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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 232 of 259

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Page 232

सप्तदश अध्याय-३ ] [ ४८५
पाद्यमध्वश्रमहर शीतलं सुमनोहरम् ।
परमानन्दजनकं गृहाण परमेश्वर ।२५।
उन्होने वेदी पर अष्टदल कमल बनाया और वेदी के चार कोरणो
मे कदली वृक्ष स्थापित किये ।२१। वस्त्रो से बने हुए मण्डप में एक
स्वर्ण निर्मित आसन पर भगवान् वसुदेवकी विविध रत्नालङ्कारोसे अलंकृत
प्रतिमा प्रतिष्ठित थी ।२२। उन्होने पुरुष सूक्त का पाठ करते हुए विभिन्न
सुगन्धो से युक्त जल, पञ्चामृत, पञ्चगव्य आदि सिद्ध किया और
ब्राह्मणो के द्वारा उच्चारण किये हुए मन्त्र से भद्रपीठा स्थित कर्णिका
पर भगवान् श्रीवासुदेव को विराजमान किया । फिर सोलह पन्द्रह अथवा
दश उपचारो से उनका पूजन किया ।२३ २४। हे परमेश्वर । आपका
श्रम दूर करने के निमित्त यह परमान्न्द का देने वाला सुन्दर पाद्य निवे-
दित है । इसे स्वीकार कीजिये ।२५।
दूर्वाचन्दनगन्धाढ्यमर्घ्यं युक्तं प्रयत्नतः ।
गृहाण रुक्मिणीनाथ प्रसन्नस्य मम प्रभो ।२६।
नानातीर्थोद्भवं वारि सुगन्धि सुमनोहरम् ।
॰गृहाणाचमनीयं त्वं श्रीनिवास श्रिया सह ।२७।
नानाकुमुमगन्धाढ्यं सूत्रग्रथितमुत्तमम् ।
वक्ष शोभाकरं चारु माल्यं नय सुरेश्वर ।२८।
तन्तुसन्तानसन्धाग्चितं बन्धनं हरे ।
गृहाणावर शुद्धश्च निरावरणा सप्रिय ।२६
यज्ञसूत्रमिदं देव ! प्रजापतिविनिर्मितम् ।
गृहाण वासुदेव स्वं रुक्मिण्या रमया सहँ ।३०।
हे रुक्मिणी नाथ ? हे वासुदेव प्रभो ! दूर्वा से युक्त यह चन्दन-
चर्चिन अर्घ्य यत्न पूर्वक स्थापित किया है, इसे प्रसन्न होकर स्वीकार
कीजिये ।२३। हे श्रीनिवास ! यह अनेक तीर्थों का पवित्र जल संग्रहीत
है । आप इस सुरम्य जलको आच मनीय द्वारा लक्ष्मीजी के सहित ग्रहण
कीजिये ।२७। हे सुरेश्वर ! यह माला अनेक प्रकार के पुष्पो से निर्मित