह मात्र है अथवा किसी ने उसके पदों का संकलन कर उसे
अर्धनारीश्वर स्तोत्र की संज्ञा दे दी है। यह विचारणीय विषय है।
जयसिंहम्युदय काव्य उपलब्ध नहीं है। केवल रत्नाकर के सार-समुच्चय में कल्हण की इस रचना
का उल्लेख मिलता है। कल्हण की सूक्तियों के संग्रह का भी उल्लेख मिलता है। किन्तु वह राजतरंगिणी के
आठों तरंगों के सुभाषितों का संग्रह मात्र है। यदि जयसिंहम्युदय काव्य प्रकाश में आ जाय तो कल्हण के
जीवन पर और प्रकाश पड़ सकता है। स्तोत्र तथा सूक्ति संग्रह का मूल स्रोत राजतरंगिणी है। स्तोत्र में
दिये गये इतिपाठ में चम्पक महामात्य का नाम नहीं है। राजतरंगिणी के आन्तरिक लेखों के आधार पर
अनुमान एवं निष्कर्ष निकाल कर, कल्हण के जीवन पर कुछ और प्रकाश डाल सकते हैं।
वंश : राजतरंगिणी के इतिपाठ से कल्हण के पिता का नाम महामात्य चम्पक प्रभु होना सिद्ध होता
है। यद्यपि अर्धनारीश्वर स्तोत्र के इतिपाठ में कल्हण के वंश, पिता, पद, देशादि का नाम नहीं दिया गया
है। इतिपाठ के अतिरिक्त कल्हण के वर्णन (रा० त० ७ : ९५४, १११७, १११८, ८ : २३६५) से प्रमाणित
हो जाता है कि चम्पक कल्हण का पिता था। वह महामात्य था। राजमन्त्री था। समाज में उच्च स्थान
प्राप्त था।
कल्हण अपने चाचा कनक के विषय में भी सूचना देता है। (रा० त० १११७-१११८) वह
चम्पक का कनिष्ठ भ्राता था। कनक काश्मीर राज हर्ष का प्रियपात्र था। शिष्य था। राजा से सपरिश्रम
गान विद्या सीखा था। राजा हर्ष सर्वश्रेष्ठ गायक, गीतकार एवं संगीत शास्त्र पारंगत था। कनक के परिश्रम
एवं संगीत में श्रेष्ठता प्राप्त करने के कारण, राजा हर्ष ने उसे एक लाख स्वर्ण मुद्रा दिया था। कनक का
राजा पर स्नेहयुक्त प्रभाव था।
कल्हण का गृह, गान-वादन, राग-रागिनी, ताल-लय समन्वित पदों एवं गीतों से गुंजित रहता
था। कल्हण के पदों में माधुर्य एवं ताल-लय की एक अविच्छिन्न धारा प्रवाहित मिलती है। उसका पद
[ २ ]
कहीं भी पद लालित्य से रहित नही है। उसके शब्दों का चयन, संकलन, निवन्धन एवं उनकी ध्वनि श्रोत-
प्रिय है। कही भी इस गति में अवरोध किंवा विश्रृंखलता नहीं मिलती ।
जन्मस्थान : कल्हण का जन्म परिहासपुर में हुआ था । उसका कुल परिहासपुर निवासी था ।
कल्हण ने इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। जिस समय राजा हर्ष परिहासपुर के प्रसिद्ध विहार-स्थित बुद्ध
की विशाल प्रतिमा खण्डित करना चाहता था, तो परिहासपुर के कनक तथा एक श्रमण कुशलस्थो के कारण
अपने अनुचित कार्य से विरत हो गया । प्रतिमा की रक्षा हो गयी । ( रा० त० ७ : १०९७ ) इससे
दो बातें स्पष्ट होती हैं। कनक परिहासपुर निवासी था । कल्हण का कुटुम्ब परिहासपुर में रहता था ।
अतएव कल्हण का जन्म परिहासपुर में होना मानना उचित होगा ।
कल्हण ने परिहासपुर का स्पष्ट और विस्तृत प्राकृतिक वर्णन किया है। यह वर्णन वहाँ का निवासी
ही कर सकता है। परिहासपुर समीपस्थ वितस्ता-सिन्धु संगम प्रयाग ( वाग्दीपुर ) का विशद वर्णन भाव-
मयी भाषा में कल्हण ने किया है। वहाँ के स्थान, मन्दिर आदि का सुस्पष्ट, वास्तविक विस्तृत वर्णन प्रसंग
आते ही किया है। दूसरों के लिये यह सम्भव नहीं था । ( रा० त० ४ : १६४, २०४; ७ : १३२६, १३४४;
५ : ९७-१०० ) परिहासपुर, प्रयाग तथा वाग्दीपुर में बार बार जा चुका हूँ। वहाँ का जो वर्णन राज-
तरंगिणी में मिलता है वह अक्षरशः सत्य है ।
जाति : कल्हण की जाति ब्राह्मण थी । उसे अपने ब्राह्मणत्व का गर्व था । कल्हण ने अपनी जाति
स्वयं कही नहीं लिखी है। वह ब्राह्मण था । यह प्रश्न विवादास्पद इसलिए नही रह जाता कि द्वितीय
राजतरंगिणी के लेखक जोनराज ने उसे 'कल्हण द्विजः' लिखा है । ( जो० रा० ५ ) जोनराज ने कल्हण के
वंशजों के लिए पुनः 'ब्राह्मणान्' 'ब्राह्मण्यान्' 'ब्राह्मण्यात्' विभिन्न पाठभेदों के साथ उल्लेख किया है ।
( जो० रा० ९९ )
शुक ने अपनी राजतरंगिणी में 'श्री कल्हण द्विज' लिखा है । ( शुक : रा० ५ ) कल्हण ने सन्
११५० ई०, जोनराज ने सन् १४४६ ई०, तथा शुक ने सन् १५८६ ई० में अपनी रचनाओ का लेखन-
कार्य समाप्त किया था । इस प्रकार कल्हण के रचना काल से आगामी ४३६ वर्षों तक कल्हण तथा उसके
वंशजो को द्विज किंवा ब्राह्मण माना जाता रहा है।
द्विज शब्द ब्राह्मण, क्षत्री तथा वैश्य यज्ञोपवीतधारी के लिए निर्देश किया गया है। किन्तु द्विज के
साथ ब्राह्मण शब्द का प्रयोग कल्हण की जाति निश्चित कर देता है। आजकल द्विज शब्द ब्राह्मणो के लिए
रूढ़ हो गया है। कल्हण को काश्मीरी ब्राह्मण होने का इतना गर्व था कि ( रा० १ : १६० ) उसने गान्धार
ब्राह्मणों को द्विजाधम तक लिखा है ( रा० १ : ३०७, ४३६, ११५० ) तथापि उसने आर्यदेशीय ब्राह्मणो के
लिए आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया है। वह ब्राह्मणों को पवित्र तथा सनातनी देखना पसन्द करता
था। ब्राह्मणो के अनुचित कार्यों की उसने निन्दा की है। ( १ : १५८ )
जन्म वर्ष : कल्हण के पिता चम्पक का सन् ११३६ ई० तक जीवित रहना सिद्ध होता है । कल्हण
ने सन् ११४८-११४९ ई० में राजतरंगिणी की रचना प्रारम्भ किया था। कल्हण ने स्वयं, अथवा मंख
अथवा किसी अन्य तत्कालीन अथवा परवर्ती लेखक ने इस विषय पर प्रकाश नही डाला है। राजतरंगिणी
के आन्तरिक साक्ष्य से ही उसका सम्भाव्य जन्म वत्सर निकालना होगा ।
कल्हण की शैली से प्रकट होता है, वह तरंगिणी रचना काल में प्रौढ़ व्यक्ति था । उसरा मस्तिष्क
प्रौढ़ था । उसका विचार प्रौढ़ था। उसका शरीर प्रौढ़ था। राजा सुस्सल के पुनराज्य प्राप्ति के पूर्व
[ ३ ]
भिक्षाचर के सैनिकों के विश्वासघातक कार्यों का प्रत्यक्षदर्शी था । यह घटना सन् ११२१ ई० की है।
( रा० ८ : ९४१ ) उसने राजा सुस्सल ( सन् १११२-११२० ई० ) के पूर्ववर्ती तीन राजाओं का
आँखो देखा वर्णन किया है । यहाँ उसकी शैली घटना-क्रमों को एक के पश्चात् दूसरे को इस द्रुत गति
से रखती है, जैसे कोई उन घटनाओं को स्वतः देखकर लिख रहा था । वह किंचित् मात्र कहीं भी अपनी
लेखनी को ठहरने नही देता । शब्द नही खोजता । कड़ी नही जोड़ता । वह शीघ्रातिशीघ्र सब कुछ वर्णन
कर देने के लिए उतावला हो उठता है । घटनायें जैसे स्वतः एक के पश्चात् दूसरी उसकी लेखनी से प्रसूत
होती गयी हैं । घटना-क्रमों के मूल को जान लेता है । परिस्थितियों का रहस्य समझ जाता है ।
कल्हण का पिता चम्पक सन् १०९८ ई० में० द्वारपति के पद पर था । राजा हर्ष ने उसे मण्डलेश
भी बनाया था । निःसन्देह चम्पक इस समय प्रौढ़ व्यक्ति था । दोनों पद काश्मीर में सर्वश्रेष्ठ उत्तरदायित्व
के थे । वे अनुभवी तथा प्रौढ बुद्धि वाले व्यक्ति को दिये जाते थे, जो उनकी गुरुता का अनुभव कर सकता
था । यदि चम्पक का अवसान काल सन् ११३६ ई० मान लिया जाय तो यह समय सन् १०९८ ई० के
लगभग पड़ता है । अर्थात् वह ३८ वर्ष की आयु तक द्वारपति एवं मण्डलेश हो चुका था । श्री स्टीन का
मत है कि कल्हण का जन्म ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रखा जा सकता है ।
चम्पक किसी युद्ध में हत नही हुआ था । यदि वह अकाल मृत्यु किंवा किसी संघर्ष में हत किंवा
आहत होता तो कल्हण उसका अवश्य वर्णन करता; क्योकि कल्हण ने उसे राजनीति एवं संघर्षों में सक्रिय
भाग लेते हुए चित्रित किया है । निश्चय ही चम्पक अपनी मृत्यु से दिवंगत हुआ था । यदि सन् १०९८ ई०
में उसकी आयु ३८ वर्ष कम से कम मान ली जाय तो सन् ११३६ ई० में उसकी आयु ६८ वर्ष की ठहरती
है । इस आन्तरिक साक्ष्य के अनुसार कल्हण का जन्म सन् १०९८ ई० के समीप रखा जा सकता है । श्री
स्टीन के मत में तथ्य है कि कल्हण का जन्म ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रखा जा सकता है ।
कनक : उच्चल तथा सुस्सल भ्राता द्वय काश्मीर राज्य प्राप्ति हेतु कृत-संकल्प हो गये थे । उच्चल
के कारण राजा हर्ष की अमानुषिक क्रूरता को भी लज्जित करने वाली हत्या की गयी । ( रा० ७ :
१७११, १७१२ ) राजा हर्ष का मुण्ड काटकर उच्चल के पास भेजा गया । मुण्ड को लगुडा पर खोसकर
चारो ओर घुमाया गया । ( रा० ७ : १७२१, १७२३ ) राज्य प्राप्ति के प्रश्न को लेकर दोनो भाई उच्चल
तथा सुस्सल में भी संघर्ष आरम्भ हो गया । उस समय सभी अनुचर सात दिनों तक मार्ग में रोक दिये
गये । कल्हण का संगीतज्ञ चाचा कनक भी उसी रुके समुदाय मे था । अवसर पाते ही वह समुदाय से निकल
भागा । कनक अपने गुरु तथा राजा हर्ष के दुःखद अन्त से इतना खिन्न हो गया कि काश्मीर मण्डल त्याग
दिया । वाराणसी में काशीवास करने लगा ! ( रा० ८ : १२, १३ ) काशी किंवा वाराणसी के इस
सम्बन्ध के कारण कल्हण ने राजतरंगिणी में काशी का अत्यधिक वर्णन किया है ।
चम्पक : प्रथम तरंग से षष्ठ तरंग के इतिपाठ के अतिरिक्त कल्हण ने प्रथम बार चम्पक का सहसा
उल्लेख नन्दि क्षेत्र यात्रा के प्रसंग में किया है । कल्हण की यह शैली है । जब वह किसी व्यक्ति का उल्लेख
करता है तो उसके पद, वंश आदि का उल्लेख करता है । यहाँ चम्पक का बिना किसी पक्ष आदि के वर्णन
करना महत्त्व रखता है । वह मान लेता है कि लोग उसके पिता के सम्बन्ध में जानकारी रखते थे । कुछ
विद्वानों का यह मत है कि यह वर्णन इस बात का प्रतीक है कि उसने अपने समय के लोगों के लिए राज-
तरंगिणी लिखी थी ।