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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

by महाकवि बाणभट्ट

DevanagariHindipublished184 pages

Page 169 of 184

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Page 169

द्वितीय उच्छ्वासः १२७
मालागुणेन परिकलितकेशान्तम्, शिखण्डाभरणभुवा मुक्ताफलालोकेन
मरकतमणिकिरणकलापेन चान्योन्यसंवलनवृजिनेन प्रयागप्रवाहवेणिका-
वारिणेवागत्य स्वयमभिषिच्यमानम्, श्रमजलविलोनबहलकृष्णागुरु-
पङ्कतिलककलङ्ककल्पितेन कालिम्ना प्रार्थनाचाटुचतुरचरणपतनशत-
श्यामिकाकिणेनेव नीलायमानललाटेन्दुलेखाभिः क्षुभितमानसोद्गतै-
रुत्कलिकाकलापैरिव हारैरुल्लसद्भीरवष्टभ्यमानाभिर्विलासवलगनचटुलै-
र्भूलताकल्पैरीर्ष्या श्रियमिव तर्जयन्तीभिरायामिभिः श्वसितैरविरल-
परिमलैर्मलयमारुतमयैः पाशैरिवाकर्षन्तीभिर्विकटबकुलावलीवराटक-
वेष्टितमुखैर्बृहद्भिः स्तनकलशैः स्वदारसंतोषरसमिवाशेषमुद्धरन्तीभिः


दयति । स्वरव्याकरणविशारदमित्यादिना गानं दर्शयति । परिवेषः परिधिः ।
वृजिनेन शकलेन, कलुषेण वा । प्रयागो गङ्गायमुनासंगमः । तत्प्रवाहस्य वेणिका-
रूपेण वारिणेव । श्रमजलेत्यादौ वारविलासिनीभिः सर्वतो विलुप्यमानमसौभाग्य-
मिवेति संबन्धः । प्रार्थनाचाट्वित्यादौ प्रार्थनादीनि सर्वाणि श्रीहर्षविषयाणि
ज्ञेयानि । मानसं सरः, चेतश्च । उत्कलिका, रहुरुहिकाः, वीचयश्च । अविरले-
त्यादिना धारणाम् आकर्षणं वशीकरणम्, समीपप्रमाणं च । विकटेत्यादिनोद्दीपनमा-
त्रमेव पोषयति । वराटको रज्जुः । बृहद्भिरिति । बृहत्त्वेन हृद्यत्वमेषामाह । बृहत्त्वादेव
च वक्ष्यति–अशेषमिति । स्तनकलशैरिति । कलशैः किल रज्जुवेष्टितमुखै रसो जलमु-


भरण में मोती और मरकत दोनों लगे थे, दोनों की किरणें परस्पर मिल कर उन पर पड़ रहा
थीं, मानों प्रयाग से गङ्गा और यमुना के जल स्वयं आकर उनका अभिषेक कर रहे हों। वहां
गणिकाएं थीं जो उनके सौभाग्य को सब प्रकार से लुप्त कर रही थीं। उन गणिकाओं के
ललाट की चन्द्रलेखा पसीने से पसीज कर बहते हुए कृष्णागुरु के पङ्क के तिलक-कलंक के
कारण काली पड़ गई थीं, मानों प्रिय वचन बोलकर प्रार्थना करने में चतुर होने के कारण
सैकड़ों बार प्रिय के चरण पर सिर पटकने से वहां दाग पड़ गया हो। उनके वक्ष पर हार
उल्लसित हो रहे थे मानों वे उनके उथल-पुथल होते हुए मानस की वीचियाँ हों। वे इस
प्रकार विलास के साथ अपनी भौंहें मटकाती थीं मानों ईर्ष्या से लक्ष्मी को तर्जना दे रही
हों। मलयानल की तरह निरन्तर निकलती हुई सुगन्धित लम्बी सांसें लेतीं तो मालूम होता
कि साँसों की डोर से कुछ खींच रही हों। बकुलमाला की लम्बी-लम्बी डोर से उनके स्तन-
रूपी वृहत् कलश बँधे हुए थे जिनसे अपनी पत्नियों में होने वाले सम्राट् के समस्त संतोष-रस
को मानो वे रिक्त कर रही थीं। हांफने से हिलते हुए उनके स्तन पर हार की तरह मणियों
की किरणों से मानो वे सम्राट् के हृदय को खींच कर हठात् अपने में प्रविष्ट कर रही थीं।