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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 984 में से

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पृष्ठ 6

( ५ )
दशाश्वमेध घाट, मेरे मकान और जम्मू हाउस के बीच एक फर्लाङ्ग का फासला था ।
अपने खानदानी मकान ओरङ्गावाद से दशाश्वमेध रोज जाया करता था । जम्मू हाउस की
भवन रचना हमें आकर्षित करती थी । जम्मू हाउस के दक्षिण तरफ दशाश्वमेध की सड़क और
उत्तर टेढ़ी नीम की गली थी । मैं बाल्यावस्था में अपनी मामी के साथ गंगा स्नान करने जाता
था । जिस दिन गली में भिखमंगों का विशाल जन समूह एकत्रित रहता, हम समझ जाते थे ।
महाराज काश्मीर आ गये थे ।
मेरा कुटुम्ब प्रारम्भ से ही अंग्रेजों का द्रोही रहा है । मेरे पिता के दूसरे मामा स्वर्गीय
श्री बैजनाथ सिंह काग्रेस स्थापना के दो वर्ष पश्चात् काग्रेस में सम्मिलित हुए । वे भंग भंग
तथा स्वदेशी आन्दोलन में जेल यात्रा कर चुके थे । हमारे जन्म के पूर्व दो बार आन्दोलन में
कारागार की सजा भुगत चुके थे । कलकत्ता उनका कार्य क्षेत्र था । यही कार्य करते थे । कवि
थे । कविता करते थे । पुरानी शैली के थे । कविता लिखकर फाड़ देते थे । कभी कविता उन्होंने
प्रकाशित करने का प्रयास नहीं किया ।
काश्मीर के राजा थे । उनकी सेना थी । उनका राज्य था । उस समय यह बातें स्वा-
धीनता आन्दोलन काल में बहुत भली लगती थीं । भारत के मानचित्र पर काश्मीर, राजस्थान
तथा अन्य भारतीय रियासतों का पीला रंग देखता तो मन में उत्साह उत्पन्न होता ।
काशी एवं काश्मीर का नाम समध्वनि होने के कारण रुचता था । दोनों राजाओ को
देखकर मन प्रसन्न होता था । भारत की पुरानी स्मृति स्मरण हो आती थी । काशिराज
प्रभुनारायण सिंह जी संस्कृत के उद्भट विद्वानो में थे । काशी के विद्वानों में उनकी गणना की
जाती थी । संस्कृत के उच्च कोटि के लेखक थे । एक समय काशी विश्वविद्यालय के स्व० उप-
कुलपति एवं गुजराती के प्रसिद्ध लेखक श्री आनन्द शंकर बापूभाई ध्रुव उनके यहाँ गये । ध्रुव
जी संस्कृत के विद्वान् थे । उन्होने अकस्मात् कुछ पृष्ठ लिखित देखे । उठाकर पढ़ा । उन्हे
आश्चर्य हुआ । ये नाटक के कुछ पृष्ठ थे । पद, अलंकार, उपमा आदि समन्वित थे । काव्य
रचना कालिदास से कम नहीं थी । पद सरस थे, मधुर थे । ओजपूर्ण शैली थी । पुरानी शैली
में मौलिक नूतनता थी । ध्रुव जी ने कहा—'महाराज आप इसे छपाते क्यों नहीं ?' उन्होंने
हँस कर कहा—'यह मेरा काम नहीं है । ब्राह्मणों का काम है ।' और सब पृष्ठ फाड़ दिया ।
राजागण उस समय परम्परा का पालन करने में गौरव का अनुभव करते थे । महाराज
काश्मीर गंगा स्नान करते थे । हमारे बैठका के ठीक सामने । दशाश्वमेध घाट पर । वे कभी-
कभी दशाश्वमेध घाट से पंचगंगा घाट नाव से जाते थे । उनके सरल स्वभाव की सब प्रशंसा
करते थे । साधारण जनता के साथ घाटो पर स्नान करते थे । जबकि छोटे-छोटे राजा आते थे
तो अपने मिथ्या अभिमान के कारण अलग प्रबन्ध कराते थे । काश्मीरराज अपनी सरलता एवं
नम्रता के कारण काशी में लोकप्रिय थे ।
मैं हिन्दू स्कूल का विद्यार्थी था । हिन्दू स्कूल में काशीनरेश हाल है । भव्य भवन रचना
है । उसके ऊपर काश्मीर नरेश श्री रणबीर सिंह के नाम पर संस्कृत पाठशाला थी । संस्कृत
पाठशाला के अध्यापक खूब बड़ी पगड़ी बाँधते थे । उस समय उधर आबादी नही थी । पंडित