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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

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DevanagariHindipublished259 pages

Page 207 of 259

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Page 207

४६० ] [ कल्कि-पुराण
सुदर्शनास्त्रघातेन मरण मम काङ्क्षितम् ।
मरणोऽभूदिति ज्ञात्वा रणे वाञ्छामि मोचनम् ।३५।
इत्यसौ जगतामीशः कल्कि श्वशुरघातनम् ।
श्रुत्वैवाधोमुखस्तस्थौ ह्रिया धर्मभिया प्रभु ।३६।
अत्याश्चर्यमपूर्वमुत्तममिद श्रुत्वा नृपा विस्मिता
लोका संसदि हर्षिता मुनिगणा कल्केर्गुणाकर्षिताः ।
आख्यान परमादरेण सुखद धन्य यशस्य पर
श्रीमद्भूपशशिध्वजेरितवजो मोक्षप्रद चाभवन् ।३७।
यह जान कर कि युद्धस्थल मे मरने से मोक्ष की प्राप्ति संभव
है, मैंने यह अभिलाषा की थी कि कल्किजी के सुदर्शन चक्र-प्रहार से
मेरा मरण हो जायगा ।३५। जगदीश्वर भगवान् कल्कि ने अपने श्वसुर
का इस प्रकार मारा जाना स्मरण करके ही धर्मभय और लज्ज से अपना
मुख झुका लिया था ।३५। इस अत्यन्त विस्मय युक्त, अपूर्व और श्रेष्ठ
उपाख्यान को सुन कर राजागण विस्मित हो उठे तथा सभी सभासद्
आनन्द विभोर हुए । कल्किजी के गुणो के प्रति मुनिगण भी आकर्षित
हो रहे थे । राजा शशिध्वज के कहे हुए इस उपाख्यान के सुनने वाला
प्राणी सुखी, धन्य और यशस्वी होकर अन्त मे मोक्ष को प्राप्त करता है,
उसका कभी पुनर्जन्म नही होता ।३७।