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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 12
  • ग -

राजतरंगिणी की सांस्कृतिक सामग्री के भंडार का समुचित शोधपूर्वक अध्ययन नहीं किया। इस प्रकार
सभी दृष्टिकोणों को लेकर एक समग्र अध्ययन की आवश्यकता थी। इसीलिये मैने यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक
एवं तुलनात्मक अध्ययन किया है।
कल्हण को पूर्ण जीवनी नहीं मिलती। 'कल्हण' शीर्षक विवरण में हमने कल्हण की जीवनी उप-
स्थित करने का प्रयास किया है। इसी सन्दर्भ में हमने कल्हण के कवि और इतिहासकार दोनों रूपों का
विवेचन भी किया है। इन दोनों रूपों में ही किन पुराकालीन प्रभावों की छाप उन पर पडी, कल्हण का
आदर्श एवं लक्ष्य क्या था और उन्हें इन क्षेत्रों में कितनी सफलता मिली आदि प्रश्नों का भी विचार हुआ
है। प्राचीन भारत में ऐतिहासिक साहित्य की परम्परा में राजतरंगिणी का स्थान और महत्त्व निर्धारित
करने का भी प्रयास हुआ है। राजतरंगिणी के तरंग प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय जिसे गाथा कालीन काल
कहते हैं उनका यहाँ समावेश किया गया है। रामायण, महाभारत, पुराण, तथा तत्कालीन ग्रन्थों के आधार
पर राजतरंगिणी के वर्णित इतिहास को क्रमबद्ध करने का प्रयास किया है। कल्हण का प्राचीन कालीन
वर्णन रामायण, महाभारत, पुराण एवं अन्य प्राप्य ग्रन्थों से कहाँ तक मेल खाता है और कहाँ तक प्रामाणिक
है इसका विवेचन पाद-टिप्पणी में किया गया है। सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित सामग्री और
ऐतिहासिक एवं भौगोलिक सूचनाओं की अद्भुत रत्नराशि राजतरंगिणी में मिलती है। पाद-टिप्पणी में
इनका यथास्थान विशद विवेचन किया गया है। भूमिका रूप वाले इस अंश में हमने इस अमूल्य सामग्री को
विषय-क्रम से एकत्रित किया है जिससे कि इस अमूल्य ज्ञान-भण्डार का कुछ आभास हो सके और राज-
तरंगिणी के ऐतिहासिक महत्त्व को प्रस्तुत किया जा सके।
रत्नाकर पुराण की कपोल-कल्पना जो हसन की तारीख तथा लुप्त राजाओं की तालिका का आधार
है, उसे तर्क की तुला पर तौल कर उसकी अप्रामाणिकता सिद्ध की है। काश्मीर के इतिहास के सम्बन्ध
में हिन्दू राज्य की समाप्ति से अब तक जो भ्रान्तियाँ उत्पन्न की गयी हैं, और इतिहास को एक नया रंग
क्यों दिया गया है, इसका स्पष्टीकरण करते हुए वास्तविकता को प्रकट किया है।
कल्हण द्वारा वर्णित घटनाओं के साथ धार्मिक विकास, ह्रास, क्रान्ति, विप्लवों आदि का संक्षिप्त
वर्णन कर, यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि घटनायें तत्कालीन जनता की मानसिक स्थिति को
प्रकट करती हैं तथा जनता की मनःस्थिति के कारण किस प्रकार घटनायें घटती है।
भावानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद, शब्दानुवाद, अर्थानुवाद, भाषान्तर, रूपान्तर, अनुकरण,
पुनर्सर्जन आदि अनेक अनुवाद की शैलियाँ प्रचलित हैं। हिन्दी में प्रथम अनुवाद 'प्रबोध चन्द्रोदय'
(सन् १५४४) मल्हू कवि का मिलता है। यह सारकथन एवं आख्यान शैली का अनुवाद है। मध्ययुग के
परवर्ती अनुवाद भाषान्तर है। आधुनिक काल में कतिपय अनुवादों में मूल रचना का रूपान्तर किया गया
है। स्व० श्री भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'कर्पूर मंजरी' (सन् १८७६ ई०) का साधारण रूपान्तर किया है।
पराश्रयी रचनायें भी हिन्दी में की गयी हैं। यथा हृदयराम कृत 'हनुमन्नाटक' (सन् १६२३ ई०) तथा
बद्रीनाथ भट्ट का 'कुरुवन दहन' (सन् १९१२ ई०) है।
यूरोप में मध्ययुग में शब्दानुवाद शैली प्रचलित थी। बाइबिल का अनुवाद इसका एक उदाहरण है।
अंग्रेजी के कवि श्री जान ड्राइडन ने शब्दानुवाद, भावानुवाद तथा अनुकरण (इमिटेशन) अनुवादो का वर्गी-
करण किया है। महा कवि गेटे ने अनुवादों को परिचयात्मक (लूथर कृत बाइबिल) रूपान्तर (एडाप्टेशन)
तथा पुनः सर्जन तीन वर्गों में विभाजित किया है। समीक्षक बेनेडेट्टे क्रोचे का कहना है कि कामिनी के