कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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प्रान्तादि पञ्चम वह्निबीज षष्ठ स्वर से आहित तथा उपांत वाग्भव
दुर्गा बीज कहा जाता है । स्थण्डिल, जलती हुई अग्नि, जल सूर्य की
किरणों, और शुद्ध प्रतिमाओं में तथा शालग्राम की शिलाओं में,
शिवलिंग में, शिला में विभूति के लिए पूजा करना चाहिए । एकाग्रमन
वाला होकर सभी जगह मण्डल का न्यास करे । योगपीठ के बीज से
स्थण्डिल आदि में साधक वासुदेव भगवान्, रुद्र देव, ब्रह्माजी की और
सूर्य की पूजाओं में सर्वत्र बुद्ध पुरुष को यह प्रतिपत्ति करनी चाहिए ।
इस प्रकार से इन प्रतिपत्तियों से जो विष्णु भगवान् की पूजा करे तो
उसको भगवान् हरि अविलम्ब ही चार वर्गों के प्रदाता हो जाया करते
हैं । शिव हों या मिहिर हों जो भी अन्य प्रभृति होवे सभी सुरगण इस
विधि में प्रसन्न हो जाया करते हैं विशेष रूप से जगन्मयी महामाया
महादेवी प्रसन्न होती हैं ।
महामाया महादेवी इस प्रतिपत्ति का नित्य ही पूजन में चाहती रहती
हैं । इस प्रकार से जो भी कोई भी पूजा किया करता है वह सम्यक
फल का भागी होता है । इनसे विहीन जो भी पूजा होती है उससे अल्प
से भी अल्प फल हुआ करता है । यह परम रहस्य है और परमाधिक
कल्याण का अयन है । मन्त्र वेदों से परिपूर्ण और शुद्ध समस्त पापों
का विनाश करने वाला होता है । जो इसका ब्राह्मणों के सन्निधान में
श्रवण कराता है, श्राद्ध, यज्ञ, सुरों के पूजनों में इसको सुनाता है वह
इस कर्म का बहुत अच्छा फल प्राप्त करता है । वह पूजा के बिना भी
अनन्त का लाभ करता है ।
देवी तन्त्र कथन
श्री भगवान् ने कहा-आप दोनों ही भली भाँति देवी के तन्त्र का
श्रवण करिए जिसके द्वारा आराधना की हुई देवी शीघ्र ही फल
प्रदायक हो जाया करती है । पूर्व में दिए हुए तन्त्र से विशेष रूप से
यह निश्चय ही उत्तम तन्त्र है । सामान्यतया से यह पहले आपके आगे
कहा गया है । फिर देवी की पूजा में भक्ति कर्म में विशेष रूप से जो