कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसप्तदश अध्याय-३ ] [ ४८३
सा गत्वा भवनं शुक्रं प्राह शर्मिष्ठया कृतम् ।
तच्छ्रुत्वा कुपितं विप्रं वृषपर्वाहि सान्त्वयन् ॥११।
दण्ड्यं मां दण्डय विभो कोपो यद्यस्ति ते मयि ।
शर्मिष्ठां वाप्यपकृतां कुरु यन्मनसेप्सितम् ॥१२।
राजानं प्रणतं पादे पितुर्दृष्ट्वा रुषाब्रवीत् ।
देवयानी त्वियं कन्या मम दासो भवत्विति ॥१३।
समानीय तदा राजा दास्ये तां विनियुज्य सः ।
ययौ निजगृहं ज्ञानी दैव परमकं स्मरन् ॥१४।
तत शुक्रस्तमानीय ययातिं प्रतिलोमकम् ।
तस्मै ददौ तां विधिवद्देवयानीं तया सह ॥१५।
इधर देवयानी ने अपने घर पहुँच कर शुक्राचार्यजी को शर्मिष्ठा
की सब करतूत सुनाई, जिससे वे अत्यंत क्रोधित हुए । तब दैत्यराज वृष-
पर्वा ने उन्हे सान्त्वना दी ॥११॥ वह बोला—हे विभो ! यदि आप मुझ
पर कुपित हो तो मुझे दड दीजिए अथवा अपकार करने वाली शर्मिष्ठा
को दण्ड देना चाहे तो उसे दडित करिये ॥१२॥ दैत्यपति वृषपर्वा को अपने
पिर्ता के चरणो मे पडा हुआ देख कर देवयानी ने उससे कहा—हे राजन्
आपकी पुत्री शर्मिष्ठा मेरी दासी बने ॥१३॥ यह सुन कर दैवगति को
प्रबल मानते हुए दैत्यराज ने शर्मिष्ठा को बुला कर उसे देवयानी की
दासी बना दिया और फिर अपने घर को चला गया ॥१४॥ फिर शुक्रा-
चार्य ने राजा ययाति को विधि विधान सहित अपनी पुत्री देवयानी का
कन्यादान कर दिया । उसके साथ उसकी दासी शर्मिष्ठा भी प्रदान कर
दी गई ॥१५॥
दत्वा प्राह नृप विप्रोऽप्येनां राजसुतां यदि ।
शयने ह्वयसे सद्यो जरा त्वामुपभोक्ष्यति ॥१६।
शुक्रस्यैतद्वचः श्रुत्वा राजा तां वरवर्णिनीम् ।
अदृश्या स्थापयामास देवयान्यनुगा भिया ॥१७।
सा शर्मिष्ठा राजपुत्री दुःखशोकभयाकुला ।