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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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Page 208

तृतीयांश—
चतुर्दश अध्याय
ततः कल्किर्महातेजाः श्वशुरं तं शशीध्वजम् ।
समामन्त्र्य वचश्चित्रैः सह भूपैर्ययौ हरिः ।१।
शशीध्वजो वरं लब्ध्वा यथाकामं महेश्वरीम् ।
स्तुत्वा मायां त्यक्तमायः सप्रियः प्रययौ वनम् ।२।
कल्किः सेनागणैः सार्द्धं प्रययौ काञ्चनीं पुरीम् ।
गिरिदुर्गावृता गुप्तां भोगिभिविषवर्षिभिः ।३।
विदार्य दुर्गं सगणः कल्किः परपुरञ्जयः ।
छित्त्वा विषायुधान्बाणांस्तां पुरीं ददृशोऽच्युतः।४।
मणिकाञ्चनचित्राढ्यां नागकन्यागणावृताम् ।
हरिचन्दनवृक्षाढ्यां मनुजैः परिवर्जिताम् ।५।
सूतजी बोले—फिर अत्यन्त तेज वाले कल्किजी ने अपने अद्भुत
वचनों के द्वारा अपने श्वसुर राजा शशीध्वज को सन्तुष्ट किया और
राजाओं के सहित उठ कर चले गये ।१। राजा शशीध्वज भी इच्छा-
नुसार वर प्राप्त करके, महेश्वरी माया का स्तव करते हुए अपनी पत्नी
सहित विषय-बन्धन से मुक्त होकर वन को गये ।२। इधर कल्किजी ने
पर्वत रूपी दुर्ग से आवृत्त काञ्चनीपुरी को प्रस्थान किया इस पुरी की
रक्षा विष-वर्षक सर्प करते हैं ।३। शत्रुओं के पुर के विजेता कल्किजी
अपनी सेना सहित आगे बढ़े और उस कठिन दुर्ग को तोड कर तथा
विष-वर्षक सर्पों को मार कर पुरी में प्रविष्ट हुए ।४। वहाँ उन्होंने देखा
कि वह नगरी सर्वत्र मणियों और स्वर्ण से युक्त है तथा सब ओर नाग
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