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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

Page 347 of 488

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२६४मुद्राराक्षसम्

असह्या—अक्षमा ( सती ), सा—राजलक्ष्मी, तयो द्वयो —मन्त्रिपाथिवयोः, एकतरम्—अन्यतरम्, जहाति—त्यजति ॥ १३ ॥

**हिन्दी अनुवाद—मलयकेतु—**अमात्य ! क्या यही एक मन्त्री का रुष्ट चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने का कारण है अथवा दूसरा भी है ?

**राक्षस—**कुमार ! दूसरे बहुत से कारणों से क्या ( लाभ ) ? उनमें यह सब से प्रधान ( कारण ) है ।

**मलयकेतु—**अमात्य ! सब से प्रधान कैसे हैं। क्या इस समय चन्द्रगुप्त अपने राजकाज का भार दूसरे मन्त्री पर या अपने पर डालकर स्वयं प्रतीकार करने में असमर्थ होगा ?

**राक्षस—**हाँ, असमर्थ ही।

**मलयकेतु—**क्या कारण है ?

**राक्षस—**अपने अधीन सिद्धि ( राज्य-कार्य सम्पादन ) वाले और दोनों ( अपने तथा मन्त्री ) के अधीन सिद्धि वाले राजाओं में कदाचित् वह सम्भव है, ( किन्तु ) चन्द्रगुप्त में नहीं है। मन्दबुद्धि चन्द्रगुप्त नित्य मन्त्री के अधीन सिद्धि में ही अवस्थित तथा अंधे के समान सम्पूर्ण लोकव्यवहार से अनभिज्ञ होता हुआ कैसे स्वयं प्रतीकार करने में समर्थ होगा ? क्योंकि—

लक्ष्मी अत्यन्त उन्नत मन्त्री और राजा पर ( अपने ) दोनों पैरों को स्थापित करके ( उन दोनों के समीप ) रहती है। किन्तु स्त्री-स्वभाव के कारण भार को न सहने वाली वह उन दोनों में से ( किसी ) एक को छोड़ देती है ( अर्थात् जैसे कोई नर्तकी समान ऊँचाई वाले दो बाँसों पर अपने पैरों को स्थिर करके नृत्य करती रहती है किन्तु उन दोनों में विषमता आ जाने पर वह सन्तुलन खोकर नीचे गिर पड़ती है उसी तरह लक्ष्मी भी समान शक्ति वाले मन्त्री और राजा का आश्रय लेकर स्थिर रहती है किन्तु उन दोनों के अन्दर भिन्नता आ जाने पर वह टिक नहीं पाती है ।) ॥ १३ ॥

**टिप्पणी—स्वकार्यधुराम्—**स्वस्य कार्यम्। तस्य धू 'ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे' इति सूत्रेण समासान्तअप्रत्ययः । **स्वायत्तसिद्धिषु—**स्वेषु आत्मसु आयत्ता अधीना सिद्धिर्येषा ते तथोक्ता, तेषु। **दुरात्मा—**मन्दबुद्धिः । दुष्टः