कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 239 of 259
Read in context४६२ ] [ कल्कि पुराण
वैभ्राजके चैत्ररथे सुपुष्पे सुनन्दने मन्दरकन्दरान्ते ।
रेमे स रामाभिरुदारतेजा रथेन भास्वत्खगमेन कल्किः २०
पद्मा ने भी सब श्रृंगार त्याग दिया और धूल मे लेट गई । उस
समय उसका कस्तूरी युक्त नील वर्ण हुआ कंठ कामदेव को भस्म करने
वाले शिवजी के समान लगने लगा ।१७। तभी उन कातर नेत्र वाली
विलासिनी प्रियाओ की इच्छा पूर्ण करने के लिए आर्तजनो के बधु
कल्किजी उनके मध्य मे प्रकट हुए ।१८। यूथपति हाथी के पास जिस
प्रकार हथनिया जाती हैं, वैसे ही कल्किजी के समीप वे सभी नारियाँ
हर्षित हृदय होकर आगईं । वे हृदय के सन्ताप को छोड़ कर पूर्ण
कामा हो गईं ।१६। फिर उदार चरित्र वाले एव तेजस्वी कल्किजी श्रेष्ठ
गगनगामी रथ पर पद्मा, रमा आदि नारियो के साथ आरूढ होकर
पुष्पो से परिपूर्ण वैभ्राजक, चैत्ररथ और नन्दन वन में जाकर विहार-रत
हुए ।२०।
ततः सरोवर त्वरा स्त्रियो ययुः क्लमज्वराः ।
प्रियेण तेन कल्किना वनान्तरे विहारिणा ।२१।
सरः प्रविश्य पद्मया विमोह रूपया तया ।
जल ददुर्वराङ्गनाः करेणवो यथा गजम् ।२२।
इति ह युवतिलीला लोकनाथः स कल्किः ।
प्रिययुवतिपरीत पद्मया रामयाद्यः ।२३।
निजरमणविनोदै शिक्षयँल्लोकवर्गान्
जयति विबुधभर्त्ता शम्भले वासुदेव ।२४।
ये शृण्वन्ति वदन्ति भावचतुरा ध्यायन्ति सन्तः सदा
कल्केः श्रीपुरुषोत्तमस्य चरित कर्णामृत सादराः ।
तैंषा नो सुखयत्ययं मुररिपोर्दास्यभिलाषं विना
संसारः परिमोचनश्च परमानन्दामृताम्भोनिधेः ।२५।
फिर वे श्रमासक्त नारियाँ विहार करने वाले कल्किजी के साथ
सरोवर के तीर पर जा पहुंची । जैसे हथिनियां यूथपति हाथी के शरीर.