सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

[ ३ ]
भिक्षाचर के सैनिकों के विश्वासघातक कार्यों का प्रत्यक्षदर्शी था । यह घटना सन् ११२१ ई० की है।
( रा० ८ : ९४१ ) उसने राजा सुस्सल ( सन् १११२-११२० ई० ) के पूर्ववर्ती तीन राजाओं का
आँखो देखा वर्णन किया है । यहाँ उसकी शैली घटना-क्रमों को एक के पश्चात् दूसरे को इस द्रुत गति
से रखती है, जैसे कोई उन घटनाओं को स्वतः देखकर लिख रहा था । वह किंचित् मात्र कहीं भी अपनी
लेखनी को ठहरने नही देता । शब्द नही खोजता । कड़ी नही जोड़ता । वह शीघ्रातिशीघ्र सब कुछ वर्णन
कर देने के लिए उतावला हो उठता है । घटनायें जैसे स्वतः एक के पश्चात् दूसरी उसकी लेखनी से प्रसूत
होती गयी हैं । घटना-क्रमों के मूल को जान लेता है । परिस्थितियों का रहस्य समझ जाता है ।
कल्हण का पिता चम्पक सन् १०९८ ई० में० द्वारपति के पद पर था । राजा हर्ष ने उसे मण्डलेश
भी बनाया था । निःसन्देह चम्पक इस समय प्रौढ़ व्यक्ति था । दोनों पद काश्मीर में सर्वश्रेष्ठ उत्तरदायित्व
के थे । वे अनुभवी तथा प्रौढ बुद्धि वाले व्यक्ति को दिये जाते थे, जो उनकी गुरुता का अनुभव कर सकता
था । यदि चम्पक का अवसान काल सन् ११३६ ई० मान लिया जाय तो यह समय सन् १०९८ ई० के
लगभग पड़ता है । अर्थात् वह ३८ वर्ष की आयु तक द्वारपति एवं मण्डलेश हो चुका था । श्री स्टीन का
मत है कि कल्हण का जन्म ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रखा जा सकता है ।
चम्पक किसी युद्ध में हत नही हुआ था । यदि वह अकाल मृत्यु किंवा किसी संघर्ष में हत किंवा
आहत होता तो कल्हण उसका अवश्य वर्णन करता; क्योकि कल्हण ने उसे राजनीति एवं संघर्षों में सक्रिय
भाग लेते हुए चित्रित किया है । निश्चय ही चम्पक अपनी मृत्यु से दिवंगत हुआ था । यदि सन् १०९८ ई०
में उसकी आयु ३८ वर्ष कम से कम मान ली जाय तो सन् ११३६ ई० में उसकी आयु ६८ वर्ष की ठहरती
है । इस आन्तरिक साक्ष्य के अनुसार कल्हण का जन्म सन् १०९८ ई० के समीप रखा जा सकता है । श्री
स्टीन के मत में तथ्य है कि कल्हण का जन्म ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रखा जा सकता है ।
कनक : उच्चल तथा सुस्सल भ्राता द्वय काश्मीर राज्य प्राप्ति हेतु कृत-संकल्प हो गये थे । उच्चल
के कारण राजा हर्ष की अमानुषिक क्रूरता को भी लज्जित करने वाली हत्या की गयी । ( रा० ७ :
१७११, १७१२ ) राजा हर्ष का मुण्ड काटकर उच्चल के पास भेजा गया । मुण्ड को लगुडा पर खोसकर
चारो ओर घुमाया गया । ( रा० ७ : १७२१, १७२३ ) राज्य प्राप्ति के प्रश्न को लेकर दोनो भाई उच्चल
तथा सुस्सल में भी संघर्ष आरम्भ हो गया । उस समय सभी अनुचर सात दिनों तक मार्ग में रोक दिये
गये । कल्हण का संगीतज्ञ चाचा कनक भी उसी रुके समुदाय मे था । अवसर पाते ही वह समुदाय से निकल
भागा । कनक अपने गुरु तथा राजा हर्ष के दुःखद अन्त से इतना खिन्न हो गया कि काश्मीर मण्डल त्याग
दिया । वाराणसी में काशीवास करने लगा ! ( रा० ८ : १२, १३ ) काशी किंवा वाराणसी के इस
सम्बन्ध के कारण कल्हण ने राजतरंगिणी में काशी का अत्यधिक वर्णन किया है ।
चम्पक : प्रथम तरंग से षष्ठ तरंग के इतिपाठ के अतिरिक्त कल्हण ने प्रथम बार चम्पक का सहसा
उल्लेख नन्दि क्षेत्र यात्रा के प्रसंग में किया है । कल्हण की यह शैली है । जब वह किसी व्यक्ति का उल्लेख
करता है तो उसके पद, वंश आदि का उल्लेख करता है । यहाँ चम्पक का बिना किसी पक्ष आदि के वर्णन
करना महत्त्व रखता है । वह मान लेता है कि लोग उसके पिता के सम्बन्ध में जानकारी रखते थे । कुछ
विद्वानों का यह मत है कि यह वर्णन इस बात का प्रतीक है कि उसने अपने समय के लोगों के लिए राज-
तरंगिणी लिखी थी ।