कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context४५६ ] [ कल्कि पुराण
अग्न्यागारे ब्रह्मवीरवधेनैकाहिकोज्वरः ।
मोक्ष्मणस्य शरीरेण प्रविष्टो मोहकारकः ।११।
त व्याकुलमभिप्रेक्ष्य द्विविदो भिषजा वरः ।
अश्विवशेन सजात स्वापयामास लक्ष्मणम् ।१२।
लिखित्वा रामभद्रस्य सज्ञापत्रीमतन्द्रित ।
लक्ष्मणा दर्शयामास ऊर्ध्वस्तिष्ठन्महाभुजः ।१३।
लक्ष्मणो वीक्ष्य ता पत्री विज्वरो बलवानभूत् ।
स ततो द्विविद प्राह वर वरय वानर ।१४।
द्विविदस्तच श्रुत्वा लक्ष्मणा प्राहि हृष्टवत्
त्वत्तो मरण प्रार्थ्यं वानरत्वाञ्च मोचनम् ।१५।
उस समय अग्निशाला मे ब्राह्मण की हत्या करने के पाप स्वरूप
लक्ष्मणजी के शरीर मे एकाहिक ज्वर घुस गया, जिससे उन्हे मोहादि
उपद्रवो ने घेर लिया ।११। उस समय अश्विनीकुमार के वश मे उत्पन्न
हुए भिषग्वर द्विविद वानर ने लक्ष्मणजी को ज्वर की पीडा से व्याकुल
देख कर एक मन्त्र बतलाया ।१२। इस मन्त्र को लिख कर भगवान्
श्रीराम के सामने ही एक ऊँचे स्थान पर टाक कर लक्ष्मणजी
को दिखाया गया ।१३। इस मन्त्र को देखते ही लक्ष्मणजी का ज्वर नष्ट
हो गया और उनमे शक्ति आ गई । फिर लक्ष्मणजी ने द्विविद नामक
उस वानर से कहा—हे वानर ! आप वर मांगिये ।१४। तब द्विविद ने
अत्यन्त हर्षित होकर कहा कि मेरी आपसे ही यहो प्रार्थना है कि वानर
भाव से मुक्त होने के उपाय स्वरूप मेरा मरण आपके हो द्वारा हो ।१५।
पुनस्तं लक्ष्मणः प्राह मम जन्मान्तरे तव ।
मोचन भविता कीश बलरामशरीरिणः ।१६।
समुद्रस्योत्तारे तीरे द्विविदो नाम वानरः ।
ऐकाहिक ज्वर हन्ति लिखनं यस्तु पश्यति ।१७।
इति मन्त्राक्षर द्वारि लिखित्वा तालपत्रके ।
यस्तु पश्यति तस्यापि नश्यत्यैकाहिकज्वरः ।१८।