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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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२६० मुद्राराक्षसम्

शकटदास—अमात्य की जो आज्ञा । [ करभक के साथ बाहर चला जाता है । ]

राक्षस—मैं भी कुमार को देखना चाहता हूँ ।

मलयकेतु—मैं ही आर्य को देखने के लिए आ गया हूँ ।

राक्षस—[ अभिनय के साथ देखकर ] अरे ! कुमार ही आ गए । [ आसन से उठकर ] कुमार इस आसन पर बैठने के योग्य हैं ।

मलयकेतु—मैं बैठता हूँ । आर्य बैठें । [ यथायोग्य आसन पर दोनों बैठ जाते हैं । ] आर्य ! तो क्या सिर की वेदना सहन करने योग्य हुई ?

राक्षस—कुमार के महाराज शब्द से कुमार शब्द के तिरस्कृत न होने पर ( अर्थात् जब तक आप कुमार शब्द को हटाकर महाराज शब्द की पदवी नहीं धारण कर लेते तब तक ) सिर की वेदना सहन करने योग्य कहाँ से हो सकती है ?

मलयकेतु—आर्य ने यह स्वयं स्वीकार किया है, दुर्लभ नहीं होगा । इस-लिए किस समय तक सेना इकट्ठी करके भी हमलोग इस प्रकार शत्रु के विपत्ति-काल की प्रतीक्षा करते हुए उदासीन रहेंगे ?

राक्षस—कुमार ! अब काल-क्षेप को अवकाश कहाँ ? शत्रु-विजय के लिए प्रस्थान करो ।

मलयकेतु—अमात्य ! क्या शत्रु का संकट कुछ मालूम हुआ है ?

राक्षस—हाँ, मालूम हुआ है ।

मलयकेतु—कैसा ?

राक्षस—मन्त्री का संकट, और क्या ? चाणक्य से चन्द्रगुप्त अलग कर दिया गया ।

मलयकेतु—मन्त्री का संकट ही ?

राक्षस—कुमार ! दूसरे राजाओ के लिए कदाचित् मन्त्री का संकट संकट न भी हो, किन्तु चन्द्रगुप्त के लिए ( ऐसी बात ) नहीं है ।

टिप्पणी—सह्या—सोढुम् शक्या इति √सह् + यत् कर्मणि स्त्रियाम् ।