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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

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DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 323 of 442

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Page 323

३२६ ६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२
तन्त्र शेष हैं उनको मैं पुनः बतलाऊँगा । जो पुरुष महामाया की भक्ति
को एकाग्रमन वाला होकर किया करता है । फल, पुष्प, ताम्बूल और
जो अन्न पान आदिक हैं वह सब देवी को समर्पित किए बिना कभी
नहीं खाना चाहिए । मार्ग में अथवा पर्वत के शिखर पर और सभा में
साधक जैसे-तैसे निवेदन करके ही अपने अर्थ को कल्पित करना
चाहिए । मदिरा के पात्र को, रक्त वर्ण वाली स्त्रियों को, सिंह को,
शिव को, रक्त पद्म को, व्याघ्र और वारण (गज) के संगम को
देखकर ही गुरु के लिए, राजा के लिए और फिर महामाया के लिए
नमन अर्थात् नमस्कार करे । जो भार्या पतिव्रता हो उससे सदा ही
ऋतुकाल में संगम करना चाहिए ।
चण्डिका देवी का ध्यान करके जो किया जाता है तब वह कार्य
विभूति के लिए होता है । चाहे शान्तिक कर्म हो अथवा पौष्टिक कर्म
हो तथा इष्टापूर्त्त कर्म हों । जब भी करे तब नमस्कार करके देवी मन्त्र
का समाचरण करना चाहिए । जिस समय में तौर्यत्रिक (नृत्यगान)
अथवा केवल गति को हीं देखें । और वह देवी के लिए निवेदन करके
ही अपना उपयोग करना चाहिए । जो भी कोई भूषण हो अथवा वस्त्र
हो या मलय से समुत्पन्न चन्दन हो उसे अपने शरीर में यदि उपयोग करे
तो वहाँ पर 'धी' अर्थात् बुद्धि से मन्त्र का न्यास करना चाहिए । चाहे
वह व्यायाम में हो और वह विधान में हो, सभा में हो, जल में हो या
स्थल में हो, कहीं पर भी हो मन्त्र का बुद्धि से न्यास करे । जहाँ-जहाँ
पर भी स्वयं गमन करे वहाँ पर ही सदा देवी का स्मरण करना
चाहिए । जो जो भी कर्म पूजन का अंग स्वरूप हो उसका समाचरण
मन्त्र के द्वारा ही करना चाहिए । मंत्र से हीन पूजन का जो भी अंग होता
है वह तो सब निष्फल होता है । जिस कर्म में जो भी अभीष्ट हो हे
भैरव! जो मन्त्र पूजाओं में होवे । वह-वह कर्म नैवेद्य के आलोक मन्त्र
के द्वारा उस-उस कर्म को समाचरित करे । देवी का मण्डल न्यास इष्ट
मन्त्र के द्वारा करना चाहिए ।
पूजा के अन्त में मण्डल को लीप कर उसके द्वारा तिलक कराना