केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८९
वाक्य-भाष्य
[संस्कृत-मूल]
श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धिभिर्नित्य-
सर्वविज्ञान ईश्वरे सर्वात्मनि सर्व-
शक्तौ सिद्धेऽपि शास्त्रार्थनिश्च-
यार्थमुच्यते । तस्येश्वरस्य सद्भाव-
सिद्धिः कुतो भवतीत्युच्यते ।
यदिदं जगद्देवगन्धर्वयक्षरक्षः-
(ईश्वरस्य जगन्नियन्तृत्व-निरूपणम्) पितृपिशाचादि-
लक्षणं द्युवियत्पृथिव्यादित्यचन्द्रग्रह-
नक्षत्रविचित्रं विविध-
प्राण्युपभोगयोग्यस्थानसाधन-
सम्बन्धि तदत्यन्तकुशलशिल्पि-
भिरपि दुर्निर्माणं देशकाल-
निमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्ति-
क्रममेतद्भोक्तृकर्मविभागज्ञप्रयत्न-
पूर्वकं भवितुमर्हति; कार्यत्वे
सति यथोक्तलक्षणत्वात् । गृह-
प्रासादरथशयनासनादिवत् ।
विपक्ष आत्मादिवत् ।
[हिन्दी-अनुवाद]
यद्यपि नित्यसर्वविज्ञानस्वरूप, सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् ईश्वर श्रुति, स्मृति और प्रसिद्धिसे सिद्ध भी है तो भी शास्त्रके अर्थको निश्चय करनेके लिये यहाँ यह [अनुमान] कहा जाता है । उस ईश्वरके सद्भावकी सिद्धि किस प्रकार होती है ? इसपर कहते हैं—
स्वर्ग, आकाश, पृथिवी, सूर्य, चन्द्र, ग्रह और नक्षत्रोंके कारण विचित्र दीखनेवाला तथा नाना प्रकारके प्राणियोंके उपभोगयोग्य स्थान और साधनोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह जितना देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृगण और पिशाचादिरूप जगत् है वह अत्यन्त कुशल शिल्पियोंद्वारा भी बनाया जाना कठिन है । अतः यह देश, काल और निमित्तके अनुरूप नियमित प्रवृत्ति-निवृत्तिके क्रमवाला जगत् भोक्ता और कर्मके विभागको जाननेवाले किसी चेतनके प्रयत्नपूर्वक ही हो सकता है, क्योंकि कार्यरूप होनेके कारण यह उपर्युक्त लक्षणोंवाला है । जैसे कि गृह, प्रासाद, रथ, शय्या और आसन आदि [सभी कार्यरूप अनित्य पदार्थ देखे जाते हैं]; तथा इसके विपरीत [व्यतिरेकी दृष्टान्तरूप] आत्मा आकाश आदि [नित्य पदार्थ हैं] ।
९० केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य
कर्मण एवेति चेत् ? न । पर- | यदि कहो कि जगत्की उत्पत्ति
[कर्मणाम्-] तन्त्रस्य निमित्तमात्र- | कर्मसे ही है तो ऐसा कहना ठीक
[स्वातन्त्र्यम्] त्वात् । यदिदमुपभोग- | नहीं, क्योंकि कर्म परतन्त्र होनेके
वैचित्र्यं प्राणिनां | कारण केवल उसका निमित्त हो सकता
तत्साधनवैचित्र्यं च देशकाल- | है । [ मीमांसककी युक्तिको स्पष्ट करके
| दिखलाते हैं ] यह जो प्राणियोंके
निमित्तानुरूपनियतप्रवृत्तिनिवृत्ति- | उपभोगकी विचित्रता है तथा उनके
| साधनोंकी विभिन्नता और देश, काल
क्रमं च तन्न नित्यसर्वज्ञकर्तृकम् । | तथा निमित्तके अनुरूप प्रवृत्ति-निवृत्ति-
| का नियमित क्रम है वह किसी नित्य
किं तर्हि ? कर्मण एव तस्या- | सर्वज्ञका रचा हुआ नहीं है । तो
| किसका रचा हुआ है ? [ इसपर कहते
चिन्त्यप्रभावत्वात् सर्वैश्च फल- | हैं—] यह केवल कर्मका ही फल है
हेतुत्वाभ्युपगमात् । सति कर्मणः | क्योंकि वह अचिन्त्य प्रभाववाला है
| तथा सभीने उसे फलके हेतुरूपसे
फलहेतुत्वे किमीश्वराधिक- | स्वीकार किया है । इस प्रकार फलके
कल्पनयेति न नित्यस्येश्वरस्य | हेतुरूपसे कर्मके रहते हुए ईश्वरकी
| अधिक कल्पना करनेसे क्या लाभ है ?
नित्यसर्वज्ञशक्तेः फलहेतुत्वं | अतः नित्य सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान्
| ईश्वरमें फलका हेतुत्व नहीं है ।
चेति चेत् । | सिद्धान्ती—केवल कर्मसे ही उपभोग
न कर्मण एवोपभोगवैचित्र्या- | आदिकी विचित्रता सम्भव नहीं है ।
| किस कारणसे ? क्योंकि कर्म कर्ताके
द्युपपद्यते । कस्मात् ? कर्तृतन्त्र- | अधीन हैं । चेतन पुरुषके यत्नसे
त्वात्कर्मणः । चितिमत्प्रयत्न- | निष्पन्न होनेवाला कर्म उसके प्रयत्नके
निर्वृत्तं हि कर्म तत्प्रयत्नोपरमात्- | निवृत्त होनेसे निवृत्त होकर देशान्तर
| या कालान्तरमें किसी नियत निमित्त-
उपरतं सद्देशान्तरे कालान्तरे | विशेषकी अपेक्षासे ही कर्ताको फलकी
वा नियतनिमित्तविशेषापेक्षं | प्राप्ति करावेगा—ऐसी व्यवस्था होनेके
| कारण यह कहना उचित नहीं कि वह
कर्तुः फलं जनयिष्यतीति न युक्त- | अपने किसी दूसरे प्रवर्त्तककी अपेक्षा
मनपेक्ष्यान्यदात्मनः प्रयोक्तृ । | न करके ही फल दे देता है । यदि