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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 231 of 259

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Page 231

४८४ ] [ कल्कि पुराण

नित्य दासीशताकीर्णा देवयानीन्तु सेवते ।१८।
एकादा सा वनगता रुदती जान्हवीतटे ।
विश्वामित्रं मुनि सा त ददृशे स्त्रीभिरावृतम् ।१६।
व्रतिनं पुण्यगन्धाभि सुरूपाभिः सुवासितम् ।
कारयन्तं व्रतं माल्यधूपदीपोपहारकैः ।२०।
राजसुता शर्मिष्ठा को देते हुए शुक्राचार्य ने राजा ययाति से
कहा कि हे राजन् ! यदि इसे कभी अपने शयनागार मे बुलाएँगे तो
उसी समय वृद्ध हो जाएगे ।१६। शुक्राचार्य के वचनो से भय को प्राप्त
हुए राजा ययाति ने अत्यन्त रुपवती शर्मिष्ठा को ले जाकर ऐसे स्थान
मे रख दिया, जहाँ पर उनकी दृष्टि भी न पड सके ।१७। अत्यन्त ही
दुखिता, शोक और भय से व्याकुला राजपुत्री शर्मिष्ठा सैकडो दासियो
के साथ देवयानी की सेवा मे तत्पर रहती थी ।१८। एक दिन वह
शर्मिष्ठा जाह्नवी के तीर पर बैठी हुई रो रही थी, तभी उसकी दृष्टि
स्त्रियो से घिरे हुए विश्वामित्र पर पडी ।१९। वे व्रती महर्षि विश्वामित्र
सुगन्धित द्रव्यो से सुवासित हो रहे थे । अनेक सुन्दर नारियाँ उनके चारो
ओर बैठी हुई थी । धूप, दीप, माला तथा अनेक प्रकार के उपहारो के
द्वारा विश्वामित्र उन स्त्रियो से व्रत-अनुष्ठान करा रहे थे ।२०।
निर्मायाष्टदलं पद्म वेदिकाया सुचिन्हितम् ।
रम्भापोतैश्चतुर्भिश्च चतुष्कोणं विराजितम् ।२१।
वाससा निर्मितगृहे स्वणपट्टैर्विचित्रिते ।
निर्मितै श्रीवासुदेवं नानारत्नविघट्टितम् ।२२।
पौरुषेण च सूक्तेन नानागन्धोदकै शुभैः ।
पञ्चामृतैः पञ्चगव्यैर्यथामन्त्रैर्द्विजेरितैः ।२३।
स्नापयित्वा भद्रपीठे कर्णिकायां प्रपूजयेत् ।
स्नामयित्वा भद्रपीठे कर्णिकाया प्रपूजयेत् ।
पञ्चभिर्दशभिर्वापि षोडशैरुपचारकैः ।२४।