Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages
Page 193Permalink

४४६ ] [ कल्कि पुराण
तमसा घोरसकल्पा भजन्ति द्ववैतदृग्जना ।४४।
सत्त्वान्निर्गुणतोमति रजसा विषयस्पृहा ।
तमसा नरक यान्ति ससाराद्वैतधर्मिणि ।४५।
वह विह्वल होकर नाचता, रोता हँसता और तन्मयतापूर्वक
विचरण करता है। वह स्वय को भूल कर भक्ति-भाव मे ही डूब जाता
है और हरि के अतिरिक्त कही कुछ नही जानता ।४१। यही भगवान् की
अव्यभिचारिणी भक्ति है, इसी के प्रभाव से देवता, दैत्य और मनुष्य
आदि की सम्पूर्ण सृष्टि सहसा पवित्रता को प्राप्त होती है ।४२। नित्या
प्रकृति अथवा ब्रह्म की सम्पदा ही भक्ति रूप मे प्रकट होती है। वही
भक्ति वेदादि मे श्रेष्ठ एव शिव, विष्णु और ब्रह्मा स्वरूपिणी है ।४३।
सत्वगुण के अभ्यास से युक्त द्वैत के जानने वाले मनुष्य इन्द्रिय व्यापार की
इच्छा वाले होते हैं और जो तमोगुण से युक्त हैं वे घोर कार्यों का सकल्प
किया करते हैं ।४४। द्वैत ज्ञान से युक्त ज्ञानीजन सत्वगुण के व्याप्त होने
पर निर्गुणता को प्राप्त होते हैं तथा रजोगुण के व्याप्त होने पर विषयो
मे लग जाते हैं और यदि तमोगुण की अधिकता होती है तो वे पुरुष
नरक को प्राप्त होते हैं ।४५।
उच्छिष्टमवशिष्टं वा पथ्य पूतमभीप्सितम् ।
भक्ताना भोजनं विष्णोर्नैवेद्यं सात्विक मतम् ।४६।
इन्द्रियप्रीतिजनन शुक्रशोणितवर्द्धनम् ।
भोजनं राजस शुद्धमायुरारोग्यवर्द्धनम् ।४७
अतः परं तामसानां कट्वम्लोष्णविदाहिंकम् ।
पूतिपर्युषित ज्ञेय भोजनं तामसप्रियम् ॥४८॥
सात्विकानां वनें वासो ग्रामे वासस्तु राजसः ।
तामसं द्यूतमद्यादिसदनं परिकीर्तितम् ॥४६॥
न दाता स हरिः किञ्चित्सवेकस्तुन याचकं ।
तथापि परमा प्रीतिस्तयोः किंमिति शाश्वती ॥५०॥

Page 194Permalink

एकादश अध्याय ] [ ४४७
इत्येवद्भगवत ईश्वरस्य विष्णोगुंणकथन सनको विबुध्य भक्त्या
सविनयवचनैः सुरर्षिवर्य परिणुत्वेन्द्रपुर जगाम शुद्ध ॥५१॥
भगवान् का शेष बचा हुआ उच्छिष्ट (प्रसाद) तथा इच्छित
नैवेद्य ही पवित्र पथ्य स्वरूप है। भक्तो को इसी सात्विक आहार का
भोजन करना चाहिये (अर्थात् भोज्य सामग्री भगवान् को अर्पण करके
ही प्रसाद रूप मे सेवन करनी चाहिए) ।४६। जो भोजन इन्द्रियो को
सन्तुष्ट करने वाला, वीर्य एव रक्त वर्द्धक तथा परमायु के देने वाला एव
आरोग्यप्रद है, ऐसा शुद्ध भोजन राजसी कहा जाता है ।४७। कडुवा,
खट्टा, जलन करने वाला, दुर्गन्ध युक्त तथा वासी भोजन तामसी मनुष्यो
को प्रिय है ।४८। सतोगुणी पुरुष वन में निवास करते हैं, रजोगुणी
मनुष्य ग्राम मे और तमोगुणी द्यूत खेलने के अथवा मद्य पीने के स्थान
मे रहते हैं ।४९। भगवान् स्वय अपना हाथ उठा कर किसी को कुछ
प्रदान नही करते, और न सेवक ही उनसे कुछ याचना करता है। फिर
भी उनमे परस्पर सदा ही परम प्रीति रहती है, यह कैसी विचित्र बात
है ? ।५०। पवित्र मन वाले सनक भक्तिपूर्वक नारदजी के द्वारा भगवान्
विष्णु का गुण-कथन सुन कर विनम्र वचनो से देवर्षिवर नारदजी की
स्तुति और नमस्कार कर देवलोक को चले गये ।५१।

Page 195Permalink

तृतीयांश —
द्वादश अध्याय
एतद्वः कथित भूपा. कथनीयोरुकर्मरण ।
कथा भक्तस्य भक्तेश्च किमन्यत्कथयाम्यहम् ॥१॥
त्व राजन्वैष्णवश्रेष्ठः सर्वसत्वहिते रत ।
तवावेश. कथ युद्धरङ्गे हिंसादिकर्मणि ॥२॥
प्रायशः साधवो लोके जीवाना हितकारिण. ।
प्राणबुद्धिधनैर्वाग्भि. सर्वेषा विषयात्मनाम् ॥३॥
द्वैतप्रकाशिनी या तु प्रकृतिः कामरूपिणी
सा सूते त्रिजगत्कृत्स्न वेदाश्च त्रिगुणात्मिका ॥४॥
ते वेदास्त्रिजगद्धर्मशासना धर्मनाशना ।
भक्तिप्रवर्तका लोके कामिना विषयेषिणाम् ॥५॥
वात्स्यायनादिमुनयो मनवो वेदपारगा ।
वहन्ति बलिमीशस्य वेदवाक्यानुशासिताः ॥६॥
वय तदनुगाः कर्म धर्म निष्ठा रणप्रियाः ।
जिघासन्त जिघासामो वेदार्थकृतनिश्चया. ॥७॥
राजा शशिध्वर्ज बोले--हे राजाग्रो ! जिनके असाधारण कर्म
कीर्तन के योग्य हैं, उन भक्तो और भक्ति का महात्म्य मैंने कह दिया
है । अब और क्या कहूँ ? ।१। राजा बोले--हे राजन् ! आप सब जीवो
के कल्याण करने मे तत्पर तथा वैष्णव श्रेष्ठ हैं। फिर आप हिंसादि
दोषो से युक्त युद्ध करने मे क्यो प्रवृत्त होगये थे ।२। प्राय; साधुजन

Page 196Permalink

द्वादश-अध्याय ] ४४६
विषयासक्त जीवो का हित साधन करने के कार्य में अपने प्राण, बुद्धि,
धन तथा वाणी आदि सब कुछ लगा देते हैं ।३। शशध्वज बोले-
त्रिगुणात्मिका प्रकृति ही द्वैतभाव को प्रकाशित करती है । सभी वेदो
और तीनो लोको को उत्पन्न करने वाली यह प्रकृति कामरूपिणी है ।४।
तीनो लोको मे नेद ही धर्म की व्यवस्था द्वारा अधर्म का नाश करते हुए
विषयासक्त कामियो में भी भक्ति का प्रवर्त्तन करते हैं ।५। वेदो के ज्ञाता
वात्स्यायन आदि मुनिगणो और मनुओ ने वेदवाणी के शासन को
मानते हुए परमात्मा के हेतु बलि प्रदान की थी ।६। हम भी उन्ही का
अनुगमन करते धर्म पूर्वक युद्ध मे तत्पर होते और वैदिक शिक्षा के
अनुसार ही युद्ध मे आततायियो का संहार कर डालते हैं ।७।
अवध्यस्य वधे यावांस्तावन्वध्यस्य रक्षणे ।
इत्याह भगवान्व्यास. सर्ववेदार्थतत्परः ॥८॥
प्रायश्चित्त न तत्रास्ति तत्राधर्मः प्रवर्त्तते ।
अतोऽत्र वाहिनी हत्वा भवता युधि दुर्जयाम् ॥६॥
धर्मं कृतञ्च कलिकन्तु समानीयागता वयम् ।
एषा भक्तिर्मम मता तवाभिप्रेतमीरय ॥१०॥
अह तदनुवक्ष्यामि वेदवाक्यानुसारतः ।
यदि विष्णु. स सर्वत्र तदा क हन्ति को हतः ॥११॥
हन्ता विष्णुर्हतो विष्णुर्वध. कस्यास्ति तत्र चेत् ।
युद्धयज्ञादिषु वधे न वधो वेदशासनात् ।१२।
इति गायन्ति मुनयो मनवश्च चतुर्दश ।
इत्थं युद्धैश्च यज्ञैश्च भजामो विष्णुमीश्वरम् ।१३।
अतो भागवती मायामाश्रित्य विधिना यजन् ।
सेव्यसेवकभावेन सुखी भवति नान्यथा ।१४।
सर्व वेदार्थ के ज्ञानी भगवान् वेद व्यासजी का कथन है कि जो
पाप-अवध्य के मारने में है वही वध योग्य का वध का न करने मे भी

Page 197Permalink

४५० ] [ कल्कि-पुराण
है। ८। इस प्रकार का आचरण न करना अधर्म है। उसका कोई प्राय-
श्चित्त भी नही है। इसीलिए मै रणभूमि मे दुर्जय सेना के वध मे तत्पर
होकर धर्म, सत्युग ओर कल्किजी को यहाँ ले आया। मेरे मत मे यही
वास्तविक भक्ति है। इस विषय मे आपका अभिप्राय जो हो, वह बताइये
।६-१०। इसके अतिरिक्त मैं वेद-वाणी के अनुसार ही कहता हूँ कि
भगवान् विष्णु सर्व-व्यापी हैं। यदि यह यथार्थ है तो फिर कौन किसी
को मारता है और कौन मरता है ? ।११। जब मारने वाले विष्णु हैं,
और मरने वाले भी विष्णु ही हैं, तो किसका वध हो सकता है ? फिर
वेद की ही व्यवस्था है कि युद्ध आदि कर्मों मे जो वध होता है, वह वध
नही माना जाता ।१२। यही बात चौदह मनुओ और मुनियो ने भी
कही है। हम भी इसी के अनुसार यज्ञो और युद्धो के द्वारा भगवान्
विष्णु का पूजन किया करते है। १३। इस प्रकार भगवती माया के आश्रय
मे स्थित हुआ साधक विधिवत् सेव्य-सेवक भाव से भगवान् का यजन
करके सुखी होता है, अन्य कोई विधि सुख-प्राप्त करने की नही है ।१४।
निमेर्भू'पस्य भूपाल ! गुरो शापान्मृतस्य च ।
तादृशे भोगायतनै विराग. कथमुच्यताम् ।१५।
शिष्यशापादवशिष्यस्य देहावाप्तिमृतस्य च ।
श्रूयते किल मुक्ताना जन्म भक्तविमुक्तता ।१६।
अतो भागवती माया दुर्बोध्याविजितात्मनाम् ।
विमोहयति ससारे नानात्वादिन्र्दजालवत् ।१७।
इति तेषा वचो भूय' श्रुत्वा राजा शशिध्वज.
प्रोवाच वदता श्रेष्ठो भक्तिप्रवणया धिया ।१८।
बहूना जन्मनामन्ते तीर्थक्षेत्रादियोगत.
दैवाद्वभवेत्साधुसगस्तस्मोदीश्वरदर्शनम् ।१६।
ततः सालोक्यताम्प्राप्य भजन्त्याह्तचेतसः ।
भुंक्त्वा भौगांस्तपर्मोग्भक्तो भवति ससृतौ ।२०।

Page 198Permalink

द्वादश अध्याय ] [ ४५१
रजोजुषः कर्मपरा, हरिपूजापराः सदा ।
तन्नामानि प्रगायन्ति तद्रूपस्मरणोत्सुकाः ॥२१॥
राजा बोले—हे भूपते ! गुरु वसिष्ठ के शापवश राजा निमि ने
देह छोड़ा था । परन्तु आपके इस भोग्यय देह मे वैराग्य की उत्पत्ति
किस प्रकार हुई ? जब यज्ञान्त मे देवनाओ ने उनकी रक्षो करते हुए
उस देह में प्रवेश करने की आज्ञा की, तब भी वे अपने छोडे हुए देह में
प्रविष्ट होने मे सहमत न हुए, इसका क्या कारण था ? ॥१५॥ सुना
जाता है कि शिष्य के शाप से गुरु वसिष्ठ ने देह त्याग कर पुनः देह को
प्राप्त कर लिया। परन्तु, भक्त तो मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, तब वह
उस विमुक्तता को छोड़ कर जन्म किन प्रकार धारण करे ? ॥१६। इस
प्रकार भगवद् माया के वर्णन मे ज्ञानीजन भी अपने को असमर्थ पाते हैं ।
क्योकि वह माया इन्द्रजाल के समान समस्त लोक मे विस्तीर्ण होती हुई
जीवो को विमोहित करती रहती है।१७। वक्ता श्रेष्ठ राजा शशिध्वज
उनके वचन सुन कर भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हुए बोले ।१८। उन्होने
कहा—तीर्थ, क्षेत्रादि के योग को प्राप्त हुआ प्राणी जन्म जन्मान्तरो मे
भगवत्कृपा से साधु सग को पाता है और उसी साधु सग के प्रभाव से
उसे ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं ।१९। फिर वह सालोक्य पद को प्राप्त
होकर हर्षित हृदय से हरि-भजन में तत्पर होता है। इस प्रकार भोग्य
वस्तुओ का उपभोग करता हुआ वह मनुष्य लोक मे भक्त हो जाता है
।२०। रजोगुणी पुरुष अपने कर्म द्वारा सदा हरिपूजा-परायण रहते तथा
उनके नाम और रूपादि का स्मरण करने मे सदा उत्सुक रहते हैं ।२१।
अवतारानुकरापर्वव्रतमहोत्सवाः ।
भगवद्भक्तिपूजाढ्याः परमानन्दसम्प्लुताः ॥२२॥
अतो मोक्षं न वांञ्छन्ति दृष्टमुक्तिफलोदयाः ।
मुक्त्वाल्लभन्ते जन्मानि हरिभावप्रकाशकाः ॥२३॥

Page 199Permalink

४५२ ] [ कल्कि पुराण
हरिरूपाः क्षेत्रतीर्थपावना धर्मतत्परा ।
सारासारविद सेव्यसेवका द्वैतविग्रहाः ।२४।
यथावतार कृष्णस्य तथा तत्सेविनामिह ।
एव निर्मेंनिमिषता लीला भक्तस्य लोचने ।२५।
मुक्तस्यापि वषिष्ठस्य शरीरभजनादरः ।
एतद्व कथित भूपा माहात्म्य भक्तिभक्तयोः ।२६।
सद्य पापहर पुंसा हरिभक्तिविवर्धनम् ।
सर्वेन्द्रियस्थदेवानामानन्दसुखसञ्चयम् ।
कामरागादिदोषघ्न मायामोहनिवारणम् ।२७।
नानाशास्त्रपुराणवेदविमलव्याख्यामृताम्भोनिधि
समथ्यातिचिर त्रिलोकमुनयो व्यासादयो भावुका ।
कृष्णे भावमननमेवममल हैयङ्गवन नव
लब्ध्वा समृतिनाशन त्रिभुवने श्रीकृष्णतुल्यायते ।२८।
वे श्रीहरि के अवतार का सदा अनुकरण करने वाले होते हैं ।
पर्वकाल मे व्रत, पूजन, भक्ति आदि मे तत्पर रहते हुए भी परमानन्द में
लिप्त रहते हैं ।२२। वे सभी भक्तजन भोग फल को प्रत्यक्ष प्रकट होता
देख कर मोक्ष की कामना नही करते और भोगो को भोगते हुए जन्म
प्राप्त करके भी सदा हरिभाव को प्रकाशित करते रहते हैं ।२३। भक्त-
जन हरिस্বরূপ और क्षेत्र तथा तीर्थों के पवित्र करने वाले, सार और
असार के ज्ञाता, धर्मानुष्ठान मे तत्पर रहते हुए सेव्य-सेवक रूप मे
निवास करते हैं ।२४। भगवान श्रीकृष्ण के अवतार लेने के समान ही
उनके सेवक भी समय-समय पर अवतार ग्रहण करते रहते हैं । इसी
लिए तो निमि का भक्तो के नेत्रो पर निमेष रूप से निवास है, इसे
भगवान की ही लीला समझना चाहिए ।२५। गुरु वसिष्ठ ने मुक्त होकर
भी जो पुनः देह धारण किया, वह भी इसी कारण से किया था । हे
राजाओ ! इस प्रकार भक्ति और भक्त का यह माहात्म्य मैंने आपके

Page 200Permalink

द्वादश अध्याय ] [ ४५३
प्रति कहा है ।२६। इसके सुनने से ही सब पाप नष्ट हो जाते हैं, मन मे
हरि-भक्ति की वृद्धि होती और इन्द्रियो के अधिष्ठाता देवता भी सुखी
होते है । काम और रागादि सभी दोष तथा माया-मोह का नाश होता
है ।२७। तीनो लोको के ज्ञाता मुनियो ने वेद पुराणादि शास्त्रो के अमृत
रूपी सार का मजन करके यह अत्यन्त पवित्र एव मगल रूप श्रीकृष्ण
भक्ति को प्राप्त किया है । यह भव-बन्धन को नष्ट करने वाली है ।
उन मुनियो को इस प्रकार का फल पाते देख कर उनको भगवान
श्रीकृष्ण के समान ही माना गया है ।२८।

Page 201Permalink

तृतीयांश—
त्रयोदश अध्याय
इति भूत सभाया स कथयित्वा निजाः कथाः ।
शशिध्वज प्रीतमना प्राह कल्कि कृताञ्जलि ।१॥
त्वंहि नाथ त्रिलोकेश एतेभूपास्त्वदाश्रया.
मा तथा विद्धि राजन् त्वन्निदेशकर हरे ।२॥
तपस्तप्तु यामि काम हरिद्वार सुनिप्रियम् ।
एते मत्पुत्रपौत्राश्च पालनीयास्त्वदाश्रया. ।३॥
ममापि काम जानासि पुरा जाम्बवतो यथा ।
निधन द्विविदस्यापि तदा सर्व सुरेश्वर ।४।
इत्युक्त्वा गन्तुमुद्युक्त भार्यया सहित नृपम् ।
लज्जयाधोमुख कल्कि प्राहूर्भूपा किमित्युत ।५।
सूतजी बोले—सभा मे उपस्थित सब जनो के समक्ष इस प्रकार
अपना वृत्तान्त कहने के उपरान्त राजा शशिध्वज ने हाथ जोड कर कल्कि
जी से कहा ।१। राजा बोले—हे हरे ! हे त्रिलोकेश ! यह सभी राजा-
गण आपके आश्रय में स्थित हैं । आप इन सबको और मुझे भी अपनी
आज्ञा के पालन मे तत्पर समझिये ।२। अब मैं ऋषियो के लिए प्रिय
हरिद्वार के लिए तपस्या हेतु गमन करूँगा । मेरे यह पुत्र-पौत्रादि सब
आपके ही आश्रित हैं और आपके द्वारा ही प्रतिपालन करने योग्य हैं ।३।
हे सुरेश्वर ! आप मेरे अभिप्राय को भले प्रकार जानते हैं । अपने पूर्व
अवतार मे आपने जाम्बवन्त और द्विविद आदि जिन वानरोका वध किया
४५४

Page 202Permalink

त्रयोदश अध्याय ] [ ४५५
था वह भी आपको स्मरण है ।४। यह कह कर राजा शशिध्वज अपनी
पत्नी सुशान्ता सहित प्रस्थान के लिए उद्यत हुए । उस समय कल्किजी ने
अपना मुख लज्जा से झुका लिया । यह देख कर राजागण उसे जानने
की इच्छा से बोले ।५।
हे नाथ किमनेनोक्तं यच्छ्रुत्वा त्वमधोमुखः ।
कथ तद्ब्रूहि कामं नः किं न शाधि संशयात् ।६।
अमुं पृच्छत वो भूपा युष्माकं संशयच्छिदम्
शशिध्वजं महाप्राज्ञं मद्भक्तिकृतनिश्चयम् ।७।
इति कल्केर्वचः श्रुत्वा ते भूपाः प्रोक्तकारिणः ।
राजानं तं पुनः प्रहुः संशयापन्नमानसाः ।८।
किं त्वया कथितं राजञ्छशिध्वज महामते ।
कथं कल्किस्तद्वदिदं श्रुत्वैवाभूदधोमुखः ।६।
पुरा रामावतारेण लक्ष्मणादिन्द्रजिद्वधम्
लक्ष्यालक्ष्यं द्विविदा राक्षसन्त्वात्सदारुणात् ।१०।
राजाओ ने कहा—हे नाथ ! राजा शशिध्वज ने ऐसी क्या बात
आपसे कही थी, जिसे सुन कर आपने लज्जा से अपना मुख नीचा कर
लिया था । यह हमारे प्रति कह कर हमारा सन्देह दूर करिये ।६।
कल्किजी बोले—हे राजाओ ! आप उन्ही महाराज शशिध्वज से ही इस
विषय में प्रश्न करिये । क्योंकि वे परम ज्ञानी और मुझमें अनन्य भक्ति
रखने वाले हैं। वे ही आपके सन्देह को नष्ट करेंगे।७। यह सुनकर सभी
राजागण संशययुक्त हृदय से राजा शशिध्वज से प्रश्न करने लगे ।
उन्होने कहा—हे राजन् ! हे महामते ! हे महाराज शशिध्वज ! आपने
अभी ऐसी कौन-सी बात कल्किजी के प्रति कही थी, जिसे सुन कर वे
लज्जावनत मुख वाले हो गये थे ।८-६। शशिध्वज बोले—हे राजागण !
पुरा काल में जब रामावतार हुआ था, तब लक्ष्मणजी के द्वारा वध को
प्राप्त हुए इन्द्रजीत मेघनाद की राक्षस भाव से मुक्ति हो गई थी ।१०।

Page 203Permalink

४५६ ] [ कल्कि पुराण
अग्न्यागारे ब्रह्मवीरवधेनैकाहिकोज्वरः ।
मोक्ष्मणस्य शरीरेण प्रविष्टो मोहकारकः ।११।
त व्याकुलमभिप्रेक्ष्य द्विविदो भिषजा वरः ।
अश्विवशेन सजात स्वापयामास लक्ष्मणम् ।१२।
लिखित्वा रामभद्रस्य सज्ञापत्रीमतन्द्रित ।
लक्ष्मणा दर्शयामास ऊर्ध्वस्तिष्ठन्महाभुजः ।१३।
लक्ष्मणो वीक्ष्य ता पत्री विज्वरो बलवानभूत् ।
स ततो द्विविद प्राह वर वरय वानर ।१४।
द्विविदस्तच श्रुत्वा लक्ष्मणा प्राहि हृष्टवत्
त्वत्तो मरण प्रार्थ्यं वानरत्वाञ्च मोचनम् ।१५।
उस समय अग्निशाला मे ब्राह्मण की हत्या करने के पाप स्वरूप
लक्ष्मणजी के शरीर मे एकाहिक ज्वर घुस गया, जिससे उन्हे मोहादि
उपद्रवो ने घेर लिया ।११। उस समय अश्विनीकुमार के वश मे उत्पन्न
हुए भिषग्वर द्विविद वानर ने लक्ष्मणजी को ज्वर की पीडा से व्याकुल
देख कर एक मन्त्र बतलाया ।१२। इस मन्त्र को लिख कर भगवान्
श्रीराम के सामने ही एक ऊँचे स्थान पर टाक कर लक्ष्मणजी
को दिखाया गया ।१३। इस मन्त्र को देखते ही लक्ष्मणजी का ज्वर नष्ट
हो गया और उनमे शक्ति आ गई । फिर लक्ष्मणजी ने द्विविद नामक
उस वानर से कहा—हे वानर ! आप वर मांगिये ।१४। तब द्विविद ने
अत्यन्त हर्षित होकर कहा कि मेरी आपसे ही यहो प्रार्थना है कि वानर
भाव से मुक्त होने के उपाय स्वरूप मेरा मरण आपके हो द्वारा हो ।१५।
पुनस्तं लक्ष्मणः प्राह मम जन्मान्तरे तव ।
मोचन भविता कीश बलरामशरीरिणः ।१६।
समुद्रस्योत्तारे तीरे द्विविदो नाम वानरः ।
ऐकाहिक ज्वर हन्ति लिखनं यस्तु पश्यति ।१७।
इति मन्त्राक्षर द्वारि लिखित्वा तालपत्रके ।
यस्तु पश्यति तस्यापि नश्यत्यैकाहिकज्वरः ।१८।

Page 204Permalink

त्रयोदश-अध्याय-३ ] [ ४५७
इति तस्य वर लब्ध्वा चिरायु सुस्यत्रानराः ।
बलरामास्त्रभिन्नात्मा मोक्षमापाकुतोभयम् ॥१६॥
तथा क्षेत्रे सूतपुत्रो निहतो लोमहर्षण ।
बलरामास्त्रयुक्तात्मा नैमिषेऽभूत्स्ववाञ्छया ॥२०।
तब लक्ष्मणजी ने उसे आश्वासन दिया कि अगले जन्म मे जब मैं
बलदेवावतार लूँगा, तब तुम मेरे हाथ से मृत्यु को प्राप्त होकर वानर
भाव से मुक्त हो जाओगे ॥१६॥ “समुद्र स्योत्तरे तीरे द्विविदो नाम
वानरः” यही वह मन्त्र है, जिसे लिखा हुआ देखने पर ऐकाहिक ज्वर
नष्ट होजाता है ॥१७। इस मन्त्र को द्वार पर अथवा ताल । पत्र पर लिख
कर देखना चाहिये तब ऐकाहिक ज्वर का नाश होना सम्भव है ॥१८।
लक्ष्मणजी से इस प्रकार वर को प्राप्त हुआ वह द्विविद नामक वानर
स्वस्थ शरीर से बहुत काल जीवित रहा और बलदेवजी का अवतार
होने पर उनके अस्त्र से मृत्यु को प्राप्त होकर अभयात्मिका मुक्ति को
प्राप्त हो गया ॥१६। इसी प्रकार अपनी इच्छा से सूत पुत्र लोमहर्षण
भी नैमिषारण्य मे बलदेव जी के अस्त्र से ही मारे गये ॥२०।
जाम्बंवाश्च पुरा भूपा वामनत्व गते हरौ :
तस्याप्यूर्ध्वगतं पाद तत्र चक्रे प्रदक्षिणम् ॥२१।
मनोजवं त निरीक्ष्य वामनः प्राह विस्मित ।
मत्तो वृणु वर काममृक्षाधीश महाबल ॥२२।
इति त हृष्टवदनो ब्रह्माङ्गो जाम्बवान्मुदा ।
प्राह भो चक्रदहनान्मम मृत्युर्भविष्यति ॥२३।
इत्युक्ते वामन प्राहकृष्णजन्मनि मे तव ।
मोक्षश्चक्रेण संभिन्नशिरसः सम्भविष्यति ॥२४।
मम कृष्णावतारे तु सूर्यभक्तस्य भूपतेः ।
सत्राजितस्तु मण्यर्थे दुर्वाद समजायत ॥२५।
हे राज्ञाग्रो ! वामनावतार मे वामनजी ने जब तीन पग में ही
तीनो लोकों को नाप लिया, तब उनके ऊर्ध्वलोक मे रखे हुए चरण की

Page 205Permalink

४५८ ] कल्कि पुराण
जाम्बवत ने प्रदक्षिणा की थी ।२१। उस समय उस जाम्बवान् को मन के
समान द्रुत वेग वाला देख कर वामनजी अत्यन्त आश्चर्य चकित होकर
बोले—हे ऋक्षाधीश ! तुम महाबली हो, मुझसे इच्छित वर मांगो
।२२। यह सुन कर हर्षित मन हुए ब्रह्मांश रूप जाम्बवान् ने कहा कि
हे प्रभो ! मेरी मृत्यु आपके चक्र से हो, यही वर प्रदान कीजिये ।२३।
जाम्बवान् के वचन सुन कर वामनजी ने कहा—कृष्णावतार मे मेरे चक्र
से तुम्हारा शिर कटेगा और तुम मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे ।२४।
तदनन्तर कृष्णावतार हुआ । उस समय मैं सूर्य का भक्त सत्राजित् नामक
एक राजा हुआ था। तब एक मणि के कारण दुर्वाद उत्पन्न हो
गया ।२५।
प्रसेनस्य मम भ्रातुर्वधस्तु मणिहेतुकः ।
सिंहात्तस्यापि मण्यर्थे वधो जाम्बवता कृतः ।२६।
दुर्वादभयभीतस्य कृष्णस्यामिततेजस ।
मण्यन्वेषणचित्तस्य ऋक्षेणाभूद्रणो बिले ।२७।
स निजेशं परिज्ञाय बच्चाक्रग्रस्तबन्धनम् ।
मुक्तो बभूव सहसा कृष्ण पश्यन्सलक्ष्मणम् ।२७।
नवदूर्वादलश्याम दृष्ट्वा प्रादान्निजात्मजाम् ।
तदा जाम्बवती कन्या प्रगृह्य मणिना सह ।२६।
द्वारका पुरमागत्य सभाया मामुपाह्वयत् ।
आहूय मह्यं प्रददौ मणि मुनिगणार्च्चितम् ।३०।
प्रसेन नामक मेरा अनुज था । उसे एक सिंह ने मणि के लिए
मार डाला । फिर वह सिंह भी उसी मणि के कारण जाम्बवान् के
द्वारा वध को प्राप्त हुआ ।२६। उधर कलंक के भय से अमित तेज वाले
भगवान् श्रीकृष्ण उस मणि की खोज करने लगे, तभी एक गिरि-गुहा
में जाम्बवान् के साथ उनका घोर युद्ध हुआ ।२७। तभी जाम्बवान्
अपने स्वामी को पहचान गया । भगवान् के चक्र से उसका शिर कट

Page 206Permalink

चतुर्दश-अध्याय-३ ] [ ४५६
गया। लक्ष्मण सहित भगवान् का दर्शन करते हुए जाम्बवान् की मोक्ष
की प्राप्ति हुई ।२८। तब उस ऋक्षराज ने अपने प्रभु की श्यामल मूर्ति
का दर्शन करते हुए उन्हे अपनी पुत्री जाम्बवती के सहित वह मणि
भेट कर दी ।२६। फिर श्रीकृष्ण ने द्वारका की राज सभा मे आकर
मुझे वहाँ बुलाया और महर्षियो के द्वारा पूजित वह मणि उ होंने मुझे
दे दी ।३०।
सोऽह ता लज्जया तेन मशिना कन्यकां स्वकाम् ।
विवाहेन ददावस्मै लावण्याज्जगृहे मणिम् ।३१।
ता सत्यभामामादाय मणि मय्यर्प्य स प्रभुः ।
द्व रकामागत्य पुनर्गजाह्वयमगाद्विभुः ।३२।
गते कृष्णे मा निहत्य शतधन्वाग्रहीन्मणिम् ।
अतोऽहमिह जानामि पूर्वजन्मनि यत्कृतम् ।३३।
मिथ्याभिशापात्कृष्णस्य नैवाभून्मोचन मम ।
अतोऽह कल्किरूपाय कृष्णाय परमात्मने ।
दत्त्वा रमा सत्यभाभारूपिणी यामि सद्गतिम् ।३४।
यह देख कर मैं अत्यन्त लज्जित हुआ और मैंने अपनी सत्यभामा
नाम की कन्या के सहित वह मणि श्रीकृष्ण को ही दे दी। उन दोनो
के लावण्य से आकर्षित होकर उन्होने उन्हे ग्रहण कर लिया ।३१।
तदनन्तर श्रीकृष्ण ने मणि मेरे पास रख दी और स्वय सत्यभामा को
साथ लेकर द्वारका से हस्तिनापुर को चले गये ।३२। श्रीकृष्ण के चले
जाने पर शतधन्वा नामक एक राजा ने मणि के निमित्त मेरा वध कर
दिया और मणि को ले लिया । इस प्रकार इन कल्किजी ने अपने
पूर्वावतार में जो किया, उस सब को मैं भले प्रकार जानता हूँ ।३३।
श्रीकृष्ण को मैंने झूठा कलंक लगाया था, इसी पाप से उस जन्म में मैं
मोक्ष को प्राप्त नही हो सका । यही कारण हैं कि इस जन्म में अपनी
रमा रूपिणी सत्यभामा को कल्कि रूप कृष्ण को देकर मैं सद्गति को
प्राप्त करूँगा ।३४।

Page 207Permalink

४६० ] [ कल्कि-पुराण
सुदर्शनास्त्रघातेन मरण मम काङ्क्षितम् ।
मरणोऽभूदिति ज्ञात्वा रणे वाञ्छामि मोचनम् ।३५।
इत्यसौ जगतामीशः कल्कि श्वशुरघातनम् ।
श्रुत्वैवाधोमुखस्तस्थौ ह्रिया धर्मभिया प्रभु ।३६।
अत्याश्चर्यमपूर्वमुत्तममिद श्रुत्वा नृपा विस्मिता
लोका संसदि हर्षिता मुनिगणा कल्केर्गुणाकर्षिताः ।
आख्यान परमादरेण सुखद धन्य यशस्य पर
श्रीमद्भूपशशिध्वजेरितवजो मोक्षप्रद चाभवन् ।३७।
यह जान कर कि युद्धस्थल मे मरने से मोक्ष की प्राप्ति संभव
है, मैंने यह अभिलाषा की थी कि कल्किजी के सुदर्शन चक्र-प्रहार से
मेरा मरण हो जायगा ।३५। जगदीश्वर भगवान् कल्कि ने अपने श्वसुर
का इस प्रकार मारा जाना स्मरण करके ही धर्मभय और लज्ज से अपना
मुख झुका लिया था ।३५। इस अत्यन्त विस्मय युक्त, अपूर्व और श्रेष्ठ
उपाख्यान को सुन कर राजागण विस्मित हो उठे तथा सभी सभासद्
आनन्द विभोर हुए । कल्किजी के गुणो के प्रति मुनिगण भी आकर्षित
हो रहे थे । राजा शशिध्वज के कहे हुए इस उपाख्यान के सुनने वाला
प्राणी सुखी, धन्य और यशस्वी होकर अन्त मे मोक्ष को प्राप्त करता है,
उसका कभी पुनर्जन्म नही होता ।३७।

Page 208Permalink

तृतीयांश—
चतुर्दश अध्याय
ततः कल्किर्महातेजाः श्वशुरं तं शशीध्वजम् ।
समामन्त्र्य वचश्चित्रैः सह भूपैर्ययौ हरिः ।१।
शशीध्वजो वरं लब्ध्वा यथाकामं महेश्वरीम् ।
स्तुत्वा मायां त्यक्तमायः सप्रियः प्रययौ वनम् ।२।
कल्किः सेनागणैः सार्द्धं प्रययौ काञ्चनीं पुरीम् ।
गिरिदुर्गावृता गुप्तां भोगिभिविषवर्षिभिः ।३।
विदार्य दुर्गं सगणः कल्किः परपुरञ्जयः ।
छित्त्वा विषायुधान्बाणांस्तां पुरीं ददृशोऽच्युतः।४।
मणिकाञ्चनचित्राढ्यां नागकन्यागणावृताम् ।
हरिचन्दनवृक्षाढ्यां मनुजैः परिवर्जिताम् ।५।
सूतजी बोले—फिर अत्यन्त तेज वाले कल्किजी ने अपने अद्भुत
वचनों के द्वारा अपने श्वसुर राजा शशीध्वज को सन्तुष्ट किया और
राजाओं के सहित उठ कर चले गये ।१। राजा शशीध्वज भी इच्छा-
नुसार वर प्राप्त करके, महेश्वरी माया का स्तव करते हुए अपनी पत्नी
सहित विषय-बन्धन से मुक्त होकर वन को गये ।२। इधर कल्किजी ने
पर्वत रूपी दुर्ग से आवृत्त काञ्चनीपुरी को प्रस्थान किया इस पुरी की
रक्षा विष-वर्षक सर्प करते हैं ।३। शत्रुओं के पुर के विजेता कल्किजी
अपनी सेना सहित आगे बढ़े और उस कठिन दुर्ग को तोड कर तथा
विष-वर्षक सर्पों को मार कर पुरी में प्रविष्ट हुए ।४। वहाँ उन्होंने देखा
कि वह नगरी सर्वत्र मणियों और स्वर्ण से युक्त है तथा सब ओर नाग
४६१,

Page 209Permalink

४६२ ] [ कल्किक पुराण
कन्याएँ छाई हुई हैं। वह पुरी स्थान स्थान पर कल्पवृक्षो से सुशोभित हो
रही है। वहाँ मनुष्य तो नाम को भी नही हैं। ५।
विलोक्य कल्कि. प्रहसन्नाह भूपान्तिकमित्यहो ।
सर्पस्येयं पुरी रम्या नराया भयदायिनी ।
नागनारीगणार्कीर्णा कि यास्यमो वदन्त्विह ।६।
इतिकर्त्तव्यताव्यग्रं रमानाथ हरिं प्रभुम् ।
भूपास्तदनुरूपाश्च खे वागाहाशरीरिणि ।७।
विलोक्य नेमां सेनाभि प्रवेष्टु भोस्त्वमर्हसि ।
त्वां विनान्ये मरिष्यन्ति विषकन्यादृशादपि ।८।
आकाशवाणीमाकर्ण्य कल्कि. शुकसहायकृत् ।
ययावेकः खड्गधरस्तुरगेण त्वरान्वित. ।६।
गत्वा ता ददृशे वीरो धीरा धैर्यनाशिनीम् ।
रूपेणालक्ष्य लक्ष्मीशं प्राह प्रहसितानना ।१०।
यह देख कर हँसते हुए कल्किजी ने राजाओ से कहा—हे राजन्
यह सर्पपुरी कैसी आश्चर्यमयी एवं मनुष्यो के लिए अत्यन्त भयावनी
है। इसमे नागकन्यो का ही निवास है। अब कहिए कि इसमे प्रवेश करें
अथवा नही ? ।६। रमानाथ कल्किजी और सब राजागण भी यह निश्चय
नही कर पाये कि क्या करना चाहिये, इसलिए अत्यन्त चिंतित हुये ।
तब आकाशवाणी सुनाई दी ।७। इस पुरी मे सेना-सहित प्रविष्ट नही
होना चाहिए। क्योकि जैसे ही पुरी निवासिनी विष-कन्याओ की दृष्टि
पड़ेगी, वैसे ही नष्ट हो जाओगे ।८। आकाशवाणी का निर्देश सुन कर
कल्किजी एकाकी ही खड्ग लेकर घोड़े पर चढ़े और शुक को साथ
लेकर चल दिये ।६। कुछ आगे जाने पर उन्हें एक अपूर्व कन्या दिखाई
दी, जिसे देखते ही ज्ञानी जन भी धैर्य छोड देते हैं । वह कन्या अपूर्व
रूप वाले कल्किजी को देख कर हँसती हुई बोली ।१०।

Page 210Permalink

चतुर्दश अध्याय-३ ] [ ४६३
ससारेऽस्मिन् नयनोर्वीक्षणक्षीणदेहा
लोका भूपाः कति कति गता मृत्युमत्युग्रवीर्याः ।
साहं दीनासुरसुरन प्रेक्षण प्रेमहीना
ते नेत्राब्जद्वयरससुधाप्लाविता त्वां नमामि । ११।
क्वाहं विषेक्षणादीना क्वामृतेक्षणसङ्गमः ।
भवेऽस्मिन्भाग्यहीनायाः केनाहो तपसा कृतः । १२।
कासि कन्यासि सुश्रोणि कस्मादेषा गतिस्तव ।
ब्रूहि मां कर्मणा केन विषनेत्र तवाभवत् । १३।
चित्रग्रीवस्य भार्याहं गन्धर्वस्य महामते ।
सुलोचनेति विख्याता पत्युरत्यन्तकामदा ।१४।
एकदाहं विमानेन पत्या पीठे न सङ्गता ।
गन्धमादनकुञ्जेषु रेमे कामकलाकुला ।१५।
विषकन्या ने कहा — इस संसार मे अत्यन्त पराक्रमी अनेक
राजागण तथा अन्यान्य मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। इस लिए
मैं अत्यन्त दुःखित हूँ । देवता, दैत्य और मनुष्य किसी के साथ भी
मेरा परिणय संभव नहीं है। मैं आपके अमृत के समान दृष्टि प्रवाह मे
बहती हुई आपको नमस्कार कर रही हूँ ।११। मैं मन्द भाग्य वाली और
विष-दृष्टि से युक्त हूँ और आपकी दृष्टि अमृतमयो है । मैं किस तपस्या
के प्रभाव से आपका दर्शन प्राप्त कर सकी हूँ ।१२। कल्किजी ने कहा —
हे सुश्रोणि ! तुम कौन एव किका कन्या हो ? तुम इस अवस्था को
किस प्रकार प्राप्त हुई हो ? किस कर्म-दोष से तुम्हे यह विष दृष्टि
मिली है । १३। विषकन्या ने कहा— हे महामते ! चित्रग्रीव नामक जो
गन्धर्व हैं मैं उनकी पत्नी सुलोचना हूँ । मेरे द्वारा मेरे पति का मन
अत्यन्त अनन्दित रहता था ।१४। एक समय की बात है — जब मैं
अपने पति के साथ विमाना रूढ़ होकर गन्धमादन पर्वत के एक कुञ्ज मे
शिला पर बैठ कर विहार-रत्त हो गई । १५।
तत्र यक्षमूनिं दृष्ट्वा विकृताकारमातुरम् । १६।
रूपयौवनगर्नेण कटाक्षेणाहसं मदात् । १६।

Page 211Permalink

४६४ ] [ कल्कि पुराण
सोपालम्भ मुनिः श्रुत्वा वचन च ममाप्रियम् ।
शशाप मा क्रुधा तत्र तेनाह विषदर्शना ।१७।
निक्षिप्ताह सर्पपुरे काञ्चन्या नागिनोगणे ।
पतिहोना दैवहीना चरामि विषवर्षिणी ।१८।
न जाने केन तपसा भवद्दृष्टिपथ गता ।
त्यक्तशापामृताक्षाह पतलोक व्रजाम्यत ।१६।
अहो तेषामस्तु शाप प्रसादो मा सतामिह ।
पत्यु. शापहृषेर्मोक्षात्तव पादाब्जदशनम् ।२०।
उस समय मैं अपने रूप यौवन के गर्व से अत्यन्त मदोन्मत्त हो
रही थी । वहाँ विकट शरीर वाले यक्षमुनि को देख कर मैं उन पर
कटाक्ष करती हुई, उनकी हँसी उडाने लगी ।१६। मेरे मुख से अपने
प्रति अपमानजनक वचन सुन कर मुनि क्रोधित हो उठे और उन्होने
मुझे जो शाप दिया, उससे मैं तुरन्त विषदृष्टि को प्राप्त हो गई ।१७। तब
मुझे इस कांचनीपुरी मे नागिनियो के मध्य डाल दिया गया । तभी से
मेरी दृष्टि विष की वर्षा किया करती है । इस प्रकार मै अभागी पति से
हीन होकर यहां एकाकी विचरती हूँ ।१८। मुझे ज्ञात नही कि अपनी
किस तपस्या के फल से मैं आपकी दृष्टि के सामने आ गई हूँ। आपके
दर्शन से मैं शाप-मुक्त होकर अमृतवर्षिणी दृष्टि से सम्पन्न हो गई हूँ ।
अब मैं अपने पति के पास गमन करती हूँ ।१६। अहा ! साधुओ के
प्रसन्न होने की अपेक्षा त शाप देना भी श्रेष्ठ है क्योकि शाप के कारण
ही तो मोक्ष स्वरूप आपके चरणाम्बुज का दर्शन प्राप्त हो सका है ।२०।
' इत्युक्त्वा सा ययौ स्वर्गं विमानेनार्कवर्चसा ।
कल्कितु तत्पुराधीश नृप चक्रे महामतिम् ।२१।
अमर्षस्तत्सुतो धीमान् सहस्रो नाम तत्सुतः ।
सहस्रत सुतश्चसीद्राजा विश्रुतवानसि ।२२।
बृहद्भानानां भूतानां संभूता यस्य वंशजा ।

Page 212Permalink

चतुर्दश अध्याय-३ ] [ ४६५
तं मनुं भूपशार्दूलं नानामुनिगणैर्वृतम् । २३।
अयोध्याया चाभिषिच्य मथुरामगमद्धरिः ।
तस्यां भूपं सूर्यकेतुमभिषिच्य महाप्रभम् । २४।
यह कह कर वह विषकन्या सूर्य जैसे तेजस्वी विमान पर चढ
कर स्वर्ग को गई । कल्किजी ने महामति नामक एक राजा को उस
पुरी के राज्य पर अभिषिक्त किया । २१। उस राजा महामति का पुत्र
अमर्ष हुआ । अमर्ष का पुत्र धीमान् सहस्र और सहस्र का पुत्र अत्यन्त
प्रसिद्ध राजा असि हुआ ।।२२। उसी राजा के वंश मे बृहन्बल राजाओ
की उत्पत्ति हुई । नृपशार्दूल मनु को अयोध्या का राज्य देकर अनेक
मुनियो के सहित कल्किजी मथुरा पहुंचे और उन्होने अत्यन्त प्रभा
से सम्पन्न सूर्यकेतु को मथुरा के राज्य पर विधिवत् अभिषिक्त किया
।२३-२४।
भूप चक्रे ततो गत्वा देवापिं वारणावते ।
अरिस्थल वृकस्थल माकन्दञ्च गजाह्वयम् ।२५।
पञ्चदेशेश्वरं कृत्वा हरिः शम्बलमाययौ ।
शौम्भ पौड्र पुलिन्दञ्च सुराष्ट्रं मगधन्तथा ।
कविप्राज्ञसुमन्तेभ्यः प्रददौ भ्रातृवत्सलः ।२६।
कीकट मध्यकर्णाटध्रमोड्र कलिङ्गकम् ।
अङ्ग वङ्ग स्वगोत्रेभ्यः प्रददौ जगदीशवरः ।२७।
स्वयं शम्बलमध्यस्थ कङ्केन कलापकान् ।
देशं विशाखयूपाय प्रादात्कल्कः प्रतापवान् ।२८।
चोलबर्बरकर्वाख्यान्दारकाद्देशमध्यगान् ।
पुत्रेभ्यः प्रददौ कल्किः कृतवर्म्मपुरस्कृतान् ।२६।
याधा करते हुए कल्किजी ने देवापि को राज्य देकर र_
अरिस्थल, वृकस्थल, माकन्द, हस्तिनापुर और वारणावत-इन पाँच
देशो का अधिपति बनाया और फिर शम्बल ग्राम के लिए चल पडे ।