हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
by महाकवि बाणभट्ट
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Read in context१३६ हर्षचरितम्
लोकद्वयाविरोधिभिस्तु चापलैः शैशवशून्यमासीत् । अत्रानपला-
पोऽस्मि । अनेनैव च गृहीतविप्रतीसारमिव मे हृदयम् । इदानीं तु सुगत
इव शान्तमनसि मनाविव कर्तरि वर्णाश्रमव्यवस्थानां समवर्तिनीव च
साक्षाद्दण्डभृति देवे शासति सप्ताम्बुराशिरशनाशेषद्वीपमालिनीं महीं
क इवाविशङ्कः सर्वव्यसनबन्धोरविनयस्य मनसाप्यभिनयं कल्पयिष्यति ।
आस्तां च तावन्मानुष्यकोपेताः । त्वत्प्रभावादलयोऽपि भीता इव मधु
पिबन्ति । रथाङ्गनामानोऽपि लज्जन्त इवाभ्यनुवृत्तिव्यसनैः प्रियाणाम् ।
कपयोऽपि चकिता इव चपलायन्ते । शरारवोऽपि सानुक्रोशा इव श्वाप-
दगणाः पिशितानि भुञ्जते । सर्वथा कालेन मां ज्ञास्यति स्वामी स्वयमेव ।
अनपाचीनचित्तवृत्तिग्राहिण्यो हि भवन्ति प्रज्ञावतां प्रकृतयः' इत्यभिधाय
तूष्णीमभूत् । भूपतिरपि 'एवमस्माभिः श्रुतम्' इत्यभिधाय तूष्णीमेवा-
भवत् । संभाषणआसनदानादिना तु प्रसादेन नैनमन्वग्रहीत् । केवलममृत-
बद्धं परस्परस्यानुपघातेन त्रिवर्गं सेवत इत्यत एवाह-शैशवमिति । अशून्यमिति ।
अनेन तदेकासक्तत्वं परिहरति । अनपलापो निरपह्नवः । विप्रतीसारः पश्चात्तापः ।
सुगतो बुद्धः । समवर्ती यमः । मनुष्यस्य भावो मानुष्यकम् । रथाङ्गनामानश्चक्र-
वाकाः चपलायन्ते चपलत्वमाचरन्ति । शरारवो हिंस्राः । श्वापदगणाः प्राणि-
समूहाः । पिशितं मांसम् । अनपाचीनाऽमृष्टा । अविपरीतेत्यर्थः, निर्दोषा वा ।
शैशव लोक-परलोक से विरोध न रखने वाली चपलताओं से शून्य नहीं था। मैं
इस सम्बन्ध में अपलाप नहीं करता। इसी कारण मेरे हृदय में पश्चात्ताप है। किन्तु इस
समय जब कि भगवान् बुद्ध के समान शान्तचित्त, मनु के समान, वर्णाश्रम-मर्यादा के
रक्षक और यम के समान साक्षात् दण्डधर आप सातों समुद्रों को करधनी और समस्त
द्वीपों की माला से विराजित पृथिवी का शासन कर रहे हैं। तो कौन ऐसा निडर है
जो सब प्रकार से दुःखद अविनय का मन से भी अभिनय करे? मनुष्यों की तो
बात जाने दीजिये, आपके प्रभाव से भौंरे भी डरते-डरते मधुपान करते हैं, चक्रवात
पक्षी भी अपनी पत्नी के प्रति अतिशय आसक्तिरूप व्यसन से लज्जित होते हैं,
वानर भी शंकित होकर चपलता करते हैं, हिंसक जानवर भी दयावान् होकर
पश्चात्ताप करते हुए मांस का भक्षण करते हैं। समय से स्वयं आप मेरे विषय में
जान लेंगे, क्योंकि बुद्धिमानों का यह स्वभाव होता है कि वे किसी बात में भी विपरीत
हठ नहीं रखते।' इतना कह कर बाण चुप हो गए। सम्राट् भी 'मैंने ऐसा ही सुना था'
बस इतना ही कह चुप हो गए। लेकिन परस्पर बात-चीत, आसनदान आदि के प्रसाद से