हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
by महाकवि बाणभट्ट
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Read in contextकुचोत्कम्पिकाविकारप्रेङ्खितानां हारतरलमणीनां रश्मिभिराकृष्य हृदय-
मिव हठात्प्रवेशयन्तीभिः प्रभामुचामाभरणमणीनां मयूखैः प्रसारितै-
र्बहुभिरिव बाहुभिरालिङ्गन्तीभिर्जृम्भानुबन्धबन्धुरवदनारविन्दावरणी-
कृतेरुत्तानैः करकिसलयैः सरभसप्रधावितानि मानसानीव निरुन्धती-
भिर्मदनान्धमधुकरकुलकीर्यमाणकर्णकुसुमरजःकणकूणितकोणानि कुसुम-
शरशरनिकरप्रहारमूर्च्छामुकुलितानीव लोचनानि चतुरं संचारयन्ती-
भिरन्योन्यमत्सरादाविर्भवद्भङ्गुरभ्रुकुटिविभ्रमक्षिप्तैः कटाक्षैः कर्णेन्दी-
वराणीव ताडयन्तीभिरनिमेषदर्शनसुखरसराशिं मन्थरितपक्ष्मणा चक्षुषा
पीतमिव कोमलकपोलपालीप्रतिबिम्बितं वहन्तीभिरभिलाषलीलानि-
र्निमित्तस्मितैश्चन्द्रोदयानिव मदनसहायकाय संपादयन्तीभिरङ्गभङ्गवल-
नाच्चोन्यघटितोत्तानकरवेणिकाभिः स्फुटनमुखराङ्गुलीकाण्डकुण्डलो-
क्रियमाणनखदीधितिनिवहनिभेनाकिंचित्करकामुकार्मुकाणीव रुषा भञ्ज-
दघ्रियते । रसोऽभिलाषः, जलं च । बन्धुरं हृद्यम् । कूणितः संकोचितः । मदनादि-
शब्दे विद्यमानेऽपि मदनान्धेत्यभिप्रायेण कुसुमशरग्रहणम् । अत्र पक्षे कर्णपदं त्य-
ज्यते । अनिमेषदर्शनसुखरसराशिमिव श्रीहर्षम् । प्रतिबिम्बितमिति । अथ च रसो
जलादिः विमले मणिमाजनादावन्तर्वर्त्यपि प्रतिबिम्बितो लक्ष्यते । करवेणिका
उनके चमचमाते हुए आभूषणों की किरणें इस प्रकार फैल रही थीं मानो वे सम्राट् के आलि-
ङ्गन के लिए अनेक भुजाएँ पसार रही हों। जंभाई लेते हुए अपने उत्तान हाथों से मुँह ढँक
कर मानो वे वेग से निकल भागते हुए अपने चित्त को रोक रही थीं। कामांध भौरों द्वारा
विकीर्ण किये गये कान के पराग कणों से वे अपनी आंखों के कोने संकुचित कर लेतीं, मानो
वे आंखें कामदेव के बाणों के प्रहार के कारण मूर्च्छा से मुंद गई हों, उस प्रकार वे अपनी
आंखें चतुरता से चला रही थीं। आंखों से परस्पर मत्सर के कारण भौंहें पेंच कर छोड़े
गए कटाक्षों से मानो अपने कर्णोत्पलों का ताड़न कर रही हों। सम्राट् के निरन्तर दर्शन-
सुख की राशि जिसे उन्होंने अपनी निश्चल आंखों से पी रखा था मानो उनके कपोल
पर प्रतिबिम्बित हो रही थी। मानो काम की सहायता करने के लिए अभिलाषाओं
के कुतूहल से निर्निमित्त हँसी हँसकर बहुत से चन्द्रों को उदित कर रही थीं। कभी-कभी
अपने अङ्गों को तोड़-मरोड़ करते हुए हाथों की उँगलियां एक दूसरे में फंसाकर हथेली
ऊपर उठा रही थीं। उँगलियां चटका कर नखों की किरणों को कुण्डलाकार बनाते
हुए मानों काम की निकम्मी धनुहियों को क्रोध से तोड़ रही थीं। चरण दबाने वाली को,