कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextद्वादश अध्याय ] [ ४५१
रजोजुषः कर्मपरा, हरिपूजापराः सदा ।
तन्नामानि प्रगायन्ति तद्रूपस्मरणोत्सुकाः ॥२१॥
राजा बोले—हे भूपते ! गुरु वसिष्ठ के शापवश राजा निमि ने
देह छोड़ा था । परन्तु आपके इस भोग्यय देह मे वैराग्य की उत्पत्ति
किस प्रकार हुई ? जब यज्ञान्त मे देवनाओ ने उनकी रक्षो करते हुए
उस देह में प्रवेश करने की आज्ञा की, तब भी वे अपने छोडे हुए देह में
प्रविष्ट होने मे सहमत न हुए, इसका क्या कारण था ? ॥१५॥ सुना
जाता है कि शिष्य के शाप से गुरु वसिष्ठ ने देह त्याग कर पुनः देह को
प्राप्त कर लिया। परन्तु, भक्त तो मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, तब वह
उस विमुक्तता को छोड़ कर जन्म किन प्रकार धारण करे ? ॥१६। इस
प्रकार भगवद् माया के वर्णन मे ज्ञानीजन भी अपने को असमर्थ पाते हैं ।
क्योकि वह माया इन्द्रजाल के समान समस्त लोक मे विस्तीर्ण होती हुई
जीवो को विमोहित करती रहती है।१७। वक्ता श्रेष्ठ राजा शशिध्वज
उनके वचन सुन कर भक्तिपूर्वक प्रणाम करते हुए बोले ।१८। उन्होने
कहा—तीर्थ, क्षेत्रादि के योग को प्राप्त हुआ प्राणी जन्म जन्मान्तरो मे
भगवत्कृपा से साधु सग को पाता है और उसी साधु सग के प्रभाव से
उसे ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं ।१९। फिर वह सालोक्य पद को प्राप्त
होकर हर्षित हृदय से हरि-भजन में तत्पर होता है। इस प्रकार भोग्य
वस्तुओ का उपभोग करता हुआ वह मनुष्य लोक मे भक्त हो जाता है
।२०। रजोगुणी पुरुष अपने कर्म द्वारा सदा हरिपूजा-परायण रहते तथा
उनके नाम और रूपादि का स्मरण करने मे सदा उत्सुक रहते हैं ।२१।
अवतारानुकरापर्वव्रतमहोत्सवाः ।
भगवद्भक्तिपूजाढ्याः परमानन्दसम्प्लुताः ॥२२॥
अतो मोक्षं न वांञ्छन्ति दृष्टमुक्तिफलोदयाः ।
मुक्त्वाल्लभन्ते जन्मानि हरिभावप्रकाशकाः ॥२३॥