मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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मुद्राराक्षसम्
में जाकर, तुम मेरी ओर से वैतालिक स्तनकलस से कहना कि 'दुष्ट चाणक्य के द्वारा उन-उन आज्ञा-भंगों के किये जाने पर (तुम्हें) उत्तेजित करने में समर्थ श्लोकों से चन्द्रगुप्त की स्तुति करनी चाहिए'।
राक्षस— तत तत ?
करभक— तब मैंने पाटलिपुत्र में जाकर अमात्य का संदेश वैतालिक स्तनकलस को सुना दिया।
राक्षस— तत तत ?
करभक— इस बीच नन्दवंश के विनाश से खिन्न पुरवासियों को सन्तुष्ट करते हुए चन्द्रगुप्त ने कुसुमपुर में कौमुदीमहोत्सव (मनाये जाने) की घोषणा करवा दी। चिरकाल से चले आते हुए और आनन्द उत्पन्न करने वाले उस (कौमुदीमहोत्सव) का भी नागरिकों ने अभीष्ट वधु के आगमन के समान स्नेह-पूर्वक अभिनन्दन किया।
**टिप्पणी—अस्ति तावत्—**यहाँ 'अस्ति' एक अव्यय है। श्रावित —स्तनकलसं अमात्यसन्देशं श्रुतवान् = अह स्तनकलसम् अमात्यसन्देशं श्रावितवान्—मया स्तनकलस अमात्यसन्देश श्रावित । 'गतिबुद्धि—' सूत्रेणायं कर्मसंज्ञा—द्वितीया । नन्दकुलविनाशदुर्मनसः नन्दानां कुलानि नन्दकुलानि तेषां विनाश नन्दकुलविनाशः । तेन दु दुष्टं खिन्नमित्यर्थः मनो यस्य स नन्दकुलविनाशदुर्मनाः, तस्य । **चिरकालप्रवर्तमान —**प्र√वृत्+शानच् बन्तरि = प्रवर्तमान । चिरं काल । चिरकाल प्रवर्तमान द्वितीयातत्० । अत्र अत्यन्तसंयोगे द्वितीया, 'अत्यन्तसंयोगे च' इत्यनेन समासः ।
राक्षस —[ सराष्पम् ] हा देव नन्द !—
कौमुदी कुमुदानन्दे जगदानन्दहेतुना
कीदृशी सति चन्द्रेऽपि नृपचन्द्र त्वया विना ॥ ९ ॥
**अन्वय —**नृपचन्द्र ! कुमुदानन्दे चन्द्रे सति अपि जगदानन्दहेतुना त्वया विना कौमुदी कीदृशी ? ॥ ९ ॥
**व्याख्या—**नृपचन्द्र !—हे चन्द्रतुल्यभूपाल !, कुमुदानन्दे—कुमुदानां कैरवाणाम् आनन्दे हर्षवर्धके, चन्द्रे—चन्द्रमसि, सति अपि—विद्यमानेऽपि,