कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context४४६ ] [ कल्कि पुराण
तमसा घोरसकल्पा भजन्ति द्ववैतदृग्जना ।४४।
सत्त्वान्निर्गुणतोमति रजसा विषयस्पृहा ।
तमसा नरक यान्ति ससाराद्वैतधर्मिणि ।४५।
वह विह्वल होकर नाचता, रोता हँसता और तन्मयतापूर्वक
विचरण करता है। वह स्वय को भूल कर भक्ति-भाव मे ही डूब जाता
है और हरि के अतिरिक्त कही कुछ नही जानता ।४१। यही भगवान् की
अव्यभिचारिणी भक्ति है, इसी के प्रभाव से देवता, दैत्य और मनुष्य
आदि की सम्पूर्ण सृष्टि सहसा पवित्रता को प्राप्त होती है ।४२। नित्या
प्रकृति अथवा ब्रह्म की सम्पदा ही भक्ति रूप मे प्रकट होती है। वही
भक्ति वेदादि मे श्रेष्ठ एव शिव, विष्णु और ब्रह्मा स्वरूपिणी है ।४३।
सत्वगुण के अभ्यास से युक्त द्वैत के जानने वाले मनुष्य इन्द्रिय व्यापार की
इच्छा वाले होते हैं और जो तमोगुण से युक्त हैं वे घोर कार्यों का सकल्प
किया करते हैं ।४४। द्वैत ज्ञान से युक्त ज्ञानीजन सत्वगुण के व्याप्त होने
पर निर्गुणता को प्राप्त होते हैं तथा रजोगुण के व्याप्त होने पर विषयो
मे लग जाते हैं और यदि तमोगुण की अधिकता होती है तो वे पुरुष
नरक को प्राप्त होते हैं ।४५।
उच्छिष्टमवशिष्टं वा पथ्य पूतमभीप्सितम् ।
भक्ताना भोजनं विष्णोर्नैवेद्यं सात्विक मतम् ।४६।
इन्द्रियप्रीतिजनन शुक्रशोणितवर्द्धनम् ।
भोजनं राजस शुद्धमायुरारोग्यवर्द्धनम् ।४७
अतः परं तामसानां कट्वम्लोष्णविदाहिंकम् ।
पूतिपर्युषित ज्ञेय भोजनं तामसप्रियम् ॥४८॥
सात्विकानां वनें वासो ग्रामे वासस्तु राजसः ।
तामसं द्यूतमद्यादिसदनं परिकीर्तितम् ॥४६॥
न दाता स हरिः किञ्चित्सवेकस्तुन याचकं ।
तथापि परमा प्रीतिस्तयोः किंमिति शाश्वती ॥५०॥