मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका १७
न्यायालय में जाने के लिए कहता है, परन्तु देवसोमा कहती है कि तब तो
कापालिक हार जाएगा क्योंकि धनी बौद्ध वरिष्ठ न्यायकर्ताओं को रिश्वत
(प्रलोभन) देकर अपने पक्ष में कर लेगा। बभ्रुकल्प उनकी शङ्का को दूर
करता है और न्याय दिलाने के लिए आश्वासन देता है।
इसी क्षण एक पागल व्यक्ति हाथ में कापालिक के ही कपाल को
लिए प्रवेश करता है, जिसे उसने एक पागल कुत्ते से प्राप्त किया था। वह
उसे पाशुपत बभ्रुकल्प को देता है। तभी कापालिक अपने पात्र को पहचान
लेता है और लेना चाहता है, परन्तु तभी वह पागल उस कपाल को लेकर
भागता है और कापालिक के कहने पर सब उसे पकड़ लेते हैं। तब वह
उस कपाल को देकर चला जाता है।
सब प्रसन्न होते हैं। कापालिक नागसेन से क्षमा मांगता है और
भरत-वाक्य के साथ प्रहसन समाप्त होता है।
'मत्तविलास' में हास्य-रस
'मत्तविलास' एक शुद्ध कोटि का प्रहसन है। प्रहसन होने के कारण
यह हास्य-रस प्रधान है। संस्कृत नाटकों में हास्य रस की सृष्टि के लिए
विदूषक की योजना की जाती है। परन्तु प्रहसन में सभी पात्रों की योजना
हास्य रस के लिए ही होती है। रूपकों में कोई सामान्य व्यक्ति यदि विकृत
आकृति वेष-भूषा और विकृत अनुकरण आदि करे तो उतनी हँसी नहीं आती
जितनी सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठित ब्राह्मण, पण्डित, भिक्षु आदि की
विकृत चेष्टाओं जैसे फिसलना, गिरना, नाचना आदि देखकर आती है।
इसीलिए विदूषक भी ब्राह्मण होता है और प्रहसन के पात्र भी विभिन्न
धार्मिक सम्प्रदायों के पाखण्डी ब्राह्मण, भिक्षु आदि ही होते हैं। वास्तव में
मानव जीवन में विपरीतता या विषमता ही हास्य रस को उत्पन्न करती है।
यह हास्य रस कई प्रकार का होता है। कहीं पात्रों की विचित्र
वेष-भूषा के माध्यम से, कहीं अभिनय द्वारा, कहीं घटना के माध्यम
से तो कहीं विचित्र प्रसङ्ग के आधार पर हास्य रस की सर्जना होती है।
'मत्तविलास' की कथा केवल एक भिक्षा पात्र पर आधारित है और
यह प्रारम्भ से अन्त तक हास्यपूर्ण है। सूत्रधार ने अपनी छोटी पत्नी के
साथ बहुत दिनों तक रमण किया जिसके फलस्वरूप उसकी बड़ी पत्नी
क्रोधित हो जाती है। सूत्रधार जब उसके पास आता है तो वह कहती है कि