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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

by महाकवि बाणभट्ट

DevanagariHindipublished184 pages
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द्वितीय उच्छ्वासः १२७
मालागुणेन परिकलितकेशान्तम्, शिखण्डाभरणभुवा मुक्ताफलालोकेन
मरकतमणिकिरणकलापेन चान्योन्यसंवलनवृजिनेन प्रयागप्रवाहवेणिका-
वारिणेवागत्य स्वयमभिषिच्यमानम्, श्रमजलविलोनबहलकृष्णागुरु-
पङ्कतिलककलङ्ककल्पितेन कालिम्ना प्रार्थनाचाटुचतुरचरणपतनशत-
श्यामिकाकिणेनेव नीलायमानललाटेन्दुलेखाभिः क्षुभितमानसोद्गतै-
रुत्कलिकाकलापैरिव हारैरुल्लसद्भीरवष्टभ्यमानाभिर्विलासवलगनचटुलै-
र्भूलताकल्पैरीर्ष्या श्रियमिव तर्जयन्तीभिरायामिभिः श्वसितैरविरल-
परिमलैर्मलयमारुतमयैः पाशैरिवाकर्षन्तीभिर्विकटबकुलावलीवराटक-
वेष्टितमुखैर्बृहद्भिः स्तनकलशैः स्वदारसंतोषरसमिवाशेषमुद्धरन्तीभिः


दयति । स्वरव्याकरणविशारदमित्यादिना गानं दर्शयति । परिवेषः परिधिः ।
वृजिनेन शकलेन, कलुषेण वा । प्रयागो गङ्गायमुनासंगमः । तत्प्रवाहस्य वेणिका-
रूपेण वारिणेव । श्रमजलेत्यादौ वारविलासिनीभिः सर्वतो विलुप्यमानमसौभाग्य-
मिवेति संबन्धः । प्रार्थनाचाट्वित्यादौ प्रार्थनादीनि सर्वाणि श्रीहर्षविषयाणि
ज्ञेयानि । मानसं सरः, चेतश्च । उत्कलिका, रहुरुहिकाः, वीचयश्च । अविरले-
त्यादिना धारणाम् आकर्षणं वशीकरणम्, समीपप्रमाणं च । विकटेत्यादिनोद्दीपनमा-
त्रमेव पोषयति । वराटको रज्जुः । बृहद्भिरिति । बृहत्त्वेन हृद्यत्वमेषामाह । बृहत्त्वादेव
च वक्ष्यति–अशेषमिति । स्तनकलशैरिति । कलशैः किल रज्जुवेष्टितमुखै रसो जलमु-


भरण में मोती और मरकत दोनों लगे थे, दोनों की किरणें परस्पर मिल कर उन पर पड़ रहा
थीं, मानों प्रयाग से गङ्गा और यमुना के जल स्वयं आकर उनका अभिषेक कर रहे हों। वहां
गणिकाएं थीं जो उनके सौभाग्य को सब प्रकार से लुप्त कर रही थीं। उन गणिकाओं के
ललाट की चन्द्रलेखा पसीने से पसीज कर बहते हुए कृष्णागुरु के पङ्क के तिलक-कलंक के
कारण काली पड़ गई थीं, मानों प्रिय वचन बोलकर प्रार्थना करने में चतुर होने के कारण
सैकड़ों बार प्रिय के चरण पर सिर पटकने से वहां दाग पड़ गया हो। उनके वक्ष पर हार
उल्लसित हो रहे थे मानों वे उनके उथल-पुथल होते हुए मानस की वीचियाँ हों। वे इस
प्रकार विलास के साथ अपनी भौंहें मटकाती थीं मानों ईर्ष्या से लक्ष्मी को तर्जना दे रही
हों। मलयानल की तरह निरन्तर निकलती हुई सुगन्धित लम्बी सांसें लेतीं तो मालूम होता
कि साँसों की डोर से कुछ खींच रही हों। बकुलमाला की लम्बी-लम्बी डोर से उनके स्तन-
रूपी वृहत् कलश बँधे हुए थे जिनसे अपनी पत्नियों में होने वाले सम्राट् के समस्त संतोष-रस
को मानो वे रिक्त कर रही थीं। हांफने से हिलते हुए उनके स्तन पर हार की तरह मणियों
की किरणों से मानो वे सम्राट् के हृदय को खींच कर हठात् अपने में प्रविष्ट कर रही थीं।

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कुचोत्कम्पिकाविकारप्रेङ्खितानां हारतरलमणीनां रश्मिभिराकृष्य हृदय-
मिव हठात्प्रवेशयन्तीभिः प्रभामुचामाभरणमणीनां मयूखैः प्रसारितै-
र्बहुभिरिव बाहुभिरालिङ्गन्तीभिर्जृम्भानुबन्धबन्धुरवदनारविन्दावरणी-
कृतेरुत्तानैः करकिसलयैः सरभसप्रधावितानि मानसानीव निरुन्धती-
भिर्मदनान्धमधुकरकुलकीर्यमाणकर्णकुसुमरजःकणकूणितकोणानि कुसुम-
शरशरनिकरप्रहारमूर्च्छामुकुलितानीव लोचनानि चतुरं संचारयन्ती-
भिरन्योन्यमत्सरादाविर्भवद्भङ्गुरभ्रुकुटिविभ्रमक्षिप्तैः कटाक्षैः कर्णेन्दी-
वराणीव ताडयन्तीभिरनिमेषदर्शनसुखरसराशिं मन्थरितपक्ष्मणा चक्षुषा
पीतमिव कोमलकपोलपालीप्रतिबिम्बितं वहन्तीभिरभिलाषलीलानि-
र्निमित्तस्मितैश्चन्द्रोदयानिव मदनसहायकाय संपादयन्तीभिरङ्गभङ्गवल-
नाच्चोन्यघटितोत्तानकरवेणिकाभिः स्फुटनमुखराङ्गुलीकाण्डकुण्डलो-
क्रियमाणनखदीधितिनिवहनिभेनाकिंचित्करकामुकार्मुकाणीव रुषा भञ्ज-
दघ्रियते । रसोऽभिलाषः, जलं च । बन्धुरं हृद्यम् । कूणितः संकोचितः । मदनादि-
शब्दे विद्यमानेऽपि मदनान्धेत्यभिप्रायेण कुसुमशरग्रहणम् । अत्र पक्षे कर्णपदं त्य-
ज्यते । अनिमेषदर्शनसुखरसराशिमिव श्रीहर्षम् । प्रतिबिम्बितमिति । अथ च रसो
जलादिः विमले मणिमाजनादावन्तर्वर्त्यपि प्रतिबिम्बितो लक्ष्यते । करवेणिका
उनके चमचमाते हुए आभूषणों की किरणें इस प्रकार फैल रही थीं मानो वे सम्राट् के आलि-
ङ्गन के लिए अनेक भुजाएँ पसार रही हों। जंभाई लेते हुए अपने उत्तान हाथों से मुँह ढँक
कर मानो वे वेग से निकल भागते हुए अपने चित्त को रोक रही थीं। कामांध भौरों द्वारा
विकीर्ण किये गये कान के पराग कणों से वे अपनी आंखों के कोने संकुचित कर लेतीं, मानो
वे आंखें कामदेव के बाणों के प्रहार के कारण मूर्च्छा से मुंद गई हों, उस प्रकार वे अपनी
आंखें चतुरता से चला रही थीं। आंखों से परस्पर मत्सर के कारण भौंहें पेंच कर छोड़े
गए कटाक्षों से मानो अपने कर्णोत्पलों का ताड़न कर रही हों। सम्राट् के निरन्तर दर्शन-
सुख की राशि जिसे उन्होंने अपनी निश्चल आंखों से पी रखा था मानो उनके कपोल
पर प्रतिबिम्बित हो रही थी। मानो काम की सहायता करने के लिए अभिलाषाओं
के कुतूहल से निर्निमित्त हँसी हँसकर बहुत से चन्द्रों को उदित कर रही थीं। कभी-कभी
अपने अङ्गों को तोड़-मरोड़ करते हुए हाथों की उँगलियां एक दूसरे में फंसाकर हथेली
ऊपर उठा रही थीं। उँगलियां चटका कर नखों की किरणों को कुण्डलाकार बनाते
हुए मानों काम की निकम्मी धनुहियों को क्रोध से तोड़ रही थीं। चरण दबाने वाली को,

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[Header] द्वितीय उच्छ्वासः १२१

न्तीभिर्वारविलासिनीभिर्विलुप्यमानसौभाग्यमिव सर्वतः, स्पर्शांस्विन्न-
वेपमानकरकिसलयगलितचरणारविन्दां चरणग्राहिणीं विहस्य कोणेन-
लीलालसं शिरसि ताडयन्तम्, अनवरतकरकलितकोणतया चात्मनः
प्रियां वीणामिव श्रियमपि शिक्षयन्तम्, निःस्नेह इति धनैः, अनाश्रयणीय
इति दोषैः, निग्रहरुचिरितीन्द्रियैः, दुरुपसर्प इति कलिना, नीरस इति
व्यसनैः, भीरुरित्ययशसा, दुर्ग्रहचित्तवृत्तिरिति चित्तभुवा, स्त्रीपर इति
सरस्वत्या, षण्ढ इति परकलत्रैः, काष्ठामुनिरिति यतिभिः, धूर्त इति
वेश्याभिः, नेय इति सुहृद्भिः, कर्मकर इति विप्रैः, सुसहाय इति
परस्परानुबन्धस्थितकराद्वयांगुलिविन्यासः। विलुप्यमानसौभाग्यादिना ताः सुभगा
इत्यर्थः। कोणो वीणादिवादनमाण्डम्। प्रियामिति। वीणायाः श्रियाश्च विशेषणम्।
निःस्नेह इत्यादौ। एतैरेकमप्यनेकधा गृह्यमाणमिति सम्बन्धः। षण्ढः प्रजनन-
क्षमः। काष्ठा पराधारा, तत्प्रधानो मुनिः काष्ठामुनिरतिशयवांस्तपस्वी। नेयः
परवशः। शन्तनुर्नाम राजा भीष्मस्य पिता, वाहिन्या गङ्गायाः पतिः, अयं तु
तस्मादपि महतीनां वाहिनीनां सेनानां पतिः शन्तनुुरिति। 'पञ्चमी विभक्ते' इति
पञ्चमी। भीष्मो जितकाशी जितेन्द्रियः। यतस्त्वयि त्वत्पुत्रे वा सत्यस्मद्दोहित्रस्य
कुतो राज्यमिति। यदा हि दशाधिपतिना स्वसुता मत्स्योदरोद्गता मत्स्यावती
नामास्मै पित्रर्थमर्थ्यते न दत्ता, तदैतेन प्रतिज्ञातम्—'नाहं राज्यं विवाहं वा
करिष्यामि' इति। अत एव ब्रह्मचार्येवाभूत्। राजा च ततोऽपि जितकाशितमः
जितकाशी वा। जितेन जयेन काशते शोभते यः। तथा हि भीष्मेण रामो जितः।
सर्वराजसहितं काशिराजं च जित्वा भ्रात्रर्थमम्बादिकन्यात्रयमनेषीत्। राजा तु
जो अपने हाथों को सम्राट् के स्पर्श से पसीज जाने और कांपने के कारण उनके चरणों पर
गिरती जा रही थी, हँसकर लीला में शनैः शिर पर वीणादण्ड द्वारा ताडन कर रहे थे।
निरन्तर वे अपने वीणादण्ड को अपने हाथ में लिए रहते थे, इस प्रकार अपनी प्रिया वीणा के
समान मानों श्री को भी शिक्षा दे रहे थे। धन उन्हें समझते कि इनमें हमारे प्रति स्नेह कुछ
भी नहीं; दोष कहते हैं कि हमारे ये आश्रय के योग्य नहीं हैं; इन्द्रियाँ कहतीं कि सम्राट् हमें
निगृहीत रखना चाहते हैं; कलि कहता है कि इनके समीप जाना कठिन है; व्यसन कहते कि
ये नीरस हैं; अयश चिल्लाता कि सम्राट् डरपोक हैं; काम समझता कि इनकी चित्तवृत्ति दुर्गृह
है; सरस्वती कहती कि ये स्त्रैण हैं; परकीया स्त्रियाँ कहतीं कि ये नपुंसक हैं; यती लोग कहते
हैं कि ये पहुँचे हुए तपस्वी हैं; वेश्याएँ उन्हें धूर्त कहतीं; सुहृद्वर्ग कहता कि ये नेय हैं अर्थात्
इनकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, ब्राह्मण कहते कि ये हमारे भृत्य हैं; शत्रु कहते कि
बहुत से दूसरे इनके सहायक हैं। इस प्रकार एक ही सम्राट् को लोग अनेक प्रकार से
९ ह०

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१३० हर्षचरितम्
शत्रुयोधैः, एकमप्यनेकधा गृह्यमाणम्, शन्तनोर्महावाहिनीपतिम्,
भीष्माज्जितकाशितमम्, द्रोणाच्चापलालसम्, गुरुपुत्रादमोघमार्गणम्,
कर्णान्मित्रप्रियम्, युधिष्ठिराद्बहुक्षमम्, भीमादनेकनागायुतबलम्,
धनञ्जयान्महाभारतरणयोग्यम्, कारणमिव कृतयुगस्य, बीजमिव
विबुधसर्गस्य, उत्पत्तिद्वीपमिव दर्पस्य, एकागारमिव करुणायाः,
प्रातिवेशिकमिव पुरुषोत्तमस्य, खनिपर्वतमिव पराक्रमस्य, सर्वविद्या-
संगीतगृहमिव सरस्वत्याः, द्वितीयामृतमन्थनदिवसमिव लक्ष्मी-
समुत्थानस्य, बलदर्शनमिव वैदग्ध्यस्य, एकस्थानमिव स्थितीनाम्,
सर्वस्वकथनमिव कान्तेः, अपवर्गमिव रूपपरमाणुसर्गस्य, सकलदुश्च-
रितप्रायश्चित्तमिव राज्यस्य, सर्वबलसन्दोहावस्कन्दमिव कन्दर्पस्य,
ततोऽपि जितकाशितमः। द्रोणश्चापाचार्यः। स हि चापे धनुषि लालसः। चापलं
न करोतीत्यर्थः। यद्वा चः समुच्चये। अपगता लालसा यस्य सोऽपलालसः। निर-
मिलाष इत्यर्थः। गुरुपुत्रोऽश्वत्थामा तस्य सफलशरता। तथा शस्त्रोपसंहारे-
ऽक्षमतया याचितोऽपि कस्यचिदेकस्य मारणमन्तरेण न तदुपसंजहार। तत
उत्तराया उदरस्थे परिक्षिति पाटिते तस्मिस्तदुपसंहृतवान्। अन्यत्र-अमोघा मार्गणा
याचका यस्येति। मित्रः सूर्यः सुहृच्च मित्रम्। क्षमा क्षान्तिः भूश्च। अनेकानि
बहूनि, अनन्यसदृशानि च। एकशब्दस्य च साधारणार्थं नन् । बलं सामर्थ्यम्,
सैन्यं च। धनञ्जयोऽर्जुनः। महाभारतानां कुरुणां यो रणः संग्रामः। अन्यत्र-
महती भारस्य कार्यधुरायास्तरणं निर्वाहणम्। प्रातिवेशिकं प्रतिबिम्बम्। 'खनि
राकरः। अपवर्गः समाप्तिः। सन्दोहः समूहः। अवभृथो यज्ञान्तः। गम्भीरं प्रसन्नं
चेति परस्परापेक्षं बोद्धव्यम्। तथा च सति गम्भीरत्वे प्रसन्नत्वम् ऋजुत्वं चेन्न स्यात्तत
ग्रहण करते थे। शन्तनु केवल वाहिनीपति (अर्थात् गंगा के पति) थे, (उनकी अपेक्षा ये
सम्राट् महावाहिनी (अर्थात् महासेना) के पति थे। भीष्म की अपेक्षा वे अधिक जितेन्द्रिय थे।
द्रोण की अपेक्षा वे अधिक चापलालस (अर्थात् धनुष के प्रेमी अथवा चपलता से शून्य या
निरभिलाष) थे। अश्वत्थामा की अपेक्षा वे अधिक बाण चलाने में निपुण (अमोघमार्ग) थे।
कर्ण की अपेक्षा अधिक वे अपने मित्रों के प्रिय थे। युधिष्ठिर की अपेक्षा अधिक क्षमावान् थे
अथवा विस्तृत पृथिवी के स्वामी थे। भीम की अपेक्षा अधिक हाथियों का उनमें बल था।
अर्जुन की अपेक्षा अधिक वे महाभारत के युद्ध के योग्य थे, अथवा कार्य के बड़े बोझ
को सम्हालने में निपुण थे। मानों वे सतयुग के कारण, विद्वानों की सृष्टि के बीज, दर्प
के उत्पन्न होने के द्वीप, कल्याण के एकागार, पुरुषोत्तम, विद्या के पड़ोसी; पराक्रम की

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द्वितीय उच्छ्वासः १३१
उपायमिव पुरन्दरदर्शनस्य, आवर्तनमिव धर्मस्य, कन्यान्तःपुरमिव कला-
नाम्, परमप्रमाणमिव सौभाग्यस्य, राजसर्गसमाप्त्यवभृथस्नानदिवस-
मिव सर्वप्रजापतीनाम्, गम्भीरं च, प्रसन्नं च, त्रासजननं च, रमणीयं
च, कौतुकजननं च, पुण्यं च, चक्रवर्त्तिनं हर्षमद्राक्षीत् ।
दृष्ट्वा चानुगृहीत इव निगृहीत इव साभिलाष इव तृप्त इव रोमाञ्च-
मुचा मुखेन मुञ्चन्नानन्दबाष्पवारिबिन्दून्दूरादेव विस्मयस्मेरः सम-
चिन्तयत्—'सोऽयं सुजन्मा, सुगृहीतनामा, तेजसां राशिः, चतुरुदधि-
केदारकुटुम्बी, भोक्ता ब्रह्मस्तम्भफलस्य, सकलादिराजचरितजयज्येष्ठ-
जिह्वाप्रकृतित्वं प्रसज्येत । एवं त्रासेत्यादौ बोद्धव्यम् । तथा च कालिदासः ‘भीम-
कान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम् । अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवाणंवः ॥’
इति दिलीपं प्रति वर्णितवान् । कौतुकजननपुण्यत्वादपि संभाव्यते । अत आह—
पुण्यमिति । गम्भीरं च प्रसन्नं चेत्यादौ सर्वत्र विरोध उद्भाव्यः । गम्भीरं सतमिस्त्रं
प्रसन्नं निर्मलं न भवतीति ।
अनुगृहीत इवेत्यादि । एवंविधमहोपतिप्रसादवशात् । निगृहीत इवेति । संकोच-
वशात् । साभिलाष इवेति । तस्य दर्शनीयत्वात् । तृप्त इवेति । तथैव तस्य कृतार्थ-
त्वात् । विरोधी ह्यत्र सुबोधः । केदारं क्षेत्रम् । ब्रह्मस्तम्भं जगत् । फलं रत्नादिः ।
यच्च स्तम्भस्य फलं धान्यादिः तद्भोक्ता कर्षको भवति, राजन्वती प्रशस्तराज्ययुता ।
खान वाले पर्वत, सरस्वती की समस्त विद्या वाला संगीतकभवन, लक्ष्मी के हृदय का दूसरा
अमृतमन्थनदिवस, विदग्धता के बल का दर्शन, मर्यादाओं के एक ही स्थान, कान्ति के सर्वस्व-
कथन, रूपपरमाणुओं की सृष्टि के मोक्ष, राज्य के समस्त दुश्चरितों के प्रायश्चित्त, काम के सारे
बलों के सहित आक्रमण, इन्द्र के दर्शनार्थ उपाय, धर्म के आवर्तन, कलाओं के कुमारी अन्तःपुर
और सौभाग्य के परम प्रमाण थे। समस्त प्रजापतियों ने मानो उन्हीं का निर्माण करके राजाओं
की सृष्टि का यज्ञ समाप्त कर अन्त में अवभृथस्नान कर लिया। इस प्रकार हर्ष गम्भीर,
हँसमुख, भय उत्पन्न करने वाले और रमणीय, आह्लाद उत्पन्न करने वाले और पवित्र थे।
सम्राट् हर्ष को देखकर अनुगृहीत, निगृहीत साभिलाष और तृप्त की भाँति अपने
उद्गत रोमाञ्च वाले मुख से आनन्द के अश्रुकणों को छोड़ता हुआ बाण दूर ही से आश्चर्योत्फुल्ल
हो सोचने लगा—ये ही शोभन जन्मवाले, सुगृहीतनामा, तेजोराशि, चार समुद्रों से घिरे
पृथ्वी के क्षेत्र के स्वामी, जगत् के रत्नादि फलों का उपभोग करने वाले एवं समस्त प्राचीन
।

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मल्लो देवः परमेश्वरो हर्षः। एतेन च खलु राजन्वती पृथिवी। नास्य-
हरेरिव वृषविरोधीनि बालचरितानि, न पशुपतेरिव दक्षजनोद्वेगकारीण्ये-
श्वर्यविलसितानि, न शतक्रतोरिव गोत्रविनाशपिशुनाः प्र वादाः, न
यमस्येवातिवल्लभानि दण्डग्रहणानि, न वरुणस्येव निस्त्रिंशग्राहसहस्र-
रक्षिता रत्नालयाः, न धनदस्येव निष्फलाः सन्निधिलाभाः, न जिनस्ये-
वार्थवादशून्यानि दर्शनानि, न चन्द्रमस इव बहुलदोषोपहताः श्रियः।

वृषो धर्मः, अरिष्टासुरो दान्तरूपश्च। बालेति। बाला हि विवेकहीनत्वादधर्मविरुद्धमा-
चरन्ति। अस्य तु तस्यामपि दशायां धर्मविरोधाभावः। दक्षः कुशलः प्रजापति-
भेदश्च। महेश्वरपक्ष ऐश्वर्यशब्दो मुख्यवृत्तिः, इतरत्र गौणः। गोत्रं कुलम्, कुल-
पर्वताश्च गोत्राः। अतिवल्लभानीति। अतिशब्देन युक्तदण्डत्वमाह। दण्डः करः, यमा-
युधं च। निस्त्रिंशग्राहाः खड्गहस्ताः, अन्यत्र, जलचरभेदाश्च। रत्नालया भाण्डा-
गाराणि, समुद्राश्च। निष्फला ऐश्वर्यादिफलप्राप्तिशून्याः, दानादिविनाकृताश्च।
सन्निधिः सन्निधानम्। एतस्य दर्शनं सर्वस्य फलदायि भवतीत्यर्थः। अन्यत्र-संनि-
धयः शोभनानि निधनान्यस्य। दर्शनानि जिनस्येव नार्थवादशून्यानि। अर्थो धनं
तस्य वादः, अनेनेदं लब्धमिति, तेन शून्यानि। सर्वे तद्दर्शिनोऽर्थेन युज्यते।
जिनस्य पुनरर्थवादशून्यानि महायानयोगाचारमाध्यमिकदर्शनानि। बहुलाः
प्रभूता दोषा रागाद्याः, बहुलदोषाश्च कृष्णपक्षरात्रयः। श्रियः समृद्धयः, शोभाश्च।

राजाओं के चरितों को जीतने वाले, ज्येष्ठ मल्लदेव परमेश्वर (सम्राट्) हर्ष हैं। इनसे धरती
राजन्वती है (अर्थात् प्रशस्त राजा से युक्त है)। विष्णु के समान इनके ऐसे बालचरित नहीं
जिनमें वृष (अर्थात् धर्म, विष्णुपक्ष में अरिष्टासुर) का विरोध हो। इनके पशुपति शिव के
समान ऐसे ऐश्वर्य के विलास नहीं, जिनसे दक्षजनों (चतुर जन, शिवपक्ष में दक्षप्रजापति) के
मन में जरा भी उद्वेग हो। इन्द्र के समान इनके विषय में ऐसा कोई प्रवाद नहीं कि ये गोत्रों
(कुलों, इन्द्रपक्ष में कुलपर्वतों) का विनाश कर डालते हैं। यम के समान दण्ड-ग्रहण (कर
लेना, यमपक्ष में दण्डनामक आयुध का ग्रहण) इन्हें अतिप्रिय नहीं। ये वरुण के समान
अपने रत्नालयों (रत्न के खजाने, वरुणपक्ष में समुद्र) की रक्षा हजारों की संख्या में तैनात
निस्त्रिंशग्राह (खड्गधारी सैनिक, वरुणपक्ष में जलचारी खूंखार जीव) द्वारा नहीं करते,
जैसे कुबेर का सन्निधान प्राप्त करना निष्फल अर्थात् ऐश्वर्य आदि फलों से रहित एवं प्राप्ति
से शून्य है उसी प्रकार इनका सन्निधान फलशून्य नहीं। जैसे बुद्ध के दर्शन (महायान के
योगाचार और माध्यमिक दर्शन) सर्वथा अर्थवाद (प्राशस्त्यमूलक वाक्य) से शून्य हैं, वैसे
ही इनके दर्शन धन की प्राप्ति के वचनों से शून्य नहीं। चन्द्र जैसे बहुलदोष (कृष्ण

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द्वितीय उच्छ्वासः १७३
चित्रमिदमर्त्यमरं राजत्वम् । अपि चास्य त्यागस्यार्थिनः, प्रज्ञायाः
शास्त्राणि, कवित्वस्य वाचः, सत्त्वस्य साहसस्थानानि, उत्साहस्य
व्यापाराः कीर्तेर्दिङ्मुखानि, अनुरागस्य लोकहृदयानि, गुणगणस्य संख्या,
कौशलस्य कला, न पर्याप्तो विषयः । अस्मिंश्च राजनि यतीनां योग-
पट्टकाः, पुस्तकर्मणां पार्थिवविग्रहाः, षट्पदानां दानग्रहणकलहाः, वृत्तानां
पादच्छेदाः, अष्टापदानां चतुरङ्गकल्पना, पन्नगानां द्विजगुरुद्वेषाः, वाक्य-
विदामधिकरणविचाराः, इति समुपसृत्य चोपवीती स्वस्तिशब्दमकरोत् ।
पर्याप्तः परिपूर्णः । योगपट्टका यतीनामुपकरणं पर्यङ्कबन्धनाथम् । ते यतीनां चतुर्था-
श्रमिणामेव, न पुनर्योगेन युक्ताः पट्टकाः कूटप्रधानानि लेख्यपत्राणि केषांचित् ।
एवमन्यत्रापि । पुस्तकर्म लेप्यम् । पार्थिवविग्रहा मृन्मयशरीराणि, राजभिः सह
वैराणि च । दानग्रहणं मदजलं दानम्, ऋणव्यवहारश्च । वृत्तानां गुरुलघुनियमात्म-
कानां । समाश्च समविषमाणां पादच्छेदा भागविरामाः, चरणकर्त्तनानि च । अष्टा-
पदानां चतुरङ्गफलकानाम् । 'चत्वार्य्यङ्गानि सेनाया हस्त्यश्वरथपत्तयः' तेषां
कल्पना रचना, चतुर्णामङ्गानां पाणिपादस्य च छेदः । द्विजगुरुर्गरुडोऽपि । वाक्य-
विदां मीमांसकानामधिकरणविश्रान्तिस्थानानि । राज्ञां च धर्मनिर्णयस्थानानि ।
अधिकबलो वा रणः संग्राम इति केचित् । उपवीती दक्षिणावीती करः । उक्तं च—
'उद्धृते दक्षिणे पाणावुपवीत्युच्यते द्विजः' इति ।
पक्ष की रातों) में क्षीण हो जाता है उस प्रकार के रोग आदि बहुरु दोषों के कारण आहत
या समृद्धिहीन नहीं हुए । देवताओं से भी बढ़ा चढ़ा इनका प्रभुत्व है यह देखकर आश्चर्य
होता है । और भी—इनका त्याग इतना है कि पर्याप्त याचक नहीं मिलते, इनकी
प्रज्ञा इतनी है कि शास्त्र के विषय पर्याप्त नहीं, कवित्व के सामने वाण, बल के सामने
साहस का स्थान, उत्साह के सामने व्यापार, गुणों के सामने संख्या और कौशल के सामने
कला आदि पर्याप्त विषय नहीं ठहरते । इनके शासन में यति लोग ही ( पर्यङ्कबन्ध आदि
आसन में) योगपट्ट नामक वस्त्रविशेष धारण करते थे, ( न कि इनके राज्य में जाली बनाए
हुए ताम्रपत्र थे ) । इनके शासन में मूर्तियां ही मिट्टी की बनाई जाती है ( न कि परस्पर
पार्थिवविग्रह अर्थात् राजाओं के साथ लड़ाई-झगड़े होते हैं) । भौंरे ही (हाथियों के)
दानजल के ग्रहण में झगड़ते (याचक लोग दान लेने के अवसर पर नहीं झगड़ते हैं)
वृत्त अर्थात् छन्दों के ही चरण में सम-विषम या भाग और विराम आदि छेद होते (न
कि किसी पाप-विशेष के होने से पैर काट लिए जाते थे) । शतरंज के खेल में ही सेना
के चार अङ्ग हस्ती-अश्वरथ-पैदल की कल्पना है ( न कि अपराधी के दोनों हाथ और
दोनों पैर काट लिए जाते हैं) सर्प ही द्विजगुरु (गरुड) से द्वेष रखते हैं (न कि प्रजा के

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१३४ हर्षचरितम्
अथोत्तरे नातिदूरे राजधिष्ण्यस्य गजपरिचारको मधुरमपरवक्त्र-
मुच्चैरगायत्—
'करिकलभ विमुञ्च लोलतां चर विनयव्रतमानताननः ।
मृगपतिनखकोटिभङ्गुरो गुरुरुपरि क्षमते न तेऽङ्कुशः' ॥
राजा तु तच्छ्रुत्वा दृष्ट्वा च तं गिरिगुहागतसिंहबृंहितगम्भीरेण स्वरेण
पूरयन्निव नभोभागमपृच्छत्—'एष स बाणः ?' इति । 'यथाऽऽज्ञापयति
देवः । सोऽयम्' इति विज्ञापितो दौवारिकेण 'न तावदेनमकृतप्रसादः
पश्यामि' इति तिर्यङ्नीलधवलांशुकधारां तिरस्करिणीमिव भ्रमयन्न-
पाङ्गनीयमानतरलतारकस्यायामिनीं चक्षुषः प्रभां परिवृत्य प्रेष्ठस्य पृष्ठतो
गजपरिचारक इति । अन्यगजपरिचारकस्य स्वजातिसमुचितं वस्तु राज्ञोः
प्रकृतस्मारकं जातम् । तत्र करिणां स्वभावत एव रागित्वादस्यापि रागवत्त्वाद्
भुजङ्गता स्मृतिः सञ्जातेति । भंगुरो वक्रः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुर इति । स्पष्टा
व्याख्या । गुरुर्भारः, शासिता च । उपरि पृष्ठदेशे प्रभुभावे च अंकुश इवांकुश
इत्यपि । अत आह—तच्छ्रुत्वेति । बृंहितं गर्जितम् । अंशव एवांशुकः । अंशुकं च
लोग ब्राह्मण और गुरु से द्वेष करते हैं ) मीमांसक लोग ही अधिकरणों अर्थात् भिन्न-भिन्न
प्रकरणों में विचार-विमर्श करते हैं, (न कि धर्मनिर्णय के स्थान-फौजदारी और दीवानी
की अदालतें लगती थी) यह सोच बाण ने समीप जाकर दाहिना हाथ उठा 'स्वस्ति' शब्द
का उच्चारण किया ।
उसी समय उत्तर दिशा की ओर राजभवन के कुछ ही दूर पर किसी महावत ने मधुर
अपवक्त्र को ऊँचे स्वर में गाया—
'अरे हाथी के बच्चे, तू अपनी चंचलता छोड़ दे, सिर नीचा करके विनय का व्रत
ले । यह अङ्कुश जो शेर के नखाग्र के समान टेढ़ा और कठोर है, तेरे ऊपर क्षमा नहीं
करेगा ।'
उसे सुनकर हर्ष ने बाण को ओर देखा और पर्वत की कन्दरा में बैठ कर दहाड़ते हुए
सिंह की आवाज के समान गम्भीर स्वर से नभोभाग को मानो भरते हुए पूछा—'वही यह
बाण है ?' तब दौवारिक ने निवेदन किया 'देव का कथन सत्य है, ये वही हैं ।' 'मैं जब
तक यह मेरे प्रसाद का पात्र नहीं होगा तबतक इसे नहीं देखूँगा' (यह कह कर ) तिर्यक्
नील-धवल वस्त्रवाली तिरस्करिणी (जवनिका) की भाँति अपाङ्ग तक पहुँचाए
गए तरल तारक वाले नेत्र की फैलने वाली प्रभा को घुमा कर पीठ की ओर बैठे हुए

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द्वितीय उच्छ्वासः १३५
निषण्णस्य मालवराजसूनोरकथयत्—'महानयं भुजङ्गः' इति। तूष्णीं-
भावेन त्वगमितनरेन्द्रवचसि तस्मिन्मूके च राजलोके मुहूर्तमिव
तूष्णीं स्थित्वा बाणो व्यज्ञापयत्—'देव ! अविज्ञाततत्त्व इव, अश्रद्दधान
इव, नेय इव, अविदितलोकवृत्तान्त इव च कस्मादेवमाज्ञापयसि ?
स्वैरिणो विचित्राश्च लोकस्य स्वभावाः प्रवादाश्च । महद्भिस्तु यथार्थ-
दर्शिभिर्भवितव्यम् । नार्हसि मामन्यथा संभावयितुमविशिष्टमिव ।
ब्राह्मणोऽस्मि जातः सोमपायिनां वंशे वात्स्यायनानाम् । यथाकाल-
मुपनयनाद्याः कृताः संस्काराः । सम्यक्पठितः साङ्गो वेदः । श्रुतानि च
यथाशक्तिः शास्त्राणि । दारपरिग्रहादभ्यगारिकोऽस्मि । का मे भुजङ्गता ।
वस्त्रम् । तिरस्करिणी जवनिका । प्रेष्ठस्यातिप्रियस्य । नेयः परवशः । स्वैरिणः
स्वतन्त्राः । सोमपायिनां सोमपानाम् । 'शिक्षा कल्पो व्याकरणं ज्योतिषं निरुक्तं
छन्दोविचितिः' इति षडङ्गानि वेदस्य । अभ्यागारिको गृहस्थः, सम्यग्वृत्तिस्थितो
वा । का मे भुजङ्गतेति । का मे भुजंगता शृङ्गारित्वम् । कामे मदने भुजंगता ज्ञेया,
न माहृशेषु । नहि मे काचिद्भुजं बाहुं गता प्राप्तेत्यर्थः । लोकद्वयेत्यादिना त्रिवर्ग-
स्यानुपघातं दर्शयति । शास्त्रविरोधप्रसङ्गात् । 'शतायुर्वै पुरुषः' कालमन्योन्यानु-
परमप्रिय मालवराज के पुत्र से कहा—'यह भारी भुजंग (गुण्डा या लम्पट) है।'
मालवराज के पुत्र तो चुप रहे। उन्हें हर्ष की बात समझ में न आई और राजसमूह भी
सुनकर गुम हो गया। तब क्षण भर चुप रह कर बाण बोला—'हे देव, आप इस प्रकार की
बात क्यों ऐसे कहते हैं जैसे आपको मेरे विषय में सच्ची बात पता न हो, या मेरा
विश्वास न हो, आपकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती हो, अथवा आप स्वयं लोक के
वृत्तान्त से अनभिज्ञ हों। लोगों के स्वभाव और फैली हुई बातें मनमानी और तरह-
तरह की होती हैं। किन्तु श्रेष्ठजनों को ठीक-ठीक देखना चाहिए। मुझे साधारण-सा समझ
कर अनाप-सनाप कल्पना न कीजिए। सोमपान करने वाले वात्स्यायन ब्राह्मणों के
वंश में मैं जन्मा हूँ । समय से मेरे यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं। मैंने अङ्गों के साथ
वेदों का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय किया है। अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रों का भी
श्रवण किया है। विवाह करके नियमित गृहस्थ हूँ। तो मुझ में क्या भुजंगपना है ? † मेरा
† का मे भुजङ्गता—मेरे जीवन में कौन-सी ऐसी बात है जिसे भुजंगता कही जाय ?
भुजंगता उस व्यक्ति में रहती है जो कामी है, मुझमें नहीं, मैंने किसी स्त्री में भुजंगता
नहीं की अर्थात् अपनी भुजाओं में आलिंगन नहीं किया। अथवा भुजंगता तो काम
(मदन) में होती है न कि मुझ-जैसे में।

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१३६ हर्षचरितम्
लोकद्वयाविरोधिभिस्तु चापलैः शैशवशून्यमासीत् । अत्रानपला-
पोऽस्मि । अनेनैव च गृहीतविप्रतीसारमिव मे हृदयम् । इदानीं तु सुगत
इव शान्तमनसि मनाविव कर्तरि वर्णाश्रमव्यवस्थानां समवर्तिनीव च
साक्षाद्दण्डभृति देवे शासति सप्ताम्बुराशिरशनाशेषद्वीपमालिनीं महीं
क इवाविशङ्कः सर्वव्यसनबन्धोरविनयस्य मनसाप्यभिनयं कल्पयिष्यति ।
आस्तां च तावन्मानुष्यकोपेताः । त्वत्प्रभावादलयोऽपि भीता इव मधु
पिबन्ति । रथाङ्गनामानोऽपि लज्जन्त इवाभ्यनुवृत्तिव्यसनैः प्रियाणाम् ।
कपयोऽपि चकिता इव चपलायन्ते । शरारवोऽपि सानुक्रोशा इव श्वाप-
दगणाः पिशितानि भुञ्जते । सर्वथा कालेन मां ज्ञास्यति स्वामी स्वयमेव ।
अनपाचीनचित्तवृत्तिग्राहिण्यो हि भवन्ति प्रज्ञावतां प्रकृतयः' इत्यभिधाय
तूष्णीमभूत् । भूपतिरपि 'एवमस्माभिः श्रुतम्' इत्यभिधाय तूष्णीमेवा-
भवत् । संभाषणआसनदानादिना तु प्रसादेन नैनमन्वग्रहीत् । केवलममृत-
बद्धं परस्परस्यानुपघातेन त्रिवर्गं सेवत इत्यत एवाह-शैशवमिति । अशून्यमिति ।
अनेन तदेकासक्तत्वं परिहरति । अनपलापो निरपह्नवः । विप्रतीसारः पश्चात्तापः ।
सुगतो बुद्धः । समवर्ती यमः । मनुष्यस्य भावो मानुष्यकम् । रथाङ्गनामानश्चक्र-
वाकाः चपलायन्ते चपलत्वमाचरन्ति । शरारवो हिंस्राः । श्वापदगणाः प्राणि-
समूहाः । पिशितं मांसम् । अनपाचीनाऽमृष्टा । अविपरीतेत्यर्थः, निर्दोषा वा ।
शैशव लोक-परलोक से विरोध न रखने वाली चपलताओं से शून्य नहीं था। मैं
इस सम्बन्ध में अपलाप नहीं करता। इसी कारण मेरे हृदय में पश्चात्ताप है। किन्तु इस
समय जब कि भगवान् बुद्ध के समान शान्तचित्त, मनु के समान, वर्णाश्रम-मर्यादा के
रक्षक और यम के समान साक्षात् दण्डधर आप सातों समुद्रों को करधनी और समस्त
द्वीपों की माला से विराजित पृथिवी का शासन कर रहे हैं। तो कौन ऐसा निडर है
जो सब प्रकार से दुःखद अविनय का मन से भी अभिनय करे? मनुष्यों की तो
बात जाने दीजिये, आपके प्रभाव से भौंरे भी डरते-डरते मधुपान करते हैं, चक्रवात
पक्षी भी अपनी पत्नी के प्रति अतिशय आसक्तिरूप व्यसन से लज्जित होते हैं,
वानर भी शंकित होकर चपलता करते हैं, हिंसक जानवर भी दयावान् होकर
पश्चात्ताप करते हुए मांस का भक्षण करते हैं। समय से स्वयं आप मेरे विषय में
जान लेंगे, क्योंकि बुद्धिमानों का यह स्वभाव होता है कि वे किसी बात में भी विपरीत
हठ नहीं रखते।' इतना कह कर बाण चुप हो गए। सम्राट् भी 'मैंने ऐसा ही सुना था'
बस इतना ही कह चुप हो गए। लेकिन परस्पर बात-चीत, आसनदान आदि के प्रसाद से

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द्वितीय उच्छ्वासः

वृष्टिभिः स्नपयन्निव स्नेहगर्भेण दृष्टिपातमात्रेणान्तर्गतां प्रीतिमकथयत्।
अस्ताभिलाषिणि च लम्बमाने सवितरि विसर्जितराजलोकोऽभ्यन्तरं
प्राविशत्।
बाणोऽपि निर्गत्य धौतारकूटकोमलातपत्विषि निर्वाति वासरे, आस्ता-
चलकूटकिरीटे निचुलमञ्जरीभांसि तेजांसि मुञ्चति वियन्मुचि मरी-
चिमालिनि, अतिरोमन्थमन्थरकुरङ्गकुटुम्बकाध्यास्यमानअदिष्ठगोष्ठीन-
पृष्ठास्वरण्यस्थलीषु, शोकाकुलकोककामिनीकूजितकरुणासु तरङ्गिणीतटेषु
वासविटपोपविष्टवाचाटचटकचक्रवालेष्वालवालावर्जितसेकजलकुटेषु नि-
ष्कुटेषु, दिवसविहृतिप्रत्यागतं प्रस्रुतस्तनं स्तनंधये धयति धेनुवर्गमुद्गतक्षीरं
क्षुधिततर्णकव्राते, क्रमेण चास्तधराधराधातुधुनीपूरप्लावित इव लोहिताय-
मानमहसि मज्जति सन्ध्यासिन्धुपानपात्रे पातङ्गे मण्डले, कमण्डलुजल-

बाणोऽपीत्यादौ । बाणोऽप्यस्मिन्सति निवासस्थानमगादिति संबन्धः । 'रीतिः
स्त्रियामारकूटम्' इत्यमरः । निर्वाति शाम्यति । निचुलो वेतसवृक्षः । भुक्तोद्गीर्णा-
हारचर्वणं रोमन्थः । अदिष्ठं मृदुतमम् । गोष्ठीपूर्वं गोष्ठोनम् । 'गोष्ठात्तञ्चभूतपूर्वे' ।
उक्तं च—'गोष्ठं गोस्थानकं तत्तु गोष्ठीनं भूतपूर्वकम्' इति । कोकाश्चक्रवाकाः ।
तरङ्गिणी नदी । आलवालमावापः । कुटा घटाः । निष्कुटाः स्वगृहारामाः । स्तन-

उसे अनुगृहीत नहीं किया। केवल स्नेह से भरे अमृत की वर्षा करने वाले दृष्टिपातमात्र से
उसको जैसे नहलाते हुए उन्होंने अपने अन्तरतम की प्रीति प्रकट की। जब सूर्य अस्ताचल
की ओर लटकने लगे तब राजसमूह विसर्जित कर महल के अन्दर चले गये।
बाण भी वहाँ से निकल कर अपने निवासस्थान स्कन्धावार में लौट आया। ढलते हुए
दिन के आतप का तेज साफ-सुथरे पीतल के समान मन्द पड़ गया। अस्ताचल के मुकुट सूर्य
वेतस की मंजरी जैसे अपने तेजसमूह की छोड़कर आकाश से हट रहे थे। वनभूमियों के
मुलायम स्थानों में झुण्ड के झुण्ड मृग बैठकर धीरे-धीरे पँगुरी करने लगे। नदियों के तटों पर
प्रियाविरह से शोकाकुल होकर चक्रवाक की पत्नियां करुण आवाज में टर्राने लगीं। गृह के
पास वाले उपवनों में चटक नामक छोटे-छोटे पक्षी पेड़ों पर बैठ कर चहचहाने लगे और वृक्ष
के थलों में सींचने के काम में आने वाले घड़े औंधा कर रख दिए। दिन भर चरने के
बाद शाम को टहल कर आई हुई दुधार गायों के स्वयं उत्पन्न क्षीर वाले स्तन को उनके बछड़े
चुभलाने लगे। क्रम से अस्ताचल की गेरू आदि धातुओं के झरनों में डुबकी लगाने से लाल

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१३८ हर्षचरितम्
शुचिशयचरणेषु चैत्यप्रणतिपरेषु पाराशरिषु, यज्ञपात्रपवित्रपाणौ प्रकीर्ण-
बर्हिष्युत्तेजसि जातवेदसि हवींषि वषट्कुर्वन्ति यायजूकजने, निद्राविद्राण-
द्रोणणकुलकलिलकुलायेषु कापेयविकलकपिकुलेष्वारामतरुषु निर्जिगमि-
षति जरत्तरुकोटरकुटीकुटुम्बिनि कौशिककुले, मुनिकरसहस्रप्रकीर्णसन्ध्या-
वन्दनोदबिन्दुतिकर इव दन्तुरयति तारापथस्थलीं स्थवीयसि तारकानि-
कुरुम्बे अम्बराश्रयिणि शर्वरीशबरीशिखण्डे खण्डपरशुकण्ठकाले कव-
लयति बाले ज्योतिः शेषं सान्ध्यमन्धकारावतारे, तिमिरतर्जननिर्गतासु
दहनप्रविष्टदिनकरकरशाखास्विव स्फुरन्तीषु दीपलेखासु, अररसम्पुटसंकी-
ऽडनकथितावृत्तिष्विव गोपुरेषु, शयनोपजोषजुषि जरतीकथितकथे शिश-
यिषमाणे शिशुजने, जरन्महिषमषीमलीमसतमसि जनितपुण्यजन प्रजा-
न्धयस्तर्णकश्च वत्सः । धुनी नदी । सिन्धुः समुद्रः । शयः करः । चैत्यमायतनम् ।
पाराशरिषु भिक्षुषु । हवींषि कुशाः । वषडिति दानक्रियासु मोचनमन्त्रः वषट्
कुर्वन्ति । जुह्वतीत्यर्थः । यायजूकोऽत्यर्थं यजनशीलः । निद्राणोऽलसः । द्रोणः
काकः । कलिला आकुलाः । 'कुलायो नीडमस्त्रियाम्' । कापेयं चापलम् । कौशिका
उलूकाः । स्थवीयसि स्थूलतरे । शिखण्डो जूटकः । खण्डपरशुः शिवः । करा एव
शाखास्तदाकारत्वादंगुलयश्च करशाखाः । अररः कपाटः । संक्रीडनं शब्दः ।
आवृत्तिः स्थगनम् । 'गोपुरं स्यात्पुरद्वारं द्वारमात्रेऽपि गोपुरम्' । उपजोषः सुखम्,
तूष्णींभावो वा । जरती वृद्धाः । शिशयिषमाणे सुषुप्सति । 'यक्षाः स्युः पुण्य-
होकर सूर्यसंध्या के समुद्ररूपी मधपात्र में डूबने लगा । भिक्षु लोग कमण्डलु के जल से
अपने हाथ-पैर पवित्र धोकर चैत्यों की वन्दना करने लगे । स्रुक् स्रुवा आदि यज्ञपात्रों को हाथ
में लेकर यज्ञ करने वाले लोग कुश को बिछा कर प्रज्ज्वलित अग्नि में वषट्कार के द्वारा हविष
छोड़ने लगे । उपवन के वृक्षों पर नींद से अलसाए कौवे खोतों में काँव-काँव करने लगे और
बन्दर अपनी चपलता छोड़ बैठे । पुराने खंखड़ वृक्षों में बैठे हुए उल्लू अब निकलना ही चाहते
थे । झुग्गे के झुग्गे बड़े तारे आकाश की स्थली में छिटकने लगे, मानो सन्ध्यावन्दन के अवसर
पर मुनियों द्वारा छींटे गए जल के बिन्दु हों। अब अन्धकार आकाश में उतरने लगा, मानों
रात्रिरूपी भीलनी के केशपाश का जूड़ा हो, वह भगवान् शंकर के कण्ठ के समान श्याम
था और सन्ध्या के बचे हुए तेज को निगलता जा रहा था। दीपलेखाएँ इस प्रकार
स्फुरित होने लगीं मानों अग्नि में प्रविष्ट सूर्य की किरणरूपी अङ्गुलियाँ हों, जो अन्धकार
के तर्जनार्थ निकल पड़ी थीं । गोपुर के दरवाजों के बन्द होने की गड़गड़ाहट
अब शान्त हो गई। बच्चे खाट पर चुपचाप पड़े बूढ़ी दादी की कहानी

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गरे विजृम्भमाणे भीषणतमे तमीमुखे, मुखरितविततसप्तभुक्तिकालवर्षति
शरनिकरमनवरतमशेषसंसारशेमुषीमुषि मकरध्वजे, रताकल्पारम्भशो-
भिनि शम्भलीसुभाषितभाजि भजति भूषां भुजिष्याजाने, सैरन्ध्रीबध्य-
मानरशनाजालजल्पाकजघनासु जनीषु, वशिकविशिखाविहारिणीष्वन-
न्यजानुप्लवासु प्रचलितास्वभिसारिकासु, विरलोभवति वरटानां वेशन्त-
शायिनीनां मञ्जुनि मञ्जीरशिञ्जितजडे जल्पिते, निद्राविद्राणद्रा-
घीयसि द्रावयतीव च विरहिहृदयानि सारसरसिते, भाविवासरबीजाङ्कुर-
निकर इव च विकीर्यमाणे जगति प्रदीपप्रकरे निवासस्थानमगात्।
अकरोच्च चेतसि—'अतिदक्षिणः खलु देवो हर्षः, यदेवमनेकबालचरित-


जनाः'। तमी रात्रिः। शेमुषी बुद्धिः। आकल्पो वेशः। शम्मली कुट्टनी। भुजिष्या
दासी। सैरन्ध्री प्रसाधनोपचारज्ञा। जनी। वशिका शून्या। विशिखा रथ्या।
अनन्यजः कामः। अनुप्लसवः सहायः। 'कान्तार्थिनी तु या याति संकेतं साभि-
सारिका'। 'हंसस्य योषित्त्वरटा'। वेशन्तः पल्वलम्। कासारोऽत्यल्पसरः। मञ्जीरं


सुनते-सुनते ऊँघने लगे। बूढ़ी भैंस एवं स्याही की भाँति मलिन अन्धकार से युक्त रात्रि
का अत्यन्त भयानक मुख (आरम्भ) जँभाई लेने लगा (बढ़ने लगा) और उसने पुण्यजनों
(यक्षों) को जगा दिया। समस्त संसार की बुद्धि का अपहरण करने वाला कामदेव अपना
धनुष चढ़ा कर टंकार भरने लगा और निरन्तर बाणों की वर्षा करने लगा। लौड़ियां
सुरत काल की वेषरचना के आरम्भ से शोभित होने लगी एवं कुट्टनियों के उपदेश पाकर
अलङ्कार धारण करने लगीं। वधुओं के जघन-भाग प्रसाधिकाओं द्वारा करधनी के बाँधे
जाने पर मुखरित हो उठे। अभिसारिकायें काम की सहायता से सुनसान गलियों में पैंतरा
मारने लगीं। ताल-तलैयों में शयन करने वाली हंसियों की नूपुर के समान मधुर आवाज
कम पड़ने लगीं। निद्रा से अलसाए हुए सारस-पक्षियों की जोरदार आवाज विरहियों
के हृदय को मानो पिघलाने लगीं। चारों ओर दीपक इस प्रकार जलने लगे मानो होने वाले
दिन के बीजांकुर बिखेर दिये गये हों। और (बाण ने) मन में सोचा—"सचमुच देव
हर्ष बड़े ही उदार हैं, क्योंकि मेरे बाल्यकाल की अनेक चपलताओं से फैले हुए जनापवाद
को सुनकर कुपित होने पर भी मन में मुझ पर स्नेह ही रखते हैं। यदि मैं उनकी 'आँखों
पर चढ़ा हुआ' (कोपभाजन) होता तो कैसे दर्शन देने की कृपा करते? वह मुझे गुणी
देखना चाहते हैं। बड़े लोग अनुरूप विश्वास उत्पन्न करके बिना कुछ कहे भी आश्रित-
जनों को विनय का उपदेश दे देते हैं। मुझे धिक्कार है कि अपने ही दोषों से अन्धा,

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१४० हर्षचरितम्
'चापलोचितकौलीनकोपितोऽपि मनसा स्निह्यत्येव मयि । यद्यहमक्षिगतः
स्याम्, न मे दर्शनेन प्रसादं कुर्यात् । इच्छति तु मां गुणवन्तम् ।
उपदिशन्ति हि विनयमनुरूपप्रतिपत्त्युपपादनेन वाचा विनापि भर्तव्यानां
स्वामिनः । अपि च धिङ्मां स्वदोषान्धमानसमनादरपीडितमेवमति-
गुणवति राजन्यन्यथा चान्यथा च चिन्तयन्तम् । सर्वथा तथा करोमि,
यथा यथावस्थितं जानाति मामयं कालेन' इत्येवमवधार्य चापरेद्यु-
र्निष्क्रम्य कटकात्सुहृदां बान्धवानां च भवनेषु तावदतिष्ठत, यावदस्य
स्वयमेव गृहीतस्वभावः पृथिवोपतिः प्रसादवानभूत् । अविशच्च पुनरपि
नरपतिभवनम् । स्वल्पैरेव चाहोभिः परमप्रीतेन प्रसादजन्मनो मानस्य
प्रेम्णो विश्रम्भस्य द्रविणस्य नर्मणः प्रभावस्य च परां कोटिमानीयत
नरेन्द्रेणेति ।
इति श्रीमहाकविबाणभट्टकृते हर्षचरिते राजदर्शनं नाम द्वितीय उच्छ्वासः ।
नूपुरम् । दक्षिणोऽनुकूलः कौलीन जनापवादः । अक्षिगतो द्वेष्यः । विश्रम्भस्याश्वा-
सस्य । द्रविणस्य धनस्य । नर्मणः परिहासस्य ॥
इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते द्वितीय उच्छ्वासः समाप्तः ।
अनादर से दुखी हो ऐसे गुणवान् राजा के विषय में कुछ अनाप-शनाप सोचने लगा । अब
मैं सर्वथा वही करूँगा जिससे समय से वे मुझे ठीक पहचान लें।' ऐसा निश्चय करके दूसरे
दिन प्रातःकाल स्कन्धावार से निकल कर मित्रों और रिश्तेदारों के घर में ठहरा । तब त-
सम्राट् स्वयं उसके स्वभाव से परिचित होकर उस पर प्रसन्न हो गए और फिर बाण ने राज-
भवन में प्रवेश किया । थोड़े ही दिनों में सम्राट् उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और अपने
प्रसादजनित सम्मान, प्रेम, विश्वास, धन-सम्पत्ति, परिहास और प्रभाव की पराकाष्ठा पर उसे
पहुँचा दिया ।
द्वितीय उच्छ्वास समाप्त ।
१. चापलोपचित ।

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