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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 225 of 259

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Page 225

४७८ ] कल्कि पुराण
हुआ मेघ शोभा पाता।, वैसे ही तुम भी मुझे ढक कर शोभा को प्राप्त
होती हो ।३६। हे माये ! तुम लीला रूपी बीज की भुसी के समान हो ।
अनेकत्व की कारण रूपा भी तुम्ही हो तथा ससार के आदि, अन्त
और लय मे इन्द्रजाल की भाति सुशोभित होती हो ।३७।
एवं र्निवषय नित्य मनोव्यापारवर्ज्जितम् ।
अभौतिकमजीवञ्च शरीर वीक्ष्य सा त्यजत् ।३८।
त्यक्त्वा मा सा ददौ शापमिति लोके तवाप्रिय
न स्थितिर्भवता काष्ठकुडद्योपम कथञ्चन ।३६।
सा माया तव पुत्रस्य कल्केर्विश्वात्मनः प्रभोः ।
ता विज्ञाय यथाकाम चर गा हरिभावन ।४०।
निराशो निर्मम. शान्त. सर्वभोगेषु निस्पृहः ।
विष्णौ जगदिद ज्ञात्वा विष्णुर्जगति वासकृत् ।
आत्मनात्मानमावेश्य सर्वतो विरतो भव ।४१।
एव त विष्णुयशसमान्त्र्य च मुनीश्वरौ ।
कल्कि प्रदक्षिणीकृत्य जग्मतुः कपिलाश्रमम् ।४२।
इस प्रकार निर्विषय, मानसिक व्यापार और अभौतिक शरीर
से परे उस शरीरधारी को देख कर माया ने उसका त्याग कर दिया
।३८। उस समय माया ने मेरा त्याग करते हुए यह शाप दिया कि हे
जीव ! तू अप्रिय है , तू काठ की भीत के समान निश्चेष्ट एव लोक मे
सर्वथा स्थिति-हीन होगा ।३६। नारदजी बोले— हे प्रभो ! तुम्हारे पुत्र
विश्वात्म कल्किजी ने ही इस माया को उत्पन्न किया था। तुम उस
माया के तत्व को जानते हुए भगवान् विष्णु के ध्यान मे रत रहते हुए
स्वेच्छापूर्वक भ्रमण करो ।४०। जब तुम आशा और ममता को त्याग
कर और सभी भोगो से परे होकर शान्त चित्त हो जाओगे, तब तुम्हे
इसका ज्ञान होगा कि यह विश्व भगवान् विष्णु के विराट् प्रभाव मे
प्रतिष्ठित है तथा भगवान् विष्णु इस लक्षित जगत् में व्याप्त हैं। इस
प्रकार के ज्ञान से जीवात्मा और परमात्मा मे अभेद मानते हुए सभी