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मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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चतुर्थ अङ्क । ६७

राक्षस ।- (स भ्रम से उठ कर ) अरे कुमार आप ही आ गए !
आइए, इस आसन पर बैठिए ।
मलयकेतु ।—मैं बैठता हूँ आप विराजिए ।
( दोनों बैठते हैं )
मलयकेतु ।—इस समय सिर की पीड़ा कैसी है ? ५
राक्षस ।—जब तक कुमार के बदले महाराज कह कर आप
को नही पुकार सकते तब तक यह पीड़ा कैसे छूटेगी *।
मलयकेतु ।—आप ने जो प्रतिज्ञा की है तो सब कुछ होईगा ।
परन्तु सब सेना सामन्त के होते भी अब आप किस बात
का आसरा देखते हैं ? १०
राक्षस ।—किसी बात की नही, अब चढ़ाई कीजिए ।
मलयकेतु ।—अमात्य ! क्या इस समय शत्रु किसी सङ्कट
में है ?
राक्षस ।—बड़े ।
मलयकेतु ।—किस सङ्कट में ? १५
राक्षस ।—मन्त्रीसङ्कट में ।
मलयकेतु ।—मन्त्रीसङ्कट तो कोई सङ्कट नही है ।
राक्षस ।—और किसी राजा को न हो तो न हो, पर चन्द्रगुप्त
का तो अवश्य है ।
मलयकेतु ।—आर्य्य ! मेरी जान में चन्द्रगुप्त को और भी २०
नहीं है ।
राक्षस ।—आप ने कैसे जाना कि चन्द्रगुप्त को मन्त्रीसङ्कट
सङ्कट नही है ?
मलयकेतु ।—क्योंकि चन्द्रगुप्त के लोग तो चाणक्य के कारण
उस से उदास रहते हैं, जब चाणक्य ही न रहेगा तब २५
उस के सब कामों को लोग और भी सन्तोष से करेंगे ।


* अर्थात् - द्रगुप्त को जीत कर जब आप को महाराज बना लेगे तब स्वस्थ होगे ।