कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतृतीयांश-
अष्टदश अध्याय
एतद्वः कथित विप्रा व्रत त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
अतः पर कल्किकृतं कर्मं यच्छ्रृणुत द्विजा ।१।
शम्भले वसत्तस्तस्य सहस्रपरिवत्सरा ।
व्यतीता भ्रातृपुत्रस्वज्ञातिसम्बन्धिभि सह ।२।
शम्भले शुशुभे श्रेणी सभापणकचत्वरै ।
पताकाध्वजचित्राढ्यं यथेन्द्रस्यामरावती ।३।
यत्राष्टषष्टितीर्थाना सम्भव. शम्भलेऽभवत् ।
मृत्योर्मोक्ष क्षितौ कल्केरकतकरय पदाश्रयात् ।४।
वनोपवनसन्ताननाना कुसुम सकुलैः ।
शोभित शम्बल ग्राम मन्ये मोक्षपद भुवि ।५।
सूतजी बोले - हे ब्राह्मणो ! तीनो लोक मे प्रसिद्ध इस रुक्मिणी
व्रत को मैने आपके प्रति कहा है । इसके पश्चात् कल्किजी ने जो कार्य
किये थे, उन्हे कहता हूँ, सुनिये ।१। इस प्रकार कल्किजी अपने भाई,
पुत्र, बांधव और स्वजनो के साथ एक हजार वर्ष तक शम्बल ग्राम में
निवास करते रहे ।२। उस समय वह शम्बल पुरी ध्वजा-पताकादि से
विभूषित हुई सब प्रकार इन्द्र की अमरावती के समान शोभामयी प्रतीत
होती थी ।३। शम्बल ग्राम मे उस काल अठसठ तीर्थ एकत्रित हो गए थे
निष्कलंक कल्किजी की महिमा से शम्बल ग्राम मे मृत्यु होने पर मोक्ष की
प्राप्ति होती थी ।४। वहां के वन-उपवन आदि अनेक प्रकारके सुन्दर पुष्पो