मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० मत्तविलास-प्रहसन
देवसोमा कपाली से कहती है कि वह थका हुआ सा लग रहा है।
अतः उसे मदिरा पीकर शक्ति अर्जित करके फिर नागसेन से कलह करनी
चाहिए। जब वह उसे मदिरा देती है तो कपाली कहता है कि वह भी
थकी सी है, उसे भी मदिरा पीनी चाहिए और बची हुई मदिरा नागसेन
को देने के लिए कहता है। देवसोमा जब उसे देने लगती है तो नागसेन मन
ही मन तो बहुत प्रसन्न होता है लेकिन उसे डर है कि कोई देख लेगा—
'अहो सुहोवणदो अब्भुदओ। एत्तओ दोसो—महाजणो पेक्खिस्सदि। [अहो
सुखोपगतोऽभ्युदयः। एतावान् दोषो महाजनो द्रक्ष्यति ।] लेकिन कपाली
भी उसके लड़खड़ाते स्वर से उसका आशय समझ जाता है—
'इयमस्य इच्छाविरोधिनी वाक् मुखप्रसेकेन स्खलति ।।
देवसोमा कपाली से कहती है कि वह नागसेन प्रेम से कपाल नहीं
देगा, अतः झगड़ा करके ही लेना चाहिए। दोनों में झगड़ा होता है और
नागसेन हाथ से कपाली को धकेलता हुआ पैर से मारता है और कपाली
गिर पड़ता है। देवसोमा नागसेन के बालों को खींचने के प्रयास में सिर पर
बाल न होने के कारण गिर पड़ती है। नागसेन प्रसन्न होकर मन ही मन कहता
है—'अघं बुद्धस्स विण्णाणं जेण मुण्डणं दिट्ठं ।' [अहं बुद्धस्य विज्ञानं, येन
मुण्डन दृष्टम् ।] फिर वह गिरी हुई देवसोमा को हाथ पकड़कर उठाने लगता
है तो कपाली चिल्लाता है, अरे माहेश्वरो ! देखो—'अनेनभिक्षुनामधारकेण
नागसेनेन मम प्रियतमा पाणिग्रहणं क्रियमाणम् ।'
नागसेन कहता है कि 'ऐसी बात नहीं है, विपत्ति में गिरे हुए पर
दया करना हमारा धर्म है', इस पर कपाली कहता हैं कि अगर ऐसी बात है
तो पहले वह (कपाली) गिरा था उसे उठाना चाहिए था—'किमयमपि सर्वज्ञः
धर्मः । नन्वहं पूर्वपतितोऽस्मि ।'
उन्मत्तक का चरित्र भी हास्य रस की ही सृष्टि करता है। उसी को
कपाली का भिक्षा पात्र शूल्यमाँस से युक्त होने के कारण कुत्ता ले भागा था
और उस पागल ने उसी से वह कपाल प्राप्त किया था। वह झगड़ते हुए इन
लोगों के पास जाता है और पाशुपत को, जो समझौता कराने आया था, वह
कपाल देना चाहता है। फिर नागसेन के कहने पर वह कपाली को देता है
परन्तु दूसरे ही क्षण छीन कर जाने लगता है। उसे वह सोने का पात्र ही