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निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

निंदकों से भी प्रेम करते हैं आप

Page 72Permalink

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साहिब बन्दगी

आपने कहा कि मत बैठो, चलते-फिरते ही नाम-भजन कर लिया करो। वो कहने लगी कि नाम-भजन करने नहीं देता है। आपने कहा कि कमी तो मुझे तुममें नज़र आ रही है, उसमें नहीं। वो कोई तुम्हारी स्वाँस में तो बैठा नहीं है।

इस तरह कोई भी शिकायत लेकर आता है या कोई विवाद लेकर आपके पास पहुँचा है तो आप दोनों पक्षों को सुनते हैं और पक्षपात रहित होकर फैसला सुनाते हैं। आप किसी की शिकायत सुनकर किसी को कुछ नहीं कहते, बल्कि उसपर विचार करके, दूसरे का पक्ष सुनकर ही कुछ कहते हैं।

निंदकों से भी प्रेम करते हैं आप

आप अपनी संगत से तो प्रेम करते ही हैं, अपने निंदकों के प्रति भी आप किसी तरह का बैर भाव नहीं रखना चाहते हैं। क्योंकि आप जानते हैं कि यदि किसी के प्रति बुरा भाव आ गया तो उसका सर्वनाश हुए बिना नहीं रहेगा। सब अपने ही बच्चे समझकर आप उनके प्रति भी दया का भाव ही रखते हैं।

निंदकों के प्रति किसी इंसान की बुद्धि दया की भावना नहीं रख सकती है। उसके प्रति बैरभाव स्वाभाविक ही होता है। आप तो कहते हैं कि आपका काम ही निंदकों ने किया है। यदि निंदक नहीं होते तो आपका इतना प्रचार होना ही नहीं था। आप उन्हें भोले इंसान समझते हैं, जिनमें विचार करने की शक्ति नहीं है, जो दूसरों से कुछ भी सुनकर उसे सच मान लेते हैं और निंदा शुरू कर देते हैं। जो पाखण्डी हैं, उनकी बात और है, पर आप उनके प्रति भी कोई बैर भाव नहीं रखते हैं, केवल उनसे बचने को कहते हैं।

ये केवल कहने की ही बातें नहीं हैं। आपने अपने हज़ारों निंदकों को क्षमा करके नाम दान तक दिया है। नाम दान के समय आप हरेक