हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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ह
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3-2
VHP₃
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भा. पु. क. वा.
॥ श्रीः ॥
विद्याभवन संस्कृत ग्रन्थमाला
३६
महाकविबाणभट्टविरचितं
हर्षचरितम्
श्रीशङ्करकविरचित 'सङ्केत'-व्याख्यासहित-
हिन्दीव्याख्योपेतम्
हिन्दीव्याख्याकारः—
पं० श्रीजगन्नाथपाठकः
साहित्याचार्यः
चौखम्बा विद्याभवन
वाराणसी २२१००१
प्रकाशक—
चौखम्बा विद्याभवन
( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक )
चौक ( बनारस स्टेट बैंक भवन के पीछे ),
पो० बाक्स नं० ६९
वाराणसी २२१००१
सर्वाधिकार सुरक्षित
चतुर्थ संस्करण १९८२
मूल्य $ १-२ उच्छ्वास & ८-००
१-४ उच्छ्वास & १५-००
सम्पूर्ण & २५-०० $
अन्य प्राप्तिस्थान—
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक )
के० ३७/११७, गोपालमन्दिर लेन
पोस्ट बाक्स नं० १२९
वाराणसी २२१००१
मुद्रक—
श्रीजी मुद्रणालय
वाराणसी
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THE
VIDYABHAWAN SANSKRIT GRANTHAMALA
36
HARṢA-CHARITAM
OF
BĀṆABHAṬṬA
Edited with the
‘SANKETA’ SANSKRIT COMMENTARY
OF
ŚAṄKARA KAVI
&
Hindi translation
By
Pt. Jagannath Pathaka
Sahityacharya
CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
VARANASI
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
© CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
(Oriental Booksellers & Publishers)
CHOWK (Behind The Benares State Bank Building)
Post Box No. 69
VARANASI 221001
Fourth Edition
1982
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CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN
(Oriental Booksellers & Publishers)
K 37/117 Gopal Mandir Lane
Post Box No. 129
VARANASI 221001
भूमिका
महाकवि बाण
संस्कृत-साहित्य में महाकवि कालिदास की पद्य-रचना जितनी उत्कृष्ट और सरस है
उतनी ही महाकवि बाण की गद्य-रचना महत्त्वशालिनी है। बाण ने अपनी गद्यरचना का
जो परिष्कृत और परिमार्जित रूप प्रस्तुत किया है वही आगे चल कर साहित्य के अन्य
गद्य कवियों के लिए आदर्श बन गया। संस्कृत में गद्य-साहित्य की यों ही कमी समझी
जाती है उस पर बाण जैसे कवि ने आकर मानो अपने पहले और आगे के समस्त अभाव
की पूर्ति स्वयं कर ली। हर्षचरित बाण की प्रथम रचना है जो गद्य की उत्कृष्ट शैली
के कादम्बरी में होने वाले साक्षात्कार की प्रस्तावना है। इससे यह नहीं कहा जा सकता
कि कादम्बरी के संतुलन में हर्षचरित एकदम नहीं आ सकता, हाँ, बाण की चित्रग्राहिणी
प्रतिभा का निखार अपेक्षाकृत हर्षचरित से कादम्बरी में अधिक पाया जाता है। हर्ष-
चरित में बाण की महती साधना अभिलक्षित होती है। वही साधना कादम्बरी के रूप
में फल के समान उद्भूत हुई है। जैसे कोई योगी सिद्धिप्राप्ति के उद्देश्य से साधना में
स्थिर हो जाता है, उसे साधक कहते हैं और जब उसकी साधना फलित हो जाती है तब
वह सिद्ध की आख्या ग्रहण करता है, उसी प्रकार हर्षचरित में बाण साधक है और
कादम्बरी में सिद्ध। बाण के दोनों ग्रन्थ साहित्य और कला की दृष्टि से सर्वांगपूर्ण हैं।
विशेषरूप से हर्षचरित पर बाण की युगीन संस्कृति का प्रभाव अधिक है। अतः ऐतिहासिक,
सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से हर्षचरित संस्कृत-साहित्य का सर्वाधिक
मूल्यवान् ग्रन्थ है ऐसा विद्वानों का कथन है। हर्षचरित हमें बाण की आत्मकथा से भी
बहुत अंशों में परिचित कराता है। बाण ने हर्षचरित के प्रसंग में आत्म-चरित को सन्नद्ध
करके साहित्यिक जगत् का बड़ा ही उपकार किया है। बाण के साहित्य का अध्ययन
करते हुए हमारी आँखों के सामने बाण का स्वाभिमानी और मस्ताना व्यक्तित्व नाचने
लगता है। हम उसी के आधार पर बाण की प्रत्येक सूक्ष्मेक्षिका को आसानी से आँक लेने
में समर्थ होते हैं। संस्कृत-साहित्य के अध्ययनशील लोगों के मन में आचार्यों और कवियों
की निजी जीवन-सम्बन्धी घटनाओं के न मिलने के कारण बड़ी उत्सुकता रह ही जाती है
और जब यह बात मन में आती है कि कभी हमें तत्तद् कवियों और आचार्यों के
जीवन के सम्बन्ध में जानने का सौभाग्य नहीं प्राप्त होगा तब वही उत्सुकता एक गहरी
निराशा के रूप में बदल जाती है। सौभाग्य से बाण के सम्बन्ध में हम ऐसा नहीं सोच
सकते क्योंकि उन्होंने हर्षचरित के आरम्भिक दो-तीन उच्छ्वासों में अपने अल्हड़ जीवन
की मौलिक घटनाओं का उल्लेख वंशानुकीर्तन की भूमिका में क्रम से प्रस्तुत कर दिया है।
बाण का स्थितिकाल निःसन्देह रूप से सप्तम शती का पूर्वार्ध (६०६-६४८ ई०) है।
हर्ष का समय निश्चित होने के कारण इस सम्बन्ध में कोई ऐतिहासिक वैमत्य नहीं है।
बाण का वात्स्यायन वंश
बाण ने हर्षचरित के आरम्भ में अपनी आत्मकथा के साथ-साथ अपने कुल का भी
पौराणिक शैली में उद्भव बताया है। बाण के जीवन से परिचित होने के लिए यह सामग्री
बड़ी सहायक है। एक बार भगवान् ब्रह्मा इन्द्र आदि देवताओं के बीच कमल के आसन
पर विराजमान थे; वहाँ मनु, दक्ष, चाक्षुष प्रभृति प्रजापति एवं मुनिगण भी गोष्ठी में ब्रह्म
के सम्बन्ध में विचार कर रहे थे। ऋक्, साम, यजु का पाठ भी चल रहा था। वेद के
अर्थ के सम्बन्ध में परस्पर विवाद का भी प्रसंग उपस्थित हो जाता था। ऐसे अवसर पर
स्वभाव से ही अत्यन्त क्रोधी महामुनि दुर्वासा और उपमन्यु नामक मुनि में विवाद छिड़
गया। क्रोध से अभिभूत दुर्वासा ने सामगान करते हुए स्वर से हीन पाठ कर दिया।
दुर्वासा के स्वरहीन सामगान से एकाएक गोष्ठी के समस्त लोग सन्न हो गये और शाप के
भय से किसी को कुछ बोलने का साहस न हुआ। भगवान् ब्रह्मा ने भी इस भयावह
प्रसंग को टालने का प्रयास किया परन्तु उन्हीं के पार्श्वभाग में चामर लेकर खड़ी सरस्वती
दुर्वासा का स्वरहीन पाठ सुन कर हँस पड़ीं। सरस्वती को अपने पर हँसते हुए देखकर
दुर्वासा क्रोध से तमतमा उठे और उन्होंने शाप देने के लिए हाथ में जल उठा लिया।
ब्रह्मा ने जोर से दुर्वासा को फटकारा, अत्रि ने स्वयं मना किया, सरस्वती की सखी सावित्री
ने भी क्रोध शान्त करने के लिए प्रार्थना की, फिर भी दुर्वासा ने किसी की न सुनी और
शाप दे ही डाला। कि ब्रह्मलोक को छोड़कर सरस्वती को तब तक अन्यत्र रहना होगा जब
तक वह अपने पुत्र का मुख न देख ले। दुर्वासा के शाप से ग्रस्त होकर सरस्वती ने किसी
प्रकार सावित्री के साथ मर्त्यलोक के लिए प्रस्थान किया। स्वर्ग की गंगा के तटमार्ग से
होते हुए वह मर्त्यलोक में हिरण्यवाह शोण के समीप उतरी। सरस्वती ने शोण के तट पर
ही रहने के लिए आग्रह किया। दोनों ने नदी के तीर पर एक लतामण्डप में निवास
किया। शोण में नित्य स्नान और देवार्चन करते हुए कुछ दिन बीत गये।
एक समय दिन जब एक पहर चढ़ गया तब उत्तर की ओर घोड़ों की हिनहिनाहट
सुन पड़ी। कुतूहल से सरस्वती ने लतामण्डप से बाहर निकल कर देखा कि धूल उड़ाता
हुआ घोड़ों का समूह चला आ रहा था, जिसके साथ हजारों पैदल युवक चले आ रहे थे।
अश्वारोहियों के बीच अट्ठारह वर्ष की आयु का एक सुन्दर युवक भी था। एक ओर
( ७ )
अधिक अवस्था वाला पुरुष भी उसके साथ था। वह युवक दिव्य आकृति वाली दोनों
कन्याओं को देखता हुआ कुतूहल से लतामण्डप के समीप आ पहुँचा और घोड़े से उतर
गया। साथ के और लोगों को दूर पर ही उसने रोक दिया और उस दूसरे सज्जन के
साथ पैदल ही वहाँ आया। सरस्वती के साथ सावित्री ने उसका वनवास की उचित
सामग्री से सत्कार किया और उस वृद्ध से पूछा—'यह युवक कहाँ से आया है ? इसे
जाना कहाँ है ? इसके पिता कौन हैं, माता का क्या नाम है और इसका क्या नाम है ?'
सावित्री के इस अनुरोध पर उस पुरुष ने कहा—'यह च्यवन का पुत्र दधीच है, इसकी
माता राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या है। शर्याति पुत्री को गर्भवती जान कर पति के घर
से अपने घर ले गये। वहीं उसने इसे जन्म दिया। अपने ननिहाल में ही यह बढ़ा। जब
इसकी माता अपने पति के घर जाने लगी तब नाना ने स्नेह से इसे अपने साथ ही रख
लिया। वहीं पर इसने समस्त विद्याओं और कलाओं को सीखा तब किसी प्रकार नाना
ने इसे पिता के पास जाने के लिए छोड़ा। मैं उन्हीं शर्याति का विकुक्षि नामक आज्ञाकारी
भृत्य हूँ। मुझे इसे पिता के घर पहुँचाने के लिए भेजा गया है। शोण के उस पार
भगवान् च्यवन का आश्रम है, हम वहीं जा रहे हैं।' यह कह कर उस पुरुष ने उन
दोनों का भी परिचय पूछा। तब सावित्री ने कहा—'आर्य, हम दोनों का यहाँ बहुत दिनों
तक रहने का विचार है अतः धीरे-धीरे सब कुछ ज्ञात हो जायगा।' फिर दधीच और वह
पुरुष दोनों च्यवनाश्रम की ओर घोड़े पर सवार होकर चल दिये। इधर सरस्वती दधीच
के चले जाने पर उस दिशा की ओर ही देर तक आँखें फैलाये बैठी रही, फिर किसी तरह
वह दिन बीता। रात में भी दधीच के दर्शन की चिन्ता में ऊम-चूम होती रही। इस
प्रकार कई रातें बीतीं तो अपने देश की ओर लौटते समय विकुक्षि वहाँ पहुँचा। सावित्री
ने दधीच का कुशल पूछा। विकुक्षि ने दधीच की मालती नाम की दूती के आने का
समाचार कह कर विदा ली। विकुक्षि के जाने पर अश्वारूढ होकर मालती वहाँ पहुँची।
दोनों ने उसका सम्मान किया। मालती कुछ देर तक ठहरी और फिर दधीच को लाने
के लिये च्यवनाश्रम गई और दधीच को साथ लेकर लौटी। प्रणय हो जाने पर दधीच
सरस्वती के साथ एक वर्ष तक वहीं रह गये। दैवयोग से सरस्वती ने गर्भ धारण किया
और समय पर पुत्र पैदा किया। पैदा होते ही सरस्वती ने अपने पुत्र को समस्त वेदों,
शास्त्रों, कलाओं और विद्याओं में प्रवीण हो जाने के लिए वर दिया और दधीच तथा
पितामह के आदेश से सावित्री के साथ ब्रह्मलोक चली गई। सरस्वती के चले जाने पर
दधीच ने भार्गव वंश में उत्पन्न अपने भाई की अक्षमाला नाम की पत्नी के पास उस
सारस्वत पुत्र को पालने के लिए छोड़ कर तपस्या करने के लिए जंगल में प्रस्थान किया।
जिस समय सरस्वती ने पुत्र पैदा किया था उसी अवसर पर अक्षमाला के गर्भ से भी पुत्र
उत्पन्न हुआ था। अक्षमाला ने दोनों पुत्रों को पाल-पोस कर बड़ा किया। एक का नाम
सारस्वत और दूसरे का नाम वत्स था। दोनों में सहोदर भाई जैसा स्नेह था। माता के
वरदान से सारस्वत यौवन के आरम्भ में ही समस्त शास्त्रों का पारंगत विद्वान् हो गया।
उसने वत्स को भी अपनी सारी विद्या दे दी और उसका विवाह करके प्रीतिकूट नाम का
स्थान बनवा दिया तथा पिता दधीच जहां तपस्या कर रहे थे वहाँ स्वयं दण्ड-चीवर धारण
करके चला गया।
⸪ वत्स से वंश चला। उसी वंश की परम्परा में बाण का जन्म हुआ। बाण ने वात्स्यायन-
वंश की परम्परा भी दी है। वत्स के बाद अनेक वर्ष बीते और बहुत से वात्स्यायन
ब्राह्मण उस कुल में क्रमशः उत्पन्न हुए। उसी क्रम में कुबेर नाम का ब्राह्मण उत्पन्न हुआ।
उसके चार पुत्र हुए—अच्युत, ईशान, हर और पाशुपत। पाशुपत के पुत्र का नाम
अर्थपति था। अर्थपति ने ग्यारह पुत्रों को उत्पन्न किया जिनके नाम ये हैं—भृगु, हंस,
शुचि, कवि, मही दत्त, धर्म, जातवेदस्, चित्रभानु, दक्ष, अहिदत्त और विश्वरूप। चित्रभानु
के ही पुत्र बाण थे। बाण की माता का नाम राजदेवी था। बाण के दो पारशव भाई
(शूद्र स्त्री से उत्पन्न) थे—चित्रसेन और मित्रसेन और चार चचेरे भाई थे—गणपति,
अधिपति, तारापति और श्यामल।
बाण की आत्मकथा
इस प्रकार बाण ने अपने वात्स्यायनवंश का उद्भव बताते हुए प्राचीन कुलपुरुषों की
क्रमबद्ध वंशावली दी है और इसी क्रम में अपनी भी चर्चा की है। कहा जा चुका है कि
बाण के पिता का नाम चित्रभानु और माता का नाम राजदेवी था। बालपन में ही उसे
माता का वियोग सहना पड़ा और पिता ने मातृस्नेह के साथ उसका पालन किया। वह
अपने घर पर ही रह कर बढ़ा। उसके उपनयन आदि संस्कार यथासमय पिता ने किये।
जब वह चौदह वर्ष का हुआ तब उसके पिता का भी देहान्त हो गया। उस समय तक
उसका समावर्त्तनसंस्कार और इसके साथ ही विवाह भी हो चुका था। पिता की मृत्यु के
बाद दुखी और शोक-संतप्त बाण ने किसी प्रकार अपने घर पर ही रह कर वह समय
काटा। कुछ दिन के बाद जब पितृशोक कुछ कम हुआ तब बाण की स्वतंत्र प्रकृति ने
जोर-मारा। उसमें वह विनय अब न रहा। अल्हड़पन के कारण बालक बाण में नई-नई
वस्तुओं के देखने का कुतूहल बढ़ा। फलतः वह यौवन के आरम्भ होते ही धैर्य को त्याग
कर घुमक्कड़ और आवारा बन गया। इसके साथी और सहायक भी बहुत से हो गये। वह
उनके साथ देश-देशान्तरों को देखने की इच्छा से अपने पिता-पितामह के वैभव और विद्या
की परवाह न करके घर-द्वार छोड़ कर निकल पड़ा। स्वच्छन्द होकर वह इस प्रकार
मनमौजी हो गया कि उसकी खिल्ली उड़ने लगी।
⸪ अपने उसी उच्छृङ्खल भ्रमण के अवसर में घूम-घूम कर बाण ने अपने युग के जीवन
का गहरा अध्ययन किया। वह राजकुलों में पहुँचा जहाँ के व्यवहार अत्यन्त उदार होते
थे, गुरुकुल या उस समय के शिक्षासंस्थानों में भी कुछ काल तक रहा, बहुमूल्य
( ९ )
बात-चीत करने वाले गुणवान् लोगों की गोष्ठियों में बैठा और विदग्ध जनों के बीच पहुँचा।
इस प्रकार युवक बाण को अनुभव के चार स्रोत जीवन के आरम्भ में ही मिल गये।
अनुभवी होकर बाण की चंचल प्रकृति बदल गई। वह वात्स्यायन वंश के अनुरूप गम्भीर
स्वभाव वाला बन गया। बहुत दिनों तक देश-देशान्तरों का चक्कर काट कर वह फिर
अपनी जन्मभूमि प्रीतिकूट को लौटा और अपने बालमित्रों से बड़े स्नेह के साथ मिला।
अपने बन्धु-बान्धवों से मिल कर बाण बड़ा प्रसन्न हुआ। बहुत दिनों तक प्रीतिकूट का
ही आनन्द लेता रहा। एक दिन स्थाण्वीश्वर के महाराज श्रीहर्ष के भाई का भेजा हुआ
मेखलक नाम का दीर्घाध्वग बाण से आकर गर्मी के दिनों में मिला। उस समय भोजन के
पश्चात् बाण अपने घर पर आराम कर रहा था। उसके पारशव भाई (शूद्रा जननी से
उत्पन्न) ने भीतर आकर उसके आगमन की सूचना दी। बाण ने कहा—'उसे शीघ्र अन्दर
लाओ।' तब वह दीर्घाध्वग भीतर जाकर बाण के समीप कुछ हट कर बैठा। बाण के पूछने
पर उसने कृष्ण का कुशल-समाचार सुना कर पत्र अर्पित किया। बाण ने पत्र को स्वयं
पढ़ा। फिर मेखलक ने मौखिक सन्देश में कृष्ण की ओर से कहा—'मैं तुमसे बिना कारण
ही अपने बन्धु की तरह प्रेम करता हूँ। तुम्हारी अनुपस्थिति में दुर्जन लोगों ने सम्राट् के
कान भर दिये, पर वह सत्य नहीं। किसी ईर्ष्यालु व्यक्ति ने तुम्हारी बाल-चपलताओं से
चिढ़ कर कुछ इधर-उधर की बात कह दी। अन्य लोगों ने भी ठीक वैसा ही समझा और
कहने लगे। सम्राट् ने ऐसे मूर्खों की एक-सी बात सुन कर अपना मत स्थिर कर लिया।
तुम्हारे विषय में मैंने सम्राट् से निवेदन किया और उन्होंने मेरी बात मान ली। अब अपने
घर पर व्यर्थ समय-यापन करना ठीक नहीं, शीघ्र राजकुल में आओ।'
यह सुन कर बाण ने उसी चन्द्रसेन को आज्ञा दी—'मेखलक को ले जाकर भोजना-
च्छादान की व्यवस्था कर आराम से ठहराओ।' तब तक दिन ढल चुका था। बाण संध्यो-
पासन से निवृत्त होकर फिर अपने शयनीय पर आ गये और सम्राट् से मिलने के सम्बन्ध
में एकाकी सोचने लगे—'क्या करूँ ? महाराज ने मुझे कुछ और ही समझ लिया है, मेरे
अकारणबन्धु कृष्ण ने ऐसा संदेश भेजा है, सेवा बहुत कष्टदायिनी है, नौकरी करना मेरे
अनुकूल नहीं, राजकुल अतिगम्भीर और विशाल है, न तो मेरे पूर्वजों का राजकुल से
सम्बन्ध रहा है जिससे प्रेमभाव बना है, न तो मुझ में कुलक्रमागत क्षमता ही है, न तो
पहले राजकुल के द्वारा किये हुए उपकार का स्मरण मुझे आता है, न तो बचपन में
राजकुल से ऐसी मदद मिली जिसका स्नेह मान कर चला जाय, न तो बड़े होने का अब
तक गौरव मिला है, न पहली मेल मुलाकात की अनुकूलता है, न तो बुद्धि सम्बन्धी विषयों
में आदान-प्रदान करने का प्रलोभन है, न तो अपनी विद्या के अतिशय प्रदर्शन का कुतूहल
है, न तो अपनी सुन्दर आकृति से मिलने वाले आदर की आकांक्षा है, न सेवावृत्ति के
अनुरूप चापलूसी करने की कला मुझे आती है, न तो मुझमें वैसी चतुराई है कि विद्वानों
की गोष्ठियों में भाग लूँ, न तो धन खर्च करके दूसरों को मुट्ठी में कर लेने की आदत
है, और न तो राजा के प्रिय जनों से मेरा परिचय है और कृष्ण के संदेशानुसार जाना
भी जरूरी है। त्रिभुवनगुरु भगवान् शंकर वहाँ जाने पर सब भला करेंगे।' यह सोच
कर बाण ने प्रस्थान करने के लिए निश्चय किया।
दूसरे दिन प्रातःकाल बाण ने स्नान करके उज्ज्वल दुकूल धारण किया और हाथ में
अक्षमाला लेकर प्रास्थानिक सूक्तों और मंत्रपदों को बार-बार दुहराया, फिर देवों के देव
भगवान् शङ्कर की साङ्गोपाङ्ग अर्चना की तथा तिल और घृत की आहुतियों से हवन
सम्पन्न किया। ब्राह्मणों को दक्षिणा में धन दिया। होमधेनु की परिक्रमा की। शुक्ल
अङ्गराग, शुक्ल माल्य, शुक्ल वसन एवं रोचनाचित्रित तथा दूर्वाग्रग्रथित गिरिकर्णिक नामक
पुष्प का कर्णपूर और शिखा में सिद्धार्थक आदि माङ्गलिक द्रव्यों से परिष्कृत होकर बाण
प्रस्थान के लिए तैयार हो गया। माता के समान स्नेह से आर्द्र हृदय वाली पिता की
छोटी बहन मालती ने बाण के प्रस्थान की माङ्गलिक तैयारी की। गाँव की बांधव-वृद्धाओं
ने आशीर्वाद दिये, परिजनों की बूढ़ी स्त्रियों ने बाण का अभिनन्दन किया, पूजितचरण
गुरुओं ने बाण के प्रस्थान का समर्थन किया, कुलवृद्धों ने उसका सिर सूँघा, शुभ शकुनों
से उसका उत्साह और भी बढ़ा, ज्योतिषियों ने नक्षत्र की गणना की, फिर शोभन मुहूर्त्त
में जल से पूर्ण कलश की ओर दृष्टिपात करते हुए कुलदेवताओं को प्रणाम कर बाण प्रीतिकूट
से निकल पड़ा।
पहले दिन गर्मी में किसी प्रकार धीरे-धीरे चण्डिकायतन-कानन पार कर वहं मल्लकूट
नामक गाँव में गया। वहाँ बाण का भाई और हार्दिक मित्र जगत्पति रहता था, उसने
बाण का सत्कार किया। बाण उस दिन वहीं सुखपूर्वक ठहरा। दूसरे दिन गङ्गा पार करके
यष्टिगृहक नाम के बनगाँव में रात बिताई। फिर राप्ती ( अजिरवती ) के किनारे मणितारा
नामक गाँव के पास हर्ष के स्कन्धावार ( छावनी ) में पहुँचा जो राज-भवन के
सन्निकट ही था।
स्कन्धावार में स्नान, भोजन और विश्राम के पश्चात् जब एक पहर दिन बाकी था
और जब हर्ष भी भोजन आदि से निवृत्त हो चुके थे तब वह मेखलक के साथ राजद्वार के
लिए चल पड़ा। मार्ग में प्रख्यात राजाओं के अनेक शिविर-सन्निवेश मिले। राजद्वार
पर सम्राट् के दर्शन के लिए नाना देशों से सामन्तगण पधारे हुए थे। झुण्ड के झुण्ड
हाथी, घोड़े और ऊँट खड़े थे और हजारों आतपत्रों से वहाँ श्वेतद्वीप का दृश्य था। सब
लोग राजद्वार के राजकीय अनुयायियों से यह पूछते हुए नहीं थकते थे कि बाह्य कक्षा में
उपस्थित होकर सम्राट् कब दर्शन देंगे ? एक ओर एकान्त में बौद्ध, जैन, पाशुपत, संन्यासी,
वर्णी सम्प्रदायों के साधु, सब देशों के लोग, समुद्री तटों के निवासी, म्लेच्छ और समस्त
द्वीपों से संवाद लेकर लौटे हुए दूत- एकत्र थे। राजद्वार के इस दृश्य को देखकर बाण के
( ११ )
मन में आश्चर्य हुआ। द्वारपालों ने मेखलक को दूर ही से पहचान लिया। 'क्षण भर
आप यहीं ठहरें' बाण से यह कह कर मेखलक बेरोक भीतर चला गया। थोड़ी देर बाद
वह महाप्रतीहारों के प्रधान दौवारिक पारियात्र के साथ वापस आया। मेखलक द्वारा
परिचित होकर पारियात्र ने बाण को प्रणाम किया और विनयपूर्वक कहा—'देव के दर्शन
के लिए भीतर पधारिये, आप पर देव की प्रसन्नता है।' बाण ने 'मैं धन्य हूँ, जो देव मुझे
इस प्रकार अपने अनुग्रह का पात्र समझते हैं' यह कहते हुए उसके साथ भीतर प्रवेश
किया। तब बाण ने वनायु, आरट्ट, काम्बोज, भरद्वाज, सिन्ध और पारस देश के राजवल्लभ
अश्वों से भरी हुई मन्दुरा देखी। कुछ दूर हट कर बाईं ओर इभधिष्ण्यागार या हाथियों
का लम्बा-चौड़ा बाड़ा मिला। वहाँ बाण ने सम्राट् के मुख्य हाथी दर्पशात को देखा। उसे
देखकर बाण बहुत आश्चर्यित हुआ और सोचने लगा—निश्चय ही इस महागज के निर्माण में
बड़े-बड़े पर्वत परमाणु बनाये गये होंगे, नहीं तो यह गौरव कहाँ से इसमें आता ? इस प्रकार
फिर तीन कक्षाओं को पार कर बाण ने मुक्तास्थानमण्डप के सामने वाले आँगन में
सम्राट् हर्ष के दर्शन किये।
तब सम्राट् के सामने आकर बाण ने दाहिना हाथ उठा कर 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण
किया। हर्ष ने उसे देख कर दौवारिक से पूछा—'यह वही बाण है?' दौवारिक ने कहा—
'देव का कथन सत्य है, वह यही बाण है।' इस पर हर्ष ने कहा—'मैं इसे तब तक नहीं
देखना चाहता जब तक यह मेरा प्रसाद प्राप्त न कर ले।' यह कह कर उन्होंने अपने पीछे
बैठे हुए मालवराज के पुत्र (माधवगुप्त ?) से कहा—'यह भारी भुजङ्ग (आवारा) है।'
बाण राजा के अभिप्राय को नहीं समझ सका। सारी राज-मण्डली में सन्नाटा छा
गया। बाण कुछ देर तक चुप रह कर बोला—'आप इस प्रकार की बात कैसे कहते हैं?
जैसे आपको मेरे विषय में सच्ची बात का पता न हो, या मेरा विश्वास न हो, या आपकी
बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, अथवा आप स्वयं लोक के वृत्तान्त से अनभिज्ञ हों। लोगों
के स्वभाव और फैली हुई बात मनमानी और तरह-तरह की होती हैं। किन्तु श्रेष्ठ लोगों
को ठीक-ठीक देखना चाहिए। मुझे साधारण समझ कर अनाप-शनाप कल्पना न कीजिए।
मैं सोमपान करने वाले वात्स्यायन ब्राह्मणों के वंश में जन्मा हूँ। समय से मेरे यज्ञोपवीत
आदि संस्कार हुए हैं। मैंने अङ्गों के साथ वेद का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय किया है।
अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रों का भी श्रवण मैंने किया है। विवाह के क्षण से लेकर मैं
नियमित गृहस्थ हूँ। तो मुझमें क्या भुजङ्गपना है? मेरी नई अवस्था की कुछ चपलताएँ
अवश्य हैं पर वे ऐसी नहीं जिससे इस लोक या परलोक का कोई विरोध हो; मैं इस बात
को इनकार नहीं करता। मेरे हृदय में इसी बात का बहुत पश्चात्ताप है। हे देव, आप
भगवान् बुद्ध के समान शान्तचित्त, मनु के समान वर्णाश्रममर्यादा के रक्षक और यम के
समान दण्डधर हैं। सातों समुद्रों की करधनी और समस्त द्वीपों की माला से विराजित
( ३२ )
पृथिवी पर आपका एकच्छत्र शासन है, तो कौन ऐसा निडर है जो सब प्रकार से दुःखद
अभिनय करने की मन से भी कल्पना करता है ?••••••समय से स्वयं आप मेरे विषय में
सब कुछ जान लेंगे, क्योंकि बुद्धिमानों का यह स्वभाव होता है कि वे किसी बात में
विपरीत हठ नहीं रखते।' इतना कह कर बाण चुप हो गया। सम्राट् ने भी 'मैंने ऐसा
ही सुना था' बस इतना ही कहा। लेकिन बातचीत और आसन-दान आदि के प्रसाद से
उसे अनुगृहीत नहीं किया। केवल स्नेह से भरे अमृत की वर्षा करने वाले दृष्टिपात मात्र से
उसको नहलाते हुए उन्होंने अपने अन्तरतम की प्रीति प्रकट की। जब सूर्य अस्त होने
लगा तो सम्राट् राजसमूह से विदा लेकर महल के अन्दर चले गये।
बाण वहाँ से निकल कर अपने निवास स्थान स्कन्धावार में लौट आया। तब वह
अपने मन में सोचने लगा—'सचमुच देव हर्ष बड़े उदार हैं, क्योंकि मेरे बाल्यकाल की
चपलताओं से फैले हुए जनापवाद को सुनकर कुपित होने पर भी मन में मेरे प्रति स्नेह
अवश्य रखते हैं। मैं उनकी आँखों पर चढ़ा हुआ (अक्षिगत, अर्थात् कोपभाजन) होता
तो कैसे दर्शन देने की कृपा करते। वह मुझे गुणी देखना चाहते हैं। बड़ों की यही रीति
है कि छोटों को बिना मुख से कहे ही केवल व्यवहार से विनय सिखा देते हैं। मुझे
धिक्कार है यदि अपने ही दोषों से अन्धा होकर और केवल अनादर से दुःखी होकर मैं ऐसे
गुणवान् राजा के विषय में कुछ सोचने लगूँ। अब मैं सर्वथा वही करूँगा जिससे समय से
वे ठीक मुझे पहचान लें। बाण ने ऐसा निश्चय किया और दूसरे दिन प्रातःकाल वह
स्कन्धावार से निकल कर मित्रों और रिश्तेदारों के घर में ठहरा। तब तक सम्राट् स्वयं
उसके स्वभाव से परिचित होकर उस पर प्रसन्न हो गये और फिर वह राजभवन में
आकर जम गया। थोड़े ही दिनों में सम्राट् उस पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उसे अपने
प्रसादजनित सम्मान, प्रेम, विश्वास, धन-सम्पत्ति, परिहास और प्रभाव की पराकाष्ठा पर
पहुँचा दिया।
इस प्रकार बाण सम्राट् हर्ष से पर्याप्त सम्मान पाकर किसी समय शरत्काल के आरम्भ
में बन्धुओं को देखने की उत्कण्ठा से अपनी जन्म-भूमि प्रीतिकूट आया। बाण के भाई-
बन्धु उसकी प्रशंसा करते हुए उसके स्वागत में निकल पड़े। सबसे मिलकर बाण बहुत
प्रसन्न हुआ। उसने सबसे पूछा—'आप लोग सुखपूर्वक तो रहे? यज्ञ का कार्य चल रहा
है? प्रतिदिन वेदाभ्यास तो अविच्छिन्न है न? व्याकरण के सम्बन्ध में शास्त्रार्थ तो होते
रहते हैं? काव्य की चर्चा तो बराबर रहती है?' तब उन्होंने उससे कहा—'हम लोग
सर्वथा कुशल से हैं। अपनी शक्ति और विभव के अनुसार समय से सब लोग ब्राह्मण के
उचित क्रिया-कलाप करते हैं। जब तुम परमेश्वर महाराज हर्ष के पार्श्वभाग में वेत्रासन
पर स्थित हो तो विशेष रूप से हम लोग प्रसन्न हैं।' इस प्रकार की अनेक बातों से मन
बहलाता हुआ बाण उनके साथ देर तक ठहरा। मध्याह्न में उठ कर वह स्नानादि से निवृत्त
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हुआ। भोजन के पश्चात् जब वह बैठा तो सब के सब जुट आये और उसे घेर कर बैठ गये।
इसी बीच सुदृष्टि नामक बाण का पुस्तक-वाचक आ गया और उसके कुछ दूर पर रखी
हुई वेत्रपीठिका पर बैठ गया। क्षणभर ठहर कर तत्काल उसने सूत की बेठन खोल दी।
पुस्तक को उसने सरकंडों के बने पीढ़े पर रख दिया। पीछे समीप में बैठे हुए मधुकर
और पारावत नामक वंशी बजाने वाले बाण के दो मित्रों ने जब अवकाश दिया, तब
सुदृष्टि वायुपुराण का पाठ करने लगा।
जब सुदृष्टि वायुपुराण का पाठ कर रहा था, उसी समय सूचीवाण नामक वन्दी ने
दो आर्याछन्दों का गान किया। उसने कहा कि वायु-पुराण हर्ष के चरित से अभिन्न प्रतीत
होता है। आर्याओं को सुन कर बाण के चार चचेरे भाइयों—गणपति, अधिपति, तारापति
और श्यामल ने एक दूसरे की ओर देखा। तत्पश्चात् उन चारों में सबसे छोटा बाण का
अत्यन्त प्रिय श्यामल बोला—'तात बाण, प्रातःस्मरणीय, पुण्यों के राशि देव हर्ष का चरित
पूर्वपुरुषों की वंशपरम्परा के साथ हम सुनना चाहते हैं। बहुत दिनों से हम लोगों की
यह इच्छा बनी हुई है। अतः आप कहें। यह भार्गववंश पुण्यवान् राजर्षि के पवित्र
चरित को सुनकर और पवित्र बन जाय।' बाण ने हँस कर अपनी असमर्थता प्रकट करते
हुए दूसरे दिन हर्षचरित का वर्णन आरम्भ करने के लिए निश्चय किया और संध्योपासन
के लिए शोण के तीर पर चले गये।
इस प्रकार बाण ने दूसरे दिन हर्ष के पूर्व-पुरुषों की वंशपरम्परा के साथ हर्षचरित
का वर्णन आरम्भ किया। बाण के जीवन के सम्बन्ध में इसके अतिरिक्त कोई वृत्तान्त
उपलब्ध नहीं होता।
हर्षचरित के अतिरिक्त बाण की दूसरी कृति कादम्बरी है। कादम्बरी संस्कृत गद्य-
साहित्य के चरम-उत्कर्ष का एक उज्ज्वल उदाहरण है। कादम्बरी के आरम्भ में भी
बाण ने संक्षेप में अपनी वंशपरम्परा दी है। कादम्बरी की वंशपरम्परा में कुबेर के
बाद अर्थपति का उल्लेख आता है। बीच में पाशुपत का नाम छूट गया है। हर्ष की
मृत्यु के पश्चात् बाण कन्नौज से प्रीतिकूट लौट आये। वहीं इन्होंने अपने दोनों ग्रन्थों को
लिखा। हर्षचरित से हर्ष के जीवनवृत्त के सम्बन्ध की आकांक्षा की पर्याप्त मात्रा में पूर्ति
नहीं होती। बाण जैसे ग्रन्थ को पूरा लिखने में उदासीन हो गये। कादम्बरी को भी वे
अपूर्ण छोड़ गये। सौभाग्य से उनके सुयोग्य पुत्र ने उसे पूरा किया। कुछ लोग उनके पुत्र
का नाम भूषणबाण या भूषणभट्ट बतलाते हैं। कादम्बरी की कुछ हस्तलिखित प्रतियों में
'पुलिन' या 'पुलिन्द' नाम मिलता है। धनपाल की तिलकमञ्जरी में श्लेष से पुलिन्द ही
का उल्लेख है—
केवलोऽपि स्फुरन्बाणः करोति विमदान् कवीन्।
किं पुनः क्लृप्तसन्धानं पुलिन्दकृतसन्निधिः ॥ (ति. म. २६ श्लोक)