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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 14
  • ङ -

ओर से कुछ जोड़ने का प्रयास नहीं किया है। अर्थ खोलने के लिये जहाँ शब्दों की आवश्यकता पड़ी है वहाँ
उन्हें कोष्ठ में दे दिया है। रचनासौष्ठव अक्षुण्ण रखने के लिये कल्हण की रचना-शैली का अनुकरण किया
है। प्रसाद गुण को यथावत रखने का प्रयास किया है। प्रसाद गुण का अनुवाद में महत्वपूर्ण स्थान है।
दुरूह स्थल तथा जहाँ भाव एवं अर्थ समझने में कठिनाई हुई है अथवा जिस पद के दो अनुवाद हो सकते
थे, उन्हें भी पाद टिप्पणी में दिया है। मै स्वयं संस्कृत का अधिकारी विद्वान नहीं हूँ। कठिनता का बोध
होने पर संस्कृत के विद्वानों से सहायता ली है। अनुवाद तथा मूल संस्कृत श्री विश्वबन्धु के सम्पादकत्व में
हुये राजतरंगिणी के होशियारपुर संस्करण (सं० १९६० ई०) पर आधारित है। पाठभेद भी उसी संस्करण
से लिये गये हैं।

संक्षेप में, पाद टिप्पणी में हमने पाठ भेद देने के बाद ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व की सभी
सामग्रियों का विवेचन किया है। प्रयुक्त शब्द का अर्थ, उसकी उत्पत्ति एवं अन्य ग्रन्थों में उसके उपयोग के
विवरण देने के बाद हमने उनके वर्तमान रूप तक का इतिहास प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। इस संबंध
में हमने पुरातत्व की सामग्री, स्थानीय परंपराओं एवं अन्य प्रामाणिक ग्रन्थों का विधिवत उपयोग किया है।
इन विवरणों में हमने सदैव ही ऐतिहासिक एवं तुलनात्मक दृष्टिकोण को अपनाने का प्रयत्न किया है। जिन
विषयों के विवेचन में विस्तार की अपेक्षा थी उन्हें सुविधा की दृष्टि से हमने परिशिष्ट में रख दिया है।

आभार प्रकाश

इस शोध प्रबन्ध के लिये अनेक महानुभावों और पुस्तकालयों की सहायता प्राप्त हुई है। उनके प्रति
कृतज्ञता प्रकाश आवश्यक है। संसदीय पुस्तकालय, नयी दिल्ली ने काश्मीर सम्बन्धी पुस्तकों का संग्रह किया
है। कितनी ही अप्राप्य पुस्तकें हमारे सुझाव पर विदेशों से मँगायी गयी हैं। कांग्रेस संसदीय दल के पुस्तका-
लय में प्रायः सभी आधुनिक पुस्तकें खरीदी गयी हैं। उनसे विशेष सहायता मिली है। काशी हिन्दू विश्व-
विद्यालय पुस्तकालय तथा संस्कृत विश्व विद्यालय, काशी में पुरानी तथा हस्तलिखित पुस्तको को देखने तथा
अध्ययन करने का अवसर मिला है। मै सप्ताह में दो दिन कलकत्ता रहता था। उस समय वंग परिषद् पुस्त-
कालय में राजतरंगिणी के बंगला मूल तथा अनुवादों के साथ ही पुराणों के भी मूल तथा अनुवाद देखने
तथा अध्ययन करने का अवसर मिला है। 'बम्बई सेन्ट्रल लाइब्रेरी' में राजतरंगिणी की मराठी अनुवाद के
साथ काश्मीर सम्बन्धी कुछ पुस्तकें मिली। वहाँ मास में एक बार नेशनल शिपिंग बोर्ड तथा मझगांव डाक
के सम्बन्ध में जाने का अवसर मिलता था। इस अवसर को मैने उक्त पुस्तकालय में लगाया है।

नेशनल लाइब्रेरी कलकत्ता, एशियाटिक सोसाइटी लाइब्रेरी में बंगला, अंग्रेजी तथा हिन्दी में
काश्मीर सम्बन्धी पुस्तकों का अध्ययन किया है। उक्त स्थानों के अतिरिक्त श्री काशी विद्यापीठ पुस्तकालय
में कुछ दुर्लभ पुस्तकें प्राप्त हुई । अडयार लाइब्रेरी अडयार, मद्रास में भी कुछ पुस्तकें देखने को मिली
हैं। उदयपुर विश्वविद्यालय पुस्तकालय में भी, जहाँ हिन्दुस्तान जिंक का चेयरमैन होने के कारण जाना
पड़ता था, पुस्तकों का अध्ययन किया है। रघुनाथ मन्दिर पुस्तकालय में काश्मीर सम्बन्धी हस्तलिखित
ग्रन्थों का उत्तम संग्रह है। वहाँ से तथा श्रीनगर राजकीय रिसर्च विभाग के संग्रह से भी सहायता ली
है। काश्मीर सम्बन्धी ग्रन्थों का वहाँ उत्तम संग्रह है। प्रताप सिंह संग्रहालय, श्रीनगर में काश्मीर में
उत्खनन कार्य में प्राप्त मूर्तियों का अच्छा संग्रह है। वहाँ की मूर्तियों के अध्ययन से काश्मीर की मूर्तिकला
पर प्रकाश पड़ता है। श्री टी. एन. खजांची, पुरातत्व विभाग श्रीनगर का सहयोग प्राप्त होता रहा है।