मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
भूमिका १३
'मत्तविलास' में दार्शनिक सम्बन्ध
महेन्द्रविक्रमवर्मा ने 'मत्तविलास' में तत्कालीन धार्मिक परिस्थितियों का
सजीव चित्रण किया है। गुप्तकालीन धार्मिक सहिष्णुता के स्थान पर
धार्मिक ईर्ष्या द्वेष जन्म ले रहा था। शैव धर्म के सम्प्रदायों में कापालिक
तथा पाशुपत जैसे सम्प्रदाय हो गए थे। बौद्ध धर्म प्रमुख रूप से ह्रासोन्मुख
हो चुका था। सभी वेदान्तियों और नैयायिकों ने दृढ़ रूप से बौद्धों के मत का
खण्डन किया। बौद्ध धर्म व जैन धर्म में जो कुरीतियाँ थीं उनको हास्य के
माध्यम से कवि ने इस प्रहसन में प्रस्तुत किया है। इस प्रहसन में शाक्य-
भिक्षु नागसेन है। इस पात्र का नाम नागसेन सम्भवतः व्यंग्य को प्रदर्शित
करने के लिए ही रखा गया है। नागसेन 'मिलिन्दपञ्हो' (राजा मिलिन्द
के प्रश्न) का एक बहुत बड़ा बुद्धिमान् दार्शनिक है। प्रस्तुत प्रहसन में
नागसेन के चरित्र को भ्रष्ट रूप में दिखाते हुए कवि ने 'मिलिन्दपञ्हो' के
नागसेन का अनादर कर दिया है।
बौद्ध धर्म में अनेक कुरीतियां आ गईं थीं। बौद्ध मठ और राज-
विहार भोग-विलास के स्थल बन गए थे। बुद्ध ने संघ के लिए महलों में
रहना, सुन्दर गद्दे वाले पलँगों पर सोना, दिन के पहले पहर खाना, दूसरे
पहर मधुर पेय पीना, पाँच सुगन्धों से युक्त पान खाना, महीन वस्त्र पहनना
आदि१६—इन सब की अनुमति दी थी। अतः नागसेन कहता है कि जब बुद्ध
ने इन सबका अनुमोदन किया तो स्त्री-सहवास और मद्यपान की अनुमति
ही क्यों नहीं दी ? उसके विचार से बुद्ध ने अवश्य ही इन दोनों का भी
विधान किया होगा, लेकिन वृद्ध लोगों ने इन युवकों के प्रति ईर्ष्या के कारण
कहीं छिपा दिया होगा। कापालिक के साथ कलह में जब देवसोमा नागसेन
को मदिरा देती है तो वह उसे परम सौभाग्य मानता है; परन्तु उसे बड़े लोगों
के द्वारा देखने का डर है ।१७ इससे स्पष्ट होता है कि बौद्ध भिक्षु लोगों की
१६. भोः ! परमकारुणिण भअवदा तहागएण पासादेसु वासो, सुविहि-
असय्येसु पज्जङ्केसु सअणं, पुव्वण्हे भोअणं, अवरण्हे सुरसाणि पाण-
आणि, पञ्चसुगन्धव्वोहिअं तम्बोल्लं, सण्हवसणपरिधाणं ति एदेहि
उवदेसेहि भिक्खुसङ्घस्स अणुग्गहं करन्तेण किण्णुहु इत्थि आपारिग्गहो
सुरावाणविहाणं च ण दिट्ठं ।
१७. अहो सुहोवण दो अन्भुदओ। एत्तओ दोसो-महाजणो पेक्खिस्सदि ।
१४ मत्तविलास-प्रहसन
दृष्टि से बचकर मदिरा पान भी कर लेते थे । शाक्य भिक्षु नागसेन ने बुद्ध
के कुछ शिक्षा पद जैसे न दी गई वस्तु को न लेना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य
का पालन करना, जीवहिंसा न करना, असमय में भोजन न करना आदि १८
कण्ठस्थ कर लिए हैं और कापालिक व पाशुपत आदि के समक्ष स्वयं को
निर्दोष प्रमाणित करने के लिए बुद्ध के इन उपदेशों की पुनरावृत्ति करता
है । कापालिक बौद्ध धर्म पर कटाक्ष करते हुये कहता है कि बुद्ध तो
चोरशास्त्र के प्रणेता खरपट से भी बढ़कर हैं १९ क्योंकि उन्होंने वेदान्तों और
'महाभारत' से ही तत्त्वों को चुराकर अपने सिद्धान्तों की स्थापना की है । २०
कापालिक नागसेन को 'माया की सन्तान' २१ कहकर बुद्ध के मायावाद की
ओर भी संकेत करता है । बौद्ध धर्म के अनुसार इस जगत् की सत्ता
सांवृतिक है, परमार्थिक नहीं । इस संसार में स्थित सभी वस्तुएँ जैसे, पृथ्वी,
समुद्र, पर्वत इत्यादि माया के कारण ही दिखाई देती हैं, २२ वास्तव में इनका
अस्तित्व नहीं है । सब कुछ शून्य है ।
कपाली सत्यसोम कापालिक सम्प्रदाय का है । कापालिक के लिए
कपाल का रखना, अपने शरीर को भस्म-रज से मलना आदि आवश्यक था ।
कापालिक सम्प्रदाय के अनुसार मदिरापान करना, प्रिया का सहवास और
विकृत वेष धारण करना—ये सब मोक्ष की ओर ले जाते हैं क्योंकि ऐसे मार्ग
के प्रवर्तक भगवान् शिव ही हैं; अर्थात् भगवान् शिव ने ही मोक्ष के मार्ग का
यह उपाय बताया है । २३ लेकिन जैन लोग मोक्ष के मार्ग का अन्य प्रकार से
वर्णन करते हैं । उनके अनुसार तपश्चर्या आदि शारीरिक कष्टों से ही मोक्ष
की प्राप्ति हो सकती है । लेकिन कापालिक उनके इस मत का खण्डन करते
१८. अदिण्णादाणा वेरमणं सिक्खापदं । मुधावादा वेरमणं सिक्खापदं । अब्बह्म-
चय्या वेरमणं पाणादिपादा वेरमणं सिक्खापदं । अकालभोअणा वेरमणं
सिक्खापदं ।
१९. खरपटादप्यस्मिन्नधिकारे बुद्ध एवाधिकः ।
२०. वेदान्तेभ्यो गृहीत्वार्थान् यो महाभारतादपि ।
विप्राणां मिषतामेव कृतवान् कोशसञ्चयम् ॥१२॥
२१. ननु मायासन्तानसम्भवाः खलु भवन्तः ।
२२. दृष्टानि वस्तूनि महीसमुद्रमहीधरादीनि महान्ति मोहात् ।
अपह्नुवानस्य सुतः कथं त्वमल्पं न निह्नोतुमलं कपालम् ॥१३॥
२३. पेया सुरा प्रियतमामुखमीक्षितव्यं ग्राह्यः स्वभावललितो विकृतश्च वेषः ।
येनेदमीदृशमदृश्यत मोक्षवत्मं दीर्घायुरस्तु भगवान् स पिनाकपाणिः ॥७॥
भूमिका १५
हुए कहता है कि एक ओर तो ये जैन लोग यह कहते हैं कि कार्य अपने कारण
के सरूप होता है और दूसरी ओर ये दुःखरूप कारण से सुखरूपी कार्य की
उत्पत्ति होती है, यह कहते हैं ।२४ अर्थात् वे काम क्लेश पर जोर देते हैं
और मानते हैं कि तप आदि कष्टों से मोक्षरूपी सुख प्राप्त होता है ।
कापालिक का कथन है कि दुःख से सुख की उत्पत्ति असम्भव है क्योंकि दुःख
और सुख दोनों विरोधी तत्त्व हैं ।
जैन धर्मानुयायियों के लिए भी ये कुछ नियम निर्धारित हैं, जैसे कि
ब्रह्मचर्य का पालन, बालों को एक-एक करके उखाड़ना, मल धारण करना,
भोजन के समय का नियम (सूर्यास्त से पहले ही खाना), मलिन वस्त्र धारण
करना इत्यादि ।२५
इस प्रकार बौद्ध धर्म, जैन धर्म और कापालिक सम्प्रदाय के कुछ
दार्शनिक तत्त्वों का उल्लेख इस प्रहसन से प्राप्त होता है ।
कथा-वस्तु
'मत्तविलास' की कथा इस प्रकार है—सत्यसोम नाम का कापालिक
देवसोमा नाम की युवती के साथ मद्यपान करते हुए काञ्चीपुरी के मार्ग पर
घूमता है और देवसोमा के सौन्दर्य की प्रशंसा करता है। नशे की अवस्था
में वह देवसोमा के नाम का उच्चारण भी गलत करता है और इस कारण
से फिर से मद्यपान न करने का निर्णय करता है, परन्तु देवसोमा उसे ऐसा
करने से रोकती है। कापालिक प्रसन्न होता है और कापालिक धर्म के
प्रवर्तक शिव की स्तुति करता है जिन्होंने सुरापान और स्त्रीसहवास आदि
को मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया है। परन्तु जब देवसोमा जैनों के मत
का पार्थक्य बताती है तो कापालिक उनके दर्शन को झूठा बताता है कि वे
दुःख रूपी कारण से सुख रूपी कार्य की उत्पत्ति होती है ऐसा कहते हैं जो
असंभव है। पुनः जैनों का नाम लेने से अपवित्र हुई जिह्वा के प्रक्षालन
के लिए पुनः मदिरा पीने के लिए मदिरा की दुकान पर जाते हैं लेकिन
२४. कार्यस्य निःसंशयमात्महेतोः सरूपतां हेतुभिरभ्युपेत्य ।
दुःखस्य कार्यं सुखमामनन्तः स्वेनैव वाक्येन हता वराकाः ॥८॥
२५. ये ब्रह्मचर्य-केशनिर्लोटन-मलधारण-भोजनवेलानियम-मलिनपट-परिधाना-
दिभिः प्राणिनः परिक्लेशयन्ति ।
१६ मत्तविलास-प्रहसन
वहाँ कापालिक को उसका भिक्षापात्र (कपाल) नहीं मिलता। वह संदेह
करता है कि शायद माँसपिंड से युक्त होने के कारण उसके कपाल को किसी
कुत्ते अथवा शाक्यभिक्षु ने ले लिया होगा। अतः कपाली आपद्धर्म को प्रमाण
मानकर गोशृङ्ग से मदिरा ले लेता है। फिर वे दोनों कपाल ढूँढ़ने काञ्ची-
पुरी में घूमते हैं।
इसी समय नागसेन नामक शाक्यभिक्षु अपना भिक्षापात्र लेकर वस्त्रों
के भीतर छिपाकर प्रवेश करता है। वह एक दयालु उपासक सेठ धनदास
के घर से मत्स्य-मांस से युक्त अत्युत्तम भोजन लेकर राजविहार की ओर जाता
है। तभी देवसोमा उसकी ओर संकेत करती है कि वह अंगों को सिकोड़ कर
भयभीत-सा जारहा है। नागसेन कापालिक को पहचान कर बचना चाहता
है परन्तु वह पकड़ा जाता है। कापालिक उसके भिक्षापात्र को देखना चाहता
है। नागसेन देवसोमा को ललचाई दृष्टि से देखता है। कापालिक के पूछने
पर नागसेन कहता है कि बुद्ध के उपदेशानुसार भिक्षापात्र ढक कर ही ले
जाना चाहिए। देवसोमा कापालिक से कहती है कि उसे मदिरा पीकर शक्ति
अर्जित करके शाक्यभिक्षु से विवाद करना चाहिए। कापालिक मदिरा
पीता है और नागसेन को भी मदिरा देने के लिए देवसोमा से कहता है। फिर
दोनों में झगड़ा होता है। कापालिक बलपूर्वक नागसेन से भिक्षापात्र छीनता
है पर नागसेन के धक्का दिये जाने पर गिर जाता है। नागसेन के बालों
को खींचने पर (सिर पर बाल न होने के कारण) देवसोमा भी गिर जाती
है। नागसेन उसे पकड़ कर उठाता है तो कापालिक चिल्लाता है कि वह
उसकी प्रिया का हाथ पकड़ रहा है।
इसी अवसर पर बभ्रुकल्प नामक पाशुपत प्रवेश करता है और
पूछने पर कापालिक घटना बताता है। बभ्रुकल्प देवसोमा को देखता है
जो कि उसकी कुटनी थी और जिसको कापालिक ले गया था। अतः बदला
लेने के लिए वह शत्रुपक्ष को उत्तेजित करने का निश्चय करता है। तभी
नागसेन बौद्ध धर्म के उपदेशों को बताता है। अन्ततोगत्वा, उसे अपना
भिक्षापात्र दिखाना ही पड़ता है। कापालिक उसे देखकर प्रसन्न होता है।
परन्तु पात्र को काले वर्ण का देखकर कापालिक कहता हैं कि रंग बदलने
में तो वह सिद्धहस्त है ही जैसे कि उसने अपने सफेद कपड़े लाल रंग (गेरुआ)
में रंग दिये हैं। अन्त में कोई निर्णय न होने पर बभ्रुकल्प उन दोनों को
भूमिका १७
न्यायालय में जाने के लिए कहता है, परन्तु देवसोमा कहती है कि तब तो
कापालिक हार जाएगा क्योंकि धनी बौद्ध वरिष्ठ न्यायकर्ताओं को रिश्वत
(प्रलोभन) देकर अपने पक्ष में कर लेगा। बभ्रुकल्प उनकी शङ्का को दूर
करता है और न्याय दिलाने के लिए आश्वासन देता है।
इसी क्षण एक पागल व्यक्ति हाथ में कापालिक के ही कपाल को
लिए प्रवेश करता है, जिसे उसने एक पागल कुत्ते से प्राप्त किया था। वह
उसे पाशुपत बभ्रुकल्प को देता है। तभी कापालिक अपने पात्र को पहचान
लेता है और लेना चाहता है, परन्तु तभी वह पागल उस कपाल को लेकर
भागता है और कापालिक के कहने पर सब उसे पकड़ लेते हैं। तब वह
उस कपाल को देकर चला जाता है।
सब प्रसन्न होते हैं। कापालिक नागसेन से क्षमा मांगता है और
भरत-वाक्य के साथ प्रहसन समाप्त होता है।
'मत्तविलास' में हास्य-रस
'मत्तविलास' एक शुद्ध कोटि का प्रहसन है। प्रहसन होने के कारण
यह हास्य-रस प्रधान है। संस्कृत नाटकों में हास्य रस की सृष्टि के लिए
विदूषक की योजना की जाती है। परन्तु प्रहसन में सभी पात्रों की योजना
हास्य रस के लिए ही होती है। रूपकों में कोई सामान्य व्यक्ति यदि विकृत
आकृति वेष-भूषा और विकृत अनुकरण आदि करे तो उतनी हँसी नहीं आती
जितनी सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठित ब्राह्मण, पण्डित, भिक्षु आदि की
विकृत चेष्टाओं जैसे फिसलना, गिरना, नाचना आदि देखकर आती है।
इसीलिए विदूषक भी ब्राह्मण होता है और प्रहसन के पात्र भी विभिन्न
धार्मिक सम्प्रदायों के पाखण्डी ब्राह्मण, भिक्षु आदि ही होते हैं। वास्तव में
मानव जीवन में विपरीतता या विषमता ही हास्य रस को उत्पन्न करती है।
यह हास्य रस कई प्रकार का होता है। कहीं पात्रों की विचित्र
वेष-भूषा के माध्यम से, कहीं अभिनय द्वारा, कहीं घटना के माध्यम
से तो कहीं विचित्र प्रसङ्ग के आधार पर हास्य रस की सर्जना होती है।
'मत्तविलास' की कथा केवल एक भिक्षा पात्र पर आधारित है और
यह प्रारम्भ से अन्त तक हास्यपूर्ण है। सूत्रधार ने अपनी छोटी पत्नी के
साथ बहुत दिनों तक रमण किया जिसके फलस्वरूप उसकी बड़ी पत्नी
क्रोधित हो जाती है। सूत्रधार जब उसके पास आता है तो वह कहती है कि
१८ मत्तविलास-प्रहसन
'बहुत दिनों से जवानी के गुणों से भरे हुए मतवालों के विलास
को इस बुढ़ापे में दिखाने आए हो' ?
'अय्य किं चिरस्स कालस्स जोव्वणगुणभरमत्तविलासप्पहसणं दंसेदुं
आअदोऽसि' ।
नटी के इस कथन से सूत्रधार समझता है कि वह 'मत्तविलास' प्रहसन
के विषय में कह रही है। इस प्रकार यहाँ विचित्र प्रसङ्ग के आधार पर
हास्य-रस को प्रस्तुत किया गया है।
कपाली सत्यसोम और उसकी सहचरी देवसोमा मदिरा पीकर
काञ्चीपुरी में घूमते हैं। नशे में चूर देवसोमा को सारी पृथ्वी घूमती हुई सी
लगती है। अतः वह कपाली से सहारा देने के लिए कहती है। कपाली उसे
सहारा देने के लिए पकड़ना चाहता है परन्तु गिरने लगता है—
'प्रिये सोमदेवे! किं त्वं कुपितासि, यदवलम्बितुमुपसर्पंतो मे दूरी
भवसि ?'
ऐसा कहते हुए वह नशे के कारण नामोच्चार भी अशुद्ध करता है—सोमदेवे !
कपाली को मद्यशाला यज्ञस्थल की तरह लगती है—'अत्र हि ध्वज-
स्तम्भो यूपः, सुरा सोमः, शौण्डा ऋत्विजः, चषकाश्रमसाः, शूल्यमांसप्रभृतय
उपदंशा हविर्विशेषाः, मत्तवचनानि यजूंषि, गीतानि सामानि, उदङ्काः
स्रुवाः, तर्षोऽग्निः, सुरापणाधिपतिर्यजमानः।'
कपाली को मदिरा के नशे में सब वस्तुएँ मदिरामय ही
प्रतीत होती हैं। शिव ने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म
कर दिया था—इस पौराणिक तथ्य को भी वह नहीं मानता। उसके विचार
में तो कामदेव का शरीर भस्म नहीं अपितु मदिरा ही बन गया—
मिथ्या त्रिलोचनविलोचनपावकेन
भस्मीकृतां मदनमूर्त्तिमुदाहरन्ति ।
स्नेहात्मिका तदभितापवशाद् विलीना
सेयं प्रिये ! मदयति प्रसभं मनांसि ॥
और उसकी सहचरी देवसोमा भी इस बात का समर्थन करती है—
'भअवं जुज्जइ एदं । णहि लोओवआरणिरदो लोअणाहो लोअं
विणासेदि ।' [भगवन् युज्यत एतद् । नहि लोकोपकारनिरतो लोकनाथो लोकं
विनाशयति । ]
भूमिका १८
शाक्यभिक्षु नागसेन भिक्षापात्र में धनदास सेठ के घर से मत्स्य-मांस
युक्त भिक्षा लाता है। उस समय वह कहता है कि बुद्ध ने जब प्रासादों में
रहना, गद्देदार पलँगों पर सोना, पञ्चगन्धयुक्त पान खाना, महीन वस्त्र
पहनना आदि का विधान किया है—तो स्त्री समागम और मद्यपान का
नियम भी अवश्य बनाया होगा। परन्तु वृद्ध बौद्धों ने युवकों के प्रति
ईर्ष्या के कारण उनसे सम्बन्धित मूल ग्रन्थों को अवश्य ही छिपा दिया
होगा—
'अहो अवस्सं एदेहि दुट्ठबुद्धत्थविरेहि णिरुच्छाएहि अम्हाणं तरुणजणाणं
मच्छरेण पिडअपउत्थएसु इत्थिआसुरावाणविहाणाणि परामिट्ठाणित्ति
तक्केमि। कहि णु हु अविणट्ठ मूलपाठं समासादएं।' [अवश्यमेतै-
र्दुष्ट बुद्धस्थविरैर्निरुत्साहैरस्माकं तरुणजनानां मत्सरेण पिटकपुस्तकेषु स्त्री-
सुरापानविधानानि परामृष्टानीति तर्कयामि। कुतो नु खल्वविनष्ट-
मूलपाठं समासादयेयम् । ]
वस्त्र के भीतर अपने भिक्षा पात्र को छिपाकर ले जाते हुए शाक्य-
भिक्षु को कपाली और देवसोमा उसके पात्र को अपना समझकर पकड़ लेते
हैं। तब भिक्षु कहता है कि 'अरे कापालिकोपासक ! नहीं-नहीं ऐसी बात
नहीं है।' अर्थात् वह पात्र कपाली का नहीं है, दूसरी ओर देवसोमा को देखकर
मन ही मन कहता है—
'अहो ललिअरूवा उवासिआ।' [ अहो ललितरूपा उपासिका । ]
कपाली और शाक्यभिक्षु का कलह भी हास्य रस को ही उत्पन्न
करता है। भिक्षापात्र लेने के लिए जब कपाली शाक्यभिक्षु नागसेन के
चीवर का कोना पकड़कर खींचता है तो वह चिल्लाता है—'णमो बुद्धाय ।'
इस पर कपाली कहता है कि फिर तो 'नमः खरपटाय' ऐसा कहना चाहिए
या बुद्ध तो खरपट से भी बढ़कर चोर हैं क्योंकि उन्होंने वेदान्तों और
'महाभारत' से ही तत्त्वों को चुराकर अपने सिद्धान्तों की स्थापना की है।
वेदान्तेभ्यो गृहीत्वार्थान् यो महाभारतादपि ।
विप्राणां मिषतामेव कृतवान् कोशसञ्चयम् ॥
कपाली के इस कथन में श्लेष भी हास्य रस का कारण है। यहाँ 'अर्थ'
शब्द एक ओर वेदान्त के तत्त्वों की ओर संकेत करता है तो दूसरी ओर
'धन' की ओर।
२० मत्तविलास-प्रहसन
देवसोमा कपाली से कहती है कि वह थका हुआ सा लग रहा है।
अतः उसे मदिरा पीकर शक्ति अर्जित करके फिर नागसेन से कलह करनी
चाहिए। जब वह उसे मदिरा देती है तो कपाली कहता है कि वह भी
थकी सी है, उसे भी मदिरा पीनी चाहिए और बची हुई मदिरा नागसेन
को देने के लिए कहता है। देवसोमा जब उसे देने लगती है तो नागसेन मन
ही मन तो बहुत प्रसन्न होता है लेकिन उसे डर है कि कोई देख लेगा—
'अहो सुहोवणदो अब्भुदओ। एत्तओ दोसो—महाजणो पेक्खिस्सदि। [अहो
सुखोपगतोऽभ्युदयः। एतावान् दोषो महाजनो द्रक्ष्यति ।] लेकिन कपाली
भी उसके लड़खड़ाते स्वर से उसका आशय समझ जाता है—
'इयमस्य इच्छाविरोधिनी वाक् मुखप्रसेकेन स्खलति ।।
देवसोमा कपाली से कहती है कि वह नागसेन प्रेम से कपाल नहीं
देगा, अतः झगड़ा करके ही लेना चाहिए। दोनों में झगड़ा होता है और
नागसेन हाथ से कपाली को धकेलता हुआ पैर से मारता है और कपाली
गिर पड़ता है। देवसोमा नागसेन के बालों को खींचने के प्रयास में सिर पर
बाल न होने के कारण गिर पड़ती है। नागसेन प्रसन्न होकर मन ही मन कहता
है—'अघं बुद्धस्स विण्णाणं जेण मुण्डणं दिट्ठं ।' [अहं बुद्धस्य विज्ञानं, येन
मुण्डन दृष्टम् ।] फिर वह गिरी हुई देवसोमा को हाथ पकड़कर उठाने लगता
है तो कपाली चिल्लाता है, अरे माहेश्वरो ! देखो—'अनेनभिक्षुनामधारकेण
नागसेनेन मम प्रियतमा पाणिग्रहणं क्रियमाणम् ।'
नागसेन कहता है कि 'ऐसी बात नहीं है, विपत्ति में गिरे हुए पर
दया करना हमारा धर्म है', इस पर कपाली कहता हैं कि अगर ऐसी बात है
तो पहले वह (कपाली) गिरा था उसे उठाना चाहिए था—'किमयमपि सर्वज्ञः
धर्मः । नन्वहं पूर्वपतितोऽस्मि ।'
उन्मत्तक का चरित्र भी हास्य रस की ही सृष्टि करता है। उसी को
कपाली का भिक्षा पात्र शूल्यमाँस से युक्त होने के कारण कुत्ता ले भागा था
और उस पागल ने उसी से वह कपाल प्राप्त किया था। वह झगड़ते हुए इन
लोगों के पास जाता है और पाशुपत को, जो समझौता कराने आया था, वह
कपाल देना चाहता है। फिर नागसेन के कहने पर वह कपाली को देता है
परन्तु दूसरे ही क्षण छीन कर जाने लगता है। उसे वह सोने का पात्र ही
भूमिका २१
समझता है—‘मूढ ! किं णं पेक्खशि, शुवण्णभाजणं खु एदं ।’ [मूढ ! किं न
पश्यसि, सुवर्णभाजनं खल्वेतत् ।]
नागसेन कहता है ‘सोने का पात्र ! क्या यह पागल है’ ? इस पर
पागल कहता है कि 'पागल यह शब्द बार-बार सुनता हूँ, तो कपाल को लेकर
उस पागल को तो दिखाओ’—'उम्मत्तओत्ति बहुशो एदं शद्दं शुणोमि । एदं
गण्हिअ दलिशेहि उम्मत्तअं ।’ [उन्मत्तक इति बहुश एतं शब्दं शृणोमि ।
एतद् गृहीत्वा दर्शयोन्मत्तकम् ।]
कपाल की प्राप्ति होने पर शाक्यभिक्षु और कपाली प्रसन्न होते हैं
और पाशुपत बभ्रुकल्प मन ही मन कहता है कि यह भिक्षु आज सिंह के
मुँह से बच गया—‘सत्यमेतत्-नास्त्यदोषवतां भममिति, यदयमद्य भिक्षु-
र्व्याघ्रमुखात् परिभ्रष्ट:’ और उन लोगों से कहता है कि तुम दोनों का
विरोध किरात और अर्जुन के समान परस्पर प्रेम को बढ़ाने वाला बने ।
नागसेन और कपाली सत्यसोम आपस में क्षमा याचना करते हैं और प्रहसन
समाप्त होता है ।
इस प्रकार प्रारम्भ से अन्त तक यह प्रहसन हास्य रस से परिपूर्ण है ।
श्री श्री सरस्वत्यै नमः
मत्तविलासप्रहसनम्
श्रीमहेन्द्रविक्रमवर्मप्रणीतम्
(नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः)
सूत्रधारः—
भाषावेषवपुःक्रियागुणकृतानाश्रित्य भेदान् गतं
भावावेशवशादनेकरसतां त्रैलोक्ययात्रामयम् ।
नृत्तं निष्प्रतिबद्धबोधमहिमा यः १ प्रेक्षकश्च स्वयं
स व्याप्तावनिभाजनं दिशतु वो दिव्यः कपाली यशः ॥१॥
भोः ! समासादितः खलु मया यवीयसीं भार्यामधिकृत्य
समुत्पन्नव्यलीकायां ज्येष्ठायां मे कुटुम्बिन्यां युक्ततरः प्रसादनोपायः,
यच्चिरस्याद्य वयं प्रेक्षाधिकारे परिषदा नियुक्ताः स्म । तद् याव-
देनामुपसर्पामि ।२ (नेपथ्याभिमुखमवलोक्य) आर्ये ! इतस्तावत् ।
(प्रविश्य)
नटी—(सरोषम्) अय्य किं चिरस्स कालस्स जोव्वणगुणभर-
मत्तविलासप्पहसणं दंसेदुं आअदोसि । [आर्य ! किं चिरस्य कालस्य
यौवनगुणभरमत्तविलासप्रहसनं दर्शयितुमागतोसि ।]
सूत्रधारः—यथाह भवती ।
नटी—ताए एव दाव ३ दंसेहि, जा तुए रमइदव्वा । [तस्यैव
तावद् दर्शय, या त्वया रमयितव्या]
सूत्रधारः—त्वया सह दर्शयिष्यामीति ।
नटी—किं ताए एव्व णिउत्तोसि । [किं तयैव नियुक्तोऽसि ।]
सूत्रधारः—एवमेतत् । अपि च तत्र गता महान्तमनुग्रहं
लप्स्यसे ।
नटी—तव एव्व खु एदं जुज्जइ । [तवैव४ खलु एतद् युज्यते]
सूत्रधारः—भवति ! किमिव न युज्यते । त्वत्प्रयोगपरितोषिता
परिषदनुग्रहीष्यतीति ।
१. करोतीत्याध्याहर्तव्यम् । २. परिक्रम्य ने—।
३. दाणिं । ४. तथैव ।
मत्तविलास-प्रहसन
श्री महेन्द्रविक्रमवर्मा द्वारा रचित
हिन्दी अनुवाद
(नान्दी के अन्त में सूत्रधार प्रवेश करता है।)
अकुण्ठित ज्ञान की महिमा वाले जो भाषा, वेष, शरीर, क्रिया (तथा)
गुण कृत (नाना प्रकार के) भेदों का आश्रय लेकर, भावावेश के वशीभूत
अनेक रसों को प्राप्त हुए, तीनों लोकों के व्यवहार रूप नृत्त को (करते हैं),
और जो स्वयं दर्शक हैं, वह दिव्य कपालधारी (शिव) भूमण्डलरूपी पात्र
में व्याप्त यश आपको प्रदान करें ॥१॥
अरे ! मैंने छोटी पत्नी के विषय में मिथ्याग्रह होने से रुष्ट (नाराज
हुई) बड़ी पत्नी को प्रसन्न करने का (मनाने का) और अधिक अच्छा उपाय
ढूंढ़ लिया है, क्योंकि आज हमें बहुत दिनों बाद सभा ने नाटक प्रदर्शन करने
को नियुक्त किया है। तो अब इसके पास जाता हूँ। [नेपथ्य की ओर
देखकर) आर्ये ! इधर आओ।
(प्रवेश करके)
नटी—(क्रोध सहित) आर्यपुत्र ! क्या तुम बहुत दिनों बाद जवानी
के गुणों से भरा हुआ शराबियों के विलासों का प्रहसन दिखाने आए हो ?
सूत्रधार—जैसा आपने कहा। (ठीक ही है)
नटी—तब उसी (स्त्री) को दिखाओ, जो तुम्हारे साथ रमण के
योग्य है।
सूत्रधार—तुम्हारे साथ दिखाऊँगा। (इस उद्देश्य से मैं तुम्हारे पास
आया हूँ।)
नटी—क्या उसी (औरत) ने तुम्हें भेजा है ?
सूत्रधार—हां ठीक ही है। और फिर वहाँ जाओगी तो बहुत
अनुग्रह मिलेगा।
नटी—यह केवल तुम्हारे लिए ही ठीक है।
सूत्रधार—आर्ये ! तुम्हारे लिए भी ठीक है। सभा तुम्हारे
अभिनय से संतुष्ट होकर (तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा) अनुग्रह करेगी। (तुम्हारा
बहुत आदर करेगी)।
बौद्ध भिक्षु नागसेन से विवाद, कपाल-पात्र अन्वेषण एवं पाशुपत मध्यस्थता
२४ मत्तविलास-प्रहसन
नटी—(सहर्षम्) एवस् । लद्धो अय्यमिस्साणं पसादो । [एवम् ।
लब्ध आर्यमिश्राणां प्रसादः ।]
सूत्रधारः—बाढम् । लब्धः ।
नटी—जइ एवं, किं दे पिअक्खाणिअं देमि । [यद्येवं, किं ते
प्रियाख्यानिकं^५ ददामि । ]
सूत्रधारः—अलं प्रियाख्यानिकपुनरुक्तेन । पश्य,
उद्भिन्नरोमाञ्चकपोलरेख-
माविर्मयूखस्मितमञ्चितभ्रु ।
लब्ध्वा प्रिये ! दुर्लभमाननं ते
भूयोऽपि किं प्रार्थयितव्यमस्ति ॥२॥
नटी—किं दाणि अय्येण पउज्जिदव्वं । [किमिदानीमार्येण^६
प्रयोक्तव्यम् । ]
सूत्रधारः—ननु त्वयैवाभिहितं मत्तविलासप्रहसनमिति ।
नटी—णूणं इमस्सि पक्खवादी मे कोवो, जेण अभिप्पाअणु-
रूवं भणाविद ह्मि । अय्य कदमो उण सो कवी, जो इमाए किदीए
पआसीअदि । [नूनमस्मिन्^७ पक्षपाती मे कोपः, येनाभिप्रायानुरूपं
भणितास्मि । आर्य ! कतमः पुनः स कविः, योजनया^८ कृत्या
प्रकाश्यते । ]
सूत्रधारः—भवति ! श्रूयताम् ।^९ पल्लवकुलधरणिमण्डल-^१०
कुलपर्वतस्य सर्वंनयविजितसमस्तसामन्तमण्डलस्य आखण्डल सम-
पराक्रमश्रियः श्रीमहिमानुरूपदानविभूतिपरिभूतराजराजस्य श्रीसिंह-
विष्णुवर्मणः पुत्रः शत्रुषद्वर्गनिग्रहपरः परहितपरतन्त्रतया महाभूत-
सधर्मा महाराजः श्रीमहेन्द्रविक्रमवर्मा नाम । अपि च,
प्रज्ञादानदद्यानुभावधृतयः कान्तिः कलाकौशलं,
सत्यं शौर्यममायता विनय इत्येवम्प्रकारा गुणाः ।
अप्राप्तस्थितयः समेत्य शरणं याता यमेकं कलौ,
कल्पान्ते जगदादिमादिपुरुषं सर्गप्रभेदा इव ॥३॥
किञ्च,
५. न कुतः, उद्भिन्न—। ६. नाटकं नाटयितव्यम् । ७. आम्, अ— ।
८. येनानया कृत्या आत्मानमेव प्रकाशयिष्यति । ६. ताम् । विदितप
१०. लपर्वत
हिन्दी अनुवाद २५
नटी—(हर्ष के साथ) ऐसी बात है ! (तो) आर्यसभिकों का प्रसाद
मिल गया।
सूत्रधार—हाँ, मिल गया।
नटी—यदि ऐसा है तो तुमको अच्छा वृत्तान्त सुनाने का पारितोषिक
क्या दूं ?
सूत्रधार—पारितोषिक की पुनरावृत्ति न करो। देखो—
तुम्हारे, फूटे हुए रोमाञ्च से युक्त कपोल वाले, प्रकट हुए किरणों
से युक्त मन्दहास वाले, तिरछी भौंहों वाले, दुष्प्राप्य मुख को प्राप्त करके
और फिर क्या माँगना है ॥२॥
नटी—तो अब आप कौन सा नाटक प्रदर्शित करेंगे ?
सूत्रधार—अभी तुमने ही तो कहा कि मत्तविलास प्रहसन।
नटी—इस विषय में भी मेरा क्रोध पक्षपाती है, जिससे (मैं) अभि-
प्रायवश कहने के लिए विवश की गई हूँ। आर्य ! फिर वह कौन सा कवि
है जो इस कृति के द्वारा प्रसिद्ध किया जा रहा है।
सूत्रधार—आर्ये ! सुनिए ! पल्लववंशरूपी पृथ्वीमण्डल के कुलपर्वत,
सब प्रकार की नीति से सम्पूर्ण सामन्तों के समूह को जीतने वाले, इन्द्र के
तुल्य पराक्रमरूपी सम्पत्ति वाले, विशाल सम्पत्ति के अनुरूप दान के उत्कर्ष
से कुबेर को भी तिरस्कृत करने वाले, श्रीसिंहविष्णुवर्मा के पुत्र श्री महेन्द्र-
विक्रमवर्मा नाम के राजा हैं, जो षड्वर्गरूपी (अन्तः) शत्रुओं को नियंत्रित
करने वाले, पञ्चमहाभूतों के समान केवल परोपकार में लगे हुए हैं।
और भी,
विवेक, उदारता, सहानुभूति, मर्यादा, स्थैर्य (संतोष), दीप्ति, (शिल्प,
ललित) कला, समृद्धि, सत्य, पराक्रम, निष्कपटता, नम्रता-आदि ये गुण
कलियुग में (कोई अन्य) स्थान न पाकर एक साथ जिस एक (राजा) की
शरण में उसी प्रकार चले गए, जैसे प्रलय के अन्त में समस्त सृष्टियाँ संसार
के आदि (विराजमान) आदिपुरुष की (शरण में चली जाती हैं ) ॥३॥
और,
२६ मत्तविलास-प्रहसन
आकरे सूक्तिरत्नानां यस्मिन् गुणगरीयसाम् ।
अर्हन्ति ११ बहुसूक्तानि सतां सारलघून्यपि ॥४॥
नटी—किं दाणि अय्येण विलम्बीअदि । णं अपुरुवदाए तुरिअं
अणुट्टिदव्वो अअं पओओ । [किमिदानीमार्येण विलम्ब्यते । नन्व-
पूर्वतया त्वरितमनुष्ठातव्योऽयं प्रयोगः ।]
सूत्रधार—अहं १२ तु—
सम्प्रति सङ्गीतधनः कविगुणकथयास्मि निघ्नतां नीतः ।
(नेपथ्ये)
प्रिये ! देवसोमे !
सूत्रधार—युवतिसख एष सुरया कपालविभवः कपालीव ॥५॥
(निष्क्रान्तौ)
॥ स्थापना ॥ १३.
(ततः प्रविशति सपरिग्रहः कपाली ।)
कपाली—(क्षीबतां रूपयित्वा) प्रिये ! देवसोमे ! सत्यमे-
वैतत् १४ तपसा कामरूपता प्राप्यत इति । यत् त्वया परमव्रतस्य
विधिवदनुष्ठानेनान्य एव रूपातिशयः क्षणात् प्रतिपन्नः । तव हि—
उद्भिन्नश्रमवारिबिन्दुवदनं सभ्रूलताविभ्रमं
खेलं यातमकारणानि हसितान्यव्यक्तवर्णा गिरः ।
रागाक्रान्तमधीरतारमलसापाङ्गं युगं नेत्रयो-
रंसोपान्तविलम्बिनश्च विगलन्मालागुणा मूर्धजाः ॥६॥
देवसोमा—भअवं ! मत्तं विअ मत्तं विअ मं भणासि । [भगवन् !
मत्तामिव मत्तामिव मां भणसि । ]
कपाली—किमाह भवती ।
देवसोमा—ण हु किञ्चि भणामि । [न खलु किञ्चद् भणामि ।]
कपाली—किन्नु खलु मत्तोऽस्मि ।
११. बहु अर्हन्ति वहमूल्यं प्राप्नुवन्ति, श्लाघामनलपां लभत इत्यर्थः ।
१२. हन्त सम्प्रति— १३. आमुखम् १४. —मेतत्
हिन्दी अनुवाद २७
श्रेष्ठ गुणों वाले, सूक्तिरूपी रत्नों वाली जिस समुद्र में सज्जनों की
अल्प मूल्य वाली सूक्तियाँ भी बहुत मूल्य को प्राप्त करती हैं (अर्थात् बहुमूल्य
हो जाती हैं) ॥४॥
नटी—आर्य ! अब देर क्यों कर रहे हैं ? अपूर्व होने के कारण
इसका प्रदर्शन शीघ्र ही करना चाहिए ।
सूत्रधार—मैं तो—
सङ्गीत ही है धन जिसका ऐसा (मैं) कवि इस समय कवि के गुणों
को कहने से नीचता को प्राप्त हो गया हूँ ।
(नेपथ्य में)
प्यारी ! देवसोमा ।
जवान स्त्री के सहचर, कपाल ही जिसकी सम्पत्ति है, (ऐसे) मदिरा
के कारण (नीचे गिरते हुए) इस कपाली के समान (मैं भी नीचता को प्राप्त
हो गया हूँ ।) ॥५॥
(दोनों निकल जाते हैं ।)
॥ स्थापना ॥
(तब सहचरी सहित कपाली प्रवेश करता)
कपाली—(मस्ती का अभिनय करके) प्यारी ! देवसोमा ये तो
सच ही है कि तप से इच्छानुसार रूप मिलता है, क्योंकि तुमने परम व्रत
का विधिपूर्वक पालन करने के कारण ही क्षण भर में नया ही सौन्दर्य प्राप्त
कर लिया है। क्योंकि—
(तुम्हारे) मुख पर स्वेद बिन्दु फूट निकले हैं, लतासदृश भौंहों में
विलास है, क्रीड़ायुक्त गति है; (तुम) बिना किसी कारण हँस रही हो,
(तुम्हारी) बोली अस्पष्ट वर्णों वाली है, दोनों नेत्र लालिमा से भरे हैं,
(आँखों की) पुतलियाँ चञ्चल हैं, (दृष्टि) अलसाई और तिरछी है, माला
की गाँठ ढीली पड़ गई है, (और) केश कंधों तक लटक गए हैं ॥६॥
देवसोमा—भगवन् (मैं) नशे में हूँ, नशे में हूँ, (आप) ऐसा कह
रहे हैं ?
कपाली—आपने क्या कहा ?
देवसोमा—कुछ नहीं कह रही हूँ ।
कपाली—(तो) क्या मैं ही नशे में हूँ ?
२८ मत्तविलास-प्रहसन
देवसोमा—भअवं। परिब्भमइ परिब्भमइ पुहुवी। पुरो वदामि
विअ। अवलम्ब दाणि मं। [भगवन् ! परिभ्रमति, परिभ्रमति
पृथिवी पुरः पतामीव। अवलम्बस्वेदानीं माम् । ]
कपाली—प्रिये ! तथास्तु। (अवलम्बमानः पतनं रूपयित्वा)
प्रिये ! सोमदेवे ! किं त्वं कुपितासि, यदवलम्बितुमुपसर्पतो मे
दूरीभवसि।
देवसोमा—अहो णु खु आदकोवा सामदेवा, जा तुए सीसेण
पणामिअ अणुणीअमाणा वि दूरी होइ। [अहो नु खलु आगतकोपा
सोमदेवा या त्वया शीर्षेण प्रणम्यानुनीयमानापि दूरीभवति।]
कपाली—ननु त्वमेवासि सोमदेवा। (ध्यात्वा) नहि, १५ देवसोमा
देवसोमा—भअवं। णं तहा वल्लहा सोमदेवा, णाहंदि मम
णामकेणाभिधादुं १६। [भगवन् ! ननु तथा वल्लभा सोमदेवा, नार्हति
मम नामकेनाभिधातुम् । ]
कपाली—भवति ! सुलभपदस्खलितो मे मदोऽयं तवात्रापराध्दः।१७
देवसोमा—दिट्ठिआ ण तुवं। [दिष्ट्या न त्वम् ।]
कपाली—कथं मद्यदोषो मामेवं सङ्क्रामयति। भवतु भवतु,
अद्यप्रभृति मद्यनिवेषणान्निवृत्तोऽस्मि।
देवसोमा— १८भअवं। मा या मम कारणादो बदभङ्गेण
तवो खण्डेदुं। [भगवन् ! मा मा मम कारणाद् व्रतभङ्गेन तपः
खण्डयितुम् । ] (पादयोः पतति)
कपाली—(सहर्षमुत्थाप्यालिङ्ग्य) धृणं धृणं, १९ नमः शिवाय ।
प्रिये !
पेया सुरा प्रियतमामुखमीक्षितव्यं
ग्राह्यः स्वभावललितो विकृतश्च वेषः।
येनेदमीदृशमदृश्यत मोक्षवर्त्म
दीर्घायुरस्तु भगवान् स पिनाकपाणिः ॥७॥
१५. नहि नहि १६. —मद्येन
१७. —राध्यति १८. मा मा भगवन् मम— १९. धृष्ण धृष्ण; धिणं धिणं
हिन्दी अनुवाद २६
देवसोमा-स्वामी ! पृथ्वी घूम रही है, घूम रही है। सामने गिरने
वाली हूँ, अब मुझे सम्हालिए ।
कपाली- प्यारी ! ठीक है। [सहारा देता हुआ गिरने का अभिनय
करके] प्यारी ! सोमदेवा ! क्या तुम नाराज हो ? (क्योंकि) मैं सहारा
देने के लिए पास आ रहा हूँ (और) तुम दूर होती जा रही हो ।
देवसोमा-हाँ, सोमदेवा को गुस्सा आया तो तुम्हारे सिर से नमस्कार
करके मनाने पर भी दूर होती जा रही है ।
कपाली-निस्संदेह तुम ही सोमदेवा हो । (सोचकर) नहीं, देवसोमा ।
देवसोमा-स्वामी ! वैसी प्यासी सोमदेवा को मेरे नाम से बुलाना
उचित नहीं है ।
कपाली-आर्ये ! मेरे नशे के कारण यह शब्दों के उलट-फेर का
दोष है ।
देवसोमा-अच्छा तो तुम अपराधी नहीं हो ।
कपाली-यह मेरे ऊपर मदिरा का प्रभाव कैसे हो रहा है ? अच्छा,
अच्छा, आज से मदिरा पीना छोड़ता हूँ।
देवसोमा-स्वामी ! नहीं, नहीं, मेरे कारण व्रतभङ्ग करके तप को
तोड़ना ठीक नहीं । (पैरों पर गिर पड़ती है ।)
कपाली-(हर्ष से उठाकर, आलिङ्गन करके) नमः शिवाय ।
मदिरा पीनी चाहिए, प्रियतमा का मुख देखना चाहिए, स्वभाव से
सुन्दर तथा विकृत वेष पहनना चाहिए, जिन्होंने ऐसा यह मोक्ष का मार्ग
दिखाया वह भगवान् शिव दीर्घजीवी हों ॥७॥
३० मत्तविलास-प्रहसन
देवसोमा—भअवं ! णं तहा भणिदव्वं । अहन्ते मोक्खमग्गं
अण्णहा वण्णअन्ति । [भगवन् ननु तथा भणितव्यम् । अर्हन्तो२०
मोक्षमार्गमन्यथा वर्णयन्ति ।]
कपाली—भद्रे ! ते खलु मिथ्यादृष्टयः । कुतः,
कार्यस्य निःसंशयमात्महेतोः
सरूपतां हेतुभिरभ्युपेत्य ।
दुःखस्य कार्यं सुखमामनन्तः
स्वेनैव वाक्येन हता वराकाः ॥८॥
देवसोमा—सन्तं सन्तं पावं । [शान्तं शान्तं पापम् ।]
कपाली—शान्तं शान्तं पापम् । न खलु ते पापा आक्षेपमुखे-
नाप्यभिधातुमर्हन्ति, ये ब्रह्मचर्यकेशनिर्लोटनमलधारणभोजनवेला-
नियममलिनपटपरिधानादिभिः प्राणिनः परिक्लेशयन्ति । तदिदानीं
कुतीर्थसङ्कीर्तनोपहतां जिह्वां सुरया प्रक्षालयितुमिच्छामि ।
देवसोमा—तेण हि अण्णं दाणिं सुरापणं गच्छामो । [तेन
ह्यन्यमिदानीं सुरापणं गच्छावः ।]
कपाली—प्रिये ! तथास्तु ।
(उभौ परिक्रामतः ।)
कपाली—अहो नु खलु विमानशिखरविश्रान्तघनरसित-
सन्दिग्धमृदङ्गशब्दस्य मधुसमयनिर्माणमातृकायमाणमाल्यापणस्य
कुसुमशरविजयघोषणायामानवरयुवतिकाञ्चीरवस्य काञ्चीपुरस्य
परा विभूतिः । अपि च—
अनतिशयमनन्तं सौख्यमप्रत्यनीकं
समधिगतसतत्त्वा मेनिरे यन्मुनीन्द्राः ।
तदिह निरवशेषं दृष्टमेतत् तु चित्रं
यदुत करणभोग्यं कामभोगात्मकं च ॥९॥
देवसोमा—भअवं ! भअवदी वाहुणीव... विअ अणवगीअमहुरा
काञ्ची । [भगवन् ! भगवती वारुणीवानवगीतमधुरा काञ्ची।]
२०. अन्यथा मोक्षमार्गम्
हिन्दी अनुवाद ३१
देवसोमा—स्वामी ! वैसा ही कहना चाहिए (अर्थात् आपने एकदम
ठीक कहा)। अर्हत् के अनुयायी मोक्ष मार्ग का वर्णन दूसरी तरह से
करते हैं।
कपाली—कल्याणि ! वे तो मिथ्या दृष्टि वाले हैं (इनका दर्शन
गलत है।) क्योंकि—
निस्सन्देह कार्य (अपने) कारण जैसा होता है, (इस प्रकार) हेतुवाद
के द्वारा सिद्ध करके (पुनः) सुख को दुख का कार्य बनाते हुए (ये) बेचारे
अपने ही वचन से परास्त हो गए ॥८॥
देवसोमा—पाप शान्त हो, शान्त हो ।
कपाली— पाप शान्त हो, शान्त हो। वे तो इतने पापी हैं कि निंदा
के लिए भी उनका नाम नहीं लेना चाहिए, जो ब्रह्मचर्य, बालों के उखाड़ने,
मल धारण करने, भोजन के समय के नियम .(सूर्यास्त से पहले खाना), मैले
वस्त्र धारण करने—आदि से लोगों को सताते हैं। तो अब पापियों का नाम
लेने से अपवित्र हुई जीभ को मदिरा से धोना चाहता हूँ !
देवसोमा—तो अब दूसरी मदिरा की दुकान पर चलते हैं ।
कपाली—प्यारी ! ठीक है।
( दोनों घूमते हैं )
अहा ! काञ्चीपुरी की प्रकृष्ट शोभा (जहाँ)—महलों के शिखरों पर
आराम करने वाले मेघों के गर्जन से मृदङ्ग ध्वनि का सन्देह हो रहा है, जहाँ
फूलों की दुकानों से वसन्त ऋतु का निर्माण किया जा सकता है, जहाँ की
श्रेष्ठ युवतियों की मेखलाओं की ध्वनि कामदेव की विजय घोषणा की तरह
होती है। और भी,
तत्त्ववेत्ता श्रेष्ठ मुनियों ने जिस सुख को सर्वोत्कृष्ट, अनन्त अद्वितीय
माना है, वही (सुख) पूरा यहाँ दिखाई दे रहा है, लेकिन आश्चर्य (की बात)
है कि यहाँ यह (सुख) इन्द्रियों के द्वारा भोग करने योग्य है और काम भोग
रूपी है ॥६॥
देवसोमा—स्वामी ! मदिरा देवी की तरह काञ्ची भी दोष रहित है।
३२ मत्तविलास-प्रहसन
कपाली—प्रिये ! पश्य पश्य ! एष सुरापणो यज्ञवाटविभूति-
मनुकरोति । अत्र हि ध्वजस्तम्भो यूपः, सुरा सोमः, शौण्डा ऋत्विजः,
चषकाश्चमसाः, शूल्यमांसप्रभृतय उपदंशा हविर्विशेषाः, मत्तवचनानि
यजूंषि, गीतानि सामानि, उदङ्काः स्रुवाः, तर्षोऽग्निः, सुरापणाधि-
पतिर्यजमानः ।
देवसोमा—अम्हाणं पि एत्थ भिक्खा रुद्दभाओ भविस्सदि ।
[आवयोरप्यत्र भिक्षा२१रुद्रभागो भविष्यति ।]
कपाली - अहो दर्शनीयानि प्रहृतमर्दल२२ करणानुगतानि
विविधाङ्गहारवचनभ्रूविकाराणि उच्छ्रितैकहस्तावलम्बितोत्तरीयाणि
विगलित२३वसनप्रतिसमाधानक्षणविषमितलयानि व्याकुलितकण्ठ-
गुणानि मत्तविलासनृत्तानि ।
देवसोमा—अहो रसिओ खु आअय्यो । [अहो रसिकः
खल्वाचार्यः ।]
कपाली—एषा भगवती वारुणी चषकेष्वावर्जिता प्रत्यादेशो
मण्डनानाम्, अनुनयः प्रणयकुपितानां, पराक्रमो यौवनस्य, जीवितं
विभ्रमाणाम् । किं बहुना —
मिथ्या त्रिलोचनविलोचनपावकेन
भस्मीकृतां मदनमूर्तिमुदाहरन्ति ।
स्नेहात्मिका तदभितापवशाद् विलीना
सेयं प्रिये ! मदयति प्रसभं मनांसि ॥१०॥
देवसोमा —भअवं ! जुज्जइ एदं । णहि लोओवआरणिरदो
लोअणाहो लोअं विणासेदि । [भगवन् ! युज्यत एतत् । नहि लोको-
पकारनिरतो लोकनाथो लोकं विनाशयति ।]
(उभौ कपोलपटहं कुरुतः)
कपाली—भवति ! भिक्षां देहि ।
(नेपथ्ये)
भअवं ! एसा भिक्खा । पडिगण्हदु भअवं । [भगवन् ! एषा
भिक्षा । प्रतिगृह्णातु भगवान् ।२४]
२१. भिक्षविभागः २२. मद्दल २३. —लितानि २४. भवान्