कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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गुटिका, अंजन, पाताल, पादलेप, रसांजन और उच्चाटन आदि ये
समस्त सिद्धियाँ प्रसन्न हो जाया करती हैं । पारद की गुटिका आकाश
और भू गामिनी होती है । अञ्जन लगाते ही ऊपर और नीचे की गुप्त
वस्तुऐं दिखाई देने लगती हैं । उसकी गति वायु के ही समान हो जाया
करती हैं जो अन्यों के द्वारा कभी वारित नहीं हुआ करती है । वह
मनुष्य लम्बी आयु वाला हो जाता है और स्वेच्छानुसार योग करने वाला
भी हो जाया करता है । वह धनवान् होता है । अष्टमी तिथि में संयत
हो नवमी में विधि के अनुसार शिवा का पूजन करके मन में विधान
से ही शिवा का विचिन्तन करे । जो मनुष्य कवच का न्यास देह में
किया करता है उसका पुण्य का फल अब श्रवण करो । वह समस्त
व्याधियों पर जिय पाने वाला, सौ वर्ष की आयु वाला, रूप से संयुत
और सदा गुणों वाला होता है । धन और रत्नों के समूह से परिपूर्ण और
वह विद्यमान होता है । उसके शरीर को अग्नि दग्ध नहीं करती है और
जल उसको भिगो नहीं सकते हैं । वायु उसको शुष्क नहीं करता है और
राक्षस उसकी हिंसा नहीं किया करता है । शास्त्र उसका छेदन नहीं
करते हैं और भास्कर से उसको ज्वर नहीं हुआ करता है । वेताल,
पिशाच, राक्षस, और गुणों के नायक सभी उसके अधीन हो जाते हैं ।
चारों प्रकार के भूतों के समूह सभी उनके वश में हो जाया करते
हैं जो मनुष्य नित्य ही भक्ति की भावना से भगवान हर का बनाया
हुआ कवच का पाठ किया करता है । वह मैं ही महादेव हूँ और मृत
का महामाया हूँ । उस पुरुष के धर्म अर्थ काम और मोक्ष उसक कर
में ही नित्य स्थित रहा करते हैं । वह अर्थों के द्वारा अन्य के लिए
वरदान वाला होता है तथा बड़ा पण्डित हो जाता है । कविता करने की
शक्ति और सत्य भाषण करना उसको निरन्तर हो जाया करता है । वह
सहस्त्रों श्लोकों को बोला करता है और वह श्रुतिधर हो जाता है । हे
भैरवी! जिसके घर में यह कवच लिखा हुआ स्थिर रहा करता है
उसकी कहीं पर भी दुर्गति नहीं हुआ करती है और उसको कोई भी
दोष नहीं लगता है, उस पुरुष के सभी ग्रह सन्तुष्ट हो जाया करते हैं