कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextचतुर्दश अध्याय-३ ] [ ४६१
रमा सखीभिः प्रमदाभिरात्ता विलोकयन्ती दिशमाकुलाक्षी
पद्माति पद्माशतशोभमाना विषण्णचित्ता न बसौस्म चार्त्ता
भूमौ लिखन्ती निजकज्जलेन कल्कि शुकं तं कुचकुंकुमेन ।
कस्तूरिकाभिस्तु तदग्रमग्रे निम्मांय चालिङ्ग्य ननाम भावात्
रमा कलालापपरा स्तुवन्ती कामाद्दिता तं हृदये निधाये
ध्यात्वा निजालङ्करणैः प्रपूज्य तस्थौ विषण्णा करुणावसन्ना
क्षणात्स चायं परोद रामा कलापिनः कण्ठनिभं श्वनाथम् ।
हृदोपगूढं न पुनः प्रलभ्य कामार्द्दितेत्याह हरे प्रसीद ।१६।
नीलेन्द्र मणिमय उस गिरिगुहा मे पहुँच कर पद्मा ने देखा कि
मेघ के समान कान्ति वाले कल्किजी अपने जैसे सुन्दर रूप वाली नारियो
के साथ गुफा के मध्य बैठे हुए है । यह देख कर पद्मा मत्यत आश्चर्य के
साथ मोहित होकर निश्चेष्ट पाषाण के समान पृथ्वो पर बैठ गई ।१२।
सखियो के सहित रमा भी उस दृश्य को देख कर विस्मय से सब ओर
देखने लगी । शत पद्माओ के समान रूप वाली नारियो को देख कर
पद्मा तो दुःख और शोकित हो ही रही थी ।१३। वह अपने नेत्र के
काजल से पृथिवी को रँगने लगी । वह कुंकुम और कस्तूरी से भूमि
को सुगधित करती हुई, उस पर गिर गई ।१४। कामवती रमा भी अपने
हृदय मे कल्किजी का ध्यान करने लगी और हृदय-पुष्पो के द्वारा उनका
पूजन करके शोक और दुःख से व्याकुल होकर पृथ्वो पर गिर गई ।१५।
क्षण भर के उपरान्त सचेत हुई रमा रोने लगी और अपने हृदय को
कल्किजी के आलिंगन से रहित पाकर कह उठी—हे हरे ! प्रसन्न हो-
इये ।१६।
पद्मापि निम्मुच्य निजाङ्गभूषाश्चकार धूलीपटले विलासम्
कण्टञ्च कस्तूरिनयापि नीले कामं निष्ठेन्तु शिवतामुपेत्य १७
कलावतीना कल्याकलय क्षीणानां हरिरात्तं बन्धुः ।
ताः सादरेणात्मपति मनोज्ञाः करेणबो यूथपति यदेयुः ।
सानन्दभावा विपदाननुवृत्ता वनेषु रामाः परिपूर्णकामा ।१६