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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 309 of 442

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Page 309

३१२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ

और उसके वश में राजा हो जाते हैं । जिस राजा के राज्य में इस कवच
का ज्ञाता रहता हैं वहाँ पर ईतियाँ कभी नहीं हुआ करती हैं । टिड्डी
आदि की वृद्धि वाली छः ईतियाँ होती हैं । सेतु देव है, शक्ति बीज
है, पञ्चमोह तुम्हारे लिए नमस्कार है । वायुबल से इसके लिए वह
द्वितीय अष्टाक्षर है, सेतुदेव है, वैष्णवी के लिए यह षडक्षर है, ऐसा
कहा गया है ।
ये दोनों जिस पुरुष की जिह्वा के अग्रभाग में होते हैं उसके शरीर
में महामाया देवी निश्चय ही सदा स्थित रहती है । मन्त्रों का प्रणव सेतु
होता है और उसका सेतु प्रणव कहा गया है । पूर्व में अनोङ्कृत क्षरित
होता है और यरस्तात् विशीर्ण हो जाया करता है । नमस्कार महामन्त्र
देव है यह सुरों के द्वारा कहा जाता है । द्विजातियों का यही मन्त्र है और
शूद्रों के सब कर्म में होता है । अकार, उकार और मकार को प्रजापति
ने तीनों वेदों में उद्धृत करके पहले प्रणव का निर्माण किया था । वह
द्विजातियों का उदात्त है और राजाओं का अनुदात्त है । वैश्यों का
प्रचित है । इसका मन से भी स्मरण नहीं करना चाहिए । जो यह चौदह
स्वरों वाला है । शेष ओंकार संज्ञा वाला है और वह अनुस्वार, चन्द्रों
से शूद्रों का सेतु कहा जाता है । जिस तरह से बिना सेतु वाला जल
क्षण भर में ही निम्न स्थल में प्रसर्पित हो जाया करता है ठीक उसी
भाँति बिना सेतु वाला मन्त्र यज्व्ताओं का क्षरित हो जाया करता है ।
इस कारण से सर्वत्र मन्त्रों में द्विजातिगण चार वर्णों वाले होते हैं ।
दोनों पार्श्वों में सेतु का आदान करके जप के कर्म का समारम्भ करे ।
शूद्रों का आदि सेतु अथवा द्विसितु यथेच्छ से दो सेतु समाख्यात हैं ।
और्व ने कहा-यह आपको मैंने त्र्यम्बक् के द्वारा कहा हुआ कवच कह
दिया है । वह कवच अभेद्य है और कवचों के अष्टक में अत्युत्तम है ।
महामाया मन्त्र कल्प कवच मन्त्र से संयुत है । यह षडक्षर समायुक्त है
और तीनों लोकों में महान् दुर्लभ है । हे नृपशार्दूल! इसका जाप नित्य
ही भक्ति से युक्त होकर पढ़ते हुए और वैष्णवी के मन्त्र का जप करते
हुए सभी प्रकार की सिद्धियों की प्राप्ति कर लेता है ।