कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
About this granth
The Kalki Purana (कल्कि पुराण) is an Upapurana devoted to Kalki, the tenth avatar of Vishnu, who is to appear at the close of the Kali Yuga. Tradition attributes it to Vedavyasa. It is arranged in three amshas (parts) and opens as an account of things to come, told by Shuka to Markandeya and other sages.
This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi translation. A note at the front points out that the Purana speaks of future events in the past tense, saying that Kalki 'was born' in the village of Shambhala. The contents include the miseries of the Kali age, Kalki's birth and the weapons he receives from Shiva, the story of Padma and the parrot, Kalki's journey to Simhala and his marriage to Padma, the tale of the sage Ananta, battles with the Bauddhas and the demoness Kuthodari, the coming of Maru and Devapi, the lunar dynasty, the return of the Satya Yuga and the war with King Shashidhvaja.
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षोडश अध्याय-३ ] [ ४७५
देवाश्च परिसन्तुष्टास्तवावेक्षणपूजनात् ।१९।
यत्पूजाया भवेत्पूज्यो विष्णुर्यन्मम दर्शनम् ।
पापसंघ स्पर्शनाच्च किमहो साधुसङ्गत ।२०।
साधूना हृदय धर्मो वाचो देवा सनातनाः ।
कर्मक्षयाणि कर्माणि यतः साधुर्हरि. स्वयम् ।२१।
उस अवसर पर प्रफुल्लित हृदय वाले विष्णुयश जी ने उन
दोनो का विधिवत् पूजन किया और फिर उन्होने वीणापाणि विष्णु
भक्त नारदजी से विनय पूर्वक कहा ।१७। विष्णुयश बोले—मेरा अहो-
भाग्य है । सौ जन्मो से संचित पुन्य के प्रभाव से ही आप परम पूर्ण
पुरुषो के दर्शन मेरे मोक्ष के उद्देश्य से ही प्राप्त हुए हैं ।१८। आपके
दर्शन और पूजन के होने से हमारे पितरो की भी तृप्ति हो गई तथा
अग्नि मे दी हुई आहुत के सफल होने से देवगण भी सन्तुष्ट हो गए हैं
।१९। जिनके पूजन मे भगवान् विष्णु का पूजन निहित है, उनके दर्शन
मात्र से ही पुनर्जन्म का नाश हो जाता है । उनके स्पर्श मात्र से पापो के
पुञ्ज भी समूल मिट जाते हैं । ऐसे साधुओ का सग भी अद्भुत ही है
।२०। साधुओ का हृदय धर्म, वाणी सनातनदेव और कर्म ही कर्म को
क्षीण करते हैं । इस प्रकार साधु ही साक्षात् हरि हैं ।२१।
मन्ये न भौतिको देहो वैष्णवस्य जगत्त्रये ।
यथावतारे कृष्णस्य सतो दुष्टयिविग्रहे ।२२।
पृच्छामि त्वामतो ब्रह्मन्मायांसंसारवारिधौ ।
नौकाया विष्णुभक्त्या च कर्णधारोऽसि पारकृत् ।२३।
केनाहं यातनागारान्निर्वाणपदमुत्तमम् ।
लप्स्यामीह जगद्बन्धो कर्मणा शर्म तद्वद ।२४।
अहो बलवती माया सर्वाश्चर्यमयी शुभा
पितर मातर विष्णुर्तैव मुञ्चति कर्हिचित् ।२५।
पूर्णो नारायणो यस्य सुत. कल्किर्जगत्पतिः
४७६ ] [ कल्कि पुराण
त विहाय विष्णुयशा मत्तो मुक्तिमभीप्सति ।२६।
दुष्टो को दण्ड देने वाला श्रीकृष्णावतार जिस प्रकार भौतिक
देह से युक्त नही है, वैसे ही तीनो लोको मे विष्णु भक्तो के शरीर भी
पञ्चभूत से युक्त प्रतीत नही होते ।२२। हे ब्रह्मन् ! इस माया मय ससार
सागर मे आप ही विष्णुभक्ति रूपिणी नौका के द्वारा पार कराने वाले
हैं । इसी लिये मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ ।२३। हे विश्ववन्द्यो !
आप मुझे यह बताने की कृपा करिये कि मै इस ससार रूपी यातनागार
से मुक्त होकर श्रेष्ठ निर्वाणपद को किस कर्म के द्वारा प्राप्त कर सकता
हूँ ? ।२४, नारदजी ने कहा—अहो ! यह माया कैसी आश्चर्यमयी,
उज्वला ओर बलवती है, जिसके प्रभाव से स्वय भगवान् भी अपने पिता
माता को मुक्त नही करा पाते ।२५। जिन विष्णुयशजी के पुत्र साक्षात्
भगवान् जगत्पति कल्कि हैं,वे मुझसे मोक्ष की कामना व्यक्त करतेहैं।२६।
विविच्येत्थ ब्रह्मसुतः प्राह ब्रह्मयशः सुतम् ।
विविक्ते विष्णुयशस ब्रह्मसम्पद्विवर्द्धनम् ।२७।
देहावसाने जीव सा दृष्ट्वा देहावम्बनम् ।
मायाऽह कर्तुं मिच्छन्त यन्मे तच्छृणु मोक्षदम् ।२८।
विन्ध्याद्रौ रमणी भूत्वा मायोवाच यथेच्छया ।२
अह मोया मया त्यक्त कथजोवतुमिच्छसि ।३०।
नाह जीवाम्यह माये कायेऽस्मिञ्जीवनाश्रये
अहमित्यन्यथाबुद्धिर्विना देह कथ भवेत् ।३१।
देहबन्धे यथाश्लेपास्तथ बुद्धि कथ तव ।
मायाधीनां विना चेष्टा ते कुतो वद ।३२।
ब्रह्मसुवन नारदजी ने यह सोच कर ब्रह्मज्ञान देने के विचार से
विष्णुयशजी से कहा ।२७। नारदजी बोले—जब देह के नष्ट होने पर
पुनः देह का आश्रय प्राप्त करने की जीव ने कामना की तब माया ने जो
कुछ कहा था, उसे सुनो ! इसके सुनने से ही मोक्ष मिल जाता है ।२८।
उन भगवती माया ने विन्ध्याचल पर स्वेच्छा से नारी रूप धारण करके
षोडश अध्याय-३ ] [ ४७७
कहा ।२६। माया बोली- मै माया हूँ । जब मैने तुम्हारा त्याग कर
दिया है, तब तुम पुनर्जीवन प्राप्त करने की इच्छा क्यो करते हो ? । ३०।
इस पर जीव ने कहा- हे माये ! मैं तो जीवन की इच्छा नही करता,
परन्तु जीवन का श्राश्रय शरीर ही है । मह रूपी अभिमान के बिना
देह धारणा ही किस प्रकार सभव है ? ।३१। माया बोली देह धारण पर
पर जो भेद ज्ञान होता है, तब तुम्हारी बुद्धि उस प्रकार की क्यो होती
है ? जब चेष्टा माया के बिना सम्भव नही, तब माया रहित तुम्हारी
चेष्टा किस प्रकार होती है ? ।३२।
• मां विना प्राज्ञता माये प्रकाशविषयस्पृहा
मायया जीवति मरश्चेष्टते हतचेतनः ।
निःसारः सारवद्भाति गजभुक्तकपित्थवत् ।३४।
मम ससर्जजाता त्व नानानामस्वरूपिणी ।
मा विनिन्दसि कि मूढे स्वैरिणी स्वामिन यथा ।३५।
ममाभावे तवाभाव प्रोद्यत्सूर्ये तमो यथा ।
मामावर्य विभासि त्व रविनवघनो यथा ।३६।
लीलाबीजकुशूलासि मम माये जगन्मये :
नाद्यन्ते मध्यतो भासि नानात्वादिन्द्रिजालवत् ।३७।
जीव ने कहा- हे माये ! तुम्हारी प्राज्ञता मेरे बिना प्रकाशित
नही हो सकती और न फिर विषय मे स्पृहा ही सम्भव है । ३३। माया
बोली- जीव का जीवन धारण माया से ही हो सकता है । माया से
रहित जीव हाथी द्वारा भक्षित कपित्थ फल के समान सारहीन होता है
।३४। जीव बोला- हे मूढ़े ! तूने हमारे ही ससर्ग से उत्पन्न होकर
नाना प्रकार के नाम और रूप धारण कर लिये हैं । स्वामी की निन्दा
करने वाली स्वैरिणी नारी के समान तू हमारी निन्दा क्यो कर रही
है ? ।३५। जैसे सूर्योदय होने पर अन्धकार का अभाव हो जाता है, वैसे
ही मेरे अभाव मे तेरा भी अभाव निहित है । जैसे सूर्य को आवृत्त करता
४७८ ] कल्कि पुराण
हुआ मेघ शोभा पाता।, वैसे ही तुम भी मुझे ढक कर शोभा को प्राप्त
होती हो ।३६। हे माये ! तुम लीला रूपी बीज की भुसी के समान हो ।
अनेकत्व की कारण रूपा भी तुम्ही हो तथा ससार के आदि, अन्त
और लय मे इन्द्रजाल की भाति सुशोभित होती हो ।३७।
एवं र्निवषय नित्य मनोव्यापारवर्ज्जितम् ।
अभौतिकमजीवञ्च शरीर वीक्ष्य सा त्यजत् ।३८।
त्यक्त्वा मा सा ददौ शापमिति लोके तवाप्रिय
न स्थितिर्भवता काष्ठकुडद्योपम कथञ्चन ।३६।
सा माया तव पुत्रस्य कल्केर्विश्वात्मनः प्रभोः ।
ता विज्ञाय यथाकाम चर गा हरिभावन ।४०।
निराशो निर्मम. शान्त. सर्वभोगेषु निस्पृहः ।
विष्णौ जगदिद ज्ञात्वा विष्णुर्जगति वासकृत् ।
आत्मनात्मानमावेश्य सर्वतो विरतो भव ।४१।
एव त विष्णुयशसमान्त्र्य च मुनीश्वरौ ।
कल्कि प्रदक्षिणीकृत्य जग्मतुः कपिलाश्रमम् ।४२।
इस प्रकार निर्विषय, मानसिक व्यापार और अभौतिक शरीर
से परे उस शरीरधारी को देख कर माया ने उसका त्याग कर दिया
।३८। उस समय माया ने मेरा त्याग करते हुए यह शाप दिया कि हे
जीव ! तू अप्रिय है , तू काठ की भीत के समान निश्चेष्ट एव लोक मे
सर्वथा स्थिति-हीन होगा ।३६। नारदजी बोले— हे प्रभो ! तुम्हारे पुत्र
विश्वात्म कल्किजी ने ही इस माया को उत्पन्न किया था। तुम उस
माया के तत्व को जानते हुए भगवान् विष्णु के ध्यान मे रत रहते हुए
स्वेच्छापूर्वक भ्रमण करो ।४०। जब तुम आशा और ममता को त्याग
कर और सभी भोगो से परे होकर शान्त चित्त हो जाओगे, तब तुम्हे
इसका ज्ञान होगा कि यह विश्व भगवान् विष्णु के विराट् प्रभाव मे
प्रतिष्ठित है तथा भगवान् विष्णु इस लक्षित जगत् में व्याप्त हैं। इस
प्रकार के ज्ञान से जीवात्मा और परमात्मा मे अभेद मानते हुए सभी
षोडश अध्याय-३ ] [ ४७६
कामनाओं से मुक्त हो जाओ ।४१। इस प्रकार विष्णुयश जी को ज्ञान
देकर और कल्किजी की प्रदक्षिणा कर दोनों मुनीश्वरो ने कपिलाश्रम के
लिए प्रस्थान किया ।४२।
नारदेरितमाकर्ण्य कल्कि सुतमनुत्तमम् ।
नारायणं जगन्नाथं वन विष्णुयशा ययौ ।४३।
गत्वा बदरिकारण्यं तपस्तप्त्वा सुदारुणम् ।
जीव बृहति सयोज्य पूर्णस्तत्याजय भौतिकम् ।४४।
मृत स्वामिनमालिङ्गच सुमतिः स्नेहविक्लवा ।
विवेश दहन साध्वी सुवेशैर्दिवि संस्तुता ।४५।।
कल्किः श्रुत्वा मुनिमुखात्पित्रोर्निर्वाणमीश्वरः ।
सवाष्पनयन स्नेहात्तयोः समकरोत्क्रियाम् ।।४६।।
पद्मया रमया कल्किः शम्भले सुरवाञ्छिते ।
चकार राज्य धर्मात्मा लोकवेदपुरस्कृत ।४७।
महेन्द्रशिखराप्रामस्तीर्थपर्यटनादृत. ।
प्रायात्कल्केर्दर्शनार्थ शम्भल तीर्थकृत् ।४८।
विष्णुयशजी ने देवर्षि नारद के मुख से यह सुन कर और जान
कर कि मेरे पुत्र ही भगवान् नारायण जगदीश्वर हैं, स्वयं वन के लिए
प्रस्थान किया ।४३। वह वहाँ से चल कर बदरिकाश्रम पहुंचे और वहाँ
घोर तप करके अपने आत्मा को ब्रह्म मे सयुक्त कर दिया तथा पच-
भूतात्मक देह को छोड कर पूर्ण स्वरूप हो गए ।४४। अपने पति की
मृत्यु हुई सुन कर सुमति स्नेह से विह्वल होकर अपने पति के साथ
चिता में प्रविष्ट हो गई। उस समय श्रेष्ठ वस्त्र भूषण को धारण किये
हुए देवलोक स्थित देवगण उनकी स्तुति करने लगे ।४५। कल्किजी ने
मुनियो के मुख से अपने माता-पिता का महाप्रयाण सुन कर स्नेह-जल
से परिपूर्ण नेत्रो के सहित उनका श्राद्धादि कर्म किया ।४६। फिर लोका
चार और धर्माचार में स्थित कल्किजी देवताओ द्वारा कामना किये हुए
शम्बल ग्राम मे रमा और पद्मा के सहित राज्य करने लगे ।४७। तीर्था-
४८० ] [ कल्कि-पुराण
टन मे संलग्न परशुरामजी महैन्द्र पर्वत के शिखर से उतरते हुए कल्कि
जी के दर्शनार्थ शम्भल ग्राम मे पधारे ।४८।
तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय पद्मया रमया सह ।
कल्किः प्रहर्षो विधिवत्पूजाञ्चक्रे विधानवित् ।४९।
नानारसैर्गुरामयैर्भोजयित्वा विचित्रिते ।
पर्यङ्केऽनकवस्त्राढ्ये शाययित्वा मुदं ययौ ५०।
तं भुक्तवन्तं विश्रान्तं पादसंवाहनैर्गुरुम् ।
संतोष्य विनयापन्नं कल्किर्मधुरमब्रवीत् ।५१।
तव प्रसादात्सिद्धं मे गुरौ त्रैवर्गिकञ्च यत् ।
शशिध्वजततायास्तु भृगु राम निवेदितम् ।५२।
इति पतिवचनं निशम्य राम निजहृदयेप्सितपुत्रलाभामष्टम् ।
व्रतजपनियमैर्यमैश्च कैर्वा मम भवतीह मुदाह जामदग्न्यम् ५३
उन्हे देखते ही पद्मा और रमा के सहित कल्किजी अपने सिहं-
सन से उठ पडे और विधि विधान सहित हर्षित मन से उनका पूजन
करने लगे ।४६। विभिन्न रसो से युक्त अन्नादि का उन्हे भोजन कराके
सुन्दर वस्त्रो से ढकी हुई अद्भुत शय्या पर उन्हे शयन कराया ।५०।
जिस समय गुरुवर परशुरामजी विश्राम कर रहे थे, उसी समय कल्किजी
उनके चरण दाबते हुए विनय पूर्वक मधुर वाणी से कहने लगे ।५१।
हे गुरो ! आपकी कृपा से मेरे धर्म, अर्थ और काम-इन तीनो वर्ग की
सिद्धि हो चुकी है । इस समय राजा शशिध्वज की पुत्री रमा आपसे एक
निवेदन करना चाहती है, उसे सुनने की कृपा करे ।५२। पति के वचन
सुन कर हर्षित हृदय से रमा ने परशुरामजी से प्रश्न किया—व्रत, जप,
नियम आदि मे ऐसा कौन-सा अनुष्ठान है, जिसके द्वारा मुझे इच्छित्
पुत्र की प्राप्ति हो सकती है ? ।५३।
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तृतीयांश-
सप्तदश अध्याय
जामदग्न्यः समाकर्ण्य रमांत्ता पुत्रगद्धिजीम् ।
कल्केरभिमतं बुद्ध्वाकारयद्रुक्मिणीव्रतम् ।१।
व्रतेन तेन च रमा पुत्राढ्या सुभगा सती ।
सर्वभोगेन सयुक्ता बभूव स्थिरयौवना ।२।
विधान ब्रूहि मे सूत व्रतस्यास्य च यत्फलम्
पुरा केन कृतं धर्म्यं रेक्मिणीव्रतमुत्तमम् ।३।
शृणु ब्रह्मन् राजपत्री शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ।
अवगाह्य सरोनीर सोम हरमपश्यत ।४।
सा सखोभिः परिवृता देवयान्या च सगता ।
शम्भुभीत्या समुत्थाय पर्यधुर्वासन द्रुतम् ।५।
सूतजी बोले —हे ऋषियो ! रमा को पुत्र की अभिलाषिणी जान
कर और कल्किजी के अभिप्राय को समझ कर परशुरामजी ने उसे
रुक्मिणी व्रत का उपदेश किया ।१। उस व्रत के प्रभाव से शशिध्वज
पुत्री रमा पुत्रवती, सौभाग्य सम्मन्ना, सर्व भोगों से परिपूर्ण एवं स्थिर
यौवन हो गई ।२। शौनरुजी ने कहा —हे सूतजी ! उस रुक्मिणी व्रत
का विधान और फल मुझे बताइये और साथ ही यह भी कहिये कि इस
अत्यन्त उत्तम व्रत को पहिले किस ने किया था ? ।३। सूतजी ने कहा —
हे ब्रह्मन् ! आपने जो पूछा है, वही कहता हूँ, सुनिये । दैत्यपति वृषपर्वा
की पुत्री शर्मिष्ठा थी । एक दिन वह सरोवर के जल मे घुल कर विहार
रत हुई थी, तभी उसने पार्वती सहित भगवान् शंकर को वहाँ देखा
४८१
४८२ ] [ कल्कि पुराण
।४। तब शर्मिष्ठा, देवयानी और अन्यान्य सखियां सभी भयभीत होकर
सरोवर से निकल कर तट पर आ गई और अपने-अपने वस्त्रो को
धारण करने लगी ।५।
तत्र शुक्रस्य कन्याया वस्त्रवत्ययमात्मनः ।
सालक्ष्य कुपिता प्राह वसनं त्यज भिक्षुकि ।६।
इति दानवकन्या सा दासीभि परिवारिता ।
तां तस्या वाससा बद्ध्वा कूपे क्षिप्त्वा गता गृहम् ।७।
ता मग्ना रुदती कूपे जलार्थी नहुषात्मजः ।
करे स्पृश्य समुद्धृत्य प्राह का त्व वरानने ।८।
सा शुक्रपुत्री वसनं परिधाय ह्रिया भिया ।
शर्मिष्ठायाः कृतं सर्वं प्राह राजानमीक्षती ।६।
ययातिस्तदभिप्रायं ज्ञात्वानुव्रज्य शोभनम् ।
आश्वास्य तां ययो गेहं तस्याः परिणायाहतः ।१०।
तभी शीघ्रता और विह्वलता के कारण दैत्यगुरु शुक्राचार्य
की पुत्री देवयानी ने भूल से शर्मिष्ठा के वस्त्र धारण कर लिये । यह
देख कर शर्मिष्ठा क्रोधित होकर बोली—अरी भिक्षुकी ! तू मेरे वस्त्रो को
उतार दे ।३। इसके पश्चात उस दैत्यराज पुत्री शर्मिष्ठा ने देवयानी को
वस्त्रो से बाँध कर एक कुए मे डाल दिया और दासियो के सहित घर
चली गई ।७। कूप मे गिरी हुई देवानी रुदन करने लगी, तभी नहुष-
पुत्र राजा ययाति जल पीनेकी इच्छासे उस कूप पर पहुँचे । उन्होंने देव-
यानी का हाथ पकड कर कूपसे निकाला और बोले-हे वरानने ! तुम कौन
हो-यह बताओ ।८। शुक्रपुत्री देवयानी ने राजा की ओर लज्जा और भय
से देखते हुए शीघ्रता पूर्वक वस्त्र पहिने और शर्मिष्ठा ने जो कुछ किया
था वह सब उन्हे कह सुनाया ।६। देवयानी के अभिप्राय को जान कर
राजा ययाति ने उसका पाणिग्रहण करने की अभिलाषा प्रकट की और
फिर कुछ दूर तक उसके साथ-साथ चलते हुए, उसे हर प्रकारका आश्वा-
सन देकर अपने घर को चले गये ।१०!
सप्तदश अध्याय-३ ] [ ४८३
सा गत्वा भवनं शुक्रं प्राह शर्मिष्ठया कृतम् ।
तच्छ्रुत्वा कुपितं विप्रं वृषपर्वाहि सान्त्वयन् ॥११।
दण्ड्यं मां दण्डय विभो कोपो यद्यस्ति ते मयि ।
शर्मिष्ठां वाप्यपकृतां कुरु यन्मनसेप्सितम् ॥१२।
राजानं प्रणतं पादे पितुर्दृष्ट्वा रुषाब्रवीत् ।
देवयानी त्वियं कन्या मम दासो भवत्विति ॥१३।
समानीय तदा राजा दास्ये तां विनियुज्य सः ।
ययौ निजगृहं ज्ञानी दैव परमकं स्मरन् ॥१४।
तत शुक्रस्तमानीय ययातिं प्रतिलोमकम् ।
तस्मै ददौ तां विधिवद्देवयानीं तया सह ॥१५।
इधर देवयानी ने अपने घर पहुँच कर शुक्राचार्यजी को शर्मिष्ठा
की सब करतूत सुनाई, जिससे वे अत्यंत क्रोधित हुए । तब दैत्यराज वृष-
पर्वा ने उन्हे सान्त्वना दी ॥११॥ वह बोला—हे विभो ! यदि आप मुझ
पर कुपित हो तो मुझे दड दीजिए अथवा अपकार करने वाली शर्मिष्ठा
को दण्ड देना चाहे तो उसे दडित करिये ॥१२॥ दैत्यपति वृषपर्वा को अपने
पिर्ता के चरणो मे पडा हुआ देख कर देवयानी ने उससे कहा—हे राजन्
आपकी पुत्री शर्मिष्ठा मेरी दासी बने ॥१३॥ यह सुन कर दैवगति को
प्रबल मानते हुए दैत्यराज ने शर्मिष्ठा को बुला कर उसे देवयानी की
दासी बना दिया और फिर अपने घर को चला गया ॥१४॥ फिर शुक्रा-
चार्य ने राजा ययाति को विधि विधान सहित अपनी पुत्री देवयानी का
कन्यादान कर दिया । उसके साथ उसकी दासी शर्मिष्ठा भी प्रदान कर
दी गई ॥१५॥
दत्वा प्राह नृप विप्रोऽप्येनां राजसुतां यदि ।
शयने ह्वयसे सद्यो जरा त्वामुपभोक्ष्यति ॥१६।
शुक्रस्यैतद्वचः श्रुत्वा राजा तां वरवर्णिनीम् ।
अदृश्या स्थापयामास देवयान्यनुगा भिया ॥१७।
सा शर्मिष्ठा राजपुत्री दुःखशोकभयाकुला ।
४८४ ] [ कल्कि पुराण
नित्य दासीशताकीर्णा देवयानीन्तु सेवते ।१८।
एकादा सा वनगता रुदती जान्हवीतटे ।
विश्वामित्रं मुनि सा त ददृशे स्त्रीभिरावृतम् ।१६।
व्रतिनं पुण्यगन्धाभि सुरूपाभिः सुवासितम् ।
कारयन्तं व्रतं माल्यधूपदीपोपहारकैः ।२०।
राजसुता शर्मिष्ठा को देते हुए शुक्राचार्य ने राजा ययाति से
कहा कि हे राजन् ! यदि इसे कभी अपने शयनागार मे बुलाएँगे तो
उसी समय वृद्ध हो जाएगे ।१६। शुक्राचार्य के वचनो से भय को प्राप्त
हुए राजा ययाति ने अत्यन्त रुपवती शर्मिष्ठा को ले जाकर ऐसे स्थान
मे रख दिया, जहाँ पर उनकी दृष्टि भी न पड सके ।१७। अत्यन्त ही
दुखिता, शोक और भय से व्याकुला राजपुत्री शर्मिष्ठा सैकडो दासियो
के साथ देवयानी की सेवा मे तत्पर रहती थी ।१८। एक दिन वह
शर्मिष्ठा जाह्नवी के तीर पर बैठी हुई रो रही थी, तभी उसकी दृष्टि
स्त्रियो से घिरे हुए विश्वामित्र पर पडी ।१९। वे व्रती महर्षि विश्वामित्र
सुगन्धित द्रव्यो से सुवासित हो रहे थे । अनेक सुन्दर नारियाँ उनके चारो
ओर बैठी हुई थी । धूप, दीप, माला तथा अनेक प्रकार के उपहारो के
द्वारा विश्वामित्र उन स्त्रियो से व्रत-अनुष्ठान करा रहे थे ।२०।
निर्मायाष्टदलं पद्म वेदिकाया सुचिन्हितम् ।
रम्भापोतैश्चतुर्भिश्च चतुष्कोणं विराजितम् ।२१।
वाससा निर्मितगृहे स्वणपट्टैर्विचित्रिते ।
निर्मितै श्रीवासुदेवं नानारत्नविघट्टितम् ।२२।
पौरुषेण च सूक्तेन नानागन्धोदकै शुभैः ।
पञ्चामृतैः पञ्चगव्यैर्यथामन्त्रैर्द्विजेरितैः ।२३।
स्नापयित्वा भद्रपीठे कर्णिकायां प्रपूजयेत् ।
स्नामयित्वा भद्रपीठे कर्णिकाया प्रपूजयेत् ।
पञ्चभिर्दशभिर्वापि षोडशैरुपचारकैः ।२४।
सप्तदश अध्याय-३ ] [ ४८५
पाद्यमध्वश्रमहर शीतलं सुमनोहरम् ।
परमानन्दजनकं गृहाण परमेश्वर ।२५।
उन्होने वेदी पर अष्टदल कमल बनाया और वेदी के चार कोरणो
मे कदली वृक्ष स्थापित किये ।२१। वस्त्रो से बने हुए मण्डप में एक
स्वर्ण निर्मित आसन पर भगवान् वसुदेवकी विविध रत्नालङ्कारोसे अलंकृत
प्रतिमा प्रतिष्ठित थी ।२२। उन्होने पुरुष सूक्त का पाठ करते हुए विभिन्न
सुगन्धो से युक्त जल, पञ्चामृत, पञ्चगव्य आदि सिद्ध किया और
ब्राह्मणो के द्वारा उच्चारण किये हुए मन्त्र से भद्रपीठा स्थित कर्णिका
पर भगवान् श्रीवासुदेव को विराजमान किया । फिर सोलह पन्द्रह अथवा
दश उपचारो से उनका पूजन किया ।२३ २४। हे परमेश्वर । आपका
श्रम दूर करने के निमित्त यह परमान्न्द का देने वाला सुन्दर पाद्य निवे-
दित है । इसे स्वीकार कीजिये ।२५।
दूर्वाचन्दनगन्धाढ्यमर्घ्यं युक्तं प्रयत्नतः ।
गृहाण रुक्मिणीनाथ प्रसन्नस्य मम प्रभो ।२६।
नानातीर्थोद्भवं वारि सुगन्धि सुमनोहरम् ।
॰गृहाणाचमनीयं त्वं श्रीनिवास श्रिया सह ।२७।
नानाकुमुमगन्धाढ्यं सूत्रग्रथितमुत्तमम् ।
वक्ष शोभाकरं चारु माल्यं नय सुरेश्वर ।२८।
तन्तुसन्तानसन्धाग्चितं बन्धनं हरे ।
गृहाणावर शुद्धश्च निरावरणा सप्रिय ।२६
यज्ञसूत्रमिदं देव ! प्रजापतिविनिर्मितम् ।
गृहाण वासुदेव स्वं रुक्मिण्या रमया सहँ ।३०।
हे रुक्मिणी नाथ ? हे वासुदेव प्रभो ! दूर्वा से युक्त यह चन्दन-
चर्चिन अर्घ्य यत्न पूर्वक स्थापित किया है, इसे प्रसन्न होकर स्वीकार
कीजिये ।२३। हे श्रीनिवास ! यह अनेक तीर्थों का पवित्र जल संग्रहीत
है । आप इस सुरम्य जलको आच मनीय द्वारा लक्ष्मीजी के सहित ग्रहण
कीजिये ।२७। हे सुरेश्वर ! यह माला अनेक प्रकार के पुष्पो से निर्मित
४८६ ] [ कल्क पुराण
हुई है इसके द्वारा आपके वक्षस्थल की शोभावृद्धि होगी । इस श्रेष्ठ
माला को आप ग्रहण कीजिये ।२८। हे हरे ! आपको आवृत्त करने मे
कोई भी समर्थ नही है । आप अपनी प्रिया लक्ष्मी जी के सहित इस सूत्र-
सथान द्वारा निर्मित शुद्ध वस्त्रावरण को स्वीकार कीजिये ।२६। हे देव !
यह सूत्र प्रजापति द्वारा निर्मित हुआ है इसे आप अपनी पत्नी रुक्मिणीजी
के सहित ग्रहण कीजिये ३०।
नानारत्नसमायुक्त स्वर्णमुक्ताविघट्टितम्
प्रियया सह देवेश गृहाणाभरण मम ।३१।
दधिक्षीरगुडान्नादिपूपलड्डुकखण्डकान् ।
गृहाण रुक्मिणीनाथ सनाथ कुरु मा प्रभो ।३२।
कर्पूरागुरुगन्धाढ्य परमानन्ददायकम् ।
धूप गृहाण वरद वैदर्भ्या प्रियया सह ।३३।
भक्ताना गेहशक्ताना ससारध्वान्तानाशनम् ।
दीपमालोकय विभो ! जगदालोकनादर ।३४।
श्यामसुन्दर ! पद्माक्ष ! पीताम्बर ! चतुर्भुज ! ।
प्रपन्न पाहि देवेश रुक्मिण्या सहिताच्युत ।३५।
हे देवेश ! हे प्रभो ! विभिन्न प्रकार के रत्नो से युक्त एव स्वर्ण
द्वारा निर्मित इन आभूषणो को आप अपनी प्रिया लक्ष्मीजी के सहित
ग्रहण कीजिये ।३१। हे रुक्मिणीनाथ ! यह दधि,दुग्ध,गुड, अन्न, पुआ
लड्ढू एव शर्करादि को ग्रहण करके मुझे सनाथ कीजिये ।३२। हे वरद !
परमानन्द के देने वाली इस कर्पूर और अगर युक्त गन्ध को आप अपनी
प्रिया के सहित स्वीकार कीजिये ।३३। हे विभो ! आप सस-कामी
भक्तो के अन्धकार को नष्ट करने वाले हैं और आदर सहित जगत् को
अपने प्रकाश से आलोकित कर रहे हैं, इस दीपक का अवलोकन कीजिये
।३४। हे श्यामसुन्दर ! हे कमलाक्ष ! हे पीताम्बरधारी चतुर्भुज ! हे
देवेश ! आप रुक्मिणीजी के सहित प्रसन्न होते हुए हमारी रक्षा
कीजिये ।३५।
सप्तदश अध्याय-३ ] [ ४८७
इति तासां व्रत दृष्ट्वा मुनि नत्वा सुदुःखिता ।
शर्मिष्ठा मिष्टवचना कृताञ्जलिरुवाच ताः ।३६।
राजपुत्री दुर्भगा मां स्वामिना परिवर्जिताम्
त्रातुमर्हथ हे देव्यो व्रतेनानेन कर्मणा ।३७।
श्रुत्वा तु ता वचस्तस्याः कारुण्याञ्च कियत्कियत् ।
पूजोपकरणं दत्त्वा कारयामासुरादरात् ।३८।
व्रत कृत्वा तु शर्मिष्ठा लब्ध्वा स्वामिनमीश्वरम् ।
सूत्वा पुत्रान्सुसन्तुष्टा समभूत्स्थिरयौवना ।३६।
सीता चाशोकवनिकामध्ये सरमया सह।
व्रत कृत्वा पति लेभेरामं राक्षसनाशनम् ।४०।
स्त्रियो को इस प्रकार व्रत करते हुए देख कर शर्मिष्ठा ने मुनि
को प्रणाम किया और हाथ जोड कर बोली ।३६। शर्मिष्ठा ने कहा—हे
देवियो ! मैं अत्यन्त अभागी राज पुत्री हूँ । भाग्य के दोष से ही पति संग-
हीना हूँ । यह व्रत किस प्रकार किया जाता है, मुझे यह बता कर मेरी
रक्षा करिये ।३७। शर्मिष्ठा के वचन सुन कर उन स्त्रियो को दया आ
गई और उन्होंने कुछ पूजन सामग्री उसे देकर उससे आदर पूर्वक व्रत
कराया ।३८। इस व्रत को करके शर्मिष्ठा भी अपने प्रिय पति को प्राप्त
होकर पुत्रवती और स्थिर यौवना होकर संतुष्ट हो गई ।३६। सीता और
सरमा ने भी अशोक वाटिका मे इस व्रत का अनुष्ठान किया था उसी के
पुण्य-फल से सीताजी राक्षस-संहारक भगवान् राम से मिल सकी
थी ।४०।
वृहदश्वप्रसादेन कृतवेमं द्रौपदी व्रतम् ।
पतियुक्ता दुखमुक्ता बभूव स्थिर यौवना ।४१।
तथा रमा सिते पक्षे वैशाखे द्वादशोदिने ।
जामदग्न्याद्व्रतं चक्रे पूर्णं वर्षचतुष्टयम् ।४२।
पट्टसूत्रं करे बद्ध्वा भोजयित्व द्विजान्ब ।
भुक्त्वा हविष्यं क्षीराक्तं सुमृष्टं स्वामिना सह ।४३।
४८८ ] [ कल्कि पुराण
बुभुजे पृथिवी सर्वामपूर्वा स्वजनेवृंता ।
सा पुत्रौमुषुवे साध्वी मेघमालबलाहकौ ।४४।
देवानामुपकर्त्तारौ यज्ञदानतपोव्रतैः ।
महोत्साहौ महावीर्यौ सुभगौ कल्किसम्मतौ ।४५।
व्रतवरमिति कृत्वा सर्वसम्पत्समुद्ध्या भवति विदि-
तनत्त्वा पूजिता पूर्ण कामा । हरिचरणसरोजद्वन्द्वभ-
क्त्यैकताना व्रजति गतिमपूर्वां ब्रह्मविज्ञैरगम्याम् ।४६।
वृहदश्व की प्रेरणा से द्रौपदी ने इस व्रत को किया था और वह
भी दु ख से मुक्त होती हुई पतिमुक्त और स्थिर यौवना हो गई ।४१।
इसके पश्चात् रमा ने परशुरामजी के निर्देशन मे वैशाख शुक्ला द्वादशी
के दिन इस रुक्मिणी व्रत का अनुष्ठान प्रारम्भ किया और चार बर्ष
व्यतीत होने पर उसका समापन किया ।४१। रेशमी सूत्र हाथ मे बाँधते
हुये रमाने ब्राह्मणी को भोजन कराया और क्षीरयुक्त श्रेष्ठ हविष्यान्न का
अपने स्वामी सहित आहार किया । इससे वह स्वजनो से परिपूर्ण होकर
पृथिवी का अखण्ड सुख भोगने लगी । उनके मेघमाल और बलाहक
नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए ।४४। वे दोनो देवताओ के उपकारी, यज्ञ-दान
और तपोव्रत मे निरत रहने वाले, अत्यत उत्साही, महापराक्रमी सौभा-
ग्यवान् तथा कल्किजी की आज्ञा में चलने वाले थे ।४५। इस व्रत को
करने वालो को सब प्रकार सुख, सम्पत्ति और समृद्धि की प्राप्ति होती
है । उनकी सब कामनाएं पूर्ण होती हैं । ब्रह्मज्ञान और हरिचरणो में
प्रीति उत्पन्न होती है, तथा वे श्रेष्ठ गति को प्राप्त होते हैं ।४६।
तृतीयांश-
अष्टदश अध्याय
एतद्वः कथित विप्रा व्रत त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
अतः पर कल्किकृतं कर्मं यच्छ्रृणुत द्विजा ।१।
शम्भले वसत्तस्तस्य सहस्रपरिवत्सरा ।
व्यतीता भ्रातृपुत्रस्वज्ञातिसम्बन्धिभि सह ।२।
शम्भले शुशुभे श्रेणी सभापणकचत्वरै ।
पताकाध्वजचित्राढ्यं यथेन्द्रस्यामरावती ।३।
यत्राष्टषष्टितीर्थाना सम्भव. शम्भलेऽभवत् ।
मृत्योर्मोक्ष क्षितौ कल्केरकतकरय पदाश्रयात् ।४।
वनोपवनसन्ताननाना कुसुम सकुलैः ।
शोभित शम्बल ग्राम मन्ये मोक्षपद भुवि ।५।
सूतजी बोले - हे ब्राह्मणो ! तीनो लोक मे प्रसिद्ध इस रुक्मिणी
व्रत को मैने आपके प्रति कहा है । इसके पश्चात् कल्किजी ने जो कार्य
किये थे, उन्हे कहता हूँ, सुनिये ।१। इस प्रकार कल्किजी अपने भाई,
पुत्र, बांधव और स्वजनो के साथ एक हजार वर्ष तक शम्बल ग्राम में
निवास करते रहे ।२। उस समय वह शम्बल पुरी ध्वजा-पताकादि से
विभूषित हुई सब प्रकार इन्द्र की अमरावती के समान शोभामयी प्रतीत
होती थी ।३। शम्बल ग्राम मे उस काल अठसठ तीर्थ एकत्रित हो गए थे
निष्कलंक कल्किजी की महिमा से शम्बल ग्राम मे मृत्यु होने पर मोक्ष की
प्राप्ति होती थी ।४। वहां के वन-उपवन आदि अनेक प्रकारके सुन्दर पुष्पो
से परिपूर्ण और रमणीय हो रहे थे । तथा शम्बल ग्राम ससार मे मोक्ष
के देने वाला माना जाने लगा था ।५।
तत्र कल्किः पुरस्त्रीणा नयनानन्दवर्धन ।
पद्माया रमया काम रराम जगतीपति. ।६।
सुराधिपप्रदत्तेन कामगेन रथेन वै ।
नदीप्रवंतकुञ्जेषु द्वीपेषु परया मुदा ।७।
रममाणो विशन्पद्मारमाद्याभीरमापति ८
पद्मामुखामोदसरोजशीधुवासोपभोगी सुविलासवास. ।
प्रभूतनीलेन्द्रमणिप्रकाशे गहाविशे प्रविवेश कल्किः ।६।
पद्मा तु पद्माशतस्तरूरूपा रमा च पीयूषलकाविलासा ।
प्रति प्रविष्ट गिरि गह्ववरे ते नारीसहस्तकुलिते त्वगाताम् १०
पद्मा पति प्रेक्ष्यगु हानिविष्टं रन्तु मनोज्ञा प्रविवेश पश्चात्
रमाबलायूथसमन्विता तत्पश्चाद्गता कलिकमहोग्रकामा
नगर निवासिनी नारियो के नयनो की आनन्द-वृद्धि करने वाले
कल्किजी पद्मा औररमा के साथ शभल ग्राम मे निवास करते हुए विहार
करने लगे ।३। वे मुदित मन से इन्द्र द्वारा दिये हुए रथ पर आरूढ
होकर नदी, पर्वत, कुन्ज और द्वीप में पद्मा और रमा प्रभृति नारियो के
साथ विहार करते रहे ।७-८। एक समय की बात है—पद्मा के मुख मोद
के पद्म-गन्ध का उपभोग करने वाले कल्किजी पर्वत की एक गुफा मे
प्रविष्ट हुए जो कि अनेक नीलेन्द मणियों की आभा से प्रकाशित हो रही
थो ।६। उनके साथ सहस्त्र सखियो के सहित पद्म और पीयूषकला जैसी
विलासिनी रमा भी उस गुफा मे गई ।१०। अपने स्वामो कल्किजी को
उस गिरिगुहा में घुसते हुए देख कर मनोहारिणी पद्मा भी उनके पीछे-
पीछे गई तथा रमा ने भी विहार की इच्छा से स्त्री यूथो के सहित पीछे
से प्रवेश किया ।११।
तत्रेन्द्रनीलोत्पलगह्वरान्ते कान्ताभिरात्म प्रतिमाभिदीशम् ।
कल्किञ्च दृष्ट्वा नवनीरदाभ ततः स्थितं प्रस्तरवन्मुमोह ।१२
चतुर्दश अध्याय-३ ] [ ४६१
रमा सखीभिः प्रमदाभिरात्ता विलोकयन्ती दिशमाकुलाक्षी
पद्माति पद्माशतशोभमाना विषण्णचित्ता न बसौस्म चार्त्ता
भूमौ लिखन्ती निजकज्जलेन कल्कि शुकं तं कुचकुंकुमेन ।
कस्तूरिकाभिस्तु तदग्रमग्रे निम्मांय चालिङ्ग्य ननाम भावात्
रमा कलालापपरा स्तुवन्ती कामाद्दिता तं हृदये निधाये
ध्यात्वा निजालङ्करणैः प्रपूज्य तस्थौ विषण्णा करुणावसन्ना
क्षणात्स चायं परोद रामा कलापिनः कण्ठनिभं श्वनाथम् ।
हृदोपगूढं न पुनः प्रलभ्य कामार्द्दितेत्याह हरे प्रसीद ।१६।
नीलेन्द्र मणिमय उस गिरिगुहा मे पहुँच कर पद्मा ने देखा कि
मेघ के समान कान्ति वाले कल्किजी अपने जैसे सुन्दर रूप वाली नारियो
के साथ गुफा के मध्य बैठे हुए है । यह देख कर पद्मा मत्यत आश्चर्य के
साथ मोहित होकर निश्चेष्ट पाषाण के समान पृथ्वो पर बैठ गई ।१२।
सखियो के सहित रमा भी उस दृश्य को देख कर विस्मय से सब ओर
देखने लगी । शत पद्माओ के समान रूप वाली नारियो को देख कर
पद्मा तो दुःख और शोकित हो ही रही थी ।१३। वह अपने नेत्र के
काजल से पृथिवी को रँगने लगी । वह कुंकुम और कस्तूरी से भूमि
को सुगधित करती हुई, उस पर गिर गई ।१४। कामवती रमा भी अपने
हृदय मे कल्किजी का ध्यान करने लगी और हृदय-पुष्पो के द्वारा उनका
पूजन करके शोक और दुःख से व्याकुल होकर पृथ्वो पर गिर गई ।१५।
क्षण भर के उपरान्त सचेत हुई रमा रोने लगी और अपने हृदय को
कल्किजी के आलिंगन से रहित पाकर कह उठी—हे हरे ! प्रसन्न हो-
इये ।१६।
पद्मापि निम्मुच्य निजाङ्गभूषाश्चकार धूलीपटले विलासम्
कण्टञ्च कस्तूरिनयापि नीले कामं निष्ठेन्तु शिवतामुपेत्य १७
कलावतीना कल्याकलय क्षीणानां हरिरात्तं बन्धुः ।
ताः सादरेणात्मपति मनोज्ञाः करेणबो यूथपति यदेयुः ।
सानन्दभावा विपदाननुवृत्ता वनेषु रामाः परिपूर्णकामा ।१६
४६२ ] [ कल्कि पुराण
वैभ्राजके चैत्ररथे सुपुष्पे सुनन्दने मन्दरकन्दरान्ते ।
रेमे स रामाभिरुदारतेजा रथेन भास्वत्खगमेन कल्किः २०
पद्मा ने भी सब श्रृंगार त्याग दिया और धूल मे लेट गई । उस
समय उसका कस्तूरी युक्त नील वर्ण हुआ कंठ कामदेव को भस्म करने
वाले शिवजी के समान लगने लगा ।१७। तभी उन कातर नेत्र वाली
विलासिनी प्रियाओ की इच्छा पूर्ण करने के लिए आर्तजनो के बधु
कल्किजी उनके मध्य मे प्रकट हुए ।१८। यूथपति हाथी के पास जिस
प्रकार हथनिया जाती हैं, वैसे ही कल्किजी के समीप वे सभी नारियाँ
हर्षित हृदय होकर आगईं । वे हृदय के सन्ताप को छोड़ कर पूर्ण
कामा हो गईं ।१६। फिर उदार चरित्र वाले एव तेजस्वी कल्किजी श्रेष्ठ
गगनगामी रथ पर पद्मा, रमा आदि नारियो के साथ आरूढ होकर
पुष्पो से परिपूर्ण वैभ्राजक, चैत्ररथ और नन्दन वन में जाकर विहार-रत
हुए ।२०।
ततः सरोवर त्वरा स्त्रियो ययुः क्लमज्वराः ।
प्रियेण तेन कल्किना वनान्तरे विहारिणा ।२१।
सरः प्रविश्य पद्मया विमोह रूपया तया ।
जल ददुर्वराङ्गनाः करेणवो यथा गजम् ।२२।
इति ह युवतिलीला लोकनाथः स कल्किः ।
प्रिययुवतिपरीत पद्मया रामयाद्यः ।२३।
निजरमणविनोदै शिक्षयँल्लोकवर्गान्
जयति विबुधभर्त्ता शम्भले वासुदेव ।२४।
ये शृण्वन्ति वदन्ति भावचतुरा ध्यायन्ति सन्तः सदा
कल्केः श्रीपुरुषोत्तमस्य चरित कर्णामृत सादराः ।
तैंषा नो सुखयत्ययं मुररिपोर्दास्यभिलाषं विना
संसारः परिमोचनश्च परमानन्दामृताम्भोनिधेः ।२५।
फिर वे श्रमासक्त नारियाँ विहार करने वाले कल्किजी के साथ
सरोवर के तीर पर जा पहुंची । जैसे हथिनियां यूथपति हाथी के शरीर.
अष्टदश अध्याय-३ ] [ ४६३
पर जल डालती हैं, वैसे ही वे सब स्त्रिया अद्भुत रूप वाली पद्मा के
सहित कल्किजी के देह पर जल की वर्षा करने लगी ।२१-२२। जो
कल्किजी युवतियो के साथ लीला करने मे निपुण तथा अपनी प्रिया रमा
आदि नारियो के साथ विनोद युक्त विहार करने वाले हैं एव जो
कल्किजी देवताओ के भी ईश्वर, आदि पुरुष और जगदीश्वर हैं, उन
शम्भल ग्राम निवासी भगवान् वासुदेव की जय हो ।२३-२४। पुरुषोत्तम
कल्किजी के इस कानो को अमृत के समान प्रिय लगने वाले चरित्र को
जो कोई आदर पूर्वक सुनेगे, कीर्तन या ध्यान करेंगे, उन दास्य भाव की
कामना वाले सत्पुरुषो के हृदय में भगवान् की प्रीति के अतिरिक्त अन्य
किसी की प्रीति या कामना उत्पन्न नहीं होगी । वे यही अनुभव करेगे
कि ससार मोक्ष के अतिरिक्त अन्य कोई परमानन्द नही ।२५।
तृतीयांश—
ऊनविंश अध्याय
ततो देवगणा सर्वे ब्रह्मणा सहिता रथैः ।
स्वैः स्वैर्गणैः परिवृता कल्कि द्रष्टुमुपाययुः ॥१॥
महर्षयः सगन्धर्वा किन्नराश्चाप्सरोगणा ।
समाजग्मुः प्रमुदिताः शम्भल सुरपूजितम् ॥२॥
तत्र गत्वा सभामध्ये कल्किं कमललोचनम् ।
तेजोनिधि प्रपन्नाना जनानामभयप्रदम् ॥३॥
नीलजीमूतसंकाश दीर्घपीवरबाहुकम् ।
किरीटेनार्कवर्मेन स्थिरविद्युन्निभेन तम् ॥४॥
शोभमान द्युमणिना कुण्डलेनाभिशोभिना ।
सहर्षालापविकसद्वदन स्मितशोभिनम् ॥५॥
सूतजी बोले—इसके अनन्तर एक समय सब देवता और ब्रह्मा
सयुक्त होकर अपने अपने गणो के सहित रथो पर चढ कर कल्किजी के
दर्शनार्थ आये ॥१॥ महर्षिगण, गधर्वगण, किन्नरगण तथा अप्सरागण
सभी अत्यंत मुदित हृदय से उस सुरपूजित शभल ग्राम मे एकत्र हुए ॥२॥
फिर सब कल्किजी की सभा में गये और वहाँ पहुँच कर उन्होने देखा कि
कमललोचन भगवान् कल्किजी शरणागतो को अभयदाता रूप से विराज-
मान हैं ॥३॥ उनकी कान्ति नील मेघ समान थी, दीर्घ और सुपुष्ट भुजाएँ
हैं, उनका मस्तक स्थिर विद्युत् अथवा सूर्य के समान तेजोमय किरीट से
सुशोभित है ॥४॥ उनका मुख मंडल सूर्य के समान प्रकाश करने वाले
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