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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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Page 333

२४८ मुद्राराक्षसम्

काश्+णिनि कर्तरि ताच्छील्ये = अतिजितकाशी, तम् । साचिव्यात्—मन्त्रिपादात् । अवरोपयेत्—च्यावयेत् । अव√रुह्+णिच्, ह्म्य प+लिङ्—यात् । नन्दकुलभक्त्या राक्षस नन्दवंश के भक्त हैं और चन्द्रगुप्त नन्द का पुत्र है, इसलिए सम्भव है कि राक्षस चन्द्रगुप्त के प्रति आकृष्ट हो जायें। सुहृज्जनापेक्षया—अत्र हेतौ तृतीया । राक्षस के मित्र चन्दनदास सपरिवार कारागार में हैं और भी उनके कतिपय मित्र संकट में हैं। इसलिए चन्द्रगुप्त से उनका सन्धि कर लेना कोई आश्चर्य की बात नहीं है । सन्दधीत—सन्धिं कुर्यात् । यदि अपसारयेत् तदा सन्दधीत इति विवक्षाया हेतुहेतुमद्भावात् लिङ् । सन्धिम्—सम्√धा+कि भावे = सन्धि, तम् । विश्वसेत्—वि√श्वस्+लिङ्—यात् । अत्र सम्भावनाया लिङ् । श्वस् धातु अदादिगणीय है । इसलिए, यहाँ 'विश्वस्यात्' रूप होना चाहिए, किन्तु 'गणकार्यमनित्यम्' इस नियम के बल से, यहाँ अदादिगणीय कार्य न होकर भ्वादिगणीय कार्य हुआ। युज्यते—√युज् (दिवादि)+लट्—ते कर्तरि । शृणुमस्तावत्—भागुरायण ने मलयकेतु के मन में राक्षस के प्रति सन्देह का अंकुर उत्पन्न कर दिया है, इसलिए वह छिपकर राक्षस की बातचीत सुनना चाहता है । स्वैरालापेषु—आ√लप्+घञ् भावे=आलापा । स्वैरा आलापा कर्मधारय स०, तेषु । इस श्लोक में काव्यलिंग अलकार है और अनुष्टुप् छन्द है। इसका लक्षण १, ३ में देखिए ॥ ८ ॥

भागुरायण—यदाज्ञापयति कुमार ।

राक्षस—भद्र ! अपि तत् कार्यं सिद्धम् ?

करभक—अमच्चस्स प्पसाएण सिद्धम् । (अमात्यस्य प्रसादेन सिद्धम् ।)

मलयकेतु—सखे भागुरायण ! किं तत् कार्यम् ?

भागुरायण—कुमार ! गहन खलु सचिववृत्तान्तो नैतावता परिच्छेत्तु शक्यते । अवहितस्तावच्छृणु ।

राक्षस—विस्तरेण श्रोतुमिच्छामि ।

करभक—सुणादु अमच्चो, अत्थि दाव अह अमच्चेणाणत्तो, जहा—