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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages
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श्रीकालिका पुराण ३०९
समस्त इन्द्रियों की और रोमों के कूपों की रक्षा करे । मेरी त्वचा में
मुझको सर्वदा भगवान् शम्भु रक्षा करें । नाखून, दाँत, कर और ओष्ठ
आदि में सदैव ही 'राँ' मेरी रक्षा करे । मेरी बस्ती में देवादि रक्षा करे
और स्तनों तथा कुक्षों में देवांत मेरी रक्षा करे । 'यः' सेतु एतदादि में
और दे के बाह्य भाग में मेरी रक्षा करें । आज्ञाचक्र में तथा ललाटकारा
में वैष्णवी तन्त्र-मन्त्र मेरी नित्य ही रक्षा करती हुई स्थित रहे । समस्त
कानों की नाड़ियों में और पार्श्व कक्ष शिखाओं में, रुधिर, स्नायु,
मज्जाओं में, मस्तिष्कों में और पार्वों में द्वितीयाष्टक्षर मन्त्र कवच सभी
ओर रक्षा करें ।
रेतस (वीर्य), वायु में, नाभि के रन्ध्र में, पृष्ठ सन्धियों में सभी
और षडक्षर यह तीसरा मन्त्र सर्वदा मेरी रक्षा करे । नासारन्ध्र में
महामाया और कण्ठरन्ध्र में वैष्णवी रक्षा करे तथा समस्त संधियों में
दुर्गार्ति हारिणी दुर्गा मेरी रक्षा करे । श्रोतों में 'हूँ फट्' यह कालिका
संधियों में दुर्गार्ति हारिणी दुर्गा मेरी रक्षा करे । श्रोतों में 'हूँ फट्' यह
कालिका नित्य रक्षा करे । नेत्र में नेत्र त्रय बीज रक्षा करने के लिए सदा
स्थित रहें । ॐ ऐं ह्रीं हैं नासिका में रक्षा करती हुई चंडिका रहे । ॐ
ह्रीं हूँ तारा सदा मेरे जिह्वा मूल में स्थित रहे । मेरे हृदय में उत्तम ज्ञान
की रक्षा करने के लिए सेतु स्थित रहें । ॐ क्षौं फट् महामाया सभी
और मेरी रक्षा करें । ॐ युँ सः प्राणान् कौशिकी मेरे प्राणों की रक्षा
करें । ह्रीं ह्रीं सौं भर्ग की दयिता देह शून्यों में मेरी रक्षा करें । ॐ नमः
शैलपुत्री सदा सब रोगों का प्रमार्जन करे । ॐ ह्रीं सः हस्रें सः अस्त्राय
फट् शिवदूती सिंह, व्याघ्र के भय से और रण से नित्य रक्षा करे । ह्रीं
सब अस्त्रों से स्थित रहे । ॐ हां ह्रीं सः चन्द्रघण्टा कर्णों के छिद्रों में
मेरी रक्षा करें ।
ॐ क्रीं सः कामेश्वरी कामों में अभिस्थिति होवें और रक्षा करें ।
ॐ आं हूँ फट् प्रचण्डा शत्रुओं को और विघ्नों को विमर्दित करे । ॐ
अं शूल से वैष्णवी जगदीश्वरी नित्य ही रक्षा करे । ॐ वं ब्रह्माणी चक्र
से रक्षा करे और रुद्राणी शक्ति से रक्षा करे । ॐ टं कौमारी वज्र से

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३१० ० श्रीकालिका पुराण ०
रक्षा करे और तं वाराही काण्ड से रक्षा करे । ॐ यं नारसिंहीं क्रव्यादों
से और अस्त्र से मेरी रक्षा करे । शस्त्रों से समस्त अस्त्रों से, मन्त्रों से
और अनिष्ट मन्त्र से चण्डिका मेरी रक्षा करें । यं सं देवी के लिए
बारम्बार नमस्कार है । ऐन्द्रीं विश्वास का घात करने वालों से मेरे मन
की रक्षा करे । ॐ महामाया के लिए नमस्कार है, ॐ वैष्णवी के लिए
बारम्बार नमस्कार है । हे परमेश्वर समस्त भूतों से सर्वत्र मेरी रक्षा करो ।
आधार में, वायु मार्ग में, समिद्ध वह्नि में वरदा के द्वारा वह आठ
अक्षरों वाला मन्त्र प्रवेश करे । जो ब्रह्मा मस्तक में धारण करते हैं गले
में हरि रक्षा करते हैं, हृदय में स्थित की चन्द्रचूड़ रक्षा करते हैं पदमगर्भ
अबीज निखिल निरतिशय प्रधान त्वं मेरी रक्षा करें ।
आद्य शेष स्वरों के समुदायों से सम पर्वतरों से बिना स्वर से भी
युक्तों से, अनुस्वार के सहित बिना विसर्गों वालो से, हरि हर विदित
जो एक सहस्र आठ हैं । वैष्णवी तन्त्र मन्त्रों का सेतुबन्ध निरन्तर निवास
करना है वही परम पवित्र और अपरज भूतल और व्योम के भोग में
मेरी रक्षा करें । आठ अंग तथा आठ मधुमती रचित तथा आठ सिद्धियाँ
आठ-आठ की संख्या जगत् में रतिकला और क्षिप्रकांङ्गष्ठ योग मुझ
में आठ अक्षर क्षरण करें । यह उसका कवच बतला दिया गया है जो
कि धर्म, और काम का साधन करने वाला है । यह परम रहस्य है और
सभी अर्थों का साधक है । मेरे द्वारा कथित इस कवच को जो कोई
एक बार श्रवण कर लेता है वह सभी कामनाओं की प्राप्ति कर लिया
करता है और परलोक में शिव के स्वरूप का भाव किया करता है ।
मेरे द्वारा कथित इस कवच को जो एक बार भी पढ़ता है वह सभी
यज्ञों के फलों का लाभ किया करता है, इसमें कुछ संशय नहीं है ।
जैसे सिंह हाथियों को परास्त कर देता और उसी भाँति वह संग्रामों में
शत्रुओं पर विजयी हो जाता है । जैसे अग्नि तृण को दग्ध कर देती है
वैसे ही वह पुरुष सदा ही शत्रु का दाह कर देता है । उसके शरीर में
शस्त्र और अस्त्र प्रवेश नहीं किया करते हैं । उसको न कभी रोग होता
है और न कभी दुःख ही होता है ।

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൹ श्रीकालिका पुराण ൹ ३११

गुटिका, अंजन, पाताल, पादलेप, रसांजन और उच्चाटन आदि ये
समस्त सिद्धियाँ प्रसन्न हो जाया करती हैं । पारद की गुटिका आकाश
और भू गामिनी होती है । अञ्जन लगाते ही ऊपर और नीचे की गुप्त
वस्तुऐं दिखाई देने लगती हैं । उसकी गति वायु के ही समान हो जाया
करती हैं जो अन्यों के द्वारा कभी वारित नहीं हुआ करती है । वह
मनुष्य लम्बी आयु वाला हो जाता है और स्वेच्छानुसार योग करने वाला
भी हो जाया करता है । वह धनवान् होता है । अष्टमी तिथि में संयत
हो नवमी में विधि के अनुसार शिवा का पूजन करके मन में विधान
से ही शिवा का विचिन्तन करे । जो मनुष्य कवच का न्यास देह में
किया करता है उसका पुण्य का फल अब श्रवण करो । वह समस्त
व्याधियों पर जिय पाने वाला, सौ वर्ष की आयु वाला, रूप से संयुत
और सदा गुणों वाला होता है । धन और रत्नों के समूह से परिपूर्ण और
वह विद्यमान होता है । उसके शरीर को अग्नि दग्ध नहीं करती है और
जल उसको भिगो नहीं सकते हैं । वायु उसको शुष्क नहीं करता है और
राक्षस उसकी हिंसा नहीं किया करता है । शास्त्र उसका छेदन नहीं
करते हैं और भास्कर से उसको ज्वर नहीं हुआ करता है । वेताल,
पिशाच, राक्षस, और गुणों के नायक सभी उसके अधीन हो जाते हैं ।

चारों प्रकार के भूतों के समूह सभी उनके वश में हो जाया करते
हैं जो मनुष्य नित्य ही भक्ति की भावना से भगवान हर का बनाया
हुआ कवच का पाठ किया करता है । वह मैं ही महादेव हूँ और मृत
का महामाया हूँ । उस पुरुष के धर्म अर्थ काम और मोक्ष उसक कर
में ही नित्य स्थित रहा करते हैं । वह अर्थों के द्वारा अन्य के लिए
वरदान वाला होता है तथा बड़ा पण्डित हो जाता है । कविता करने की
शक्ति और सत्य भाषण करना उसको निरन्तर हो जाया करता है । वह
सहस्त्रों श्लोकों को बोला करता है और वह श्रुतिधर हो जाता है । हे
भैरवी! जिसके घर में यह कवच लिखा हुआ स्थिर रहा करता है
उसकी कहीं पर भी दुर्गति नहीं हुआ करती है और उसको कोई भी
दोष नहीं लगता है, उस पुरुष के सभी ग्रह सन्तुष्ट हो जाया करते हैं

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३१२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ

और उसके वश में राजा हो जाते हैं । जिस राजा के राज्य में इस कवच
का ज्ञाता रहता हैं वहाँ पर ईतियाँ कभी नहीं हुआ करती हैं । टिड्डी
आदि की वृद्धि वाली छः ईतियाँ होती हैं । सेतु देव है, शक्ति बीज
है, पञ्चमोह तुम्हारे लिए नमस्कार है । वायुबल से इसके लिए वह
द्वितीय अष्टाक्षर है, सेतुदेव है, वैष्णवी के लिए यह षडक्षर है, ऐसा
कहा गया है ।
ये दोनों जिस पुरुष की जिह्वा के अग्रभाग में होते हैं उसके शरीर
में महामाया देवी निश्चय ही सदा स्थित रहती है । मन्त्रों का प्रणव सेतु
होता है और उसका सेतु प्रणव कहा गया है । पूर्व में अनोङ्कृत क्षरित
होता है और यरस्तात् विशीर्ण हो जाया करता है । नमस्कार महामन्त्र
देव है यह सुरों के द्वारा कहा जाता है । द्विजातियों का यही मन्त्र है और
शूद्रों के सब कर्म में होता है । अकार, उकार और मकार को प्रजापति
ने तीनों वेदों में उद्धृत करके पहले प्रणव का निर्माण किया था । वह
द्विजातियों का उदात्त है और राजाओं का अनुदात्त है । वैश्यों का
प्रचित है । इसका मन से भी स्मरण नहीं करना चाहिए । जो यह चौदह
स्वरों वाला है । शेष ओंकार संज्ञा वाला है और वह अनुस्वार, चन्द्रों
से शूद्रों का सेतु कहा जाता है । जिस तरह से बिना सेतु वाला जल
क्षण भर में ही निम्न स्थल में प्रसर्पित हो जाया करता है ठीक उसी
भाँति बिना सेतु वाला मन्त्र यज्व्ताओं का क्षरित हो जाया करता है ।
इस कारण से सर्वत्र मन्त्रों में द्विजातिगण चार वर्णों वाले होते हैं ।
दोनों पार्श्वों में सेतु का आदान करके जप के कर्म का समारम्भ करे ।
शूद्रों का आदि सेतु अथवा द्विसितु यथेच्छ से दो सेतु समाख्यात हैं ।
और्व ने कहा-यह आपको मैंने त्र्यम्बक् के द्वारा कहा हुआ कवच कह
दिया है । वह कवच अभेद्य है और कवचों के अष्टक में अत्युत्तम है ।
महामाया मन्त्र कल्प कवच मन्त्र से संयुत है । यह षडक्षर समायुक्त है
और तीनों लोकों में महान् दुर्लभ है । हे नृपशार्दूल! इसका जाप नित्य
ही भक्ति से युक्त होकर पढ़ते हुए और वैष्णवी के मन्त्र का जप करते
हुए सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति कर लेता है ।

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൵७५ श्रीकालिका पुराण ൵७५ ३१३
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मन्त्र साधना के अंग
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-भैरव के द्वारा इस सम्वाद को राजा
सगर ने श्रवण करके और भर्ग से वेताल के द्वारा भी सुनकर पुनः और्व
से पूछा । सगर ने कहा-हे द्विज! आपने मन्त्र अंगों के सहित बतला
दिया है । हे द्विजोत्तम! अब देवी के अंगमन्त्र मुझसे कहिए । तथा
समस्त्र मन्त्र और सभी ओर पूजा के स्थान हैं । ठीक उसी भाँति उत्तर
मन्त्र और पृथक्-पृथक् कवचों को और कामाख्यान के माहात्म्य को
जो रहस्य और मन्त्रों के सहित होवे । जैसा भगवान् उमापति महादेव
ने कहा था और वेताल, भैरव दोनों को बतलाया था उसे विस्तार
सहित आप कहने की कृपा करें । यह महान् अद्भुत है, इसका श्रवण
करते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती है । जबकि आपको इसे कहते हुए मैं
देखता हूँ तो मुझे बहुत ही अधिक कौतूहल होता है । और्व ने कहा-हे
राज शार्दूल! जो भी उमापति ने अपने पुत्रों से कहा था और जो एक
महान् आख्यान है । मैं अब आपको कहता हूँ मुझसे आप श्रवण
कीजिए । यह परमाधिक रहस्य है, बहुत ही पवित्र है और पापों का
नाश करने वाला है ।
पुरुषों का परम स्वस्त्ययन अर्थात् कल्याण का आलय है और
इसको गर्भ में पुसंवन कहा गया है, यह कल्याण करने वाला, परम
भद्र और चारों वर्गों के फल का प्रदान करने वाला हैं । इसको ऐसे
व्यक्ति को भी भूलकर भी नहीं देना चाहिए जो शठ होवे, चंचल चित्त
वाला हो । जो नास्तिक हो, जो अजित आत्मा वाला हो, जो देव, द्विज
और गुरु वर्ग का मिथ्या निर्बन्धकारी होवे । जो पापी हो तथा
अभिशाप्त हो, खञ्ज हो, काणा हो और रोगी हो ऐसे पुरुष से यह नहीं
करना चाहिए और न देना भी चाहिए । जिसमें श्रद्धा का अभाव हो
उसे भी यह न देवे । उमापति ने उन दोनों को वेताल, भैरव से कहकर
अर्थात् इस महामाया के मन्त्र कल्प का उपदेश देकर पुनः यह बोले थे ।
भगवान् ने कहा- उत्तम मन्त्र तो मैंने कह दिया है किन्तु अब मूल मन्त्र
को बताऊँगा वह ही सर्वप्रथम जान लो । यह सब पूजाओं में संगत हैं ।

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३१४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
आचमन करके, शुचिता को प्राप्त हुआ, सुन्दर रीति से स्नान किया
हुआ देव पूजा में स्थित होवे । पूजा की वेदी से बाहर स्थित होकर
बुद्धि से चार हाथों के अन्तर में स्थित रहे । घर में अथवा द्वार देश में
स्थित होता हुआ शिर से गुरु को प्रणाम करे अपने इष्टदेव को इसी
भाँति प्रणाम करना चाहिए तथा चित्त के ही द्वारा दिक्पालों को प्रणाम
करना चाहिए ।
जो पाप में अथवा पूर्वकाल में अर्जित किया है उन दिनों में अथवा
अन्य किसी दिन में प्रायश्चितों के द्वारा अपनुन्न नहीं किया गया है उस
पाप का बुद्धि के द्वारा स्मरण करना चाहिए । उस पाप के अपनोदन
करने के लिए दो मन्त्रों का उच्चारण करे । हे देवि! जो कि एक प्राकृत
चित्त है पाप से आक्रांत हो गया था आप मेरे चित्त से आप पाप को
निकाल दो, हूँ फट् आपके लिए नमस्कार है । पाप पुण्य के कुछ देव
प्रत्यक्षा देखने वाले हैं उनमें सूर्य, सोम, यम, काल, और पाँच महाभूत
ये नौ हैं । ये शुभ और कर्म के नौ देव साक्षी होते हैं । इसके अनन्तर
'हूँ फट्' इसके पार्श्व में, ऊर्ध्व में और अधोभाग में आत्मा को क्रोध
की दृष्टि से निरीक्षण करके सुनना चाहिए । ऐसा करने पर प्रथम से
पापों के उत्सारण कर्म किए जाने पर जो भी दृढ़त्तर पाप होता है वह
दूर ही स्थित रहा करता है । पूजन के अतीत होने पर जो अपने स्थान
को पुनः प्रणाम करता है तो जो भी अल्पतर पाप हो वह नाश को प्राप्त
हो जाया करता है । ॐ अः फट्, इस मन्त्र के द्वारा पूजा की वेदी से
वह प्रवेश करे ।
पूजन में पापों के त्याग कर देने वाले की जो भी अभीष्ट कामना
है वह क्षण भर में पूरी हो जाया करती है । पुष्प, नैवेद्य, गन्ध प्रभृति
'ह्रीं हूँ फट्' मन्त्र से जो अपने द्वारा अवज्ञात न होवें भली भाँति से पुष्प
आदि का दूषण, स्पर्श न करने के योग्य का स्पर्श, जो अन्याय से
अर्जित होवे तथा निर्माल्य में संतुष्ट में जो कीट आदि का आरोहरण
हो वह सभी नाश को प्राप्त हो जाता है । नैवेद्य आदि के अवलोकन
से फिर 'रम्', इस मन्त्र से दीप की शिखा का संस्पर्श करना चाहिए ।

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8002 श्रीकालिका पुराण 8002 ३९५
उसका वह दीप स्पर्शन मात्र से ही सुभग हो जाता है । पतंग कीट-केश
आदि के दाह से, कन्याद से संहत, वसा, मज्जा, अस्ति सम्पूति जो
यज्ञादि में उपयोजन हैं ऐसे अज्ञात रूप वाला सभी दोष स्पर्श से ही
विनाश को प्राप्त हो जाया करता है । नारसिंह मन्त्र के द्वारा देवतीर्थ से
संस्पर्श करे । याजक को चाहिए कि घट के मध्य मैं स्थित जल को
देखते हुए अभ्युक्षण करे ।
बांये हाथ से पकड़ कर उस समय में वाम पार्श्व में स्थित पात्र को
आधार मन्त्र के द्वारा संस्कार करता हुआ जल का संस्पर्श करना
चाहिए । यहाँ पर यज्ञ दान से अपेय आदि का संसृष्टि संगता है । शव
के स्पर्श से जलाशय और स्नान से संगत जल से दूषण सब देव पूजन
में विष्ट हो जाया करते हैं । चन्द्रार्थ बिन्दु से रहित यह नारसिंह मन्त्र
है । अपनी संज्ञादि का अक्षर जो बिन्दु और चन्द्रार्द्ध से परियोजित
होवे । इसको कार्य की सिद्धि के लिए आधार मन्त्र साधक जान लेवे ।
फिर आधार मन्त्र के द्वारा अपने आसन को हाथों से लाकर और
रखकर शीघ्र ही पाणि में संस्पर्श करे । उस समय में उस श्रेष्ठ आसन
पर आत्मा मन्त्र के द्वारा उपवेशन करे ।
पूर्व में सोम से समन्वित स्वाक्षर के समाहूत करके साधक को
बिन्दु के सहित आत्मा मन्त्र जानना चाहिए । इसके अनन्तर नाद बिन्दु
से समन्वित मातृका न्यास करे । विचक्षण पुरुष को अपने शरीर में
मातृका के मन्त्रों के द्वारा न्यास करना चाहिए । जो भी दुष्ट हो तथा
स्पष्ट हो और मात्राओं के भ्रष्ट आदि का दोष होवे न्यास किए हुए
मातृका के मन्त्र साथ ही उनका नाश कर दिया करते हैं । समस्त व्यंजन
तथा विष्णु आदि स्वर ये सभी मातृका के मन्त्र है जो कि चन्द्रबिन्दु के
विभूषण वाले हैं । सब युगान्त स्वयं बन्धों के न्यस्त होने पर न्यूनता की
पूर्ति है । विन्यास की हुई मातृका स्वयं ही मन्त्र में और कल्प में न्यूनता
की पूर्ति कर देती है । जिसमें एक मात्रा हो तो वह ह्रस्व होता है मात्रा
का अर्थ कम से कम समय होता है । दो मात्राओं वाला स्वर दीर्घ कहा
जाता है । तीन मात्राओं वाला या दो से अधिक मात्राओं वाला स्वर
प्लुत जानना चाहिए । वर्ण इसी प्रकार से व्यवस्थित होते हैं ।

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३५६ ॥ श्रीकालिका पुराण ॥
सभी वर्णों की मात्रा देवियाँ ही मातृका हैं। वे शिवदूती प्रभृति है।
तनु में स्थित उसके न्यास हैं। ये उन न्यूनताओं की पूर्ति किया करते
हैं तथा शीघ्र ही चतुर्वर्ग को देती हैं और सुतों के पूजन में सदा ही रक्ष
किया करती हैं। सर्वदा मातृका का न्यास करना धर्म, अर्थ, काम मोक्ष
के चार वर्गों का प्रदान करने वाला होता है और सभी कामनाओं को
देने वाला है तथा यह तुष्टि और पुष्टि कर भी देने वाला होता है। जो
मनुष्य सुरों के पूजन के बिना भी मातृका का न्यास किया करता है
उससे चारों प्रकार का भूतों का समूह निरन्तर भयभीत रहा करता है।
उस महान् ओज वाले पुरुष के दर्शन करने के लिए देवगण भी स्पृहा
किया करते हैं। उसमें ऐसी विलक्षण शक्ति समुत्पन्न हो जाती है कि
वह सबको अपने वश में कर लिया करता है और स्वयं कभी भी
पराभव को प्राप्त नहीं होता है।
साधक को चाहिए कि कुसुम को विष्णु के मन्त्र के द्वारा अंगुलि
के अग्र भाग से विमर्दन के लिए ग्रहण करे और इसका ग्रहण कर
शोधन के कर्म में करना चाहिए। उस कुसुम को ग्रहण करके हाथों
से मर्दन करना चाहिए। उपान्त सामिचन्द्र से राजित, शून्य से संयुत,
रुद्रान्तोपरि संसृष्ट यह मन्त्र वैष्णव मन्त्र माना गया है। प्रासाद मन्त्र के
द्वारा साधक अंगुलि के अग्र भाग से ग्रहण करके करों से पुष्प मर्दन
करे। काम बीज के द्वारा निमन्थन करे ब्राह्मण के द्वारा अवघ्राण करे।
ऐशानी दिशा में विशेष रूप से प्रसाद के द्वारा परित्याग करना चाहिए।
ऐसा करने पर करों की अनुपम विशुद्धि होती है। जलों का, गूढ़पाद
आदि के स्पर्श से विशोधन करने से विशुद्धि हुआ करती है। जो हाथों
में दुर्गन्धि एवं उच्छिष्ट के संस्पर्श से दूषण होता है। वह सब अज्ञान
रूप वाला है उसका सुन्दर विधान से विनाश कर देता है। पुष्पों के
ग्रहण करने से अंगुलियों के अग्रभाग शुद्ध हो जाते हैं और करों के
दोनों तले पुष्पों के मर्दन से विशुद्धि को प्राप्त होते हैं। सभी तीर्थ
नासिका में और कर के प्रति समापात होते हैं। हे भैरव! इस कारण
से ये कार्य यत्नों के साथ करने चाहिए।

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൵७०४ श्रीकालिका पुराण ൵७०४ ३१७
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शम्भु चूड़ा और बिन्दु से युक्त हो वह प्रसाद कहा जाता है ।
वासुदेव इन्द्र बिन्दुओं से कर्म बीज जानना चाहिए । व्यञ्जन और आद्य
दन्त्य और आद्य दन्त्य पूर्वक तथा पीछे आद्य दन्त्यद्वय व्यंजन होवे
जिसके उत्तर में प्रणव हो, यह ब्रह्मबीज कहा गया है जो सब पापों
का विनाश करने वाला है । मुख की शुद्धि के लिए प्रथम दीर्घ प्रणव
का उच्चारण करे । वासुदेव के बीज के द्वारा प्राणायाम का समाचरण
करे । जिस देव का जो भी रूप हो वैसा ही भूषण और वाहन होना
चाहिए । उसके पूजन में वह ही पूरक आदि के द्वारा चिन्तन करना
चाहिए । जो सदा पूर्ण चन्द्र के समान है । प्रथम गंगावतार बीज से धेनु
मुद्रा के द्वारा अर्घ्यपात्र के सहित जल में अमृतीकरण करना चाहिए ।
चन्द्र के खण्ड से युत कण्ठ में पञ्चमी बल बीजक है ।
यह गंगावतार बीज है जो सब पापों का नाश करने वाला है । दो
मात्राओं से युत विष्णु बलबीज उदाहृत किया गया है । अमृतीकरण के
होने पर जो जल दिया जाता है, वह अमृत होकर सुरों के पूजन में
देवता की प्रीति के लिए जाया करता है । पूजा के मात्र के जल की
और गंगा भी स्वयं आ जाया करती है । धर्म, काम और अर्थ की
सिद्धि के लिए अमृतीकरण करना चाहिए । अभीष्ट सुर पूजन में
स्वास्तिक, गोमुख, पद्म अर्धस्वस्तिक, पर्यंक आसन प्रशस्त होते हैं ।
वह पादयन्त्र कहा गया है जो सब मन्त्रों से स्वत्युत्तम है । दूध पुरुष को
उसे प्रथम वाराह के बीज के साथ प्रथम ग्रहण करना चाहिए ।
अग्निबीज काया आदि समव्याप्तिक चतुर्थ छठवें स्वरोपरिचर वाराह
बीज कहा जाता है । मन्त्र के दो पादों में किया हुआ वाराह बीज संशुद्ध
है । अभीष्ट देव का दर्शन करते हुए पाद रोष को नहीं देखा करता है ।
अन्य प्रकार से सुरों के पूजन में पाददर्शन युक्त नहीं होता है । मन्त्र
के द्वारा अभीष्ट का लाभ किया करता है । इस कारण से मन्त्र में ही
होना चाहिए । साधना करने वाले पुरुष को कर्म मन्त्र के द्वारा कर की
कच्छपिका बनावे । वहाँ पर संस्कार किए हुए पुरुष से अपने शरीर का
पूजन करे । उस पुष्प के द्वारा पूजित होने पर अपने आपको देवत्य हो

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३१८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
जाता है । दूसरा वैष्णवी तन्त्र बीज है जो बिन्दु इन्द्र से संयुत है । षष्ठ
स्वर के उपरिचर कूर्मबीज कीर्तित किया गया है । दहन और प्लवन
के आदि में दशम रन्ध्र का भेदन साधक को प्रणव मन्त्र के द्वारा भेदन
करना चाहिए । वासुदेव के बीच के द्वारा आकाश में विनिधापति करे ।
प्रणव के सहित जो बीज है वह सब प्रतिपादित कर दिया है ।
आज भी समस्त देवगण क्षति को पद से स्पर्श नहीं किया करते
हैं और अपने शरीर की छाया को भूतल में योजित नहीं किया करते
हैं । उस दोष के मोक्ष के लिए क्षिति पर मन्त्रराज को लिखना चाहिए ।
प्रोक्षण करने से अथवा वीक्षण से भी भेदिनी, शुद्ध हो जाया करती
है । स्थण्डिल का वीक्षण धर्म बीज के द्वारा समाचरण करना चाहिए ।
दान्त बल से संयुक्त और बिन्दु से समन्वित धर्म बीज कहा गया है जो
धर्म, काम और अर्थ का साधन होता है । आदान, धारण तथा संस्थान,
पूजन सलिल से ही पूर्ण, गन्ध और पुरुष का निक्षेप मण्डल का
विन्यास और पुनः पुष्प का सश्रय अमृतीकरण यह पात्र प्रतिपति है ।
मनुष्य अनिरुद्ध के द्वारा आदान करके अस्त्र मन्त्र से धारण करे और
पात्र में वाग्बीजराग्र से मण्डल न्यास योजित करे ।
आद्य बिन्दु के उत्तर अनिरुद्ध बीज होता है । वह अनिरुद्ध जब
फट् अन्त में होता है तो अस्त्र मन्त्र कहा गया है । शम्भु आद्यबल
प्रान्तःसपूर्व ये संहिता है । पर से पूर्व समाप्ति के अन्तवाले बिन्दु के
सहित तीसरा वाग्भव बीज है यह सकल निष्फल नाम वाला है । चतुर्थ
स्वर संकल्प संसृष्टि में बिन्दु से और इन्दु से वर्गादि का द्वितीय तो
वाग्बीज कहा जाता है और यह कामराज नाम वाला है जो धर्म, अर्थ
और काम का साधन होता है । मनोभाव का बीज कुण्डली शक्ति से
संयुक्त होता है वह वासुदेव से सम्पृक्त होता है जो आद्य वाग्भव कहा
गया है । एक-एक काम बीज आदि तीनों से तो त्रिपुरामद है । आद्य,
तृतीय सामीन्दु बिंदुओं से समलंकृत है । यह मदन का मन्त्र है जो काम
के भोग का फल प्रदान करने वाला है ।
ओत्, ऐत के रूप से विन्यस्त यन्त्र भास्कर के सदृश है । उसको

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३१९
में बताऊँगा जो कि कुण्डली की शक्ति है । जो अभेद से कही जाती
है । मार्जक इस मन्त्र के द्वारा भूतों का अपसारण करे इसके करने पर
स्थानभूत जो है वे सुरार्चन के समय में दूर चले जाया करते हैं । भूतों
के वहाँ पर स्थित रहने पर सदा ही वे लुब्धक नैवेद्य मण्डल को विशेष
रूप से लुप्त कर दिया करते हैं और देवता उसका ग्रहण नहीं किया
करते हैं । इस कारण से यत्नपूर्वक भूतों का अपसारण करना ही
चाहिए । वह अपसारण अस्त्र मंत्र के सहित ही करे । उसका मन्त्र यह
कहा गया है । वे भूत इस भूमि के पालक होवें । मैं भूतों के अविरोधक
के द्वारा ही पूजा कर्म कर रहा हूँ । साधक इसके द्वारा स्थण्डिल से
भूतों को अपसारित करके इसके पश्चात् दिग्बन्धन में मन्त्र स्थित
होता है ।
अपनी आत्मा के पूजन के द्वारा ही कर्म के आरम्भ करने की
अधिकारिता प्राप्त हुआ करती है और पूजित आसन योगपीठ के सदृश
हो जाया करता है । यह पाँचों भूतों के स्वरूप वाले वपु स्वाभाविक
रूप से सदा ही अशुद्ध होता है । यह मल की पूर्ति से समायुक्त है और
श्लेष्मा, विष्ठा, मूत्र, इनसे पिच्छल रहा करती है, यह शरीर अपरिष्कृत
रहा करता है । इस शरीर के बीजभूत ये पाँच महाभूत होते हैं । उन
समस्त भूतों को जो देह की संङ्गी हैं और बीज हैं । जो वायु, तेज,
पृथ्वी, जल और आकाश है इनकी वृद्धि के लिए क्रम से शोषण,
दहन, भस्म, प्रोत्साह, अमृतवर्षण और आप्लवन करना चाहिए जो कि
चिंता मोक्ष की विशुद्धि के लिए है । अण्ड के चिंतन से, भेद से उसके
मध्य में देव का चिंतन से, स्वकीय इष्टदेव की चिन्ता सर्वात्मा रूप से
होती है जो कि आत्मा को हो जाती है ।
मैं देव हूँ, ऐसा संस्कार हो जाता है । इसके अनन्तर जो नैवेद्य और
पुष्प गन्ध आदिक है और भी पूजा के उपकरण के लिए है यहाँ पर
देवत्व हो जाता है । देव आधार है, मैं देव हूँ, देव के लिए योजित
करें । सबको देवता की सृष्टि से शुद्धता भी समुत्पन्न हो जाया करती
है । मन और जीवात्मा की शुद्धि प्राणायाम से हुआ करती है । अन्तर्गत

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३२० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
जो भी मल है वह भी शुद्ध हो जाता है। ग्रह में यदि देव या यजन
करे तो उस समय में उसका विलोकन करना चाहिए और आदित्य बीज
के द्वारा क्रम से चारों पाश्र्वों में करे। हान्त समाप्ति से सहित और वह्नि
बीज से संहित होवे । चतुर्थ के सहित उपान्त वह सकल आगे हो, यही
आदित्य बीज कहा गया है जो कि समस्त रोगों का विनाश करने वाला
है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कारण है और सन्तोष देने वाला
है । किसी अशुद्ध पक्षी का संयोग, पक्षी की विष्ठा का प्रसेचन तथा
मूषिकाओं का स्पर्श एवं कृमि और कीट आदि का संगम आदि दोष
नष्ट हो जाया करते हैं अवलोकन करने मात्र से ही इनका विनाश होता
है और गृह दूषण नष्ट हो जाया करता है । इसके अनन्तर प्रथम
योगपीठ का ध्यान का समाचरण करना चाहिए ।
योगपीठ का ध्यान मात्र ही पर्याप्त है। इसी से योगपीठ मण्डल में
प्रवेश किया करता है । योगपीठ के स्मरण करने पर सब कुछ योगपीठ
से परिपूर्ण सम हो जाता है । योगपीठ से परमोत्तम कोई आसन नहीं
हुआ करता है जिसके ध्यान से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है जिसमें
जड़-चेतन मनुष्य सभी हैं। उसके चिन्तन का बड़ा भारी महात्म्य है
जिसके कहने का उत्साह कौन कर सकता है ! उसके चिन्तन भर से ही
देखो मनुष्यों के शोक विनाश हो जाया करता है । योगपीठ के धारण
करने से तो चतुर्वर्ग के फल का वह प्रदायक होता है । अब उसके
ध्यान एवं चिन्तन का प्रकार बतलाया जाता है, वह विशुद्ध स्फटिक
मणि के सदृश है, चतुष्कोण है और चार वृत्तियों वाला है ।
आधारशक्ति से विदित प्रग्रह वाला है तथा सूर्य के समान है । आग्नेय
आदि चारों कोनों में क्रम से सदा ही धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य और वैराग्य
स्थित रहा करते हैं । पूर्व आदि दिशाओं में यह निम्नलिखित क्रम से
स्थिति करते हैं ।
अधर्म, अज्ञान, अनैश्वर्य, अवैराग्य, हैं इससे धारणार्थ व्यवस्थित
हैं। उसके ऊपर जल का समुदाय है। उसमें ब्रह्माण्ड अवस्थित हैं, उस
ब्रह्माण्ड के भीतर जल है। उसके ऊपर यह पृथ्वी स्थित है। उस कूर्म

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६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ ३२१
से ऊपर में अनन्त है और उसके ऊपर यह पृथ्वी स्थित है । अनन्त के
शरीर से संयुक्त एक नाल है जो पाताल तक गोचर होता है । पृथ्वी
के मध्य में एक पद्म स्थित है जिसके दल दिशायें हैं और गिरि उसका
केशर हैं । उसके आठ दिशाओं में दिक्पाल है और मध्यभाग में स्वर्ग
अवस्थित है । उस पद्म की कर्णिका में ब्रह्मलोक है । उसके नीचे भाग
में महालोक आदि हैं । स्वर्ग में ज्योतिर्मणि हैं और देवगण हैं । उनके
अनन्तर में चारों वेद हैं । रज, सत्व, तम ये तीन गुण हैं जो प्रकृति से
समुद्गत हैं । ये सदा ही पद्म के मध्य में स्थित है और परतत्व हैं ।
वहाँ पर आत्मा संस्थित है । जो ऊर्ध्वछेदन है, जो ऊपर की ओर है ।
अधः छेदन है जो नीचे की ओर है वहाँ पर केशर के अग्रभाग में पुनः
स्थित है ।
इसके अनन्तर सूर्य, अग्नि, चन्द्र और मरुत के मण्डल क्रम से है ।
योग पीठ में शिव का आसन है और इसके परे में सुखासन है फिर
आराध्य आसन है इसके पर में विमलासन है । मध्य में सम्पूर्ण इस
चराचर जगत् का विशेष चिंतन करना चाहिए । वहाँ पर तीन भागों
में विनिश्चित हुए ब्रह्मा, विष्णु और शिव का चिन्तन करना चाहिए ।
वहाँ पर अभ्यर्थना करने में समुपस्थित अपने आपका चिंतन करे ।
मण्डल, योगपीठ और पद्म का चिन्तन करना चाहिए । शव आदि
चारों आसनों का भी यहाँ पर चिन्तन करे । इसके उपरान्त योगपीठ का
ध्यान करके मण्डल के साथ एकता पुनः ध्यान करे । पीछे आसन का
यजन करे । योगपीठ के ध्यान के द्वारा जो जिस प्रकार से जल दिया
जाता है और नैवेद्य, पुष्प, धूप आदि स्वयं ही वहां पर उपस्थित हो
जाया करते हैं । योगपीठ के पूजन में गन्धर्वों के सहित सब देवगण
और चर, सचर, गुह्यक सभी चिन्तित और पूजित हो जाया करते हैं ।
अपने अभीष्ट देवता के पूजन बिना जिसके विचिन्तन से चतुर्वर्ग
का लाभ उपासक किया करता है और उसकी तुष्टि एवं पुष्टि हो जाती
है । आवाहन के अनन्तर ही दोनों करों के द्वारा अवतारित करना
चाहिए । पहले दोनों करों को ऊँचा करे और ऊपर की ओर उत्क्षिप्त

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३२२ श्रीकालिका पुराण

करके अन्तर सहित निरन्तर नीचे की ओर नमित करते हुए पूजक को
करना चाहिए । गणेश के बीज से उससे अवतरित होओ, यह कहे ।
अभीष्ट देवों के अवलम्बन के लिए दो बार उच्चारण करे । नासिका
की वायु निःसारण से देवता आकाश में स्थित हो जाते हैं । इस प्रकार
से करने पर उसी स्थिति मण्डल में हो जाया करती है । स्वान्तः अंशु
और बिन्दु से बीज कहा जाया करता है । यह विघ्नों के बीजों का
विनाश करने वाला है और धर्म, कर्म काम साधने वाला है ।
गन्ध पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और जो भी अन्य वस्तु दी जाती है तथा
वस्त्र और अलंकार आदि उनका देवता उच्चारण करके प्रोक्षण तथा
पूजन करे ।
मूल मन्त्र से उत्सर्जन करके प्रतिनाम से निवेदन करना चाहिए ।
वरुण के बीज के द्वारा उनका प्रोक्षण करे । इष्ट मूल मन्त्र के द्वारा
उसी भाँति उत्सर्ग और निवेदन करे । ऊपर चन्द्र और बिन्दु से वरुण
और बीज कहा जाता है । विलोकन, पूरक तथा पृथक्-पृथक्
दान-जप कर्म माला की प्रतिपत्ति यह तीन हैं । अपने इष्ट मन्त्र के द्वारा
माला का प्रोक्षण कीर्तिक किया गया है । पहले गाठापत बीज का
उच्चारण करके इसके अनन्तर ही करना चाहिए । हे माला! आप
अविघ्न करे, इसी मन्त्र के द्वारा माला का ग्रहण करे । जप के अन्त
में माला का न्यास शिर पर करे, ऐसा कहा गया है । हाथों से माला
लेकर श्री बीज के द्वारा उसी भाँति अर्चना करनी चाहिए । अन्त्य
दन्त्यान्य मात्राओं आदि वर्ग और तृतीय पर से पर के पूर्व में श्री बीज
बिन्दु से इन्दु से माला का अवतार शिर से सदा किया जाता है ।
उसके हाथों से आदान करके सारस्वत से श्री बीजों का आद्य-आद्य
बिन्दु चन्द्रार्ध से संयुत, यह चार बीज सारस्वत कहे जाते हैं ।
पौराणिकों और वैदिकों द्वारा और मूल मन्त्र के द्वारा करे । प्रदक्षिणा
और प्रणाम करे जो धर्म व अर्थ का साधक है । भूमि का वीक्षण
करके तथा उसका अध्युक्षण करके पूर्व से क्षिति बीज के द्वारा उस
भूमि का शिर से स्पर्श करता हुआ अपने इष्ट देवताओं को प्रणिपात

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३२३
करना चाहिए । समाप्ति से हीन बीज है और बिन्दु-बिन्दु से संयुत
क्षिति बीज है इसको जान लेना चाहिए । यह चारों वर्गों का प्रदान
करने वाला है । फिर दर्पण, व्यंजन, घण्टा, चामर का प्रोक्षण करे ।
हे भैरव! यह प्रोक्षण पूर्व में कहे हुए नैवेद्य लोकमन्त्र के द्वारा करे ।
इनके बिन्दु और इन्दु से युक्त आद्य नामों के अक्षर हैं-तस्मै नमः
अर्थात् उसके लिए नमस्कार है, यह प्रांतः में, ग्रहण करना चाहिए ।
हे भैरव! वाग्भव के द्वितीय कामबीज से मुद्रा का बन्धन करना
चाहिए । मूल मन्त्र से दर्शन करे । मुद्रा का परित्याग तारा बीज के द्वारा
समाचरण करे । चन्द्र बिन्दुओं से प्रांतादि षष्ठ स्वर से संयुत जो है वह
ताराबीज कहा गया है जो धर्म अर्थ और काम का साधन होता है ।
क्योंकि वह मुद्रा अर्थात् आनन्द को दिया करती है इसलिए यह
मुद्रा-नाम से कीर्तित की गई है । मुद्रा दर्शित किए जाने पर पूजा का
समापन हुआ करता है । वह स्वयं काम, मोक्ष, धर्म, अर्थ और मोद
से समन्वित होती हैं । गमन करने के लिए अन्त में इन छः महामन्त्रों का
उच्चारण करना चाहिए और भक्ति मार्ग के द्वारा पत्र-पुष्प फल, जल
दिया गया है और जो नैवेद्य आवेदित किया गया है उसे कृपा करके
ग्रहण करिए । मैं आवाहन कैसे किया जाता है, यह नहीं जान पाता हूँ
और मुझे विसर्जन करने का भी ज्ञान नहीं हैं । मैं यजन के भाव को
भी नहीं समझता हूँ अतएव हे परमेश्वरि! मेरी आप ही गति हैं ।
कर्म, मन और वचन से आपसे अन्य मेरी कोई भी गति नहीं है ।
हे माता! जिन-जिन सहस्रों योनियों में मैं गमन करूँ, हे अच्युते! उन
योनियों में सदा आपके प्रति मेरी भक्ति होवे जो कभी भी च्युत न
होवे । देवी, दात्री, भोक्त्री यह सम्पूर्ण जगत् देवीमय ही है । देवी सर्वत्र
जय प्राप्त करती है । जो देवी है वह मैं ही हूँ । जो अक्षर परिभ्रष्ट हो
और जो मात्रा से हीन हो, हे देवी! वह सभी आप क्षमा कर देवें । कौन
ऐसा है जिसका मन स्खलित न होता हो । हे भैरव! इन मन्त्रों के पढ़े
जाने पर देवी स्वयं ही प्रसन्न हो जाया करती है और वह अविलम्ब ही
चतुर्वर्ग को प्रदान कर दिया करती है । ऐशानी दिशा में मण्डल की

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३२४
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ

रचना करे जो द्वार और पद्म से वर्जित होवे । विसर्जन के लिए
निर्माल्य धारिणी के पूजन के लिए मण्डल रचना करे । निर्माल्य
धारिण का ध्यान पाद्य आदि के पूजन करे । उसमें निर्माल्य का
निक्षेपण करके मन्त्र से विसर्जन करे । हे परमेश्वरि! अपने परमस्थान
को गमन कीजिए जहाँ पर ब्रह्मा आदि देवगण परम को नहीं जानते हैं ।
इस मन्त्र के द्वारा विसर्जन करके अनन्तर पूरक वायु के द्वारा ध्यान
करते हुए इस मन्त्र से नमस्कार करके उसको हृदय में स्थापित करे ।
हे परमेश्वरि! हे देवि! परमोत्तम स्थान पर अपने आसन पर विराजमान
होइए । जहाँ पर मेरे हृदय में ब्रह्मादिक सब देवता स्थिति हैं । इसके
उपरान्त एक जटा बीजों से इष्ट देवी का बुद्धि से स्मरण करता हुआ
निर्माल्य को मूर्धा में ग्रहण करे जो कि धर्म-काम और अर्थ का साधन
होता है । इसके अनन्तर विभूति के मण्डल की प्रतिपत्ति करे । समस्त
अंगुलियों के समूहों से आठ दलों से संयुत पद्म को क्षति बीज के द्वारा
निर्मन्थन करे । हे भैरव! मण्डल का भी निर्मन्थन करना चाहिए । इसके
पश्चात् मूल मन्त्र के द्वारा अथवा पुनः सर्ववश्य के द्वारा अनामिकाओं
के अग्रभाग से ललाट का संस्पर्श करे । समाप्ति के सहित प्रान्त, उसके
आगे ताराबीज, स्मरबीज विसर्ग के सहित पर सभी-परम एक जटाबीज
होता है जो धर्म काम और अर्थ का साधन है ।
इसके अनन्तर आत्मा के सहित भास्करबीज के मन्त्र के द्वारा
भास्कर के लिए अच्छिद्रार्थ अर्घ्य का निवेदन करना चाहिए । हे ब्रह्मन्!
भास्वान्, कर्मदायी के लिए नमस्कार है । इसके बाद दोनों हाथों को
जोड़कर कथित मन्त्र को पढ़कर एकाग्रमन से वागियों द्वारा अच्छिद्र का
अवधारण करे । यज्ञ का छिद्र, तपश्चर्या का छिद्र, जो छिद्र, मेरे पूजन
में हो वह सब अच्छिद्र हो जावे । भास्कर भगवान् के प्रसाद से ही
अच्छिद्रता हो जावे । इसके पश्चात् पुष्प, नैवेद्य, जलपात्र आदि जो भी
हे उन सबको देवीबीज के द्वारा पुनःविलोकन करना चाहिए । हाथ से
अथवा चक्षु से जहाँ-जहाँ पर पहले मन्त्र न्यास किया है वहाँ-वहाँ ही
इससे विसृष्टि होती है ।

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४०२ श्रीकालिका पुराण ४०२ ३२५
प्रान्तादि पञ्चम वह्निबीज षष्ठ स्वर से आहित तथा उपांत वाग्भव
दुर्गा बीज कहा जाता है । स्थण्डिल, जलती हुई अग्नि, जल सूर्य की
किरणों, और शुद्ध प्रतिमाओं में तथा शालग्राम की शिलाओं में,
शिवलिंग में, शिला में विभूति के लिए पूजा करना चाहिए । एकाग्रमन
वाला होकर सभी जगह मण्डल का न्यास करे । योगपीठ के बीज से
स्थण्डिल आदि में साधक वासुदेव भगवान्, रुद्र देव, ब्रह्माजी की और
सूर्य की पूजाओं में सर्वत्र बुद्ध पुरुष को यह प्रतिपत्ति करनी चाहिए ।
इस प्रकार से इन प्रतिपत्तियों से जो विष्णु भगवान् की पूजा करे तो
उसको भगवान् हरि अविलम्ब ही चार वर्गों के प्रदाता हो जाया करते
हैं । शिव हों या मिहिर हों जो भी अन्य प्रभृति होवे सभी सुरगण इस
विधि में प्रसन्न हो जाया करते हैं विशेष रूप से जगन्मयी महामाया
महादेवी प्रसन्न होती हैं ।
महामाया महादेवी इस प्रतिपत्ति का नित्य ही पूजन में चाहती रहती
हैं । इस प्रकार से जो भी कोई भी पूजा किया करता है वह सम्यक
फल का भागी होता है । इनसे विहीन जो भी पूजा होती है उससे अल्प
से भी अल्प फल हुआ करता है । यह परम रहस्य है और परमाधिक
कल्याण का अयन है । मन्त्र वेदों से परिपूर्ण और शुद्ध समस्त पापों
का विनाश करने वाला होता है । जो इसका ब्राह्मणों के सन्निधान में
श्रवण कराता है, श्राद्ध, यज्ञ, सुरों के पूजनों में इसको सुनाता है वह
इस कर्म का बहुत अच्छा फल प्राप्त करता है । वह पूजा के बिना भी
अनन्त का लाभ करता है ।
देवी तन्त्र कथन
श्री भगवान् ने कहा-आप दोनों ही भली भाँति देवी के तन्त्र का
श्रवण करिए जिसके द्वारा आराधना की हुई देवी शीघ्र ही फल
प्रदायक हो जाया करती है । पूर्व में दिए हुए तन्त्र से विशेष रूप से
यह निश्चय ही उत्तम तन्त्र है । सामान्यतया से यह पहले आपके आगे
कहा गया है । फिर देवी की पूजा में भक्ति कर्म में विशेष रूप से जो

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३२६ ६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२
तन्त्र शेष हैं उनको मैं पुनः बतलाऊँगा । जो पुरुष महामाया की भक्ति
को एकाग्रमन वाला होकर किया करता है । फल, पुष्प, ताम्बूल और
जो अन्न पान आदिक हैं वह सब देवी को समर्पित किए बिना कभी
नहीं खाना चाहिए । मार्ग में अथवा पर्वत के शिखर पर और सभा में
साधक जैसे-तैसे निवेदन करके ही अपने अर्थ को कल्पित करना
चाहिए । मदिरा के पात्र को, रक्त वर्ण वाली स्त्रियों को, सिंह को,
शिव को, रक्त पद्म को, व्याघ्र और वारण (गज) के संगम को
देखकर ही गुरु के लिए, राजा के लिए और फिर महामाया के लिए
नमन अर्थात् नमस्कार करे । जो भार्या पतिव्रता हो उससे सदा ही
ऋतुकाल में संगम करना चाहिए ।
चण्डिका देवी का ध्यान करके जो किया जाता है तब वह कार्य
विभूति के लिए होता है । चाहे शान्तिक कर्म हो अथवा पौष्टिक कर्म
हो तथा इष्टापूर्त्त कर्म हों । जब भी करे तब नमस्कार करके देवी मन्त्र
का समाचरण करना चाहिए । जिस समय में तौर्यत्रिक (नृत्यगान)
अथवा केवल गति को हीं देखें । और वह देवी के लिए निवेदन करके
ही अपना उपयोग करना चाहिए । जो भी कोई भूषण हो अथवा वस्त्र
हो या मलय से समुत्पन्न चन्दन हो उसे अपने शरीर में यदि उपयोग करे
तो वहाँ पर 'धी' अर्थात् बुद्धि से मन्त्र का न्यास करना चाहिए । चाहे
वह व्यायाम में हो और वह विधान में हो, सभा में हो, जल में हो या
स्थल में हो, कहीं पर भी हो मन्त्र का बुद्धि से न्यास करे । जहाँ-जहाँ
पर भी स्वयं गमन करे वहाँ पर ही सदा देवी का स्मरण करना
चाहिए । जो जो भी कर्म पूजन का अंग स्वरूप हो उसका समाचरण
मन्त्र के द्वारा ही करना चाहिए । मंत्र से हीन पूजन का जो भी अंग होता
है वह तो सब निष्फल होता है । जिस कर्म में जो भी अभीष्ट हो हे
भैरव! जो मन्त्र पूजाओं में होवे । वह-वह कर्म नैवेद्य के आलोक मन्त्र
के द्वारा उस-उस कर्म को समाचरित करे । देवी का मण्डल न्यास इष्ट
मन्त्र के द्वारा करना चाहिए ।
पूजा के अन्त में मण्डल को लीप कर उसके द्वारा तिलक कराना

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३२७
चाहिए । और उसको सर्ववश्य मन्त्र के द्वारा ललाट में तिलक का
न्यास करे जो कि धर्म, काम और अर्थ का प्रदान करने वाला है ।
उसके वश में सम्पूर्ण जगत् हो जाता है ।
यज्ञ पूजा तथा राजा सर्वशास्त्र है, यह श्रुत है । पूजन के बिना जो
भी कोई नर इस मन्त्र के द्वारा निरन्तर करे उसके सब वश में हो जाते
हैं चाहे वह राजा हो, राजा का पुत्र हो, स्त्रियाँ हों अथवा यक्ष तथा
राक्षस हों । चारों प्रकार के भूत ग्राम सब उसके वश में हो जाया करते
हैं । प्रवास में अर्थात् अपने घर से दूर देश में हो, अथवा मार्ग में हो,
दुर्ग में हो, स्थान के न प्राप्त होने पर कहीं भी हो अथवा जल में हो
अथवा कारागार में घिरा हुआ हो अथवा निरन्तर भूखा हो वहीं पर
महामाया की पूजा करके जो कि बुद्धि पुरुष को मानसी ही करनी
चाहिए । मन में भय के समुत्पन्न हो जाने पर तथा सिंह और व्याघ्र
आदि के द्वारा समाकुल होने पर, दूसरे के चक्र में समागम होने पर
मानसिक पूजन ही इन स्थितियों में रहने पर करना चाहिए क्योंकि ऐसी
दशा में अन्य कोई भी चारा नहीं है । मन के द्वारा हृदय के अन्दर योग
नामक पीठ का ध्यान करके वहीं पर पृथ्वी के मध्य में पूजन का
समाचरण करना चाहिए । प्रसाधन, स्नान, दन्तधावन कर्म और अन्य
सभी मन के द्वारा हो करके पूजन करना चाहिए ।
इसके पीछे बाहर के देश में पुष्प आदि के द्वारा पूजन की जाती
है उसी भाँति हृदय में भी सभी प्रतिपत्तियाँ करनी चाहिए । देवी का
यजन करने वाला निरन्तर अष्टमी तिथि में अपने रुधिरों से पूजा करनी
चाहिए । लिंग में विराजमान देवी का पूजन करे । उसी भाँति पुस्तक
में संस्थित देवी का पूजन करे । स्थण्डिल में संस्थित महामाया का और
पादुका प्रतिमाओं में पूजन करे । चित्र और त्रिशिख में शंख का यजन
करे अथवा जल में पूजन करे । शिला में, पर्वत के अग्रभाग में तथा
पर्वतों में खोह में नित्य ही भक्तिभाव और श्रद्धा से संयुत देवी का
पूजन करना चाहिए । वाराणसी पुरी में सदा का पूजन करना सम्पूर्ण
फलों की देने वाली हुआ करती है । उससे भी दुगुनी फलप्रदाती

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३२८ ௵ श्रीकालिका पुराण ௵
भगवान् पुरुषोत्तम की सन्निधि में हुआ करती है । उससे भी दुगुने फल
की देने विशेष रूप से द्वारका में कही है । समस्त क्षेत्रों में और तीर्थों
में की हुई पूजा द्वारावती की पूजा के ही समान हुआ करती है ।
विंध्याचल में की हुई पूजा सौगुनी फलदायिका होती है, ऐसा कहा
गया है और गंगा में भी की गई पूजा उसी के समान होती है ।
आर्यावर्त्त, मध्यदेश, ब्रह्मवर्त्त तथा पुष्कर में करतोया नाम की नदी के
जल में उससे भी चौगुनी फल देने वाली कही गई है । हे भैरव! उससे
भी चौगुने फल देने वाली पूजा नन्दि कुण्ड में होती है । उसमें भी
चौगुनी जाल्पिपेश्वर की सन्निधि में की हुई बतलायी हुई है । वहाँ पर
सिद्धेश्वरि की योनि में की गई पूजा उससे भी दुगुनी बताई गई है ।
उससे भी चौगुने फल को देने वाली लौहित्य नदी के जल में कही गई
है । उसी के समान कामरूप देश में सभी जगह जल और स्थल में मानी
गई है । जैसे सबसे श्रेष्ठ भगवान् विष्णु हैं तथा लक्ष्मी सबसे उत्तम है ।
कामरूप में सुरालय में देवी की पूजा प्रशस्त होती है । देवी का क्षेत्र
कामरूप देश है और अन्यत्र उसके समान है अन्य स्थल में देवी विरल
ही हुआ करती है और कामरूप में तो घर-घर में ही विद्यमान रहती है ।
इससे भी सौ गुने महत्व वाली पूजा नीलकूट पर्वत के शिखर पर
होती है ।
उससे भी दुगुने शिवलिंग में की गई पूजा फलदायिनी होती है ।
उससे भी दुगुनी फलदायिनी शैल पुत्र्यादि की योनियों में कही गई हैं ।
उससे भी सौ गुनी अधिक महत्व वाली पूजा कामाख्या देवी की योनि
मण्डल में बतलाई गई है । कामाख्या में महामाया की पूजा को एक
बार कर चुका है वह इस लोक में कामनाओं को प्राप्त करता है और
परलोक में भगवान् शिव की स्वरूपता का लाभ किया करता है । उस
पुरुष के समान अन्य कोई भी भाग्यशाली नहीं है और फिर उसका
कोई भी कृत्य शेष नहीं रह जाता है । वह पुरुष अपना मनोवांछित अर्थ
इस लोक में प्राप्त करके चिरायु हो जाता है । उसकी गति वायु के ही
समान हो जाती है जो अन्यों के द्वारा कभी भी बाधित नहीं हुआ करती