Skip to content
SarvaKosh
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

by महाकवि बाणभट्ट

DevanagariHindipublished184 pages

Page 175 of 184

Read in context
Page 175

द्वितीय उच्छ्वासः १७३
चित्रमिदमर्त्यमरं राजत्वम् । अपि चास्य त्यागस्यार्थिनः, प्रज्ञायाः
शास्त्राणि, कवित्वस्य वाचः, सत्त्वस्य साहसस्थानानि, उत्साहस्य
व्यापाराः कीर्तेर्दिङ्मुखानि, अनुरागस्य लोकहृदयानि, गुणगणस्य संख्या,
कौशलस्य कला, न पर्याप्तो विषयः । अस्मिंश्च राजनि यतीनां योग-
पट्टकाः, पुस्तकर्मणां पार्थिवविग्रहाः, षट्पदानां दानग्रहणकलहाः, वृत्तानां
पादच्छेदाः, अष्टापदानां चतुरङ्गकल्पना, पन्नगानां द्विजगुरुद्वेषाः, वाक्य-
विदामधिकरणविचाराः, इति समुपसृत्य चोपवीती स्वस्तिशब्दमकरोत् ।
पर्याप्तः परिपूर्णः । योगपट्टका यतीनामुपकरणं पर्यङ्कबन्धनाथम् । ते यतीनां चतुर्था-
श्रमिणामेव, न पुनर्योगेन युक्ताः पट्टकाः कूटप्रधानानि लेख्यपत्राणि केषांचित् ।
एवमन्यत्रापि । पुस्तकर्म लेप्यम् । पार्थिवविग्रहा मृन्मयशरीराणि, राजभिः सह
वैराणि च । दानग्रहणं मदजलं दानम्, ऋणव्यवहारश्च । वृत्तानां गुरुलघुनियमात्म-
कानां । समाश्च समविषमाणां पादच्छेदा भागविरामाः, चरणकर्त्तनानि च । अष्टा-
पदानां चतुरङ्गफलकानाम् । 'चत्वार्य्यङ्गानि सेनाया हस्त्यश्वरथपत्तयः' तेषां
कल्पना रचना, चतुर्णामङ्गानां पाणिपादस्य च छेदः । द्विजगुरुर्गरुडोऽपि । वाक्य-
विदां मीमांसकानामधिकरणविश्रान्तिस्थानानि । राज्ञां च धर्मनिर्णयस्थानानि ।
अधिकबलो वा रणः संग्राम इति केचित् । उपवीती दक्षिणावीती करः । उक्तं च—
'उद्धृते दक्षिणे पाणावुपवीत्युच्यते द्विजः' इति ।
पक्ष की रातों) में क्षीण हो जाता है उस प्रकार के रोग आदि बहुरु दोषों के कारण आहत
या समृद्धिहीन नहीं हुए । देवताओं से भी बढ़ा चढ़ा इनका प्रभुत्व है यह देखकर आश्चर्य
होता है । और भी—इनका त्याग इतना है कि पर्याप्त याचक नहीं मिलते, इनकी
प्रज्ञा इतनी है कि शास्त्र के विषय पर्याप्त नहीं, कवित्व के सामने वाण, बल के सामने
साहस का स्थान, उत्साह के सामने व्यापार, गुणों के सामने संख्या और कौशल के सामने
कला आदि पर्याप्त विषय नहीं ठहरते । इनके शासन में यति लोग ही ( पर्यङ्कबन्ध आदि
आसन में) योगपट्ट नामक वस्त्रविशेष धारण करते थे, ( न कि इनके राज्य में जाली बनाए
हुए ताम्रपत्र थे ) । इनके शासन में मूर्तियां ही मिट्टी की बनाई जाती है ( न कि परस्पर
पार्थिवविग्रह अर्थात् राजाओं के साथ लड़ाई-झगड़े होते हैं) । भौंरे ही (हाथियों के)
दानजल के ग्रहण में झगड़ते (याचक लोग दान लेने के अवसर पर नहीं झगड़ते हैं)
वृत्त अर्थात् छन्दों के ही चरण में सम-विषम या भाग और विराम आदि छेद होते (न
कि किसी पाप-विशेष के होने से पैर काट लिए जाते थे) । शतरंज के खेल में ही सेना
के चार अङ्ग हस्ती-अश्वरथ-पैदल की कल्पना है ( न कि अपराधी के दोनों हाथ और
दोनों पैर काट लिए जाते हैं) सर्प ही द्विजगुरु (गरुड) से द्वेष रखते हैं (न कि प्रजा के