मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)
Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi
विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा
स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)
चतुर्थ अङ्क । ६७
चतुर्थ अङ्क । ६७
राक्षस ।- (स भ्रम से उठ कर ) अरे कुमार आप ही आ गए !
आइए, इस आसन पर बैठिए ।
मलयकेतु ।—मैं बैठता हूँ आप विराजिए ।
( दोनों बैठते हैं )
मलयकेतु ।—इस समय सिर की पीड़ा कैसी है ? ५
राक्षस ।—जब तक कुमार के बदले महाराज कह कर आप
को नही पुकार सकते तब तक यह पीड़ा कैसे छूटेगी *।
मलयकेतु ।—आप ने जो प्रतिज्ञा की है तो सब कुछ होईगा ।
परन्तु सब सेना सामन्त के होते भी अब आप किस बात
का आसरा देखते हैं ? १०
राक्षस ।—किसी बात की नही, अब चढ़ाई कीजिए ।
मलयकेतु ।—अमात्य ! क्या इस समय शत्रु किसी सङ्कट
में है ?
राक्षस ।—बड़े ।
मलयकेतु ।—किस सङ्कट में ? १५
राक्षस ।—मन्त्रीसङ्कट में ।
मलयकेतु ।—मन्त्रीसङ्कट तो कोई सङ्कट नही है ।
राक्षस ।—और किसी राजा को न हो तो न हो, पर चन्द्रगुप्त
का तो अवश्य है ।
मलयकेतु ।—आर्य्य ! मेरी जान में चन्द्रगुप्त को और भी २०
नहीं है ।
राक्षस ।—आप ने कैसे जाना कि चन्द्रगुप्त को मन्त्रीसङ्कट
सङ्कट नही है ?
मलयकेतु ।—क्योंकि चन्द्रगुप्त के लोग तो चाणक्य के कारण
उस से उदास रहते हैं, जब चाणक्य ही न रहेगा तब २५
उस के सब कामों को लोग और भी सन्तोष से करेंगे ।
* अर्थात् - द्रगुप्त को जीत कर जब आप को महाराज बना लेगे तब स्वस्थ होगे ।
६८ मुद्राराक्षस-
राक्षस ।—कुमार, ऐसा नही है, क्योंकि यहा दो प्रकार
के लोग हैं—एक चन्द्रगुप्त के साथी, दूसरे नन्दकुल के
मित्र, उन मे जो चन्द्रगुप्त के साथी हैं उन को चाणक्य
ही से दुख या कुछ नन्दकुल के मित्रों को नही, क्योकि
५ वह लोग तो यही सोचते है कि इसी कृतघ्न चन्द्रगुप्त ने
राज के लोभ से अपना पितृकुल नाश किया है, पर क्या
करें उन का कोई आश्रय नही है इस से चन्द्रगुप्त
के आसरे पडे है, जिस दिन आप को शत्रु के नाश
म और अपने पक्ष के उद्धार में समर्थ देखेंगे उसी दिन
१० चन्द्रगुप्त को छोड कर आप से मिल जायंगे, इस के
उदाहरण हमी लोग हैं ।
मलयकेतु ।- आर्य्य । चन्द्रगुप्त के हाग्ने का एक यही कारण
है कि कोई और भी है ?
राक्षस ।—और बहुत क्या होंगे एक यही बडा भारी ह ।
१५ मलयकेतु ।—क्यों आर्य्य । यही क्या प्रधान है ? क्या चन्द्र
गुप्त और मन्त्रियों से आप अपना काम करने मे असमर्थ
है ?
राक्षस ।—निरा असमर्थ है ।
मलयकेतु ।—क्यो ?
२० राक्षस ।—यों कि जो आप राज्य सम्भालते हैं या जिन का
राज राजा और मन्त्री दोनों करते हैं वह राजा ऐसे हों
तो हो, परन्तु चन्द्रगुप्त तो कदापि ऐसा नही है । चन्द्रगुप्त
एक तो दुरात्मा है दूसरे वह तो सचिव ही के भरोसे सब
काम करता है, इस से वह कुछ व्यवहार जानता ही नही
२५ तो फिर वह सब काम कैसे कर सकता है ? क्योंकि—
लक्ष्मी करत निवास अति, प्रबल सचिव नृप पाय ।
वै निज बाल-सुभाव सों, इकहि तजत अकुलाय ॥