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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

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DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 324 of 442

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३२७
चाहिए । और उसको सर्ववश्य मन्त्र के द्वारा ललाट में तिलक का
न्यास करे जो कि धर्म, काम और अर्थ का प्रदान करने वाला है ।
उसके वश में सम्पूर्ण जगत् हो जाता है ।
यज्ञ पूजा तथा राजा सर्वशास्त्र है, यह श्रुत है । पूजन के बिना जो
भी कोई नर इस मन्त्र के द्वारा निरन्तर करे उसके सब वश में हो जाते
हैं चाहे वह राजा हो, राजा का पुत्र हो, स्त्रियाँ हों अथवा यक्ष तथा
राक्षस हों । चारों प्रकार के भूत ग्राम सब उसके वश में हो जाया करते
हैं । प्रवास में अर्थात् अपने घर से दूर देश में हो, अथवा मार्ग में हो,
दुर्ग में हो, स्थान के न प्राप्त होने पर कहीं भी हो अथवा जल में हो
अथवा कारागार में घिरा हुआ हो अथवा निरन्तर भूखा हो वहीं पर
महामाया की पूजा करके जो कि बुद्धि पुरुष को मानसी ही करनी
चाहिए । मन में भय के समुत्पन्न हो जाने पर तथा सिंह और व्याघ्र
आदि के द्वारा समाकुल होने पर, दूसरे के चक्र में समागम होने पर
मानसिक पूजन ही इन स्थितियों में रहने पर करना चाहिए क्योंकि ऐसी
दशा में अन्य कोई भी चारा नहीं है । मन के द्वारा हृदय के अन्दर योग
नामक पीठ का ध्यान करके वहीं पर पृथ्वी के मध्य में पूजन का
समाचरण करना चाहिए । प्रसाधन, स्नान, दन्तधावन कर्म और अन्य
सभी मन के द्वारा हो करके पूजन करना चाहिए ।
इसके पीछे बाहर के देश में पुष्प आदि के द्वारा पूजन की जाती
है उसी भाँति हृदय में भी सभी प्रतिपत्तियाँ करनी चाहिए । देवी का
यजन करने वाला निरन्तर अष्टमी तिथि में अपने रुधिरों से पूजा करनी
चाहिए । लिंग में विराजमान देवी का पूजन करे । उसी भाँति पुस्तक
में संस्थित देवी का पूजन करे । स्थण्डिल में संस्थित महामाया का और
पादुका प्रतिमाओं में पूजन करे । चित्र और त्रिशिख में शंख का यजन
करे अथवा जल में पूजन करे । शिला में, पर्वत के अग्रभाग में तथा
पर्वतों में खोह में नित्य ही भक्तिभाव और श्रद्धा से संयुत देवी का
पूजन करना चाहिए । वाराणसी पुरी में सदा का पूजन करना सम्पूर्ण
फलों की देने वाली हुआ करती है । उससे भी दुगुनी फलप्रदाती