कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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विषयासक्त जीवो का हित साधन करने के कार्य में अपने प्राण, बुद्धि,
धन तथा वाणी आदि सब कुछ लगा देते हैं ।३। शशध्वज बोले-
त्रिगुणात्मिका प्रकृति ही द्वैतभाव को प्रकाशित करती है । सभी वेदो
और तीनो लोको को उत्पन्न करने वाली यह प्रकृति कामरूपिणी है ।४।
तीनो लोको मे नेद ही धर्म की व्यवस्था द्वारा अधर्म का नाश करते हुए
विषयासक्त कामियो में भी भक्ति का प्रवर्त्तन करते हैं ।५। वेदो के ज्ञाता
वात्स्यायन आदि मुनिगणो और मनुओ ने वेदवाणी के शासन को
मानते हुए परमात्मा के हेतु बलि प्रदान की थी ।६। हम भी उन्ही का
अनुगमन करते धर्म पूर्वक युद्ध मे तत्पर होते और वैदिक शिक्षा के
अनुसार ही युद्ध मे आततायियो का संहार कर डालते हैं ।७।
अवध्यस्य वधे यावांस्तावन्वध्यस्य रक्षणे ।
इत्याह भगवान्व्यास. सर्ववेदार्थतत्परः ॥८॥
प्रायश्चित्त न तत्रास्ति तत्राधर्मः प्रवर्त्तते ।
अतोऽत्र वाहिनी हत्वा भवता युधि दुर्जयाम् ॥६॥
धर्मं कृतञ्च कलिकन्तु समानीयागता वयम् ।
एषा भक्तिर्मम मता तवाभिप्रेतमीरय ॥१०॥
अह तदनुवक्ष्यामि वेदवाक्यानुसारतः ।
यदि विष्णु. स सर्वत्र तदा क हन्ति को हतः ॥११॥
हन्ता विष्णुर्हतो विष्णुर्वध. कस्यास्ति तत्र चेत् ।
युद्धयज्ञादिषु वधे न वधो वेदशासनात् ।१२।
इति गायन्ति मुनयो मनवश्च चतुर्दश ।
इत्थं युद्धैश्च यज्ञैश्च भजामो विष्णुमीश्वरम् ।१३।
अतो भागवती मायामाश्रित्य विधिना यजन् ।
सेव्यसेवकभावेन सुखी भवति नान्यथा ।१४।
सर्व वेदार्थ के ज्ञानी भगवान् वेद व्यासजी का कथन है कि जो
पाप-अवध्य के मारने में है वही वध योग्य का वध का न करने मे भी