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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages
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२४४ मुद्राराक्षसम्

हुए तथा अत्यन्त तीक्ष्ण लगामों के खींचने से अत्यधिक टेढ़े और ( इसीलिए ) समुन्नत हो उठने वाले ग्रीवाभागों से युक्त अश्वों को रोक लिया। कतिपय राजगण वेग के रोक देने के कारण निःशब्द घंटे वाले गजराजों के साथ लौट पड़े। महाराज ! समुद्र के समान राजा लोग आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते हैं ॥ ७ ॥

टिप्पणी—अतर्कितागमनेन—सहसोपस्थित्या । √तर्क् + णिच् स्वार्थे + क्त कर्मणि = तर्कितम् न तर्कितम् नञ्तत्० । तादृशं गमनम् कर्मधारय स०, तेन । कृतम्—अलम् । अस्य योगे 'अनुगमनक्लेशेन' इत्यत्र तृतीया । पुरस्तात्—अव्ययमेतत् । पूर्वस्मिन् देशे इति पूर्व + टि—अस्ताति स्वार्थे । अतिशयेन खरम् इति खरतरम् । √भुज् + क्त कर्तरि = भुग्न। सोत्सेधे —उद् √भिद् + घञ् भावे = उत्सेधः = उच्छ्रायः । तेन सह इति सोत्सेधाः, तैः । स्कन्धदेशैः —अत्र इत्थम्भूतलक्षणे तृतीया । निरुद्धाः —नि √रुध् + क्त कर्मणि । मातङ्गमुख्यैः —मातङ्गानां मुख्याः षष्ठीतत्० वा मातङ्गेषु मुख्याः सुप्सुपा स०, तैः । निवृत्ताः—नि √वृत् + क्त कर्तरि । भूमिपालाः —भूमिं पालयति इति भूमि √पाल् + णिच् + अण् कर्तरि । इस श्लोक में स्वभावोक्ति अलंकार, उत्प्रेक्षा और उपमा अलंकारों से संसृष्ट है। इसमें स्रग्धरा छन्द है। इस छंद का लक्षण १, १ में देखिए ॥७॥

मलयकेतु —आर्य जाजले ! त्वमपि सपरिजनों निवर्तस्व । भागुरायण एको मामनुगच्छतु ।

कञ्चुकी—यदाज्ञापयति कुमारः ।

[ इति सपरिजनों निष्क्रान्तः ]

मलयकेतु —सखे भागुरायण ! विज्ञापितोऽहमिहागच्छद्भिर्भद्रभटप्रभृतिभिः, यथा—'न वयममात्यराक्षसद्वारेण कुमारमाश्रयणीयमाश्रयामहे, किन्तु कुमारस्य सेनापतिं शिखरसेनमुररीकृत्य दुष्टामात्यपरिगृहीतात् चन्द्रगुप्तादपरक्ताः सन्तः कुमारमाभिरामिकगुणयोगादाश्रयणीयमाश्रयामहे' इति । तन्मया सुचिरमपि विचारयता तेषां न वाक्यार्थोऽधिगतः ।

भागुरायण —कुमार ! नायमत्यन्तदुर्बोधोऽर्थः । पश्य, विजिगीषुमात्मगुणसम्पन्नं प्रियहितद्वारेणाश्रयणीयमाश्रयेदि' ति ननु न्याय्य एवायम् ।

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चतुर्थोऽङ्कः २४५

मलयकेतुः—सखे भागुरायण ! नन्वस्माकममात्यराक्षसः प्रियतमो हिततमश्च ।

हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—आर्य जाजलि ! तुम भी परिजनों के साथ लौट जाओ । अकेला भागुरायण मेरे पीछे-पीछे आवे ।

कंचुकी—कुमार की जो आज्ञा ।

[ अनुचरों के साथ चला जाता है । ]

मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! यहाँ आये हुए भद्रभट आदियो ने मुझसे कहा कि हम लोग अमात्य राक्षस के द्वारा आश्रय के योग्य कुमार का आश्रय नही ले रहे हैं, किन्तु कुमार के सेनापति शिखरसेन ( की बातों ) को स्वीकार करके दुष्ट अमात्य चाणक्य के वशीभूत चन्द्रगुप्त से विरक्त होकर उत्तम गुणों से विभूषित होने के कारण कुमार का आश्रय ले रहे है । सो मैने चिरकाल तक सोचने पर भी उनके वाक्य का तात्पर्य नही समझा ।

भागुरायण—कुमार ! यह तात्पर्य दुर्बोध नहीं है । देखिए, जीतने के इच्छुक, आत्मा के गुणों ( पराक्रम, उत्साह आदि ) से सम्पन्न और आश्रय के योग्य का आश्रय प्रिय एवं हितचिन्तक व्यक्ति के द्वारा ग्रहण करना चाहिए ।

मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! आमात्य राक्षस तो हमारे अत्यन्त प्रिय एवम् अत्यन्त हितचिन्तक हैं ।

टिप्पणी—विज्ञापितः—निवेदितः । आमात्यराक्षसद्वारेण—अमात्य-राक्षस एव द्वारम्, तेन, करणे तृतीया । आश्रयणीयम्—सेवनीयम् । आश्रया-महे—सेवामहे । ऊरीकृत्य—स्वीकृत्य । ऊरी √कृ + क्त्वा—ल्यप्, 'ऊर्यादि-च्चिडाचश्च' इत्यनेन गतिसंज्ञा, 'कुगतिप्रादयः' इत्यनेन गतिसमासः । आभि-रामिकगुणयोगात्—प्रशस्तगुणभूषितत्वात् । अभि समन्तात् रमयति इति अभि √रम् + णिच् + अच् कर्तरि = अभिरामम् । तत् शीलमस्य इति अभिराम + ठक्—इक = आभिरामिकम् । तस्य गुणाः । तैः योगः, तस्मात् । हेतौ पञ्चमी । विजिगीषुम्—विजयाभिलाषिणम् । विजेतुम् इच्छुः विजिगीषुः वि√जि + सन्, द्वित्वादि + उ, तम् । प्रियहितद्वारेण—प्रियश्चासौ हितः प्रियहितः । स एव द्वारम् उपायः, तेन ।

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२४६ मुद्राराक्षसम्

भागुरायण —कुमार ! एवमेतत्, किन्तु अमात्यराक्षसश्चाणक्ये बद्धवैरो न तु चन्द्रगुप्ते, तद्यदि कदाचिच्चन्द्रगुप्तश्चाणक्यमतिजितकाशि-नमसहमान साचिव्यादवरोपयेत्, ततो नन्दकुलभक्त्या नन्दान्वय एवाय-मिति कृत्वा, सुहृज्जनापेक्षया च, अमात्यराक्षसश्चन्द्रगुप्तेन सह सन्दधीत । चन्द्रगुप्तोऽपि पितृपारम्पर्यागत एवायमिति गत्वा सन्धि-मनुमन्येत । एव मत्यम्मास्वपि कुमारो न विश्वमेदित्ययमेषा वाक्यार्थ ।

मलयकेतु —युज्यते । सखे भागुरायण ! अमात्यराक्षसस्य गृहमार्ग मादेशय ।

भागुरायण —इत इत कुमार । [इत्युभौ परिक्रामत ।] कुमार ! इदमात्यराक्षसस्य गृह, प्रविशतु कुमार ।

मलयकेतु —एष प्रविशामि । [इत्युभौ प्रवेशम नाटयत ।]

राक्षस —[आत्मगतम्] आ स्मृतम् ! [प्रकाशम्-] भद्र ! अपि दृष्टस्त्वया कुसुमपुरे वैतालिक स्तनकलस ?

करभक —अमच्च ! अथ इ ? (अमात्य ! अथ किम् ?)

मलयकेतु —सखे भागुरायण ! कुसुमपुरवृत्तान्त प्रस्तूयते । तदुप-सर्पाव, शृणुवस्तावत्—

सत्त्वभङ्गभयाद्राज्ञा कथयन्त्यन्यथा पुर ।
अन्यथा विवृत्तार्थेषु स्वैरालापेषु मन्त्रिण ॥८॥

अन्वय —मन्त्रिण राज्ञा पुर सत्त्वभङ्ग भ्यात् अन्यथा कथयन्ति, विवृत्तार्थेषु स्वैरालापेषु अन्यथा ॥८॥

व्याख्या —मन्त्रिण —अमात्या, राज्ञा—नृपाणा, पुर —अग्रे, सत्त्वभङ्ग-भयात्—सत्त्वस्य मनस प्रभावस्य वा भङ्ग नाश तस्य भयात् भीत्या, अन्यथा—प्रकारान्तरेण, कथयति—वदति, विवृत्तार्थेषु—विवृत प्रकटीभूत अर्थ तात्पर्य येषु तादृशेषु, स्वैरालापेषु—स्वच्छन्दभाषणेषु, अन्यथा—अन्य-प्रकारेण (कथयन्ति) ॥८॥

हिन्दी अनुवाद —भागुरायण—कुमार ! यह ऐसा ही है । किन्तु अमात्य राक्षस का वैर चाणक्य से बँधा हुआ है न कि चन्द्रगुप्त से, इसलिए यदि

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चतुर्थोऽङ्कः २४७.

कदाचित् अत्यन्त अभिमानी चाणक्य को सहन न करता हुआ चन्द्रगुप्त (उसे) मन्त्रि-पद से च्युत कर दे, तदनन्तर नन्द-वंश की भक्ति के कारण यह नन्द-वंश का ही है—यह समझकर तथा (चन्दनदास आदि) मित्रों की अपेक्षा के कारण अमात्य राक्षस चन्द्रगुप्त के साथ सन्धि कर ले, और चन्द्रगुप्त भी पितृ-परम्परा से आया हुआ ही यह है—यह सोचकर सन्धि का अनुमोदन करे तो ऐसी स्थिति में हम लोगों पर भी कुमार विश्वास न करें—यह इनके वाक्य का तात्पर्य है।

मलयकेतु—ठीक है। मित्र भागुरायण ! अमात्य राक्षस के घर का मार्ग बताओ।

भागुरायण—इधर से कुमार (आवें) इधर से। [दोनों घूम जाते हैं।] कुमार ! यह अमात्य राक्षस का घर है, कुमार प्रवेश करे।

मलयकेतु—यह प्रवेश करता हूँ। [दोनों प्रवेश करने का अभिनय करते हैं।]

राक्षस—[मन में] ओह ! स्मरण आ गया। [प्रकट] भद्र ! क्या तुम कुसुमपुर में वैतालिक स्तनकलस से मिले थे ?

करभक—अमात्य ! और क्या ?

मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! कुसुमपुर का वृत्तान्त चल रहा है ! इसलिए हम दोनों समीप नहीं जाते, (यहीं से) तब तक सुनते हैं—

मंत्री लोग प्रभाव के नष्ट हो जाने के भय से राजाओं के सामने (किसी बात को) दूसरे ढंग से कहते हैं और प्रकट तात्पर्य वाली स्वच्छन्द बातचीतों में अन्य प्रकार से (कहते हैं) ॥८॥

टिप्पणी—एवमेतत्, किन्तु—भागुरायण चाणक्य का गुप्तचर है। वह राक्षस और मलयकेतु में फूट डालना चाहता है। फूट या भेद का लक्षण यह है—'स्नेहापरागानयनं संघर्षोत्पादनं तथा। संतर्जनं च भेदज्ञैर्भेदस्तु त्रिविधः स्मृतः॥' यहाँ भागुरायण ने 'स्नेहापरागानयन' भेद का प्रयोग किया है।

बद्धवैरः—धृतविद्वेषः। बद्धं वैरं येन स बद्धवैरः। अतिजितकाशिनम्—अनल्पमदशालिनम्। अतिजितेन अतिजयेन काशते तच्छीलः इति अतिजित

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२४८ मुद्राराक्षसम्

काश्+णिनि कर्तरि ताच्छील्ये = अतिजितकाशी, तम् । साचिव्यात्—मन्त्रिपादात् । अवरोपयेत्—च्यावयेत् । अव√रुह्+णिच्, ह्म्य प+लिङ्—यात् । नन्दकुलभक्त्या राक्षस नन्दवंश के भक्त हैं और चन्द्रगुप्त नन्द का पुत्र है, इसलिए सम्भव है कि राक्षस चन्द्रगुप्त के प्रति आकृष्ट हो जायें। सुहृज्जनापेक्षया—अत्र हेतौ तृतीया । राक्षस के मित्र चन्दनदास सपरिवार कारागार में हैं और भी उनके कतिपय मित्र संकट में हैं। इसलिए चन्द्रगुप्त से उनका सन्धि कर लेना कोई आश्चर्य की बात नहीं है । सन्दधीत—सन्धिं कुर्यात् । यदि अपसारयेत् तदा सन्दधीत इति विवक्षाया हेतुहेतुमद्भावात् लिङ् । सन्धिम्—सम्√धा+कि भावे = सन्धि, तम् । विश्वसेत्—वि√श्वस्+लिङ्—यात् । अत्र सम्भावनाया लिङ् । श्वस् धातु अदादिगणीय है । इसलिए, यहाँ 'विश्वस्यात्' रूप होना चाहिए, किन्तु 'गणकार्यमनित्यम्' इस नियम के बल से, यहाँ अदादिगणीय कार्य न होकर भ्वादिगणीय कार्य हुआ। युज्यते—√युज् (दिवादि)+लट्—ते कर्तरि । शृणुमस्तावत्—भागुरायण ने मलयकेतु के मन में राक्षस के प्रति सन्देह का अंकुर उत्पन्न कर दिया है, इसलिए वह छिपकर राक्षस की बातचीत सुनना चाहता है । स्वैरालापेषु—आ√लप्+घञ् भावे=आलापा । स्वैरा आलापा कर्मधारय स०, तेषु । इस श्लोक में काव्यलिंग अलकार है और अनुष्टुप् छन्द है। इसका लक्षण १, ३ में देखिए ॥ ८ ॥

भागुरायण—यदाज्ञापयति कुमार ।

राक्षस—भद्र ! अपि तत् कार्यं सिद्धम् ?

करभक—अमच्चस्स प्पसाएण सिद्धम् । (अमात्यस्य प्रसादेन सिद्धम् ।)

मलयकेतु—सखे भागुरायण ! किं तत् कार्यम् ?

भागुरायण—कुमार ! गहन खलु सचिववृत्तान्तो नैतावता परिच्छेत्तु शक्यते । अवहितस्तावच्छृणु ।

राक्षस—विस्तरेण श्रोतुमिच्छामि ।

करभक—सुणादु अमच्चो, अत्थि दाव अह अमच्चेणाणत्तो, जहा—

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चतुर्थोऽङ्कः

'करभअ ! कुसुमपुरे गच्छिअ भणिदव्वो मम वअणेण तुए वैआलिओ थणकलसो, जहा—'चाणक्कहदएण तेसु तेसुं अण्णाभङ्गेसुं अणुचिट्ठी-अमाणेसुं चन्दउत्तो समुत्तेअणसमत्थेहिं सिलोएहिं उबसिलोइदव्वो' त्ति । (शृणोत्वमात्यः, अस्ति तावदहममात्येनाज्ञप्तो यथा—'करभक ! कुसुमपुरं गत्वा मम वचनेन त्वया भणितव्यो वैतालिकः स्तनकलसः, यथा—'चाणक्यहतकेन तेषु तेषु आज्ञाभङ्गेषु अनुष्ठीयमानेषु चन्द्रगुप्तः समुत्तेजनसमर्थैः श्लोकैरुपश्लोकयितव्यः' इति ।)

राक्षसः—ततस्ततः ?

करभकः—तदो मए पाडलिउत्तं गच्छिअ सुणाविदो अमच्चस्स सन्देसं वैआलिओ थणकलसो । (ततो मया पाटलिपुत्रं गत्वा श्रावितोऽमात्यस्य सन्देशं वैतालिकः स्तनकलसः ।)

राक्षसः—ततस्ततः ?

करभकः—एत्थन्तरे णन्दकुलविणासदुम्मणस्स पोरजणस्स परिओसं सम्मुप्पाअन्तेण चन्दउत्तेण आघोसिदो कुसुमउरे कौमुदीमहोसबो । सोवि चिरआलपबत्तमाणो जणिदपरिओसो अहिमदबन्धुजणसमागमो बिअ, ससिणेहं बहुमाणिदो णअरजणेण । (अत्रान्तरे नन्दकुलविनाशदुर्मनसः पौरजनस्य परितोषं समुत्पादयता चन्द्रगुप्तेनाघोषितः कुसुमपुरे कौमुदीमहोत्सवः । सोऽपि चिरकालप्रवर्तमानो जनितपरितोषः अभिमत-बन्धुजनसमागम इव सस्नेहं बहुमानितो नगरजनेन ।)

हिन्दी अनुवाद—भागुरायण—कुमार की जो आज्ञा ।

राक्षस—भद्र ! क्या वह कार्य सिद्ध हुआ ?

करभक—अमात्य की कृपा से सिद्ध हो गया ।

मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! वह कौन कार्य है ?

भागुरायण—कुमार ! दुर्ज्ञेय अमात्य का वृत्तान्त इतने से निश्चित नहीं किया जा सकता ।

राक्षस—विस्तार से सुनना चाहता हूँ ।

करभक—अमात्य सुनें । आपने मुझे आज्ञा दी थी कि—करभक ! कुसुमपुर

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२५०
मुद्राराक्षसम्

में जाकर, तुम मेरी ओर से वैतालिक स्तनकलस से कहना कि 'दुष्ट चाणक्य के द्वारा उन-उन आज्ञा-भंगों के किये जाने पर (तुम्हें) उत्तेजित करने में समर्थ श्लोकों से चन्द्रगुप्त की स्तुति करनी चाहिए'।

राक्षस— तत तत ?

करभक— तब मैंने पाटलिपुत्र में जाकर अमात्य का संदेश वैतालिक स्तनकलस को सुना दिया।

राक्षस— तत तत ?

करभक— इस बीच नन्दवंश के विनाश से खिन्न पुरवासियों को सन्तुष्ट करते हुए चन्द्रगुप्त ने कुसुमपुर में कौमुदीमहोत्सव (मनाये जाने) की घोषणा करवा दी। चिरकाल से चले आते हुए और आनन्द उत्पन्न करने वाले उस (कौमुदीमहोत्सव) का भी नागरिकों ने अभीष्ट वधु के आगमन के समान स्नेह-पूर्वक अभिनन्दन किया।

**टिप्पणी—अस्ति तावत्—**यहाँ 'अस्ति' एक अव्यय है। श्रावित —स्तनकलसं अमात्यसन्देशं श्रुतवान् = अह स्तनकलसम् अमात्यसन्देशं श्रावितवान्—मया स्तनकलस अमात्यसन्देश श्रावित । 'गतिबुद्धि—' सूत्रेणायं कर्मसंज्ञा—द्वितीया । नन्दकुलविनाशदुर्मनसः नन्दानां कुलानि नन्दकुलानि तेषां विनाश नन्दकुलविनाशः । तेन दु दुष्टं खिन्नमित्यर्थः मनो यस्य स नन्दकुलविनाशदुर्मनाः, तस्य । **चिरकालप्रवर्तमान —**प्र√वृत्+शानच् बन्तरि = प्रवर्तमान । चिरं काल । चिरकाल प्रवर्तमान द्वितीयातत्० । अत्र अत्यन्तसंयोगे द्वितीया, 'अत्यन्तसंयोगे च' इत्यनेन समासः ।

राक्षस —[ सराष्पम् ] हा देव नन्द !—

कौमुदी कुमुदानन्दे जगदानन्दहेतुना
कीदृशी सति चन्द्रेऽपि नृपचन्द्र त्वया विना ॥ ९ ॥

**अन्वय —**नृपचन्द्र ! कुमुदानन्दे चन्द्रे सति अपि जगदानन्दहेतुना त्वया विना कौमुदी कीदृशी ? ॥ ९ ॥

**व्याख्या—**नृपचन्द्र !—हे चन्द्रतुल्यभूपाल !, कुमुदानन्दे—कुमुदानां कैरवाणाम् आनन्दे हर्षवर्धके, चन्द्रे—चन्द्रमसि, सति अपि—विद्यमानेऽपि,

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चतुर्थोऽङ्कः २५३

मलयकेतुः—एवमेतत् ।

राक्षसः—ततस्ततः ?

करभकः—तदो चन्दउत्तेण आणाभङ्गकलुसिदहिअएण सुइरं अमच्चगुणं प्पसंसिअ प्पब्भंसिदो अहिआरादो चाणक्कहदओ । ( ततश्चन्द्रगुप्तेनाज्ञाभङ्गकलुषितहृदयेन सुचिरममात्यगुणं प्रशस्य प्रभ्रंशितोऽधिकारात् चाणक्यहतकः । )

मलयकेतुः—सखे भागुरायण ! गुणप्रशंसया दर्शितश्चन्द्रगुप्तेन राक्षसे भक्तिपक्षपातः ।

भागुरायणः—कुमार ! न तथा गुणप्रशंसया यथा चाणक्यवटोर्निराकरणेन ।

राक्षसः—भद्र ! किमयमेवैकः कौमुदीमहोत्सवप्रतिषेधश्चन्द्रगुप्तस्य चाणक्यं प्रति कोपकारणमुतान्यदप्यस्ति ?

मलयकेतुः—सखे भागुरायण ! चन्द्रगुप्तस्य अपरकोपकारणान्वेषणे किं फलमेष पश्यति ?

भागुरायणः—कुमार ! एतत् फलं पश्यति—'अतिमतिमान् चाणक्यो निष्प्रयोजनमेव किमिति चन्द्रगुप्तं कोपयिष्यति ? न च कृतवेदी चन्द्रगुप्त एतावता गौरवमुल्लङ्घयिष्यति । सर्वथा चाणक्यचन्द्रगुप्तयोः पुष्कलात् कारणाद् यो विश्लेष उत्पद्येत, स आत्यन्तिको भविष्यति' इति ।

हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—यह ऐसा ही है ।

राक्षस—तब क्या हुआ ?

करभक—तब आज्ञा-भंग होने के कारण अप्रसन्न चित्त वाले चन्द्रगुप्त ने बहुत देर तक आपके गुण की प्रशंसा करके चाणक्य को अधिकार से च्युत कर दिया ।

मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! गुण की प्रशंसा के द्वारा चन्द्रगुप्त ने राक्षस के प्रति ( अपनी ) भक्ति का पक्षपात दिखलाया ।

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२५४
मुद्राराक्षसम्

भागुरायण—कुमार ! गुण की प्रशंसा के द्वारा उतना नहीं जितना कि दुष्ट चाणक्य को हटाने के द्वारा ।

राक्षस—भद्र ! क्या यही एक कौमुदीमहोत्सव का रोका जाना चन्द्रगुप्त का चाणक्य के प्रति क्रोध का कारण है या और भी है ?

मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! चन्द्रगुप्त के दूसरे क्रोध के कारण के अन्वेषण में क्या लाभ देखते हैं ?

भागुरायण—कुमार ! यह लाभ देखता हूँ—'अत्यन्त बुद्धिमान् चाणक्य बिना प्रयोजन के ही चन्द्रगुप्त को क्यों कुपित करेगा ? कृतज्ञ चन्द्रगुप्त भी इतने से ( चाणक्य की ) प्रतिष्ठा का उल्लङ्घन नहीं करेगा । सब प्रकार से परिपुष्ट कारण होने से चाणक्य और चन्द्रगुप्त में जो फूट पड़ेगा, वह आत्यन्तिक ( स्थायी ) होगा' ।

टिप्पणी—आज्ञाभङ्गकलुषितहृदयेन—कलुषं कृतम् इति कलुष + णिच् ( नामधातु ) + क्त कर्मणि = कलुषितम् । आज्ञाभङ्गेन कलुषितम् तथाविधं हृदयम् यस्य स , तेन। भक्तिपक्षपात —भक्त पक्षपातः चन्द्रगुप्तस्य भक्तिः राक्षसे पक्षपातिनी न चाणक्य इत्यर्थः । निराकरणेन—हटाने से । निर् + आ √कृ + ल्युट्—अन भाव । मतिमान्—प्रशस्ता मतिः अस्ति अस्य इति मति + मतुप् । कृतवेदी—कृतम् उपकृतम् वेत्ति इति कृत √विद् + णिनि साधुकारिणि कर्तरि = कृतवेदी = कृतज्ञः । आत्यन्तिक —प्रवृद्ध प्रतीकारायोग्य इत्यर्थः । अतिगतम् अन्तम् अत्यन्तम् । अत्यन्ते भवः इति अत्यन्त + ठञ्—इक = आत्यन्तिकः ।

करभक—अमच्च ! अत्थि अण्णदपि चन्दउत्तस्स कोवकारणं चाणक्के । ( अमात्य ! अस्त्यन्यदपि चन्द्रगुप्तस्य कोपकारणं चाणक्ये । )

राक्षस—किं किम् ?

करभक—जधा पढमं दाव उवेक्खिदो अणेण अवक्कमन्तो कुमारो मलयकेदू अमच्चरक्खसो अ । ( यथा प्रथमं तावदुपेक्षितोऽनेन अपक्रामन् कुमारो मलयकेतुः अमात्यराक्षसश्च । )

राक्षस—[ सहर्षम् ] सखे शकटदास ! हस्ततलगत्तो मे चन्द्रगुप्तो

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चतुर्थोऽङ्कः २५५

भविष्यति । इदानीं चन्दनदासस्य बन्धनान्मोक्षः, तव च पुत्रदारैः सह समागमः, जीवसिद्धिप्रभृतीनां क्लेशच्छेदः ।

भागुरायणः—[ आत्मगतम् ] जातः सत्यं जीवसिद्धेः क्लेशच्छेदः ।

**मलयकेतुः—**सखे भागुरायण ! 'हस्ततलगतो मे सम्प्रति चन्द्रगुप्तो भविष्यति' इति व्याहरतः कोऽयमस्याभिप्रायः ?

**भागुरायणः—**किमन्यत् ? चाणक्यादपकृष्टस्य चन्द्रगुप्तस्योद्धरणान्न किञ्चित्कार्यमवश्यं पश्यति ।

**राक्षसः—**भद्र ! हताधिकारः साम्प्रतं क्वासौ वटुः ?

**करभकः—**तर्हि ज्जेब पाडलिपुत्ते प्पडिवसदि । ( तस्मिन्नेव पाटलिपुत्रे प्रतिवसति ।)

राक्षसः—[ सावेगम् ] भद्र ! तत्रैव प्रतिवसति, न तपोवनं गतः, प्रतिज्ञां वा न पुनः समारूढवान् ?

**करभकः—**अमच्च ! तपोवणं गमिस्सदि त्ति सुणीअदि । ( अमात्य ! तपोवनं गमिष्यतीति श्रूयते ।)

राक्षसः—[ सावेगम् ] शकटदास ! नेदमुपपद्यते । पश्य—

**हिन्दी अनुवाद—करभक—**अमात्य ! चाणक्य के प्रति चन्द्रगुप्त के क्रोध का कारण और भी है ।

**राक्षस—**क्या क्या ?

**करभक—**जैसे, पहले तो इसने भागते हुए कुमार मलयकेतु और अमात्य राक्षस की उपेक्षा की ।

राक्षस—[ हर्ष के साथ ] मित्र शकटदास ! चन्द्रगुप्त मेरे हाथ में आ जाएगा । अब चन्दनदास को बंधन से छुटकारा मिल जाएगा । तुम्हारा पुत्र और स्त्री से मिलन होगा और जीवसिद्धि आदि के दुःखों का अन्त हो जाएगा ।

भागुरायण—[ मन में ] जीवसिद्धि के दुःखों का अन्त तो सचमुच हो गया ।

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२५६ | मुद्राराक्षसम्

मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! 'अब चन्द्रगुप्त मेरे हाथ में आ जाएगा' ऐसा कहते हुए इसका क्या तात्पर्य है ?

भागुरायण—और क्या ? चाणक्य से अलग हुए चन्द्रगुप्त के उन्मूलन से किसी प्रयोजन को ( यह ) अवश्य नहीं देखता है ।

राक्षस—भद्र ! अधिकार से वंचित वह वटुक ( चाणक्य ) इस समय कहाँ है ?

करभक—उसी पाटलिपुत्र में रह रहा है ।

राक्षस—[आवेग के साथ] भद्र ! वही रह रहा है ? तपोवन नहीं गया ? या फिर प्रतिज्ञा नहीं की ?

करभक—अमात्य ! तपोवन जाएगा, ऐसा सुना जाता है ।

राक्षस—[ आवेग के साथ ] शकटदास ! यह युक्तिसंगत नहीं है । देखो—

टिप्पणी—हस्तलगत —करतलप्राप्त । हस्तस्य तलम् षष्ठीतत्० । तत्र गतं द्वितीयातत्० । अपकृष्टस्य—दूरीभूतस्य । उद्धरणात्—समुच्छेदात् । किञ्चित् कार्यम्—कामपि स्वार्थसिद्धि । न पश्यति—न उत्प्रेक्षते । हृताधिकार —हृत दूरीकृत अधिकारः नियोग यस्य स हृताधिकार बहुव्रीहि स० ।

देवस्य येन पृथिवीतलवासवस्य
स्वाग्रासनापनयजा निकृतिर्न सोढा ।
सोऽयं स्वयङ्कृतनराधिपतेर्मनस्वी
मौर्यात्कथ नु परिभूतिमिमा सहेत ? ॥ ११ ॥

अन्वय—येन पृथिवीतलवासवस्य देवस्य स्वाग्रासनापनयजा निकृति न सोढा, स अयं मनस्वी स्वयङ्कृतनराधिपते मौर्यात् इमां परिभूतिं कथं नु सहेत ? ॥११॥

व्याख्या—येन—चाणक्येन, पृथिवीतलवासवस्य—पृथिव्या तले महीपृष्ठे वासव इन्द्र इव तस्य, देवस्य—नन्दस्य, स्वाग्रासनापनयजा—स्वस्य आत्मनः यत् अग्रासनं श्रेष्ठासन तस्मात् य अपनय निष्कासन तस्मात् जाता उत्पन्ना,

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चतुर्थोऽङ्कः २५७

निकृतिः अपमानः, न सोढा—न क्षान्ता, सः अयं—प्रसिद्धः, मनस्वी—मानी ( चाणक्यः ) स्वयङ्कृतनराधिपतेः—स्वयम् आत्मना कृतः सम्पादितः यः नराधिपतिः राजा तस्मात्, मौर्यात्—वृषलात्, इमाम्—एताम्, परिभूतिं—पराभवं, कथं नु—केन प्रकारेण, सहेत—मर्षयेत् ? ॥११॥

हिन्दी अनुवाद—जिसने भूतल पर इन्द्रतुल्य महाराज ( नन्द ) के ( द्वारा किये हुए ) अपने अग्रासन से निष्कासनजन्य अपमान का सहन नहीं किया, वह मनस्वी ( चाणक्य ) स्वयं के बनाये हुए राजा मौर्य से इस तिरस्कार को कैसे सहन करेगा ? ॥११॥

टिप्पणी—देवस्य निकृतिः—अत्र कृद्योगे कर्तरि षष्ठी। मनस्वी—प्रशस्तं मनः अस्ति अस्य इति मनस् + विनि मत्वर्थे। मौर्यात्—अत्र अपादाने पञ्चमी। इस श्लोक में अर्थापत्ति अलंकार अतिशयोक्ति अलंकार से संसृष्ट है। इसमें वसन्ततिलका छन्द है। इस छन्द का लक्षण १, ८ में देखिए ॥११॥

मलयकेतुः—सखे भागुरायण ! चाणक्यस्य तपोवनगमने पुनः प्रतिज्ञारोहणे वा काऽस्य स्वार्थसिद्धिः ?

भागुरायणः—कुमार ! नात्यन्तदुर्बोधोऽयमर्थः यावद्यावत् चाणक्यहतकश्चन्द्रगुप्ताद् दूरीभवति तावत्तावदस्य स्वार्थसिद्धिः ।

शकटदासः—अमात्य ! अलमत्यन्तविकल्पितेन, एतदुपपद्यत एव । कुतः ? पश्यत्वमात्यः—

राज्ञां चूडामणीन्दुद्युतिखचितशिखे मूर्ध्नि विन्यस्तपादः
स्वैरेवोत्पाद्यमानं किमिति विषहते मौर्य आज्ञाविघातम् ? ।
कौटिल्यः कोपनोऽपि स्वयमभिचरणज्ञातदुःखः प्रतिज्ञां
दैवात् पूर्णप्रतिज्ञः पुनरपि न करोत्यायतिज्यानिभीतः ॥१२॥

अन्वयः—चूडामणीन्दुद्युतिखचितशिखे राज्ञां मूर्ध्नि विन्यस्तपादः मौर्यः स्वैरेव उत्पाद्यमानम् आज्ञाविघात किमिति विषहते ? स्वयमभिचरणज्ञातदुःखः दैवात् पूर्णप्रतिज्ञः कौटिल्यः कोपनोऽपि आयतिज्यानिभीतः ( सन् ) पुनरपि प्रतिज्ञां न करोति ॥१२॥

व्याख्या—चूडामणीन्दुद्युतिखचितशिखे—चूडामणिः शिरोरत्नं तत् इन्दुः

मु० रा०—१७

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३५८ | मुद्राराक्षसम्

चन्द्रः इव तस्य द्युतिभिः कान्तिभिः खचिता संश्लिष्टा शिखा केशगुच्छ यस्मिन् तथाविधे, राज्ञा—नृपाणां, मूर्ध्नि—मस्तके, विन्यस्तपाद—विन्यस्तो स्थापितो पादौ चरणौ येन तादृशः, मौर्य्य—वृषल, स्वैरेव—आत्मीयैरेव जनैरिति शेषः, उत्पाद्यमानम्—क्रियमाणम्, आज्ञाविघात—आदेशभङ्गं, किमिति—कथं, विषहते—मर्षयति ? स्वयमभिचरणज्ञातदुःख—स्वयम् आत्मना यत् अभिचरणम् अभिचार तस्मिन् ज्ञातम् अवगतम् दुःखं कष्टं येन तथाविध, दैवात्—भाग्यात्, पूर्णप्रतिज्ञ—पूर्णा सफला प्रतिज्ञा प्रतिश्रुतिः यस्य तथाविध, कौटिल्य—चाणक्य, कोपनोऽपि—क्रुद्धोऽपि, आयतिज्यानिभीत—आयतो उत्तरे काले या ज्यानि हानि निष्फलतेत्यर्थः तस्या भीत शङ्कितः (सन् ), पुनरपि—भूयोऽपि, प्रतिज्ञा—प्रतिश्रुति, न करोति—न विदधाति ॥१२॥

हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—मित्र भागुरायण ! चाणक्य के तपोवन में जाने या पुनः प्रतिज्ञा करने से इस (राक्षस) की क्या स्वार्थसिद्धि है ?

भागुरायण—कुमार ! यह तात्पर्य बहुत कठिन नहीं है। जैसे-जैसे दुष्ट चाणक्य चन्द्रगुप्त से दूर होता जाता है वैसे-वैसे इसकी स्वार्थसिद्धि होती है ।

शकटदास—अमात्य ! बहुत संदेह करना व्यर्थ है। यह ठीक ही है। क्योकि अमात्य देखें —

चन्द्रमा के समान चूडामणि की कान्तियों से खचित केशगुच्छ वाले राजाओं के मस्तकों पर चरणों को रखने वाला चन्द्रगुप्त अपने ही जनों से किये जाने वाले आज्ञा-भंग को कैसे सह सकता है ? अभिचार कर्म मे होने वाले दुःख को स्वयं समझने वाला तथा भाग्य से पूर्ण प्रतिज्ञा वाला चाणक्य क्रुद्ध होने पर भी भविष्यत्काल में होने वाली असफलता से सशंकित होने के कारण पुनः प्रतिज्ञा नहीं कर रहा है ॥१२॥

टिप्पणी—यावत् यावत्—वीप्सायां द्विरुक्तिः। विषहते—अत्र वर्तमानसामीप्ये लट् अतीते। 'परिनिविभ्यः'—इति षत्वम्। अभिचरण—अभिचार। तन्त्रोक्त मारण, मोहन, उच्चाटन आदि अनुष्ठान। 'हिंसाकर्माभिचारः स्यात्' इत्यमरः। दैवात्—अत्र हेतौ पञ्चमी। आयतिज्यानिभीत—आ + √ यम् + क्तिन् अधिकरणे = आयतिः = उत्तरकालः। √ ज्या + नि भावे औणादिकः = ज्यानिः। आयतौ ज्यानिः सुप्सुपा स०। तस्याः भीतः पञ्चमीतत्०। इस श्लोक

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चतुर्थोऽङ्कः (२५६)

में उत्प्रेक्षा अलंकार है। और स्रग्धरा छन्द है। स्रग्धरा का लक्षण १, १ में देखिए ।।१२।।

राक्षसः—शकटदास ! एवमेतत् । तद् गच्छ, विश्रामय करभकम् ।

शकटदासः—यदाज्ञापयत्यमात्य, इति । [करभकेण सह निष्क्रान्तः ।]

राक्षसः—अहमपि कुमारं द्रष्टुमिच्छामि ।

मलयकेतुः—अहमेवार्यं द्रष्टुमागतः ।

राक्षसः—[नाट्येनावलोक्य] अये ! कुमार एवागतः । [आसनादुत्थाय] इदमासनमुपवेष्टुमर्हति कुमारः ।

मलयकेतुः—अहमुपविशामि । उपविशत्वार्यः [इत्युभौ यथासनमुपविष्टौ] आर्य ! अपि सह्या शिरोवेदना ?

राक्षसः—कुमारस्याधिराजशब्देनातिरस्कृते कुमारशब्दे कुतः शिरोवेदनायाः सह्यता ?

मलयकेतुः—स्वयमुरीकृतमेतदार्येण, न दुष्प्रापं भविष्यति । तत् कियन्तं कालमस्माभिरेवं सम्भृतबलैरपि शत्रुव्यसनमवेक्षमाणैरुदासितव्यम् ।

राक्षसः—कुमार ! कुतोऽद्यापि कालहरणस्यावकाशः ? प्रतिष्ठस्व रिपुजयाय ।

मलयकेतुः—अमात्य ! अपि किञ्चिच्छत्रुव्यसनमुपलब्धम् ।

राक्षसः—बाढमुपलब्धम् ।

मलयकेतुः—कीदृशम् ?

राक्षसः—सचिवव्यसनं, किमन्यत् ? अपकृष्टश्चाणक्याच्चन्द्रगुप्तः ।

मलयकेतुः—अमात्य ! सचिवव्यसनमेव ?

राक्षसः—कुमार ! अन्येषां भूपतीनां कदाचिदमात्यव्यसनमव्यसनमपि स्यात्, न पुनश्चन्द्रगुप्तस्य ।

हिन्दी अनुवाद—राक्षस—शकटदास ! यह ऐसा ही है। इसलिए जाओ, करभक को विश्राम कराओ।

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२६० मुद्राराक्षसम्

शकटदास—अमात्य की जो आज्ञा । [ करभक के साथ बाहर चला जाता है । ]

राक्षस—मैं भी कुमार को देखना चाहता हूँ ।

मलयकेतु—मैं ही आर्य को देखने के लिए आ गया हूँ ।

राक्षस—[ अभिनय के साथ देखकर ] अरे ! कुमार ही आ गए । [ आसन से उठकर ] कुमार इस आसन पर बैठने के योग्य हैं ।

मलयकेतु—मैं बैठता हूँ । आर्य बैठें । [ यथायोग्य आसन पर दोनों बैठ जाते हैं । ] आर्य ! तो क्या सिर की वेदना सहन करने योग्य हुई ?

राक्षस—कुमार के महाराज शब्द से कुमार शब्द के तिरस्कृत न होने पर ( अर्थात् जब तक आप कुमार शब्द को हटाकर महाराज शब्द की पदवी नहीं धारण कर लेते तब तक ) सिर की वेदना सहन करने योग्य कहाँ से हो सकती है ?

मलयकेतु—आर्य ने यह स्वयं स्वीकार किया है, दुर्लभ नहीं होगा । इस-लिए किस समय तक सेना इकट्ठी करके भी हमलोग इस प्रकार शत्रु के विपत्ति-काल की प्रतीक्षा करते हुए उदासीन रहेंगे ?

राक्षस—कुमार ! अब काल-क्षेप को अवकाश कहाँ ? शत्रु-विजय के लिए प्रस्थान करो ।

मलयकेतु—अमात्य ! क्या शत्रु का संकट कुछ मालूम हुआ है ?

राक्षस—हाँ, मालूम हुआ है ।

मलयकेतु—कैसा ?

राक्षस—मन्त्री का संकट, और क्या ? चाणक्य से चन्द्रगुप्त अलग कर दिया गया ।

मलयकेतु—मन्त्री का संकट ही ?

राक्षस—कुमार ! दूसरे राजाओ के लिए कदाचित् मन्त्री का संकट संकट न भी हो, किन्तु चन्द्रगुप्त के लिए ( ऐसी बात ) नहीं है ।

टिप्पणी—सह्या—सोढुम् शक्या इति √सह् + यत् कर्मणि स्त्रियाम् ।

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चतुर्थोऽङ्कः १२१

कुमारस्य ..... अधिराजशब्देन—अधिराज इत्याख्यया, कुमारशब्दे —कुमार इत्याख्यायाम्, अतिरस्कृते अन्तर्द्धानमसते यावत् कुमारसंज्ञां निरस्य अधिराजसंज्ञां नारोपयसि तावत् इत्यर्थः । अधिको राजा अधिराजः प्रादिसमासः, 'राजाऽहः सखिभ्यष्टच्' इत्यनेन टच्प्रत्ययः । सम्भृतबलैः —एकत्रितसैन्यैः । शत्रुव्यसनम्—शत्रोः व्यसनम् विपद् । उदासितव्यम्—तूष्णीं वर्तितव्यम् ।

मलयकेतुः—आर्य ! ननु विशेषतश्चन्द्रगुप्तप्रकृतीते ।

राक्षसः—किं कारणं यदस्यामात्यापराधप्रभवं व्यसनम् ?

मलयकेतुः—चन्द्रगुप्तप्रकृतीनां हि चाणक्यदोषा एव विरागहेतवः। तस्मिन्निराकृते प्रथममपि चन्द्रगुप्तानुरक्ताः प्रकृतयः इदानीं पुनः सुतरामेव तत्रानुरागं दर्शयिष्यन्ति ।

राक्षसः—कुमार ! नैतदेवं, इह द्विविधाः प्रकृतयः — चन्द्रगुप्तसहोत्थायिन्यो नन्दकुलानुरक्ताश्च । तत्र चन्द्रगुप्तसहोत्थायिनीनां प्रकृतीनां चाणक्यदोषा एव विरागहेतवः, न नन्दकुलानुरक्तानाम् । तास्तु खलु नन्दकुलमनेन पितृकुलभूतं कृत्स्नं कृतघ्नेन घातितमित्यपराधप्राधान्येन विप्रकृताः सत्यः स्वाश्रयमलभमानाश्चन्द्रगुप्तमेवानुवर्त्तन्ते । तास्त्वं पुनः प्रतिपक्षोद्धरणे सम्भावितशक्तिमभियोगात्प्रख्यातमपदानं परित्यज्य त्वामेवाश्रयिष्यन्ते इति । अत्र कुमारस्य भयमेव निदर्शनम् ।

व्याख्या—चन्द्रगुप्तप्रकृतीनां—मौर्यप्रजानां, चाणक्यदोषा एव-कौटिल्यहत्यादय एव, विरागहेतवः—अपरागकारणानि भवन्ति शेषः । तस्मिन्-कौटिल्ये, निराकृते—दूरीकृते सति, प्रथममपि—पूर्वमपि, चन्द्रगुप्तानुरक्ताः—शत्रुगुणे मौर्ये अनुरक्ताः अनुरागिण्यः, प्रकृतयः—प्रजाः, इदानीम्—अधुना, पुनः-भूयः, सुतरामेव-सर्वथैव, तत्र-चन्द्रगुप्ते, अनुरागं—स्नेहं, दर्शयिष्यन्ति-

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१६२ मुद्राराक्षसम्

मन्दकुल—नन्दवंश, घातितम्—नाशितम्, इति हेतो, अपरागामर्षाम्यां—विरागक्रोधाभ्यां, विप्रकृता —विरक्तीकृता, मय, स्वाश्रयम्—स्वाधारम्, अलभमाना —अप्राप्नुवाना, चन्द्रगुप्तमेव—मौर्यमेव, अनुवर्तन्ते—अनुसरन्ति, पुन —पक्षान्तरे, प्रतिपक्षोद्धरणे—प्रतिपक्षाणा शत्रूणा उद्धरणे उन्मूलन, सम्भावितशक्तिम्—निश्चितसामर्थ्यम्, त्वादृश—भवत्सद्दश, अभियातारम्—शत्रुपराभवकारिणम्, आसाद्य—प्राप्य, क्षिप्रम्—शीघ्रम्, एनम्—चन्द्रगुप्तम्, परित्यज्य—विहाय, त्वामेव—भवन्तमेव, आश्रयिष्यन्ते—अवलम्बिष्यन्ते । अत्र—अस्मिन् विषये, कुमारस्य—भवत, वयमेव, निदर्शनम्—दृष्टान्त ।

हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—आर्य ! विशेष रूप से चन्द्रगुप्त के लिए (ही ऐसी बात है) ।

राक्षस—क्या कारण है कि इसके लिए मन्त्री का सकट सङ्कट नहीं है ।

मलयकेतु—चाणक्य के दोष ही चन्द्रगुप्त की प्रजाओ की विरक्ति के कारण हैं। उसके अलग हो जाने पर पहले भी चन्द्रगुप्त में अनुरक्त प्रजाएँ इस समय फिर सब तरह से उसमे अनुराग प्रकट करेंगी ।

राक्षस—कुमार ! यह ऐसा नहीं है । यहाँ दो प्रकार की प्रजाएँ हैं—चन्द्रगुप्त के साथ उठने-बैठने वाली और नन्दवंश में अनुरक्त । उनमें से चन्द्रगुप्त के साथ उठने-बैठने वाली प्रजाओ की ही विरक्ति के कारण चाणक्य के दोष हैं न कि नन्दवंश में अनुरक्त प्रजाओ की । वे तो इस कृतघ्न ने पितृवंश के समान सम्पूर्ण नन्दवंश को नष्ट कर दिया—इस कारण वितृष्णा तथा क्रोध से विक्षुब्ध होती हुई उपयुक्त अवलम्ब को न पाकर चन्द्रगुप्त का ही अनुसरण कर रही हैं । फिर शत्रुओं के उन्मूलन मे अनुमेय शक्ति वाले आप जैसे आक्रमणकारी को प्राप्त करके शीघ्र ही इस (चन्द्रगुप्त) को त्यागकर आपका ही आश्रय ग्रहण करेंगी । इस विषय मे कुमार के लिए हम ही उदाहरण हैं ।

टिप्पणी—पितृकुलभूतम्—पितु कुलम् । तेन भूत गभम् मुप्मुपा स० । 'युक्ते क्ष्मादादृते भूत प्राण्यतीते समे त्रिपु' इत्यमर । घातितम्—√हन् + णिच् + क्त कर्मणि । अपरागामर्षाम्याम्—अप् √रञ्ज् + घञ् भावे = अपराग । √मृष् + घञ् भावे = मर्ष । न मर्ष अमर्ष । अपरागाश्च अमर्षश्च द्वन्द्व स०, ताभ्याम् । विप्रकृता = उपद्रवयुक्त । वि-प्र √कृ + क्त कर्मणि ।

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चतुर्थोऽङ्कः २६३

स्वाश्रयम्—आ√श्रि+अच् कर्मणि = आश्रयः। सुशोभनः आश्रयः स्वाश्रयः, तम्। वयमेव—अत्र 'अस्मदो द्वयोश्च' इत्यनेन एकत्वे बहुवचनम्। निदर्शनम्—निदर्श्यते अनेन इति नि√दृश्+णिच्+ल्युट् करणे = निदर्शनम् = दृष्टान्तः।

मलयकेतुः—अमात्य ! किमेतदेवैकं सचिवव्यसनमभियोगकारणं चन्द्रगुप्तस्य ? आहोस्विदन्यदप्यस्ति ?

राक्षसः—कुमार ! किमन्यैः बहुभिरपि ? एतद्धि तत्र प्रधानतमम्।

मलयकेतुः—अमात्य ! कथं प्रधानतमं नाम ? किमिदानीं चन्द्रगुप्तः स्वराज्यकार्यधुरामन्यत्र मन्त्रिणि आत्मनि वा समासज्य स्वयं प्रतिविधातुमसमर्थः स्यात् ?

राक्षसः—बाढम्, असमर्थ एव।

मलयकेतुः—किं कारणम् ?

राक्षसः—स्वायत्तसिद्धिषु उभयायत्तसिद्धिषु वा भूमिपालेषु कदाचिदेतत् सम्भवति, न तु चन्द्रगुप्ते। चन्द्रगुप्तस्तु दुरात्मा नित्यं सचिवायत्तसिद्धावेवावस्थितश्चक्षुर्विकल इवाप्रत्यक्षसर्वलोकव्यवहारः कथमिव स्वयं प्रतिविधातुं समर्थः स्यात् ? कुतः—

अत्युच्छ्रिते मन्त्रिणि पार्थिवे च
विष्टभ्य पादावुपतिष्ठते श्रीः।
सा स्त्रीस्वभावादसहा भरस्य
तयोर्द्वयोरेकतरं जहाति ॥ १३ ॥

अन्वयः—श्रीः अत्युच्छ्रिते मन्त्रिणि पार्थिवे च पादौ विष्टभ्य उपतिष्ठते। स्त्रीस्वभावात् भरस्य असहा सा तयोः द्वयोः एकतरं जहाति ॥ १३ ॥

व्याख्या—श्रीः—राजलक्ष्मीः अत्युच्छ्रिते—अत्युन्नते, मन्त्रिणि—अमात्ये, पार्थिवे च—नृपे च, पादौ—चरणौ, विष्टभ्य—व्यवस्थाप्य, उपतिष्ठते—सङ्गता भवतीत्यर्थः। स्त्रीस्वभावात्—नारीजनसुलभत्वात्, भरस्य—स्वदेहभरस्य,

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२६४मुद्राराक्षसम्

असह्या—अक्षमा ( सती ), सा—राजलक्ष्मी, तयो द्वयो —मन्त्रिपाथिवयोः, एकतरम्—अन्यतरम्, जहाति—त्यजति ॥ १३ ॥

**हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—**अमात्य ! क्या यही एक मन्त्री का रुष्ट चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने का कारण है अथवा दूसरा भी है ?

**राक्षस—**कुमार ! दूसरे बहुत से कारणों से क्या ( लाभ ) ? उनमें यह सब से प्रधान ( कारण ) है ।

**मलयकेतु—**अमात्य ! सब से प्रधान कैसे हैं। क्या इस समय चन्द्रगुप्त अपने राजकाज का भार दूसरे मन्त्री पर या अपने पर डालकर स्वयं प्रतीकार करने में असमर्थ होगा ?

**राक्षस—**हाँ, असमर्थ ही।

**मलयकेतु—**क्या कारण है ?

**राक्षस—**अपने अधीन सिद्धि ( राज्य-कार्य सम्पादन ) वाले और दोनों ( अपने तथा मन्त्री ) के अधीन सिद्धि वाले राजाओं में कदाचित् वह सम्भव है, ( किन्तु ) चन्द्रगुप्त में नहीं है। मन्दबुद्धि चन्द्रगुप्त नित्य मन्त्री के अधीन सिद्धि में ही अवस्थित तथा अंधे के समान सम्पूर्ण लोकव्यवहार से अनभिज्ञ होता हुआ कैसे स्वयं प्रतीकार करने में समर्थ होगा ? क्योंकि—

लक्ष्मी अत्यन्त उन्नत मन्त्री और राजा पर ( अपने ) दोनों पैरों को स्थापित करके ( उन दोनों के समीप ) रहती है। किन्तु स्त्री-स्वभाव के कारण भार को न सहने वाली वह उन दोनों में से ( किसी ) एक को छोड़ देती है ( अर्थात् जैसे कोई नर्तकी समान ऊँचाई वाले दो बाँसों पर अपने पैरों को स्थिर करके नृत्य करती रहती है किन्तु उन दोनों में विषमता आ जाने पर वह सन्तुलन खोकर नीचे गिर पड़ती है उसी तरह लक्ष्मी भी समान शक्ति वाले मन्त्री और राजा का आश्रय लेकर स्थिर रहती है किन्तु उन दोनों के अन्दर भिन्नता आ जाने पर वह टिक नहीं पाती है ।) ॥ १३ ॥

**टिप्पणी—स्वकार्यधुराम्—**स्वस्य कार्यम्। तस्य धू 'ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे' इति सूत्रेण समासान्तअप्रत्ययः । **स्वायत्तसिद्धिषु—**स्वेषु आत्मसु आयत्ता अधीना सिद्धिर्येषा ते तथोक्ता, तेषु। **दुरात्मा—**मन्दबुद्धिः । दुष्टः

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चतुर्थोऽङ्कः २६५

मन्दः आत्मा बुद्धिः यस्य सः । चक्षुर्विकलः—विगता कला अस्य इति विकलः। चक्षुभ्यां विकलः। अप्रत्यक्षसर्वलोकव्यवहारः—अप्रत्यक्षः अगोचरः सर्वलोकानां व्यवहारो यस्य सः । अत्युच्छ्रिते—अत्यंत उच्च। यह 'मन्त्रिणि' और 'पार्थिवे' दोनों का विशेषण है। अति-उद् √श्रि + क्त कर्तरि। विष्टभ्य—रखकर। वि √स्तम्भ् + क्त्वा—ल्यप्, 'स्तम्भेः' इति षत्वम्। जहाति—√हा (त्यागे) + लट्—ति। इस श्लोक में समासोक्ति अलंकार है, प्रसाद गुण है, वैदर्भी रीति है और उपजाति छन्द है। इसका लक्षण २, २ में देखिए ॥१३॥

अपि च—

नृपोऽपकृष्टः सचिवात्तदर्पणः
स्तनन्धयोऽत्यन्तशिशुः स्तनादिव ।
अदृष्टलोकव्यवहारमन्दधी-
र्मुहूर्तमप्युत्सहते न वर्तितुम् ॥१४॥

अन्वयः—सचिवात् अपकृष्टः तदर्पणः अदृष्टलोकव्यवहारमन्दधीः नृपः स्तनात् ( अपकृष्टः ) अत्यन्तशिशुः स्तनन्धय इव मुहूर्तमपि वर्तितु न उत्सहते ॥ १४ ॥

व्याख्या—सचिवात्—अमात्यात्, अपकृष्टः—पृथग्भूतः, तदर्पणः—तस्मिन् सचिवे एव अर्पणं राज्यभारसमर्पणं यस्य स तथाभूतः, अदृष्टलोकव्यवहारमन्दधीः—अदृष्टः अविदितः लोकस्य संसारस्य व्यवहारः आचारः यस्य तादृशः तेन च हेतुना मन्दधीः मूढमतिः, नृपः—राजा, स्तनात्—मातृस्तनात्, (अपकृष्टः) अत्यन्तशिशुः—अतिबालः, स्तनन्धय इव—स्तनपायी इव, मुहूर्तमपि—क्षणमपि, वर्तितुं—स्थातुं, न उत्सहते—न क्षमते ॥ १४ ॥

हिन्दी अनुवाद—और भी—मंत्री से अलग हुआ, उस (मंत्री) को ही (राज्य-भार) सौंपने वाला और लोकव्यवहार से अनभिज्ञ होने के कारण मंद बुद्धि वाला राजा स्तन से अलग हुए निरे दुधमुंहे बच्चे के समान एक क्षण भी रहने के लिए उत्साहित नही होता है ॥ १४ ॥

टिप्पणी—तदर्पणः—√ऋ + णिच् + ल्युट्—अन भावे = अर्पणम् । तस्मिन्नेव अर्पणं यस्य सः। ऐसा राजा जिसने मंत्री को ही राज्य का भार